जो एक रस है, अपार है,
सदा साथ है. जो जागृत है, प्रेममय है, सदा सुख है. जो सहज है, सदा पुकार दे रहा है,
सच्चा मित्र है, वही जीवन में बहार है. जो सदा खुला हुआ द्वार है, सबको समो लेता
है, जिसके बिना जीवन असार है. वही जीवन का आधार है.
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Thursday, August 27, 2015
Friday, January 2, 2015
मन उसकी छाया बन जाये
अगस्त २००७
शरीर,
श्वास, मन, प्राण, भाव ये पांच मिलकर हमारा जीवन है. भाव वे सूक्ष्म स्पंदन हैं जो
भीतर से आकर स्थूल देह को संचालित करते हैं. देह प्राण ऊर्जा से ही बलवान बनती है.
प्राण ऊर्जा कम होने पर ही मन बेचैन रहता है. श्वास भी अनियमित हो जाती है. इस
प्राण ऊर्जा को बढ़ाने के तरीके ही धर्म हमें सिखलाता है. प्राणायाम, ध्यान साधना
आदि इसे बढ़ाने के साधन हैं. भाव भी शुद्ध तभी होते हैं जब प्राण ऊर्जा सबल हो. भाव
के अनुसार ही विचार होंगे. मन तब मित्र होगा, कृतज्ञ होगा, जगत में सुख बांटने
वाला होगा. वर्तमान में रहेगा. हर पल आत्मा की सुगंध से भरा होगा. उससे आती शीतल
हवा की छुअन को महसूस करेगा. इस जगत की वास्तविकता को जानने वाला होगा.
Wednesday, May 14, 2014
मित्र वही जो बने सहायक
मार्च २००६
जीवन
में कोई एक मंत्र हो, एक मित्र हो और एक सूत्र हो जो हमारी रक्षा करे. मंत्र, मित्र
तथा सूत्र तीनों एक भी हो सकते हैं, एक ही सद्गुरु में समा सकते हैं जो हमारी
रक्षा करता है. आत्मा भी एक मंत्र है, मित्र भी वह है, और सूत्र तो वह है ही. जो
आत्मा में वास करता है सदा उसकी रक्षा होती है. ईश्वर भी हमारा मित्र है, उसका नाम
मंत्र है, उसका ‘ध्यान’ ही सूत्र है. हमारा नेत्र भी मंत्र, मित्र तथा सूत्र हो
सकता है. हमारी दृष्टि जितनी पवित्र होगी उतनी ही हमारी रक्षा होती रहेगी.
दृष्टिकोण सकारात्मक हो, भाव उच्च हों तो हमारा अनिष्ट कैसे हो सकता है. हमारी
दृष्टि जब धूमिल हो जाती है, चीजों को हम उनके सही रूप में नहीं देखते तभी हमारा
अंतःकरण मलिन होता है. मूल रूप में सब पवित्र है. हमारा जीवन आनंद के लिए है,
प्रभु को प्रेम करते करते त्याग करते हुए ग्रहण करने के लिए है न कि संसार के पीछे
भागकर दुखी होके जीने के लिए.
Sunday, August 19, 2012
तुलसी ममता राम से
जुलाई २००३
तुलसी ममता राम से समता सब संसार ! इस जगत में सम भाव से रहना आ जाये तो राग, द्वेष
आदि दुखद विकार मन से नष्ट हो जाते हैं. संसार का चिंतन अंतः करण की मलिनता है और
भगवद् चिंतन अंत करण की शुद्धि है, पहले का परिणाम भय, दुःख ही होने वाला है और
दूसरे का परिणाम मंगलकारी ही. हमारे भीतर वह परमात्मा मित्र रूप में है, जैसे दो
पक्षी एक डाल पर बैठे हों. यह विचार ही हमें आनंद देता है कि वह हमारे निकटस्थ है,
एक बार उसे सच्चे दिल से पुकारें तो वह झट अपनी उपस्थिति जताता है, ऐसा रस बरसता
है कि हमें उसके अमृत स्वाद का अनुभव होने लगता है. बल्कि वह तो यह भी जानता है कि
हम उसे पुकारने वाले हैं, हमारे विचारों को वह हमसे पहले ही जान जाता है. ऐसे रस
का पान करने के लिये ही साधना का पथ सदगुरु बताते हैं, ध्यान में हम उसको अपने
सम्मुख पाते हैं, उसने हमें गुणात्मक रूप से अपने समान बनाया है.
Wednesday, August 8, 2012
प्रेम जो बन जाता है भक्ति
जुलाई २००३
भक्त के हृदय में पूर्ण विश्वास होता है कि ईश्वर उससे प्रेम करता है. परमात्मा के
वचन उसे बदल देते हैं. वह अनंत है और उसकी महिमा अवर्णनीय है, वह इतना महान है फिर
भी वह भक्त को इस योग्य समझता है कि वह उसकी कृपा पाए. वह उसका मित्र है उसकी
आत्मा का रक्षक. वह उसकी हर श्वास में है, वही उसके तन में रक्त बन कर प्रवाहित हो
रहा है. भक्त उसी से है, वह इतना प्रिय है कि उसका नाम ही जीवन को सुंदर बना रहा
है. वह भक्त से दूर तो नहीं फिर भी उसकी आँखों में उसके लिये आँसुओं की झड़ी लग
जाती है. कभी उसकी याद आती है तो मन कृतज्ञता से भर जाता है. कभी उसको याद करके
अधर मुस्कुराने लगते हैं, वह उसे शक्ति और सामर्थ्य से भर जाता है. वह हर क्षण उसे
आगे ले जाना चाहता है. उसने भक्त के हृदय में प्रेम का बीज बोया है, सभी के प्रति
प्रेम ! जो अब विशाल वृक्ष बन गया है, उसकी दृष्टि में सभी कुछ उसी चैतन्य के कारण
हो रहा है. पंछियों का कलरव हो अथवा मानवों की भाषा, वही तो हर जगह बोल रहा है.
Tuesday, March 13, 2012
नन्हा सा ? यह मन बेचारा
जनवरी २००३
सत्य के साधक को आपने मन पर नजर रखनी होती है, हमारे मन में एक पल में न जाने कितने विचार आकर चले जाते हैं, जिनके बारे में हम कभी ध्यान ही नहीं देते. ध्यान करते-करते मन जब दर्पण जैसा बन जाये तो भीतर का सारा खेल उसमें झलकने लगता है, तब सूक्ष्म से सूक्ष्म बात भी छिप नहीं सकती. मन ही हमारा शत्रु है और मन ही हमारा मित्र है, सारी साधना इसी मन को केन्द्र में रखकर होती है. हर पल का हमारा साथी है मन, पर इसकी गहराइयों में क्या छिपा है हम नहीं जानते. विचित्र हैं इसकी गतिविधियां. आत्मा की शक्ति ही है मन, हमें आत्मा का संचय करना है अर्थात मन का संचय करना है. व्यर्थ के चिंतन में न लगाकर अपने लक्ष्य पर केंद्रित करना है. ध्यान से ऊर्जा का संचय होता है जो हममें कर्म करने का सामर्थ्य बढ़ाती है. मन की सीमा नहीं और इसीलिए इसको असीम प्रेम, ज्ञान व शांति से ही संतुष्ट किया जा सकता है ससीम वस्तुओं से नहीं.
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