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Thursday, May 2, 2024

ध्यान, मुक्ति में भेद नहीं है

संत कहते हैं, साधक को हर सुबह अपने दिन की शुरुआत ऐसे करनी चाहिए जैसे कि वह पहली बार जगत को देख रहा है। ध्यान का अर्थ ही है,  हर पल को गहराई से महसूस करना, हर पल ओस की तरह ताज़ा है, अभी है अभी नहीं रहेगा। अतीत मृत हो चुका है। जब हम अतीत को भुला देते हैं तो भविष्य की आशंका भी नहीं रहती।केवल शुद्ध वर्तमान रह जाता है। परमात्मा की उपलब्धि वर्तमान में ही हो सकती है। अतीत और भविष्य हमें स्मृति या कल्पना से बांधे रखते हैं। जबकि हर आत्मा की पुकार स्वतंत्रता है।शिशु भी मुक्त होना चाहता है और वृद्ध भी, किसी को भी आदेश या शासन में रहना नहीं भाता। अनुशासन का अर्थ है, स्वयं पर स्वयं का लगाया गया प्रतिबंध, जिसके भीतर हम मुक्त हैं। जब अतीत का बोझ नहीं है और आने वाले कल की चिंता नहीं है तभी मन अपने शुद्ध व मुक्त स्वरूप का अनुभव कर सकता है। यही ध्यान है। 


Thursday, November 24, 2022

श्वास श्वास जब खिल जाएगी

अतीत हमारे वर्तमान में सेंध न लगाए, इसका सदा ध्यान रखना है। परमात्मा जब भी जिसको मिला है, सदा वर्तमान में मिला है। जब हमारा मन अतीत या भविष्य की कल्पना में खोया होता है, वह उस वर्तमान की क़ीमत पर करता है, जो हमें लक्ष्य तक पहुँचा सकता था। साधक का एकमात्र लक्ष्य है अपने भीतर छिपे दिव्य तत्व का आत्मा के रूप में अनुभव करना तथा कण-कण में छिपे देवत्व को पहचान कर जगत के साथ एकत्व का अनुभव करना। हमारा मन इस एकत्व को अनुभव नहीं कर सकता क्योंकि वह सीमित है। मन हमारे विचारों, भावनाओं, आकांक्षाओं का एक पुंज है, बुद्धि अवश्य तर्क के आधार पर जगत की अनंतता को जान सकती है। किंतु बौद्धिक स्तर पर जानने से उस दिव्यता की कल्पना ही की  जा सकती है, उसे अस्तित्त्व गत जानना होता है। जिसका अर्थ है, हमारी हर श्वास में वह प्रकट हो, हमारे हर कृत्य, हर विचार में उसकी झलक हो, जो सदा आनन्दमय है, पूर्ण है, प्रेम, शांति, शक्ति और ज्ञान का स्रोत है। जीवन में जब भी इन तत्वों की कमी हो मानना होगा कि हम आत्मा से दूर हैं और अपने लक्ष्य से भी दूर हो रहे हैं। 


Tuesday, August 23, 2022

इस पल में जो जाग गया

 जीवन का हर नया पल एक उपहार की तरह हमें मिलता है. हम पुराने उपहार की मीनमेख निकालने में लगे रहते हैं या तो अब न जाने कौन सा उपहार मिलेगा इसकी  चिंता में इस पल के उपहार को खोलना ही भूल जाते हैं. इस तरह वर्तमान सदा ही अतीत के पश्चाताप या भविष्य के भय का शिकार बनता रहता है. जो भी खुशी है वह इस क्षण में मिलती है, सुख की हर स्मृति बीते कल की छाया है. भविष्य की कल्पना कितनी भी सुखद हो वह वास्तविक नहीं है. वह चित्र की नदी की तरह प्यास नहीं बुझाती. शुद्ध, निर्दोष, वास्तविक सुख केवल वर्तमान में बिना किसी कीमत के सहज ही बंट रहा है, जिसकी सबको तलाश है. खेल, खतरे भरे कार्यो में, प्रेम में हम वर्तमान में होते हैं, तभी ख़ुशी का अनुभव होता है. केवल ध्यानी व्यक्ति सदा ही वर्तमान में रह सकता है. 

