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Saturday, April 22, 2023

कृतज्ञता का भाव जगे जब

भोर से रात तक  धन्यवाद देने, कृतज्ञ होने के अनेक अवसर हमें प्राप्त होते हैं। उठते ही सबसे पहले एक और नये दिन में आँखें खोलने का अवसर देने के लिए अस्तित्त्व का आभार ! परिवार साथ है,  सिर पर छत है, देश में शांति है, इसके लिए भी ईश्वर का आभार !  आहार के लिए किसानों व दुकानदारों का, आजीविका  देने के लिए  सरकार या उद्योग पतियों का कृतज्ञ होना भी ज़रूरी है। वर्तमान काल में सोशल मीडिया का, जिस पर अपनी बात रखी जा सकती है, औरों की सुनी जा सकती है। न्याय पालिका,  शासन व्यवस्था, सेना, लेखकों, पत्रकारों आदि उन सभी का धन्यवाद किया जा सकता है, जो हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं।  रिश्तेदारों, मित्रों, जान-पहचान के लोगों और बच्चों के प्रति जब मन में कृतज्ञता का भाव बना रहे तो मन फूल सा हल्का रहता है। जहां धन्यवाद नहीं वहाँ शिकायत घेर लेती है । नकारात्मक भाव आते ही मन एक चक्र में फँस जाता है। तब यह भी याद नहीं रहता कि शिकायत किसके प्रति है। कृतज्ञता का भाव मन की गहराई से आता है, जो अनंत से जुड़ी है। शिकायत मन की ऊपरी सतह से आती है, जो हमें अस्त-व्यस्त कर देती है। 


Sunday, October 3, 2021

मन असीम की शरण में जाए

हम जगत के लिए कैसे उपयोगी बनें यदि मन इसका चिंतन करे तो उसके सारे भय, आशंकाएँ और द्वंद्व खो जाएँगे। अहंकार केवल स्वयं के बारे में सोचता है और जैसे ही मन का विस्तार होता है, अहंकार के लिए कोई जगह नहीं बचती। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है सीमित में दुःख है, असीम में विश्राम है। अनंत ही हमारे मन को समाधान दे सकता है। स्वयं को जगत से पृथक मानना व जगत को स्वयं का विरोधी मानना ही तनाव का कारण है। तनाव से ही तन व मन के कई रोग होते हैं। जब हम सारे अस्तित्त्व को अपना ही विस्तार देखते हैं तो मन खो जाता है। देह पंच तत्त्वों के स्थूल भाग से बना है और मन उन्हीं के सूक्ष्म भाग से। इस प्रकार देह सृष्टि का ही एक छोटा अंश है और मन इस विशाल मन का। चेतना भी विश्व चेतना का ही भाग है। यहाँ हर वस्तु दूसरे से संयुक्त है। यह पूरा ब्रह्मांड एक ही जीवित इकाई है। यदि हम स्वयं को इसका एक अंश मानते हैं तो कोई विरोध या प्रतिद्वंदिता नहीं रह जाती। मन से सारा विषाद खो जाता है और एक अपूर्व शांति का अनुभव होता है। 


Tuesday, December 8, 2020

कर्मण्येवाधिकारस्ते

 फल की कामना को रखकर किया गया कर्म अस्तित्त्व के लिए नहीं होता, जबकि साधक  अस्तित्त्व के साथ अभिन्नता का अनुभव करना चाहता है. यदि उसका स्वार्थ अभी भी शेष है तो साधना का लक्ष्य अभी दूर है. जो किंचित मात्र भी मन को बचाकर रखना चाहता है, वह अहंकार का पोषण ही कर रहा है. उसे दुःख का  भागी होना ही पड़ेगा. दुःख आत्मा से दूर ले जाता है, सहजता ही आनंद है. जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारना तथा किसी मान की चाह या प्राप्ति के लिए कुछ करना या करने की इच्छा रखना सहजता के पद से नीचे उतर जाने जैसा ही है। जो भाव दशा मन में आती है और उतर जाती है वह नश्वर है। आकाश की भांति अनंत और सागर की भांति गहरे स्थायी भाव में टिकना ही साधना है। 


