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Friday, December 15, 2017

मुक्त रहे मन भूत-भावी से

१६ दिसम्बर २०१७ 
असजग व्यक्ति ही स्वयं के लिए और अंततः समष्टि के लिए दुःख का कारण बनता है. सृष्टि का हर कण स्वयं में आनंदित है. दुःख की अपने आप में कोई सत्ता नहीं है, यह सुख पर पड़ा आवरण मात्र है. कल्पना और स्मृति ही इसके दो आश्रय हैं. मानव मन के द्वारा दुःख का सृजन होता है. जीवन अपने आप में इतना अनमोल है पर जैसे नेत्र में पड़ा धूल का नन्हा सा कण दृष्टि को बाधित कर देता है और विशाल गगन भी दिखाई नहीं देता, वैसे ही मन में उठा कोई संस्कार जीवन की दिव्यता और भव्यता को भुला देता है. जैसे एक बीज अनंत बीजों का कारण है उसी प्रकार एक संस्कार अपने जैसे अनेक संस्कारों को जन्म देता है. जीवन तब एक पहेली बन जाता है.  

Wednesday, June 14, 2017

तू ही दाता तू ही विधाता

१४ जून २०१७ 
सुबह से शाम तक न जाने कितनी बार हम जाने-अनजाने भगवान का नाम लेते रहते हैं. किसी कठिनाई में फंस जाएँ तब तो उसके नाम का जप भी शुरू हो जाता है. कुछ अच्छा हो जाये तो उसको धन्यवाद देते हैं और न हो तो उससे शिकायत भी करते हैं, किंतु कभी बैठकर उसकी नहीं सुनते. एकतरफा संवाद ही चलता रहता है और हम अपनी मर्जी से जीवन को जीये चले जाते हैं. इसका अर्थ हुआ जिस भगवान के बिना हमारा जीवन चल ही नहीं सकता, वह हमारी कल्पना में ही है. बचपन से जो भी हमने सुना है, किताबों में पढ़ा है और कुछ हमारी स्वयं की धारणाओं के अनुसार एक छवि हमने गढ़ ली है और भगवान व हम स्वयं दो समानांतर रेखाओं की तरह चलते चले जाते हैं, जिनके मिलन की कोई गुंजाइश ही नहीं है. 

Thursday, March 23, 2017

नव जीवन पल पल मिलता है

२४ मार्च २०१७ 
हम जहाँ हैं वहाँ नहीं होते, तभी परम के दरस नहीं होते
जिन्दगी कैद है दो कल में, आज को दो पल मयस्सर नहीं होते

स्मृति और कल्पना इन दोनों के मध्य ही निरंतर हमारा मन डोलता रहता है. अतीत की स्मृति और भविष्य की कल्पना. हम वर्तमान में टिकते ही नहीं, हमारे वर्तमान के कर्म भी अतीत के किसी कर्म द्वारा पड़े संस्कार से प्रेरित होते हैं अथवा तो भविष्य की किसी कल्पना से. जीवन में कोई नयापन नहीं बल्कि एक दोहराव नजर आता है, जिससे नीरसता पैदा होती है, जबकि जीवन पल-पल बदल रहा है, जिसे देखने के लिए मन को बिलकुल खाली होना पड़ेगा, हर सुबह तब एक नया संदेश लेकर आएगी और हर रात्रि कुछ नया स्वप्न दिखाएगी. अभी तो हमारे स्वप्न भी वही-वही होते हैं. हमारे अधिकतर कर्म प्रतिक्रिया स्वरूप होते हैं, चाहे वे भौतिक हों या मानसिक.  

Monday, January 19, 2015

होश बने स्वभाव हमारा

सितम्बर २००७ 
सतत् होश रखने की जरूरत है, उस समय तक रखने की जरूरत है जब तक जरा सा भी घास-पात या शैवाल भीतर रह जाये, जब जरा सा भी घास-पात भीतर न रहे तो होश स्वभाव बन जाता है और यह होश हमें मुक्त अवस्था में ला देता है. यही जीवन मुक्ति है, इच्छा गति है, इच्छा भविष्य में है, हम तभी वर्तमान में आते हैं जब कोई इच्छा नहीं रहती. इच्छा काल पर आधारित है. हम वर्तमान में नहीं रहते, समय को बांटते रहते हैं. इच्छा ही भविष्य है और स्मृति ही भूत है. समय केवल वर्तमान में है. हम कल्पना और स्मृति में रहकर वर्तमान को खोते रहते हैं, अपने आप को खो देते हैं. इच्छा हमें अपने आप से दूर कर देती है. 