Tuesday, October 27, 2020

पल-पल सजग रहे जो मन

अतीत में जो भी अच्छे-बुरे कर्म  हमसे हुए हैं, उसके संस्कार मन पर पड़े हैं तथा उनके फल सुख-दुख के रूप में हमें प्राप्त हो रहे हैं। सुख आने पर यदि हम गर्वित न हों, दुख आने पर व्यथित न हों तो अतीत हम पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। यदि दुख में दुखी होना और सुख में अभिमान से भर जाना हमारे लिए स्वाभाविक है तो भविष्य भी ऐसा ही होने वाला है। अतीत जब पत्थर बन कर राह में आ जाए तो वर्तमान का दर्शन हमें होता ही नहीं। संत कहते हैं भूख-प्यास और नींद के अलावा वर्तमान में कौन सा दुख है, सारे मानसिक दुख व चिंता अतीत के ही हैं, और यदि हमारा मन किसी भी कारण से परेशान रहता है तो अतीत के हाथों वह जकड़ा हुआ है। वर्तमान का क्षण निर्दोष है, परमात्मा की कृपा का अनुभव सदा वर्तमान में ही होता है। आज यदि हम हर कर्म को सजग होकर करते हैं तो पुराने संस्कार क्षीण पड़  जाएंगे और शुभ कर्मों के संस्कार पड़ेंगे, यही मुक्ति का मार्ग है।


Friday, August 28, 2020

मध्य में टिकना जो भी जाने

 ज्ञानीजन कहते हैं, सदा वर्तमान में रहो. अतीत जा चुका और भविष्य अभी आया नहीं है, फिर क्यों अपनी ऊर्जा को  उन बातों को याद करने में गंवाए जो हमारे वर्तमान जीवन को सुंदर बनाने में जरा भी काम नहीं आ सकतीं. अतीत से हमें सीख अवश्य लेनी है और वह हमारा मन उसी वक्त ग्रहण कर लेता है जब वह घटना विशेष घटी थी. इस समय का एक-एक पल हमारे भविष्य को गढ़ने वाला है और यही हमारे हाथ में है. विपासना ध्यान में जब हम श्वास को देखते हैं तो जाती हुई श्वास अतीत बन गयी, अगली अभी आयी नहीं है उस मध्य काल में यही कोई पल भर के लिए भी टिक जाता है तो उसकी बाहर जाने वाली श्वास सहज और शांत हो जाती है. ऐसे ही आज का दिन बीत गया, मध्य में रात्रि है यदि वह पूर्ण विश्राम देती है तो अगले दिन हम प्रफ्फुलित रह सकते हैं. इसी तरह वार्तालाप में यदि एक व्यक्ति ने अपनी बात कह दी और हम पल भर के लिए रुक गए तो उसका जवाब सही और स्थिरता के साथ दे पाएंगे. यदि हम उसकी बात में ही अटक गए या पहले ही अपना जवाब तय कर लिया तो हमारा उत्तर सन्तुलित नहीं हो सकता. भगवान बुद्ध का मध्यम मार्ग भी यही सिखाता है कि हमें मध्य में ठहरने की कला सीखनी है. 