Friday, September 11, 2020

सत्यम परम अनंतं ज्ञानम

  अद्वैत के ग्रन्थों में रज्जु और सर्प का उदाहरण दिया जाता है. अँधेरे में हम रस्सी को सांप समझ लेते हैं और व्यर्थ ही भयभीत हो जाते हैं. प्रकाश होने पर जब ज्ञान होता है तो खुद पर ही हँसी आती है. इसी तरह चमकती हुई सीपी को देखकर चाँदी का व पीतल में स्वर्ण का भ्रम भी हो सकता है.  जीवन में हम मोह को प्रेम समझ लेते हैं. मोह से होने वाले दुःख को अनुभव करते हैं तब लगता है  प्रेम  दुखदायी है, जब ज्ञान होता है तभी समझ में आता है यह प्रेम था ही नहीं. प्रेम तो एक विशुद्ध भावना है, इसमें समर्पण है, हम अन्यों पर अधिकार चाहते हैं और उन्हें झुकाना चाहते हैं. देह, मन, बुद्धि  को आत्मा समझ लेते हैं और इनके रोगी होने या मिटने पर दुखी होते हैं, जबकि शाश्वत तो केवल आत्मा है, देह तो मरणशील है ही. धीरे-धीरे अद्वैत का सिद्धांत हमें इस सत्य की ओर ले जाता है कि जिसे हम जगत समझ रहे हैं वह परमात्मा ही है. परमात्मा सत्य, अनंत, ज्ञान और परम है, यह सृष्टि भी अनादि काल से है. परमात्मा को हम अनुभव कर सकते हैं, उसे पा नहीं सकते वह कभी भी वस्तु बनकर हमें नहीं मिल सकता, वैसे ही यह जगत कभी पकड़ में नहीं आता. न वस्तु शाश्वत है, न पकड़ने वाला ही. यह उस बाजार की तरह है जिसमें से हमें इसकी शोभा देखते हुए गुजर भर जाना है.   


Tuesday, May 5, 2020

ज्योति जलेगी जिस पल मन में

जब हम अध्यात्म के क्षेत्र में कदम रखते हैं, जब हम वास्तव में स्वयं के अनंत रूप से परिचित होना चाहते हैं, सारा जगत हमारा घर बन जाता है. हमारे मन में जब किसी बात के प्रति संदेह उत्पन्न होता है तो हमें जानना चाहिए की यह जहाँ से आया है वहाँ गहरा विश्वास है. मन उसी के आधार पर तर्क करता है जो वह जानता है. यदि हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि हमारी छोटी सी बुद्धि जितना जानती है अस्तित्त्व उससे कहीं अधिक है तो हृदय के द्वार खुलने लगते हैं. जब हम किसी भी स्थिति का सामना सहज रूप से कर सकते हैं, मन का संतुलन बना रहता है, तो मानना चाहिए कि उस गहराई से हम जुड़े हैं. जीवन में हम गतिमयता का वरण तभी करते हैं जब जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण अति विशाल होता है. हमारे भीतर एक ऐसी चेतना का जन्म होता है जो साक्षी रहकर जो भी आवश्यक हो उसे करने की प्रेरणा देती है. हमारी खोज यदि सच्ची है तो प्रकृति हमारा मार्गदर्शन करती है. 

