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Monday, March 26, 2018

साधो सहज समाधि भली


२६ मार्च २०१८ 
हम अपने आंतरिक जीवन से जिस विश्वास से मिलते हैं, बाह्य जीवन भी उसी विश्वास से हमारा स्वागत करता है. वास्तव में हमारा स्वयं के साथ जितना और जैसा संबंध है, वैसा ही बाहर के जगत में हमारे साथ घटित होता है. यदि कोई भय से ग्रस्त है तो उसे अपने जीवन में ऐसी परिस्थितियों से दोचार होना पड़ सकता है जिसमें उसे भय का सामना करना पड़े. सभी के मूल में एक ही सत्ता है, पर हर व्यक्ति अपनी मान्यताओं, धारणाओं और भावनाओं के अनुसार ही उसे अभिव्यक्त करता है. ध्यान में जब शंकालु, चंचल मन शांत हो जाता है, तब कुछ क्षणों के लिए सहज प्राप्त निजता का अनुभव होता है. यह सहजता स्वयं का स्वभाव बन जाये इसी लिए जीवन में साधना की आवश्यकता है.

Wednesday, January 24, 2018

रहे ऊर्जित हर पल अपना

२४ जनवरी २०१८ 
जीवन एक ऊर्जा है, जो हजार-हजार रूपों में स्वयं को व्यक्त कर रही है. मानव इस उर्जा को पहचान कर उसे दिशा दे सकता है. जब तक हम स्वयं को नहीं जानते नियति के द्वारा संसार सागर में इधर-उधर बहाए जाते हैं. हमारे कर्म पूर्वाग्रहों से संचालित होते हैं, जो पूर्व संस्कारों के कारण बनते हैं. न चाहते हुए भी हम मनसा, वाचा, कर्मणा स्वयं दुःख पाते हैं और अन्यों को दुःख देने के साधन बन जाते हैं. एक बार अपने भीतर इस ऊर्जा को अनुभव करने के बाद भीतर स्वराज्य का जन्म होता है. यही असली मुक्ति है. विकारों, संस्कारों, मान्यताओं और विश्वासों से मुक्त होते ही ऊर्जा खिलने लगती है और जीवन के एक नये आयाम से परिचय होता है.

Tuesday, December 13, 2016

सहज हुआ मन है संतोषी

१४ दिसम्बर २०१६ 
किसी भी बात अथवा घटना को देखने के कम से कम दो नजरिये होते हैं, अधिक से अधिक तो अनेक हो सकते हैं. इसका अर्थ हुआ यदि  दो व्यक्तियों में आपस में विवाद हो रहा हो तो दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही हो सकते हैं. अपनी बात रखते हुए कोई यदि इस सत्य को भी स्मरण कर ले तो एक पल में उसके भीतर सहजता का जन्म हो जाता है और यही सहजता धीरे-धीरे संतोष में बदलने लगती है. संतोष ध्यान को जन्म देता है और ध्यान पुनः हमें सहज बनाता है और यह  सहजता इस जगत के प्रति अटूट विश्वास को जन्म देती है.

Thursday, April 10, 2014

एक अनोखा खेल चल रहा

जनवरी २००६ 
ईश्वर की ओर चलना आरम्भ तो करें सारी सृष्टि सहायक हो उठती है. जो जगत का नियामक है, नियंता है, आधार है उसे अपना मान लें तो जगत का विरोध स्वतः समाप्त हो जाता है, भीतर यदि विश्वास हो तो सारे मार्ग सुगम हो जाते हैं. ईश्वर से की गयी कोई भी प्रार्थना विफल नहीं जाती, वह तत्क्ष्ण उत्तर देता है. वह जो हमारे भीतर है, साक्षी है, वह जो हमें हमसे भी अधिक जानता है. हम क्या हैं, उसी के अंश हैं, उसी ने हमें रचा है, कारीगर जैसे अपने खिलौने को जानता है वैसे ही ईश्वर हमारी रग-रग से वाकिफ है. जब हम सारा अहंकार ( अहंकार करने लायक कुछ भी नहीं है हमारे पास) उसकी शरण में जाते हैं तो वह जो पहले से ही हाथ फैलाये बैठा है, हमें स्वीकार लेता है. हम जैसे हैं वैसे ही. उसे हमसे कोई अपेक्षा नहीं, वह हमसे कोई शिकायत भी नहीं करता, लेकिन हम उसके पास जाने से डरते हैं, हमें स्वयं पर विश्वास नहीं है, उस पर भी विश्वास नहीं करते. न जाने कितने काल से हम यह खेल खेलते आये हैं, न जाने कितनी बार हम उसके द्वार पर जाकर लौट आये हैं. हम अपने हर दुःख के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं. यह जगत अद्भुत है, अद्भुत है ईश्वर की व्यवस्था भी, हम सत्य को जानते नहीं तभी व्यथा के शिकार होते हैं. सद्गुरु की कृपा से जब भीतर ज्ञान होता है, संशय मिट जाते हैं, मन खाली हो जाता है तब यह जीवन उत्सव बन जाता है. हर घड़ी, हर पल एक नवीन उत्साह का अनुभव होता है. 