Tuesday, July 21, 2020

दृष्टि मिले जब हमें ध्यान की


किसी भी वस्तु को ठीक से देखने के लिए एक समुचित दूरी पर रखना होता है. आँख के बहुत नजदीक रखी वस्तु भी नजर नहीं आती और बहुत दूर रखी वस्तु भी. जीवन भी कुछ ऐसा ही है जब हम उसमें इतना घुस जाते हैं तब चीजें धुंधली होने लगती हैं और जब उससे दूर निकल जाते हैं तब वह हमारे हाथ से फिसलता हुआ नजर आता है. कभी अतीत के स्वप्न हमें वर्तमान से दूर ले जाते हैं तो कभी भविष्य की व्यर्थ आशंका हमारी ऊर्जा को बहा ले जाती है. ध्यान ही हमारे भीतर वह दृष्टि पैदा करता है जिससे जीवन जैसा है वैसा नजर आता है. वर्तमान के क्षण में जब मन टिकना सीख जाता है तभी वह अस्तित्त्व से प्राप्त अपार क्षमता को देख पाता है. यह ऐसा ही है जैसे कोई आँखें बंद करके कमरे से बाहर निकलने का प्रयास करे और दरवाजे के निकट आते ही अपना मुख मोड़ ले और विपरीत दिशा में चलने लगे. यदि ऐसा हर बार होने लगे तो वह यह निर्णय कर लेगा इस कमरे में दरवाजा है ही नहीं. ऐसा व्यक्ति जीवन के मर्म से वंचित ही रह जाता है. 

Friday, July 3, 2020

चैतन्य: आत्मा -शिव सूत्र


शिव कहते हैं जिस आत्मा को तुम ढूंढ रहे हो वह चैतन्य है. यह संसार जड़-चेतन दोनों से बना है, इसमें जहाँ-जहाँ चेतना हो वहाँ मुझे खोज लेना. एक धूल के कण और एक जीवाणु में कौन चेतन है ? एक जगे हुए और एक सोये हुए व्यक्ति में कौन ज्यादा चेतन है ? हमारा मन जब निद्रा और तन्द्रा से भरा हो या किसी खतरे को देखकर सौ प्रतिशत सचेत हो तो दोनों में से कौन ज्यादा चेतन है ? यह चेतना जब किसी बुद्ध पुरुष  में उस तरह खिल जाती है जैसे कोई कमल का फूल तो वहीं शिव प्रकट हो जाते हैं. मन जब अतीत के कारण पश्चाताप से भरा हो, भविष्य की चिंता से भरा हो या वर्तमान में तुलना से भरा हो तो चेतना पर एक आवरण छा जाता है. इसी को अहंकार कहते हैं जो शिव से जुदा रखता है. गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, शिव आदि गुरु हैं.



Tuesday, July 16, 2019

सदा वसंत रहे जब मन में



एक जीवन है हम सबका जीवन, यानि सामान्य जीवन, जिसमें कभी ख़ुशी है कभी गम हैं. इस जीवन में जिन खुशियों को फूल समझकर हमने ही चुना था वे ही अपने पीछे गम के कांटे छुपाये हैं यह बात देर से पता चलती है. इस जीवन में छले जाने के अवसर हर कदम पर हैं, क्योंकि यहाँ असलियत को छुपाया जाता है, जो नहीं है उसे ही दिखाया जाता है. एक और जीवन है ज्ञानीजन का जीवन, जिसमें सदा वसंत ही है, जिसमें खुशियों के फूलों को चुनने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वे स्वयं ही फूल बन जाते हैं, ऐसे फूल जिनमें कोई कांटे नहीं होते. उस जीवन में कोई छल नहीं होता क्योंकि भीतर और बाहर वे एक से हैं. वे वास्तविकता को जान कर सहज रहना सीख जाते हैं, कोई दिखावा, दम्भ या पाखंड, बनावट उन्हें छू भी नहीं पाती. जीवन जैसा उन्हें मिलता है उसे वैसा ही स्वीकार करने की क्षमता वे अपने अंदर जगा लेते हैं. वे वर्तमान में रहते हैं और अतीत के भूत से पीछा छुड़ा लेते हैं. भविष्य के दिवास्वप्न भी उन्हें नहीं लुभाते क्योंकि जीवन की क्षण भंगुरता का उन्हें हर समय बोध रहता है, जिस कल के लिए हम संग्रह करते हैं, और वर्तमान में कष्ट उठाते हैं, उस कल को वे कल पर ही छोड़ देते हैं. वह कल भी उनके लिए इस वर्तमान की तरह सुंदर ही होगा ऐसा उन्हें यकीन रहता है. ऐसे ही जीवन से हमारा परिचय कराने के लिए परमात्मा ने गुरू और शास्त्र का निर्माण किया हैं.

