नारद भक्ति सूत्र के आधार पर प्रेम की व्याख्या करते हुए गुरूजी कहते हैं, प्रेम का वर्णन नहीं किया जा सकता, वह भाव से भी परे है। भावुकता प्रेम नहीं है, भीतर की दृढ़ता ही प्रेम है, सत्यप्रियता ही प्रेम है और असीम शांति भी प्रेम का ही रूप है. भीतर ही भीतर जो मीठे झरने सा रिसता रहता है वह भी तो प्रेम है. प्रभु हर पल प्रेम लुटा रहे हैं. तारों का प्रकाश, चाँद, सूर्य की प्रभा, पवन का डोलना तथा फूलों की सुगंध सभी तो प्रेम का प्रदर्शन है. प्रकृति प्रेम करती है, घास का कोमल स्पर्श और वर्षा की बूंदों की छुअन सब कुछ तो प्रेम ही है. वृद्ध की आँखों में प्रेम ही झलकता है शिशु की मुस्कान में भी प्रेम ही बसता है. प्रेम हर प्राणी का स्वभाव है और प्रेम से ही वे बने हैं. प्रेम ही ईश्वर है !
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Monday, December 6, 2021
Sunday, April 5, 2020
आओ मिलकर दीप जलाएं
दीप जलाकर हम पूजा करते हैं, अतिथियों का स्वागत करते हैं, दीपावली मनाते हैं पर आज रात्रि जो दीपक हम जलाने जा रहे हैं उसके पीछे कितने ही कारण छुपे हैं. सबसे पहला कारण है भारत के नागरिकों की एकता और अखंडता की शक्ति का जागरण. संगठन में कितनी शक्ति है यह सर्वविदित है, जब हम सभी एक ही संकल्प लेकर दीपदान करेंगे तो उस संकल्प की शक्ति कितने गुणा बढ़ जाएगी, इसका अंदाजा अभी हम नहीं लगा सकते. मन एक ऊर्जा है, इसे सकारात्मक भी बनाया जा सकता है और नकारात्मक भी, जैसे एक ही विद्युत शक्ति से हम हीटर भी चलाते हैं कूलर भी, इसी तरह हमारे मन की शक्ति का उपयोग दोनों प्रकार से किया जा सकता है. सकारात्मकता और उत्साह आज हम सबकी सबसे बड़ी आवश्यकता है. जिस आपदा का सामना हम कर रहे हैं, उसे देख नहीं सकते, कब तक और कैसे उस पर विजय मिलेगी यह किसी को भी ज्ञात नहीं, ऐसे अनिश्चय के वातावरण में यदि हमारे मन सकारात्मक विचारों और शुभ भावनाओं से संयुक्त रहेंगे तभी हम अपना और अपने परिवार, समाज और राष्ट्र का तथा अंततः इस विश्व का कुछ भला कर सकते हैं. हर नकारात्मक विचार हमारी ऊर्जा को व्यर्थ ही नहीं करता उसे काटता भी है. अतः आज रात्रि नौ बजे हम सभी एक शुभ संकल्प हृदय में लेकर परमात्मा से प्रार्थना करेंगे और स्वयं की शक्ति को जगायेंगे. इसका सुखद परिणाम हमें निकट भविष्य में शीघ्र ही देखने को मिलेगा.
Sunday, September 29, 2019
अमन हुआ जो मुक्त वही है
जब तक मन संकुचित है वह डोलेगा
ही, ऐसा मन अशांति का ही दूसरा नाम है. जो मन दिखावा करता है, तुलना करता है, वह
उद्ग्विन हुए बिना नहीं रहेगा. स्वार्थ से भरा हुआ मन भी अकुलाहट से भर जाता है. विशाल
मन का अर्थ है अमनी भाव में आ जाना. संत कहते हैं अमन हुए बिना समाधान नहीं मिलता.