Friday, March 28, 2014

भेद-अभेद का खेल अनूठा

नवम्बर २००५ 
स्वरूप में अभेद है पर संबंध में भेद होगा ही. भक्ति में भेद का अर्थ है मर्यादा, भक्त और भगवान के मध्य भी द्वैत का अर्थ एक मर्यादा है, एक सुव्यवस्था है. जब हम पूजा करते हैं तो भी एक दूरी रहती है. जब हम प्रभु के साथ कोई संबंध बनाते हैं तो भी एक भेद रह जाता है. वह हमारी माँ, पिता, सखा, गुरू कुछ भी हो सकता है, एक भेद तब भी रहता है. गुरु शिष्य के बीच में भी एक भेद रहता है, तभी भक्ति रहती है. जिसकी भक्ति करें वहाँ विश्वास है और भक्त में श्रद्धा है. जिस श्रेष्ठ का हम वरण करें तो उसमें विश्वास हो तथा हममें श्रद्धा हो, यह भी भेद है. वह अंशी है तथा हम अंश हैं, वह गगन सदृश है हम जड़ पृथ्वी हैं. यह जगत ब्रह्म है हम सेवक हैं, यह भेद है. पर जो इस भेद का राज जानता है वह अभेद को पार करके ही आता है.

Tuesday, February 25, 2014

श्रद्धा रूपी बेलि फूले जब

अगस्त २००५ 
साधना के द्वारा पहले मन से हमें हृदय की ओर जाना है, भाव जगत में जाना है, अंततः भाव से भी परे शून्य में जाना है. एक बार इस शून्यता का अनुभव हो जाने के बाद मन सदा ही उससे जुड़ा रहता है. जगत में उतना ही व्यवहार करता है जितना आवश्यक हो. श्रद्धा तथा विश्वास के सहारे–सहारे वह ऊपर चढ़ता है. यह विश्वास कि वह सदा हमारे साथ है, हमें अनेक संकटों से उबार लेता है. शास्त्र हमें प्रेरणा देते है, संतजन प्रेम देते हैं और हमारे मन में श्रद्धा जितनी दृढ होती है, कृपा का अनुभव उतना ही अधिक होता है. 

Thursday, August 23, 2012

तुम्हीं हो बंधु सखा तुम्हीं हो


जुलाई २००३ 
हम छोटे मन से सोचते हैं, जो शरीर तक ही सीमित है अथवा बड़े मन से, जो विशाल है, जिसमें उस परमात्मा का वास है. अनंत तो अनंत में ही समा सकता है, हमारी सोच ही हमें उसके निकट अथवा दूर लाती है. हम यदि उन बातों के बारे में सोचते हैं जो सकारात्मक हैं, प्रशंसनीय हैं, जो हमें उच्चता की ओर ले जाती हैं, जब हम प्रभु पर अटल विश्वास करते हैं तो वह विश्वास ही हमारी रक्षा करता है. वैसे भी जब हम उसकी शरण में होते हैं तो हमें अपनी रंचमात्र भी चिंता नहीं होती. बस हमें अपना सच्चा मन उसे अर्पित करना है, हमारा भीतर-बाहर एक हो, तो हर क्षण उसके सान्निध्य में ही बीतेगा. वह हमारे इतने निकट है कि उतने हम स्वयं भी नहीं हैं. बस एक झीना सा पर्दा हमारे बीच है जिसे हटाने में भी वही हमारी मदद करता है, वही हमें बुद्धियोग प्रदान करता है, वह जो अव्यक्त है पर स्वयं को हमारे भीतर व्यक्त करता है. जो हमारे होने का कारण है, जो हर क्षण हमारी खबर रखता है, वह हमें अनंत आनंद का अनुभव कराता है, जगत अभी है, अभी नहीं, पर वह सदा है.