Thursday, July 4, 2019

बीती ताहि बिसार दे



अतीत की बातों को हमारा लेकर दुखी होना वैसा ही है जैसे कोई वर्षों पूर्व आयी आँधी के द्वारा फैलायी गंदगी को आज बाल्टियाँ भर-भर कर धोये. पानी व्यर्थ जायेगा, श्रम भी व्यर्थ जायेगा और वह गंदगी जो अब है ही नहीं भला साफ कैसे हो सकती है. मन हर दिन नया हो रहा है, रोज जो भोजन हम ग्रहण करते हैं उसके सूक्ष्म संश से ही मन बनता है, जो श्वास हम आज ग्रहण कर रहे हैं वही हमें ऊर्जा से भर रही है, जो आज मिला है वह आज के लिए है, इस ऊर्जा को हम व्यर्थ ही पुरानी बातों को याद करने में लगते हैं फिर दुखी भी होते हैं. स्मृतियाँ सुखद हों तब भी उन्हें ज्यादा तूल देना ठीक नहीं, बल्कि आज को एक सुखद स्मृति बनाने के लिए ऊर्जा का सदुपयोग करना उचित है. सबसे प्रमुख बात है कि सारे अनुभव वर्तमान के क्षण में ही होते हैं, अतीत में जो भी सुखद हुआ, वह उस समय के लिए वर्तमान में ही घटा था, आज एक नये अनुभव के लिए स्वयं को खाली रखना है, वरना कोल्हू के बैल की तरह अतीत लौट-लौट कर हमारे सम्मुख वर्तमान की शक्ल में आता रहेगा, क्योंकि हम उसे भूलना ही नहीं चाह रहे हैं.

Friday, June 14, 2019

समता एक साधना ही है



किसी भी व्यक्ति, घटना अथवा वस्तु को गलत कहते ही हम अपने भीतर द्वेष भाव उत्पन्न कर लेते हैं. जिसका फल दुःख के रूप में हमें ही प्राप्त होता है. कोई भी व्यक्ति जैसा है वैसा होने के लिए उसे न जाने कितने कर्मों का प्रवाह ले आया है. इसमें वह स्वाधीन नहीं है. हम स्वाधीन हैं अपने अंतर की समता बनाये रखने में, क्योंकि वही आत्मा में रहना है. हम तभी भूल जाते हैं जब अहंकार वश स्वयं को कर्त्ता मानते हैं. अतीत का भय हमें तभी सताता है जब भविष्य में हम कुछ पाना चाहते हैं. वर्तमान का क्षण निर्दोष है जिसमें न कोई भय है न पश्चाताप, क्योंकि अतीत में जो हुआ वह उन क्षणों की उपज था, भविष्य में जो होगा वह वर्तमान के कार्यों का परिणाम होगा. वर्तमान में हम नये कर्म नहीं बाँध रहे क्योंकि समता में रहना आ गया है, तो भविष्य सुधरने ही वाला है.