Monday, July 7, 2014

चलती चाकी देख के

सितम्बर २००६ 
संतजन कहते हैं कि हम समस्या मूलक भी बन सकते हैं और समाधान मूलक भी. यदि हम अपने केंद्र से जुड़े नहीं हैं तो समाधान मूलक हो जाते हैं. केंद्र से जुड़े रहने के लिए एक आधार चाहिए, एक सूक्ष्म तन्तु, जो कि प्रेम ही हो सकता है. यदि हम परिधि पर ही रह गये तो दूसरों के साथ-साथ स्वयं के लिए भी समस्या खड़ी कर देंगे. परिधि पर रहने से हम डगमगाते रहते हैं, केंद्र से जुड़े रहना स्थिरता प्रदान करता है. आत्मा केंद्र है, मन परिधि है, मन स्वयं ही योजनायें बनता है फिर उन्हें तोड़ता है. वह कल्पनाओं का जाल अपने इर्द-गिर्द बुना लेता है. हमें सच्चाई की ठोस जमीन चाहिए न कि कल्पना का हवा महल. हम सत्य के पारखी बनें.  

Saturday, June 14, 2014

द्रष्टा से जो जुड़ जाता है

अप्रैल २००६ 
मन की कल्पना ही हमें सुख-दुःख देती है, जो इस मन को कभी स्थिर कभी चलायमान देखता है, वही तत्व जानने योग्य है. जो हर एक के पीछे सामान्य सत्ता के रूप में स्थित है उससे जुड़े रहें तब प्रभु हमें बुद्धियोग देते हैं. उस जानने वाले को जानकर ही सन्त सहज हो जाते हैं और हमें भी वैसा ही बनाने का प्रयत्न करते हैं. हम जितने-जितने सरल व सहज होते हैं, उतने-उतने ही दुखों से दूर होते जाते हैं, जब हम सारे आग्रह छोड़ देते हैं तो जीवन अपने आप चलने लगता है. सारे कार्य तो वैसे भी हो रहे हैं, हम व्यर्थ ही स्वयं को कर्ता मानकर अभिमान का भार ढोते हैं. 

Saturday, September 14, 2013

मैं से भरा उससे खाली

फरवरी २००५ 
जब तक हम देहात्म बुद्धि से जगत में रहते हैं, मन पर एक बोझ पड़ा ही रहता है, यह बोझ ‘मैं’ का है, ‘मैं’ जो अपने को कल्पनाओं के अनुसार एक पहचान दे देता है. बाहर जो दीखता है वह जगत बंधन का कारण नहीं है, बल्कि हमारी कल्पनाओं द्वारा गढ़ा गया संसार ही बंधन का कारण है. जब मन सारी, उपाधियों, कल्पनाओं, वासनाओं से खाली हो जाता है, तभी देहातीत का अनुभव होता है, तब हम स्वालम्बी हो जाते हैं, अपनी ख़ुशी के लिए संसार के आश्रित नहीं रहते, जगत तो अपनी प्रकृति के अनुसार पल-पल बदल रहा है, पर हम ‘वह’ हैं जो कभी नहीं बदलता.

Thursday, April 25, 2013

साईं नाथ तेरे हजारों हाथ


  मन की व्यग्रता इस बात की द्योतक है कि हमें अभी जगत में रहना नहीं आया, जगत में रहना जब किसी को आ जाता है तो वह परमात्मा के द्वार पर रहने लायक भी हो जाता है. मान-अपमान, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों रूपी चक्की के पाटों में वही पिसने से बच जाता है. व्यर्थ की बातों में फंसकर जब हम स्वयं को उलझा लेते हैं, कल्पनाओं के जाल में फंसकर स्वयं को सुखी-दुखी करते हैं, तब हम यह भूल जाते हैं कि कल्पना का यह महल कब तक रहेगा, इसे तो गिरना ही होगा. प्रामाणिकता यदि हमारे आचरण में नही है तो सुख भी प्रामाणिक नहीं हो सकता. हमें तो उस शांति को पाना है जो हमारी निज की सम्पत्ति है, उस प्रेम को, जो हमारा स्वरूप है. जगत में जो कुछ भी घट रहा है वह  अनंत करवा रहा है, वही हमारा शत्रु बन कर आता है, वही मित्र बनकर, वही हमारे भीतर है, हमें अपने मूल स्रोत तक पहुँचाने के लिए वह निरंतर हम पर दृष्टि रखे है. हम सुरक्षित हाथों में हैं. 

