मन की धारा यदि भीतर की ओर मुड़ जाये तो राधा बन जाती है इसी तरह मन की हजारों वृत्तियाँ गोपियाँ क्यों नहीं बन सकतीं। हमारी ‘आत्मा’ ही वह कृष्ण है जिसे रिझाना है. जीवन का कोई भरोसा नहीं है, श्वास रहते-रहते उस तक जाना है, जाना है, कहना भी ठीक नहीं, वह तो सहज प्राप्य है. मध्य में जो आवरण है उसे हटाना है. संसार से सुख पाने की कामना का त्याग करना है, तभी सहज प्राप्त सुख दीखने लगेगा. एक ही निश्चय रहे तो सारी ऊर्जा उस एक की तरफ बहेगी. एक ही व्रत हो और एक ही लक्ष्य कि भीतर के प्रकाश को बाहर फैलाना है. जिसके आने पर जीवन में बसंत छा जाता है. सद्विचारों के पुष्प खिल जाते हैं और प्रीत की मंद बयार बहने लगती है. जैसे वसंत में दिन-रात समान हो जाते हैं, वैसे ही भीतर हानि-लाभ समान हो जाते हैं.
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Friday, February 4, 2022
Tuesday, July 16, 2019
सदा वसंत रहे जब मन में
एक जीवन है हम सबका जीवन, यानि सामान्य जीवन, जिसमें कभी ख़ुशी है कभी गम हैं. इस
जीवन में जिन खुशियों को फूल समझकर हमने ही चुना था वे ही अपने पीछे गम के कांटे
छुपाये हैं यह बात देर से पता चलती है. इस जीवन में छले जाने के अवसर हर कदम पर
हैं, क्योंकि यहाँ असलियत को छुपाया जाता है, जो नहीं है उसे ही दिखाया जाता है.
एक और जीवन है ज्ञानीजन का जीवन, जिसमें सदा वसंत ही है, जिसमें खुशियों के फूलों
को चुनने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वे स्वयं ही फूल बन जाते हैं, ऐसे फूल
जिनमें कोई कांटे नहीं होते. उस जीवन में कोई छल नहीं होता क्योंकि भीतर और बाहर
वे एक से हैं. वे वास्तविकता को जान कर सहज रहना सीख जाते हैं, कोई दिखावा, दम्भ
या पाखंड, बनावट उन्हें छू भी नहीं पाती. जीवन जैसा उन्हें मिलता है उसे वैसा ही
स्वीकार करने की क्षमता वे अपने अंदर जगा लेते हैं. वे वर्तमान में रहते हैं और
अतीत के भूत से पीछा छुड़ा लेते हैं. भविष्य के दिवास्वप्न भी उन्हें नहीं लुभाते
क्योंकि जीवन की क्षण भंगुरता का उन्हें हर समय बोध रहता है, जिस कल के लिए हम
संग्रह करते हैं, और वर्तमान में कष्ट उठाते हैं, उस कल को वे कल पर ही छोड़ देते
हैं. वह कल भी उनके लिए इस वर्तमान की तरह सुंदर ही होगा ऐसा उन्हें यकीन रहता है.
ऐसे ही जीवन से हमारा परिचय कराने के लिए परमात्मा ने गुरू और शास्त्र का निर्माण
किया हैं.
Monday, March 18, 2019
बासंती बहे बयार जब
फागुन माह के आगमन के साथ ही ह्रदयों में इन्द्रधनुष बनने-संवरने
लगते हैं, और पूर्णिमा आते-आते दिलों में उमंग बढ़ जाती है. इस बासंती रुत में प्रकृति
अपने पूरे श्रृंगार के साथ खिल जाती है. पलाश, कंचन, सेमल और अशोक के वृक्ष
कुसुमों का परिधान पहन लेते हैं. नींबू और आम के वृक्ष जैसे साल भर से संग्रहित
हुआ अपना सुरभि स्रोत उड़ाने को व्याकुल हैं. हवा में एक मदमस्त कर देने वाली सुगंध
अनायास ही समाई रहती है. बगिया रंग-बिरंगे फूलों से सजी है, सभी मानो एक-दूसरे से
होड़ ले रहे हैं. खेतों में गेहूँ और सरसों झूमती-इठलाती नजर आती हैं. फागुनी हवा
चलती है तो लोकमन भी संकोच की बेड़ियाँ तोड़कर ढोल-मंजीरे व झांझ की ताल पर थिरकने को
आतुर हो उठता है. कण-कण से वसंत राग सहज ही फूटने लगता है. ऐसे में होलिकादहन के
उत्सव में जो हृदय के सारे वैर और द्वेष भाव को जला देता है, उसके अंतर में ही आह्लाद
सुरक्षित रहता है. उसी आह्लाद को उल्लास पूर्ण वातावरण में एक-दूसरे के साथ बांटने
का नाम होली है.
Monday, March 19, 2018
अंबा अंबा माँ जगदंबा
१९ मार्च २०१८
वासन्तिक नवरात्र आरम्भ हो चुके हैं. चैत्र के महीने का शुभारम्भ
अर्थात वसंत का पूर्ण आगमन. अशोक के वृक्ष लाल फूलों से लद गये हैं. प्रकृति अपने
निखार पर है. मानव कहीं इस बाहरी रूप-रंग में ही न व्यस्त हो रहे, इसलिए हमारे
पूर्वजों ने व्रत-उत्सव की सुंदर परंपरा का सृजन किया है. इन नौ दिनों में हम देवी
के नौ रूपों की उपासना करते हैं. उपासना जीवन में अनुशासन लाती है, व्रत हमारे मन
को दृढ़ता प्रदान करते हैं. स्वार्थ को भुलाकर हम परार्थ और फिर परमार्थ की ओर बढ़ना
सीखते हैं. उपासना के दौरान यदि मन केवल कर्मकांड में ही उलझ गया तो देवी की शक्ति
का जागरण होने पर भी उसका अनुभव हमें कैसे होगा. पूजा में केन्द्रित हुआ मन जब
अपने आप में ठहर जाएगा तब निज आत्मस्वरूप का दर्शन होगा और दैवीय शक्तियाँ हमारे
भीतर प्रकट होंगी.
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