क्योंकि मन होने का अर्थ ही है अहंता का होना, जो है वह अपने अस्तित्त्व की रक्षा
के लिए अन्य का विरोध करेगा ही, इसीलिए सिर काटने और घर जलाने की बात कबीर कह गये
हैं. मन के मिटे बिना आत्मिक शांति का अनुभव नहीं किया जा सकता. चेतना जब पूर्ण
विश्राम में होती है, अर्थात समाधि में होती है, तब मन खो जाता है. जब हम
विचारधारा में बह जाते हैं मन के प्रभाव में होते हैं, जब हम विचार के साक्षी होते
हैं, अप्रभावित बने रह सकते हैं. किंतु समाधि का अनुभव शून्यता में ही किया जा
सकता है.
Sunday, July 28, 2019
गुरू की महिमा कौन बखाने
शब्द
अधूरे हैं, अल्प सामर्थ्य है शब्दों में. भाव गहरे हैं, अनंत ऊर्जा है भावों में, किंतु गुरू
के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी हो तो भाव भी कम पड़ जाते हैं. वहाँ तो मौन ही शेष
रहता है. जब उसके हृदय से साधक का हृदय जुड़ जाता है तो मौन में ही संवाद घटता
है. गुरू के शब्द और कर्म प्रेम से ही उपजे हैं. वह नित जागृत है, करुणा, प्रेम और
जीवन के प्रति उत्साह के भाव उसके हृदय में लबालब भरे हैं. उसका ज्ञान एक पवित्र
जल धारा की तरह साधकों के मनों को तरोताजा कर देता है. उसके हृदय का वृक्ष शांति,
सुख और आनंद के फलों से लदा है, जो वह बेशर्त प्रदान करता है. उसकी आँखों में
प्रेम की मस्ती है, आत्मा में बेशकीमती खजाना है, जो वह लुटा रहा है. वह साधकों के
अंतर में साधना का बीज बोता है, जो भी व्यर्थ है उसे उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित
करता है, जो भी अच्छा है, उसे बाड़ लगाकर सहेजने के लिए कहता है. उसके भीतर से
जो स्वर्गिक संगीत निकलता है, उसे सुनकर साधक जीवन के सुन्दरतम रूप को देखते हैं.
उसकी आत्मा के प्रकाश में भीग कर उनमें भी भीतर जाने की ललक जगती है, पावों में
पंख लग जाते हैं, मन जीवन के प्रति तीव्र चाह से भर उठता है.
Thursday, June 15, 2017
अति सर्वत्र वर्जयेत्
मन को नकारात्मकता से मुक्त करने लिए पहला कदम है उचित श्रम और दूसरा एकाग्रता. यदि
समय अधिक है और करने के लिए काम कम है तो जाहिर है मन व्यर्थ की चहलकदमी करेगा ही.
जितनी समय मन किसी काम में एकाग्र रहता है, कोई अनचाहा भाव या विचार उसमें नहीं
आता. यदि काम सीमा से अधिक है तो मन थका रहेगा और सकारात्मक विचारों को ग्रहण नहीं
कर पायेगा. जीवन में एक अनुशासन साधना के पथ पर चलने के लिए पहली सीढ़ी है. एकाग्र
मन अपनी ऊर्जा को बचाता है और यही ऊर्जा ध्यान में प्रवेश करने के लिए उपयोगी होती
है. ध्यान हमें अपने भीतर की गहराई में ले जाता है जहाँ जाकर हम सहज ही प्रसन्नता
व शांति का अनुभव कर सकते हैं.