Saturday, June 1, 2019

चाहें तो इस पल में जी लें



वर्तमान के लघु क्षण में विराट छिपा है, जिसने ध्यान के इस राज को जान लिया, वह मुक्त है. मन सदा अतीत में ले जाता है या भविष्य की कल्पना में. वर्तमान में आते ही मन मिट जाता है, उसे टिकने के लिए कोई न कोई आधार चाहिए. वर्तमान का पल इतना छोटा है कि उसमें कोई शब्द नहीं ठहर सकता. मन शब्द के सहारे ही जीवित रहता है. मौन का अनुभव वर्तमान का अनुभव है. अतीत में जाकर कभी मौन को अनुभव नहीं किया जा सकता. मौन ही सत्य का अनुभव है. यदि कोई इस क्षण में टिकना सीख ले तो वह ऊर्जा के परम स्रोत से जुड़ जाता है. ऊर्जा का यह स्रोत प्रेम, आनंद और शांति का संगम है.

Friday, December 15, 2017

मुक्त रहे मन भूत-भावी से

१६ दिसम्बर २०१७ 
असजग व्यक्ति ही स्वयं के लिए और अंततः समष्टि के लिए दुःख का कारण बनता है. सृष्टि का हर कण स्वयं में आनंदित है. दुःख की अपने आप में कोई सत्ता नहीं है, यह सुख पर पड़ा आवरण मात्र है. कल्पना और स्मृति ही इसके दो आश्रय हैं. मानव मन के द्वारा दुःख का सृजन होता है. जीवन अपने आप में इतना अनमोल है पर जैसे नेत्र में पड़ा धूल का नन्हा सा कण दृष्टि को बाधित कर देता है और विशाल गगन भी दिखाई नहीं देता, वैसे ही मन में उठा कोई संस्कार जीवन की दिव्यता और भव्यता को भुला देता है. जैसे एक बीज अनंत बीजों का कारण है उसी प्रकार एक संस्कार अपने जैसे अनेक संस्कारों को जन्म देता है. जीवन तब एक पहेली बन जाता है.  

Saturday, September 9, 2017

मिटना जिसने सीख लिया है

९ सितम्बर २०१७ 
मन का स्वभाव है अभाव में जीना, आत्मा तृप्ति और संतोष चाहती है. मन की दृष्टि सदा कमियों की तरफ ही जाती है, आत्मा अपने आप में इतनी आनंदित होती है कि कमियां उसे नजर ही नहीं आतीं. मन को सदा नयेपन की तलाश है, आत्मा चिरंतन है. मन सदा भय में जीता है, आत्मा में होना ही अभय का दूसरा नाम है. मन मिटने से डरता है, आत्मा कुछ न होने में ही अपना होना जानती है. मन दुःख बनाता है, न हो तो आशंकित होता है, आत्मा किसी भी परिस्थिति में अडोल बनी रह सकती है. मन सदा अतीत अथवा भविष्य में जीता है, कभी अतीत की भूलों पर पछताता है और कभी भविष्य में होने वाले दुखों से घबराता है. आत्मा के लिए हर क्षण अपार सम्भावना लिए आता है. वर्तमान में रहना ही आत्मा में होना है. 

Thursday, March 23, 2017

नव जीवन पल पल मिलता है

२४ मार्च २०१७ 
हम जहाँ हैं वहाँ नहीं होते, तभी परम के दरस नहीं होते
जिन्दगी कैद है दो कल में, आज को दो पल मयस्सर नहीं होते

स्मृति और कल्पना इन दोनों के मध्य ही निरंतर हमारा मन डोलता रहता है. अतीत की स्मृति और भविष्य की कल्पना. हम वर्तमान में टिकते ही नहीं, हमारे वर्तमान के कर्म भी अतीत के किसी कर्म द्वारा पड़े संस्कार से प्रेरित होते हैं अथवा तो भविष्य की किसी कल्पना से. जीवन में कोई नयापन नहीं बल्कि एक दोहराव नजर आता है, जिससे नीरसता पैदा होती है, जबकि जीवन पल-पल बदल रहा है, जिसे देखने के लिए मन को बिलकुल खाली होना पड़ेगा, हर सुबह तब एक नया संदेश लेकर आएगी और हर रात्रि कुछ नया स्वप्न दिखाएगी. अभी तो हमारे स्वप्न भी वही-वही होते हैं. हमारे अधिकतर कर्म प्रतिक्रिया स्वरूप होते हैं, चाहे वे भौतिक हों या मानसिक.  