अमन हुआ जब मन


जुलाई २००३ 
जो हमें रुचता है अर्थात जो वास्तव में हम हैं उसे रुचता है- प्रेम, सत्य, सदाचार, विश्वास और श्रद्धा आदि सदगुण, कहीं से भी मिलें ग्रहण कर लेने चाहिए. इस भौतिक जगत में द्वंद्व हर जगह है, शीत-ग्रीष्म, सुख-दुःख आदि. लेकिन हमारे उस आध्यात्मिक जगत में जहाँ हम वास्तव में रहते हैं, कोई द्वंद्व है ही नहीं. वहाँ समरसता है, तो भेद सिर्फ यहीं है, जब तक देहात्म बुद्धि है तभी तक कोई अच्छा-बुरा प्रतीत होगा. समरसता तभी मिलेगी जब मन स्थिर होगा, ऐसा मन जो सभी का कल्याण चाहता है, जो प्रेम बाँटता है, जो इच्छा रहित है. तीनों गुणों के पार है. जहाँ न मान की इच्छा है न अपमान का भय, जहाँ न लोभ है न ईर्ष्या. जहाँ सत्य ही एकमात्र आश्रय है, जहाँ मद, मोह, आलस्य आदि असुरों का नाश हो चुका है. जहाँ भगवती का निवास है, जहाँ शिव का कैलाश है और कान्हा का वृन्दावन है. ऐसे मन में ही ज्ञान टिकता है. तब हमारा होना मात्र ही पर्याप्त होता है, हमारे मन में संकल्प-विकल्प नहीं उठते, सहज चेष्टा होती है, सहज, स्वतः स्फूर्त कल्याणकारी वचन निकलते हैं, तब हमें परिणाम की चाह तो होती नहीं, अतः कर्मों का बंधन नहीं होता. हमारा मन जो अभी स्वयं को द्रष्टा मानता है तब दृश्य हो जाता है और जो वास्तव में हम हैं, द्रष्टा बनकर सब देखता है, तन-मन में होने वाले छोटे छोटे परिवर्तनों को भी वह देख लेता है, मन तब अमनी भाव में आ जाता है.

Wednesday, August 8, 2012

प्रेम जो बन जाता है भक्ति


जुलाई २००३ 
भक्त के हृदय में पूर्ण विश्वास होता है कि ईश्वर उससे प्रेम करता है. परमात्मा के वचन उसे बदल देते हैं. वह अनंत है और उसकी महिमा अवर्णनीय है, वह इतना महान है फिर भी वह भक्त को इस योग्य समझता है कि वह उसकी कृपा पाए. वह उसका मित्र है उसकी आत्मा का रक्षक. वह उसकी हर श्वास में है, वही उसके तन में रक्त बन कर प्रवाहित हो रहा है. भक्त उसी से है, वह इतना प्रिय है कि उसका नाम ही जीवन को सुंदर बना रहा है. वह भक्त से दूर तो नहीं फिर भी उसकी आँखों में उसके लिये आँसुओं की झड़ी लग जाती है. कभी उसकी याद आती है तो मन कृतज्ञता से भर जाता है. कभी उसको याद करके अधर मुस्कुराने लगते हैं, वह उसे शक्ति और सामर्थ्य से भर जाता है. वह हर क्षण उसे आगे ले जाना चाहता है. उसने भक्त के हृदय में प्रेम का बीज बोया है, सभी के प्रति प्रेम ! जो अब विशाल वृक्ष बन गया है, उसकी दृष्टि में सभी कुछ उसी चैतन्य के कारण हो रहा है. पंछियों का कलरव हो अथवा मानवों की भाषा, वही तो हर जगह बोल रहा है.

Thursday, July 12, 2012

सब उस पथ के ही राही हैं


मई २००३ 
ईश्वर को मानना ही नहीं जानना है क्योंकि मानना भी कल्पना है. हम अपने संस्कारों के कारण, परिवार व समाज की मान्यता के कारण मन में ईश्वर का एक चित्र बना लेते हैं, पर जब उसे स्वयं अनुभव करते हैं, तभी उसे वास्तव में जानते हैं. जीवन में श्रद्धा हो, विश्वास हो, प्रेम हो, आस्था हो, अनुशासन हो, परहित की भावना हो, दोष दृष्टि न हो, अपने दोषों को उखाड़ फेंकने की ललक हो, स्वयं को कुछ न मानते हुए उस परम सत्ता को ही जगत का कारण मानते हुए निरहंकारी होते जाने का प्रयास हो, तभी साधना के पथ का अधिकारी कोई बन सकता है. सभी में उसी चैतन्य का वास है, सभी अपने-अपने पथ से उसी की ओर जा रहे हैं, सभी को वह उनकी क्षमता के अनुसार निर्देशित कर रहा है, यह मानव जन्म हमें उस परम को जानकर आनंदित होने के लिये मिला है. जीवन का परम लक्ष्य वही है, केवल वही, उसे पाकर कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता...