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भाव,
मन,
विचार
Monday, May 15, 2017
भाव भरा जब अंतर होगा
१५ मई २०१७
ऋषि कहते आये हैं भाव
यदि शुद्ध होंगे तो विचार रूपी वृक्ष भी शुद्ध होंगे और कर्मों के फल भी उन्हीं
वृक्षों पर लगेंगे. भविष्य में उन कर्मों के फल रूप सौभाग्य हमारी ही थाती होगा. आज
की पीढ़ी के मस्तिष्क को हम सूचनाओं से भरते जाते हैं पर उनके भाव पक्ष की तरफ
ध्यान ही नहीं देते. भाव गहराई से आते हैं और शब्द ऊपर-ऊपर से, वे एक सजावट से
ज्यादा काम नहीं करते, वे प्रामाणिक भी नहीं होते. बचपन से ही हम उन्हें प्रतिद्वंद्वी
होना सिखाते हैं, जिससे हृदय पीछे छूट जाता है. ऐसा प्रतीत होता है मानो सदा ही वे
एक दौड़ में रत हों. इसीलिए आज समाज सम्पन्न तो हो रहा है पर तनाव ग्रस्त भी.
Friday, January 2, 2015
मन उसकी छाया बन जाये
अगस्त २००७
शरीर,
श्वास, मन, प्राण, भाव ये पांच मिलकर हमारा जीवन है. भाव वे सूक्ष्म स्पंदन हैं जो
भीतर से आकर स्थूल देह को संचालित करते हैं. देह प्राण ऊर्जा से ही बलवान बनती है.
प्राण ऊर्जा कम होने पर ही मन बेचैन रहता है. श्वास भी अनियमित हो जाती है. इस
प्राण ऊर्जा को बढ़ाने के तरीके ही धर्म हमें सिखलाता है. प्राणायाम, ध्यान साधना
आदि इसे बढ़ाने के साधन हैं. भाव भी शुद्ध तभी होते हैं जब प्राण ऊर्जा सबल हो. भाव
के अनुसार ही विचार होंगे. मन तब मित्र होगा, कृतज्ञ होगा, जगत में सुख बांटने
वाला होगा. वर्तमान में रहेगा. हर पल आत्मा की सुगंध से भरा होगा. उससे आती शीतल
हवा की छुअन को महसूस करेगा. इस जगत की वास्तविकता को जानने वाला होगा.
Friday, December 12, 2014
एक नूर ते सब जग उपज्या
जुलाई २००७
हमारी
साधना इस जन्म में जहाँ तक पहुंचती है, अगले जन्म में वहीं से आरम्भ हो जाती है.
हमारी साधना का एक मुख्य भाग है किसी को भी दोषी नहीं देखना, यदि हम किसी को दोषी
मान लें तो फौरन मन को निर्मल कर लेना चाहिए ! हर पल हमारी ऊर्जा रिस रही है
क्योंकि हम अज्ञानावस्था में रहते हैं, स्वयं को देह मानते हैं. जब ज्ञान होता है
और स्वयं को आत्मा मानते हैं तब हमारी ऊर्जा नहीं घटती. जिसकी भाव शुद्धि हो गयी
है उसको मृत्यु का भय नहीं सताता.
Monday, November 17, 2014
भावना हो शुद्ध अपनी
मई २००७
संत कहते हैं, मृत्यु से
हमें भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, हम तो हर पल उसकी ओर कदम दर कदम चल ही रहे
हैं. हर श्वास जो बाहर जाती है, वह छोटी मृत्यु ही है. एक नियम के अनुसार हमारी
मृत्यु होनी ही है, जो अवश्यम्भावी है उससे डरना व्यर्थ है. हमारे भीतर गुप्तचित्र
है, जिसके आधार पर हमारा अगला जन्म होता है. इस प्रकृति में सभी कुछ स्वभाव से हो
रहा है, पर अहंकार यह मानता है कि वह कर्ता है, यही कर्म बाँधता है. जो कर्म हम
वर्तमान में बांधते हैं वह भविष्य में फल रूप में सामने आते हैं. मन, वचन, काया की
जो भी क्रिया हम करते हैं वह सभी पूर्व के कर्मों के फलस्वरूप ही मिले हैं. सजग
रहकर हम कर्म करने में बदलाव ला सकते हैं, हम इस जीवन में क्षण-प्रतिक्षण जैसा भाव
बनाते हैं वही बंधता है, यदि भाव शुद्ध हो तो कर्म नहीं बँधते और हम मुक्ति की तरफ
ही बढ़ते जाते हैं.