Wednesday, March 1, 2017

खिले सदा मुस्कान लबों पर

१ मार्च २०१७ 
संत कहते हैं सदा प्रसन्न रहना भगवान की सबसे बड़ी पूजा है. प्रसन्न रहने का अर्थ है एक ऐसी मुस्कुराहट का मालिक बनना जिसे संसार की कोई भी परिस्थिति मिटा न सके, ऐसी प्रसन्नता किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर नहीं रहती, वह स्वाभाविक सहजता से उत्पन्न होती है. प्रतिपल यदि हम सजग रहते हैं और अस्तित्त्व से निरंतर झरती हुई ऊर्जा से एकत्व का अनुभव करते हैं तब ही इसका अनुभव किया जा सकता है. अतीत जो जा चुका, पश्चाताप या क्रोध के रूप में हमारी ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दे और भविष्य जो अभी आया नहीं हमें आशंकित न करे तो जीवन को उसके समग्र सौन्दर्य के साथ जीने का अनुभव प्राप्त होता है. हमारे चारोंओर जो सृष्टि का इतना बड़ा आयोजन चल रहा है, उसके पीछे छिपे अज्ञात हाथों का स्पर्श हम भी महसूस करने लगते हैं. आकाश हमारा मित्र बन जाता है और हवाएँ सहयोगी. 

Thursday, January 19, 2017

छिपे आज में दोनों कल

२० जनवरी २०१७ 
आज तक न जाने कितनी बार हमें यह लगा है, एक दिन सब ठीक हो जाएगा, और अब वे बातें याद भी नहीं हैं जिनके ठीक होने की कभी हमने कामना की थी. अतीत जैसे स्वप्न हो गया है, भविष्य कैसा होगा यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारा आज कैसा है. वर्तमान ही भविष्य का बीज है, जैसा बीज वैसी फसल, सीधा सा हिसाब है, तो यही क्षण है जिसे हम आनंदित होकर जी सकते हैं.जो मिला था वह स्वप्न हो गया, जो मिलेगा वह आज के आनंद से ही उपजेगा, यही आध्यात्म हमें सिखाता है. वर्तमान का सुख ही एक दिन सुखद अतीत बनेगा और यही भविष्य की नींव है. वर्तमान में हमें सुखी होने से रोक रहे हैं यही दोनों, अतीत की स्मृतियां और भविष्य की कल्पना..समाधि है इनसे पार जाना. 

Friday, August 21, 2015

जगा रहे मन घड़ी-घड़ी


जीवन को गहराई से महसूस करना हो तो वर्तमान के क्षण में ही किया जा सकता है, पर हम न  जाने कितना समय अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं में खो देते हैं. रात्रि को स्वप्न देखना स्वाभाविक है पर जागते हुए भी भीतर जो विचार की धारा चलती रहती है वह स्वप्न ही है, संत जन तभी कहते हैं हम जागते हुए भी सोये हैं. जिस क्षण हम भोजन कर रहे हैं, मन कहीं और है, स्वप्न चल रहा है, ऊर्जा व्यर्थ ही बही जा रही है, जिस समय किसी से वार्तालाप कर रहे हैं, भीतर एक अन्य बातचीत चल रही है, अर्थात हम जहाँ होते हैं अक्सर वहाँ नहीं होते, इसी कारण मन थक जाता है. संतजन प्रफ्फुलित रह पाते हैं क्योंकि उन्होंने इस राज को जान लिया है, वह निरंतर ऊर्जा के प्रवाह को बनाये रखते हैं. 