Monday, January 16, 2012

श्रद्धावान लभते ज्ञानम


अक्तूबर २००२ 
मन श्रद्धा से भरा हो तभी विश्वास भी टिकता है. वही विश्वास हमें कैसी भी परिस्थिति में डिगने नहीं देता. परमात्मा अथवा सदगुरु का स्मरण भी हृदय को कैसी शीतलता पहुंचाता है. वे साक्षी भाव में रहते हुए जगत को देखते हैं, उससे लिप्त नहीं होते. उन्हें कोई कामना नहीं सताती और न किसी वस्तु के खो जाने का भय रहता है. आत्मा से बढ़कर वे किसी को नही जानते और आत्मा को न खोया जा सकता है न पाया जा सकता है, उसकी मात्र प्रतीति की जा सकती है, जीवनमुक्त आत्म भाव में रहकर सहजता का जीवन जीते हैं. वे हमें भी उसी पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं.

Thursday, January 12, 2012

विश्वास ज्योति है


सितम्बर २००२ 
जो परमात्मा का प्रिय भक्त होता है वह अपने अंतर में विश्वास की ज्योति जला कर रखता है, उसी की लौ के सहारे-सहारे वह अंदर बाहर दोनों ही जगह उजाला पाता है. विश्वास तभी गहरा होता है जब अनुभूति हो जाये अनुभव साधना से ही आता है, अनुभव के बाद कृतज्ञता से मन भर जाता है, और हम जीवन निश्चिंत होकर एक-एक क्षण का आनंद लेते हुए जीते हैं. साधना की अग्नि में तपकर ही हम अपनी सम्भावनाओं को तलाश सकते हैं. देह और मन हमें साधन रूप में मिले हैं, जिन्हें स्वस्थ रखना हमारा कर्तव्य है, ताकि आत्मा स्वयं को प्रकाशित कर सके, वही तो परमात्मा का प्रतिबिम्ब है जो मन के दर्पण में झलकना चाहता है. 

Friday, November 18, 2011

प्रेम ही पूजा है


july 2002 
हृदय में श्रद्धा और विश्वास की पूंजी हो तो जीवन का पथ सरल हो जाता है, मात्र सरल ही नहीं  सरस भी हो जाता है. सामर्थ्य बढ़ जाता है, समर्थ वही है जो किसी भी देश, काल में अपनी आत्मा पर ही निर्भर रहे, अहंता व ममता छोड़कर श्रेय के पथ पर चले. एक बार ईश्वरीय प्रेम का अनुभव हो जाने के बाद वह कभी हमारा हाथ नहीं छोड़ता. बल्कि पग-पग पर ध्यान रखता है, इतने स्नेह से वह हमारी खोजखबर लेता है जैसे पुराना परिचित हो. इस जग में जितना प्रेम हमें मिलता है या हमारे हृदयों में अन्यों के लिये रहता है वह उसी के प्रेम का का प्रतिबिम्ब है. मनसा, वाचा, कर्मणा वह हमारे सभी कर्मों का साक्षी है. उसे अर्पित करने के लिये इस जग के सभी पदार्थ तुच्छ हैं, एक मात्र प्रेमपूर्ण हृदय ही उसे समर्पित करने योग्य है, उसकी बनायी इस सृष्टि में हर कहीं उसे ही देखने की कला ही पूजा है.

Wednesday, October 12, 2011

साधना क्यों

मई २००२ 
साधक के मन में श्रद्धा हो और पूर्ण विश्वास भी कि सब कारणों के एक मात्र कारण परमात्मा ही हैं, उनकी प्रसन्नता में ही हमारी प्रसन्नता है. वह हमारे हृदय में रहते हैं और हमारे शुभ-अशुभ विचारों व कर्मों के भी साक्षी हैं, वही हमें कर्म करने के लिये प्रेरित करते हैं. यदि उनकी शरण में चले जाएँ तो वह हमारा भार अपने पर ले लेते हैं और हम निश्चिंत बालक की तरह आनंद से भर जाते हैं. शरीर, मन और बुद्धि की दासता को त्याग कर यदि हम परमात्मा के प्रेम का बंधन स्वीकार करते हैं तो सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है. यह विश्वास अनुभव के बिना टिकता नहीं है और अनुभव के लिये ही साधना करनी है.