Wednesday, August 6, 2014
शुभता ही प्रकटे जीवन से
जनवरी २००७
हमारा
तन वेदिका है. प्राणों को हम भोजन की आहुति देते हैं. प्राणाग्नि बनी रहे, देह
दर्शनीय रहे, पवित्र रहे इसलिए सात्विक और अल्प आहार ही लेना है. इंद्र हाथ का देव
है, सो कर्म भी ऐसे हों जो भाव को शुद्ध करें. मुख के देव अग्नि हैं, अतः वाणी भी
शुभ हो. अतियों का निवारण ही योग है. योग से मन प्रसन्न रहता है और भीतर ऐसा प्रेम
प्रकटता है जो शरण में ले जाता है. सन्त हमें जगाते हैं और हम जग कर पुनः सो जाते
हैं. हमें संकल्प करना है कि अशुभ से बचे, क्यों कि अशुभ विष है और हमें जीना है. व्यवहार
क्षेत्र में पहले भाव फिर क्रिया होती है पर अध्यात्म क्षेत्र में पहले क्रिया
पवित्र हो तो भाव अपने आप पवित्र होने लगते हैं. श्रवण या पठन क्रिया है पर श्रवण
के बाद मनन फिर निदिध्यासन होता है.
Wednesday, June 25, 2014
भोले भाव मिले गोपाला
अगस्त २००६
हमारा अंतर्जगत
अति विशाल व सूक्ष्म है और उसमें प्रतिपल कितना कुछ घटता रहता है. इसका मूल तत्व
मन नहीं भाव है, भाव की संवेदना बहुत दूर तक जाती है, जहां मन नहीं पहुँचता,
बुद्धि नहीं पहुंचती, वहाँ भाव के सूक्ष्म कण पहुंच जाते हैं. मन व बुद्धि भी
अंतर्भाव से प्रभावित होते हैं, अतः इसकी शुद्धि का सदा ध्यान रखना होगा. भीतर की
यात्रा पर जब साधक जाता है तो उसे विचारों के पार भावों के सूक्ष्म लोक में प्रवेश
करना होता है. भाव धारा को बदले बिना विचार धारा बदली नहीं जा सकती और विचारों पर
ही कर्म आधारित हैं, तथा कर्मों पर हमारा भविष्य, अतः भाव शुद्धि के बिना हम सुखद
भविष्य की आशा नहीं रख सकते.
Monday, May 12, 2014
सहज हुए सब कर्म करें
फरवरी २००६
मिथ्या
पुरुषार्थ कर्मों को बाँधने वाला है, वास्तविक पुरुषार्थ कर्मों से हमें छुड़ाता
है. आनन्द का प्रदाता है, और यह तब होता है जब हम स्वयं को जान लेते हैं. तब बाहर
से सारे कार्य करते हुए भी हम भीतर से विरक्त ही रहते हैं. कर्तृत्व व भोक्तृत्व
तब शेष नहीं रहता. बाहर हम जो भी कर्म करते हैं वे तो फल हैं, भीतर जो भाव बनते हैं,
वे ही बाँधते हैं. हमारे भीतर के भाव ही भावी को जन्म देते हैं. आत्मा में जो
स्थित रहता है, उसके जीवन में जो भी घटता है वह सहज ही स्वीकार्य हो जाता है. उसके
भीतर कर्मों की होली जलती है और बाहर प्रेम का रंग चढ़ता है.