Sunday, December 1, 2013

आज तोड़ दें सब जंजीरें

अप्रैल २००५ 
अनंत धैर्य तथा अखंड भरोसा हमें शुभ की ओर ले जाता है. हमारा मन जो आज हमारा शत्रु प्रतीत होता है, साधना की अग्नि में तपकर मित्र हो जाता है. फिर वह स्वतः ही परम की ओर जाता है, आत्मा के सान्निध्य का रस प्राप्त करने के बाद  पुनः झूठे रस को पाकर संतुष्ट नहीं होता, बल्कि उसी दिव्य रस को चखना चाहता है. वर्तमान के क्षण में वही दिव्यता हमें मिलती है, हर आने वाला क्षण अपने भीतर अनंत प्रेम छिपाए है. शुद्ध वर्तमान हमें मुक्त कर देता है. उसमें रहने वाला मन एक उन्मुक्त पंछी की तरह खुले गगन में उड़ान भर सकता है, अन्यथा भूत तथा भावी की जंजीरें बंधीं हो तो पंछी कैसे उड़ेगा. अतीत का पश्चाताप तथा भविष्य की आशंका की जंजीरें बांध दें तो वह नहीं उड़ पायेगा, ज्ञान की तलवार से इन्हें काट सकते हैं. भूत कभी लौट कर नहीं आता और भविष्य अनिश्चित है, जिन पर न हमारा वश है और जो न हमें तृप्त कर सकते हैं. जिसके मन में पूर्ण की चाह उठे वह सदा वर्तमान में ही रहता है वही ज्ञानी है और वही पूर्ण तृप्ति का अनुभव करता है.

Monday, December 24, 2012

घूँघट के पट खोल रे



संतजन कहते हैं कि हमने मन को कई परतों में लपेट रखा है, जैसे बिजली की तार पर पहले प्लास्टिक की परत, फिर कपड़े की परत लगी होने पर, छूने पर भी कुछ महसूस नहीं होता, इसी तरह हमारे मन पर भीं जाने कितनी परतें चढ़ी हैं, तभी तो ईश्वर का नाम लेते रहने पर भी कुछ नहीं होता. उसके प्रति कृतज्ञता के भाव अंतर में नहीं उपजते न ही उसकी अनंत कृपाओं का स्मरण होता है. प्रमाद और व्यर्थ की कामनाओं की परत उसे हमसे दूर ही रखती है. अतीत का विषाद और भविष्य के स्वप्न हमें ऊपर उठने से रोकते हैं, जैसे कोई पैर बड़ा होने पर भी छोटे आकार के जूते पहने ही रहे तो पैर छोटे ही रह जायेंगे. हम जैसे उसे दूर-दूर से ही याद करते हैं, उसके निकट आने से डरते हैं, क्योंकि ऐसा करने के लिए हमें अपने को खोलना होगा. हम उसी से शांति चाहते हैं और अशांति का साधन जुटाए रहते हैं. यह संसार जो प्रतिपल बदल रहा है, हमें स्थिर होने ही नहीं देता, दे ही नहीं सकता, स्थिरता परम का धर्म है, उससे जुड़ते ही एक आधार मिल जाता है, सहजता, सरलता और सरसता तब अनायास ही प्राप्त हो जाती है.

Monday, July 18, 2011

ध्यान

ध्यान वह स्थिति है जहाँ मन नहीं रहता, न अतीत की चिंता, न भावी की कल्पना. संसार समय की बदलती हुई स्थिति को ही दर्शाता है. ध्यान समय, संसार, व मन तीनों से अतीत ले जाता है. ज्ञान का अधकारी समाहित मन ही हो सकता है. ध्यान मन का स्नान है. मन स्वस्थ होता है, चेतना जगती है, मन हल्का होता है लेकिन यह सब परिणाम है, ध्यान के वक्त तो केवल शून्यता होती है, संसार से परे की झलक मिलती है ध्यान में. जो इस जगत को ईश्वर मय जान लेता है उसका ध्यान सहज ही टिकता है. कुछ क्षणों का ध्यान ही शांति की गहरी अनुभूति कराता है.