Sunday, March 10, 2013

चेतन अमल सहज सुख राशि


मई २००४ 
नन्हा बच्चा अपने भीतर की मस्ती से आनन्दित है, वह किसी भौतिक कारण के कारण सुखी नहीं है, पर दुखी वह किसी कारण से ही होता है.  मानव जब बड़ा होता है तो किसी कारण से ही सुखी होता है और दुखी बिना किसी कारण के ही होता है. कल्पनाओं के महल बनाकर वह स्वयं ही उन्हें गिराता है फिर आकुल होता है. प्रतिस्पर्धा की अग्नि में स्वयं को झुलसाता है, दिखावे की पीड़ा से गुजरता है. हम अकारण ही भयभीत होते हैं. और अपने भीतर के आनंद को ढक देते हैं. सहज उल्लास जो छह महीने के बच्चे में प्रकट होता है भीतर से, वही उस इंसान में भी प्रकट हो सकता है जिसने सारी तृष्णाओं का त्याग कर दिया है, जो पूर्णकाम है, उसके जीवन की बागडोर अब अस्तित्त्व के हाथों में है. वह सहज रूप से जीता है, तभी उस अकारण करुणानिधि उस परमात्मा की अहैतुकी कृपा का अनुभव उसे होता है. 

Thursday, July 12, 2012

सब उस पथ के ही राही हैं


मई २००३ 
ईश्वर को मानना ही नहीं जानना है क्योंकि मानना भी कल्पना है. हम अपने संस्कारों के कारण, परिवार व समाज की मान्यता के कारण मन में ईश्वर का एक चित्र बना लेते हैं, पर जब उसे स्वयं अनुभव करते हैं, तभी उसे वास्तव में जानते हैं. जीवन में श्रद्धा हो, विश्वास हो, प्रेम हो, आस्था हो, अनुशासन हो, परहित की भावना हो, दोष दृष्टि न हो, अपने दोषों को उखाड़ फेंकने की ललक हो, स्वयं को कुछ न मानते हुए उस परम सत्ता को ही जगत का कारण मानते हुए निरहंकारी होते जाने का प्रयास हो, तभी साधना के पथ का अधिकारी कोई बन सकता है. सभी में उसी चैतन्य का वास है, सभी अपने-अपने पथ से उसी की ओर जा रहे हैं, सभी को वह उनकी क्षमता के अनुसार निर्देशित कर रहा है, यह मानव जन्म हमें उस परम को जानकर आनंदित होने के लिये मिला है. जीवन का परम लक्ष्य वही है, केवल वही, उसे पाकर कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता...



Saturday, September 10, 2011

मिलन का क्षण


दिसंबर २००१ 

हमारा मूल तो वही है और वही हमें पोषता है. हमने न जाने कितने लेप खुद पर चढा रखे हैं. कभी बेबस और निरीह होकर सहानुभूति बटोरना चाहते हैं, कभी कुछ करके प्रशंसा बटोरना चाहते हैं. स्वयं राजा होकर मंगता बने बैठे हैं. कल्पना और स्मृति की दुनिया में विचरण करने वाले हम खुद से ही अपरिचित हैं. एक क्षण में ही यदि हम यह मुल्लमा उतार फेंके तो वही क्षण मिलन का क्षण होगा. एक पुकार यदि दिल से उठे तो वह सारे पर्दे खोल कर अपनी झलक दिखाता है. वह हमारा हितैषी हर पल बाट जोहता है कि कब हम भूले-भटके वापस घर लौट आयें.

Friday, June 24, 2011

जीवन



जून २००० 
सार्थक जीवन, सही मायनो में जीना अथवा वास्तविक जीवन क्या है, यह प्रश्न हर कोई कभी न कभी  खुद से पूछता है. जीने को तो हम सभी जिए चले जा रहे हैं. लेकिन अपनी सारी योग्यताओं, क्षमताओं को पहचाने बिना, हमें अपने सामर्थ्य का ज्ञान ही नहीं है. जीवन की गहराई में गए बिना एक अधूरा-अधूरा सा उथला-उथला सा जीवन जीते जाते हैं कि जीवन की शाम हो जाती है. कितने ही निराधार भय, अनेकों व्यर्थ दुश्चिंताएं, व्यर्थ की कल्पनाएँ करते रहते हम अपने आस-पास की सच्चाई को नहीं देखते. बस कल्पना के असत्य को ही सत्य मान कर उसके पीछे दौड़ते रहते हैं. सत्य ठोस और स्थूल नहीं होता सो हम उसे देख नहीं पाते. मन को व्यर्थ के झाड़-झंखाड़ से भरे उन्हीं कंटीली पगडन्डियों पर उलझते चलते रहते हैं. अपने को सीमा में बांध हम एक कैदी का सा जीवन व्यतीत करते हैं, जबकि हमारे भीतर उन्मुक्त गगन में उड़ने की क्षमता मौजूद है. बस जागरण की ओर कदम बढ़ाने भर की देर है.