Tuesday, February 25, 2014
श्रद्धा रूपी बेलि फूले जब
अगस्त २००५
साधना
के द्वारा पहले मन से हमें हृदय की ओर जाना है, भाव जगत में जाना है, अंततः भाव से
भी परे शून्य में जाना है. एक बार इस शून्यता का अनुभव हो जाने के बाद मन सदा ही
उससे जुड़ा रहता है. जगत में उतना ही व्यवहार करता है जितना आवश्यक हो. श्रद्धा तथा
विश्वास के सहारे–सहारे वह ऊपर चढ़ता है. यह विश्वास कि वह सदा हमारे साथ है, हमें
अनेक संकटों से उबार लेता है. शास्त्र हमें प्रेरणा देते है, संतजन प्रेम देते हैं
और हमारे मन में श्रद्धा जितनी दृढ होती है, कृपा का अनुभव उतना ही अधिक होता है.
Sunday, July 28, 2013
भाव युक्त हों कर्म हमारे
हमें भाव सहित क्रिया का विकास करना है, जिस समय जो काम
करें उसी में मन रहे. इसके लिए मस्तिष्क को आदेश तब देना होगा जब मन शांत है, तब
हमारा अवचेतन मन हमारे सुझाव को पकड़ लेगा, तब चेतन व अवचेतन में कोई विरोध नहीं
रहेगा. हमारे कार्यों तथा वाणी में कोई विरोध नहीं रहेगा. भावना के साथ की गयी
क्रिया ही हमें मुक्त करती है. एकाग्र होकर खाना ही हमारे भोजन को पचाता है.
कभी-कभी हम देखते हैं की सारी क्रिया व्यर्थ चली जाती है, क्योंकि अचेतन में
अनेकों धारणाएं, पूर्वाग्रह, विचार तथा स्मृतियों का खजाना है वह यदि चेतन के
विरुद्ध हो तो क्रिया फलदायक नहीं होती. दोनों मनों का भेद जब मिट जाये, हम जो
सोचें वही करें, तो ही हम साधक कहलाने योग्य हैं.
Tuesday, July 16, 2013
भावपूर्ण हो पल पल अपना
संतजन कहते हैं, भाव शून्य क्रिया फलित नहीं होती, हम
क्रिया तो करते हैं पर मन कहीं और है. आहार का ध्यान, तत्वों का शरीर में उचित
मात्रा में होना पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करता है. जिस व्यक्ति में पृथ्वी तत्व
अधिक है, उसमें नकारात्मक भाव बढ़ जाते हैं, अग्नि तत्व अधिक होने से सहन शक्ति कम
होने लगती है. हमारे भीतर मन, शरीर तथा चैतन्य आपस में जुड़े हुए हैं और एक का
प्रभाव दूसरे पर पड़ता ही है, मन यदि स्वच्छ हो तभी चैतन्य को प्रकट होने का अवसर
मिलता है, मन स्वस्थ तभी होगा जब शरीर रोग मुक्त हो, अन्यथा मन उधर ही लगा रहेगा.
साधना में एकाग्रता नहीं होगी. भाव साधना के लिए भी मन की उर्वर भूमि चाहिए, कोई
चिंता या द्वंद्व यदि मन में है तो भाव नहीं जगते. अतः साधक को मनसा, वाचा, कर्मणा
हर क्षण, हर क्षेत्र में सजग रहना होगा.
Friday, February 1, 2013
देह से विदेह तक
हमारी आत्मा के उद्घाटन के लिए ही साधना के पथ पर संत हमें ले जाते हैं. उनके
निर्देशन में हम पग-पग कदम बढ़ाते हुए अपने लक्ष्य तक पहुंचते हैं. लक्ष्य यदि
स्पष्ट हो और मार्गदर्शक साथ हो तो हर कोई उसे पा सकता है. हमारे अस्तित्त्व की
सात परतें हैं-शरीर, श्वास, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व आत्मा. मानव जन्म को हम तब सफल मान सकते हैं जब शरीर से आत्मा तक
पहुंचें. आत्मा के नैसर्गिक गुण हैं- प्रेम, आनंद, सुख, शांति, शक्ति, ज्ञान और
पवित्रता. तब वीतरागता, दया, करुणा आदि सहज ही भीतर होते हैं और हम अन्याय कर ही
नहीं सकते., हम समाज के लिए उपयोगी हो सकते हैं. आगे बढ़ सकते हैं जहाँ भावधाराएँ
उत्पन्न होती हैं. हाइपोथैलेमस यदि सक्रिय है तभी हृदय का होना सार्थक है, ध्यान
से यह सहज ही होता है. यह अंतरिक्ष शब्दों से भरा है पर ज्यादातर शब्द व्यर्थ ही
हैं. ऐसे शब्द जो हमारे भावों को उच्चता के लिए प्रेरित करें वही सार्थक हैं, और तभी
हमारे मुख से निकले शब्द भी सार्थक होंगे जब वे बिना राग-द्वेष के बोले गए हों.
यदि मानसिक, वाचिक तथा कार्मिक कृत्यों के प्रति हम सजग हों तभी ऐसा हो सकता है.
हमारा ऐसा मन जो किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है, तथा ऐसी बुद्धि जो निष्काम कर्म
करने का संदेश दे, आत्मा में ले जाते हैं, तब मन अमन में ठहर जाता है और बुद्धि
प्रज्ञा में बदल जाती है. तब मन दाता हो जाता है, सुख चाहिए का उसका राग स्वतः
शांत हो जाता है, ऐसे मन में कैसा भय और कैसा संकोच, वह मन सिर्फ प्रेम ही कर सकता
है. आनंद ही बाँट सकता है.
Tuesday, January 15, 2013
ध्यान परम पूजा है
हमारा व्यक्तित्व समग्र हो अर्थात हम सुसम्पन्न तथा शील सम्पन्न दोनों हों इसके लिए
आवश्यक है की हम ज्ञान, क्रिया, प्रेम, कामना, इच्छा में समन्वय करें, संतुलन
रखें. हम शरीर, मन और आत्मा हैं, तीनों का उत्तम स्वास्थ्य हमारा लक्ष्य है. हमारे मस्तिष्क में भाव केन्द्र पृथक है तथा विचार केन्द्र
पृथक, दोनों का विकास आवश्यक है, ध्यान के द्वारा हम भावना को पुष्ट करते हैं.
ध्यान में भीतर कुछ घटता है जो उस वक्त तो स्पष्ट नहीं होता परन्तु बाद में उसका
प्रभाव अवश्य देखा जा सकता है. हमारी निरीक्षण क्षमता बढ़ जाती है, हम वस्तुओं को
उनके सही रूप में देखने लगते हैं, मन शांत रहता है, विचार आते तो हैं पर शीघ्र ही
हम उनकी उपयोगिता या व्यर्थता पहचान कर उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करते हैं.
हमारा मन तब सजग रहता है, ध्यान भीतर छुपी जन्मों की वासनाओं का शमन करता है. एक
मुख्य विचार रह जाता है, जो वास्तव में हमारे ही भीतर है, जो हमारा आधार है, मल,
विक्षेप तथा आवरण की वजह से हम उसे देख नहीं पाते, हमारे मन का पानी चंचल है तथा उस
पर काई जमी है, ध्यान एक-एक कर इन्हें दूर करता है, और तब आत्मा का प्रतिबिम्ब
उसमें दीख पड़ता है.
Wednesday, September 19, 2012
रोम रोम जब उसे पुकारे
अगस्त २००३
साधक के जीवन में अनुशासन की अत्यधिक आवश्यकता है, समय की पाबंदी रहे, उसका
सदुपयोग हो, उसके महत्व को जानते हुए हम कर्म करें. प्रातः उठकर यदि सभी के लिए मंगल
कामना हो तो दिन भर उसकी सुगन्धि मिलती है. भाव और विचार ही वाणी व कर्म को जन्म
देते हैं. वह पुण्यों की खेती करे ऐसे ही बीज बोये जिसके फल सुखकारी हों. हर अशुभ
कर्म, वाणी अथवा सोच दुःख का वह बीज होता
है जो हम स्वयं ही बोते हैं और भविष्य में उसका फल हमें ही काटना होता है. आज
हमारे जीवन में जो भी दुखद घटता है वह हमारे ही कर्मों का प्रतिफलन है. ऐसा मन
जिसे सत्य की आकांक्षा हो उसमें कोई विकार आए भी क्यों, परम सत्य शुद्धता चाहता
है, खोट, कपट, मिलावट, दम्भ, छल अथवा झूठ उसे नहीं भाते, वह हमारे मन को निर्मल
देखता है तभी अपने कदम वहाँ रखता है. हमारे हृदय में उसके लिए पुकार, प्यास, चाह
कितनी गहरी है, इसका पता उसे चल जाता है, जिस क्षण हम विकारग्रस्त होते हैं अथवा तो
निर्मल होते हैं तत्क्षण हमें अनुभव होता है. उसकी कृपा तभी होती है जब हमारे
रोम-रोम से उसकी चाह उठती है. तभी वह जिस भी परिस्थिति में रखे, उसे स्वीकारते हुए
समता की भावना बनाये हुए और अंतर में उसके प्रेम को अनुभव करते हुए साधक इस जगत
में व्यवहार करता है.
Friday, July 6, 2012
कर्म की कला
मई २००३
हमारे कर्म मात्र हमारा ही उत्थान-पतन नहीं करते हैं वरन् वे हमारे आसपास के
वातावरण के उत्थान-पतन के प्रति जिम्मेदार हैं, हमारी संतति को भी वे प्रभावित
करते हैं. कर्म शुद्ध होंगे तो भविष्य ज्ञानमय होगा. मूल्यों के प्रति प्रतिबद्दता
होगी तो ही ज्ञान हमारा सहायक होगा, कोरा ज्ञान हमें कहीं नहीं ले जाता. हमारे कर्म ही हमारे आंतरिक भावों को प्रकट
करते हैं. मनसा-वाचा-कर्मणा जो एकरस है भीतर-बाहर एक सा उसे अपने कहे, किये या
सोचे पर एक क्षण के लिये भी पछताना नहीं पड़ता. सहज भाव से जो भी मार्ग में आये उसे
अपने विकास के लिये साधित कर लें तो जीवन में अर्थ की सुगन्धि भर जाती है.
Tuesday, April 17, 2012
प्रेम जगाए भाव अनोखे
मिथ्या अहंकार के कारण हम स्वयं को एक लघु इकाई मान बैठते हैं, पर जब हृदय प्रेम से परिचित होता है तो अहंकार गल जाता है. सभी अपने लगते हैं. सभी के भीतर वही एक चैतन्य दीख पड़ता है. हम स्वयं को विशाल अनुभव करते हैं. यह भाव अनोखा है. कोई सुंदर दृश्य देखकर एक क्षण के लिये श्वास भी थम जाती है, कभी किसी के आँसू देखकर जो सूक्ष्म भाव मन में उठते हैं, उस कान्हा की कोई कथा याद आने पर कभी मुस्कान तो कभी आँखों से जल बहता है, ये सभी प्रेम के ही रूप हैं. यह संसार उसकी लीला है, यह सोचकर जो कौतूहल होता है, इस विशाल ब्रह्मांड को अरबों, नक्षत्रों, और नाना जीवों को धरा पर चलते-फिरते देखकर कितना अचरज होता है, फिर हमारा स्वयं का मन..एक क्षण में कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है. आत्मा की सुंदरता, जो ध्यान में दीख पड़ती है. हमारे भीतर का संगीतमय सुंदर संसार...यह सब कितना विचित्र है. और कितने भाग्यशाली हैं हम कि यह सब देख पा रहे हैं.
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