Thursday, July 11, 2019

इस पल में जो जाग गया


जीवन की परिभाषाएं कितनी ही देते चलो, जीवन है कि चूकता ही नहीं, हाथ में आता ही नहीं. नित नये रंग बिखेरे चला जाता है. जीवन के रंग अनंत हैं और इसके ढंग भी अनंत हैं. इसे किसी खांचे में फिट नहीं किया जा सकता. यदि कोई सोचे कि विकासशील देश के किसी सुदूर गाँव में ही असली जीवन है तो वह भी आधा सच होगा और यदि कोई कहे विकसित देशों में ही सच्चा जीवन है तो वह भी अर्धसत्य होगा. जीवन के मर्म को जाने बिना हम कुछ भी करें, कहीं भी रहें एक तलाश भीतर चलती ही रहती है. यही माया है. सर्व सुविधा सम्पन्न होकर भी कुछ यहाँ अभाव का अनुभव करते हैं और कुछ न होते हुए भी अलमस्त देखे जाते हैं. इसका अर्थ हुआ जो भी जहाँ है वहाँ यदि थोड़ा गहराई से देखे कि जिस जीवन को ढूँढने में हम सारा श्रम लगा रहे हैं, वह तो एक दिन हाथ से फिसल जाने वाला है, और जो हमारे पास इस समय है वह अमूल्य है. वर्तमान के क्षण में जिसने जीवन से मुलाकात नहीं की वह भविष्य में कभी करेगा, ऐसी कल्पना दिवास्वप्न के सिवा कुछ भी नहीं.

Tuesday, April 16, 2019

है अपार महिमा उसकी


हम परमात्मा की महिमा के गीत गाते हैं, कि वह सर्वज्ञ है, वह अनादि है, अनंत है, वह परम कृपालु है, अन्तर्यामी है और परम स्नेही है. यदि हमारी भावनाएं सच्ची हैं तो ऐसा करके हम अपनी ही सम्भावनाओं को तलाशते हैं. परम की महिमा एक दिन हमें अपने भीतर के सत्य से मिला देती है. हर व्यक्ति अपने ज्ञान को बढ़ाना चाहता है, किसी को भी अपने जन्म का कोई अनुभव नहीं, हम सदा से ही स्वयं को जानते हैं और न ही हमें कभी यह लगता है कि एक दिन हम नहीं रहेंगे. उसकी कृपा को अनुभव करने वाला हृदय अन्यों पर दया करना अनायास ही सीख जाता है. स्नेह का वह स्रोत, जो सबके भीतर गहराई में बहता है और ज्यादातर लोग जीवन भर उससे अछूते ही रह जाते हैं,  उसके जीवन में प्रवाहित होने लगता है और उसे ही नहीं आसपास के लोगों को भी भिगोता हुआ बहता है.

Monday, May 21, 2018

मनसा, वाचा, कर्मणा भजे एक को जो


२२ मई २०१८ 
महात्मा गाँधी के प्रसिद्ध वचन हैं, ख़ुशी तब मिलेगी जब आप जो सोचते हैं, जो कहते हैं और जो करते हैं, तीनों में सामंजस्य हो. मन और वाणी एक दूसरे के विपरीत न हों, हमारे वचन और कर्म भी एक दूसरे की गवाही बनें. किन्तु अक्सर ऐसा होता है कि भाव शुद्ध होते हुए भी वाणी कठोर हो जाती है, अथवा वाणी अत्यंत मधुर है, मानो शहद में डूबी हो, पर कर्म स्वार्थ से भरे होते हैं. जब तक ऐसा है, ख़ुशी टिकने वाली नहीं है. साधक को तो अति सजग रहना होगा, उसका आचरण परमार्थ के लिए हो, वाणी में कोई दोष न हो, और भाव पवित्र हों. परमात्मा के पथ का जो राही है, उसे यदि स्वयं के कुशल-क्षेम की चिंता स्वयं ही करनी है तो उसकी श्रद्धा सच्ची नहीं. उसे भी यदि सम्मान पाने की आकांक्षा है तो उसने परमात्मा को सर्वोत्तम माना ही नहीं. कबीर दास ने कहा है, जो शीश कटाने को तैयार हो वही इस पथ पर चल सकता है. स्वयं को बचाते हुए बल्कि और भी  सजाते हुए इस पथ पर नहीं चला जा सकता. निष्कामता और निस्वार्थता साधे बिना अनंत के द्वार तक नहीं पहुंचा जा सकता.    

Wednesday, December 20, 2017

पल में सारा राज छिपा है

२१ दिसम्बर २०१७ 
जीवन और काल, ये दोनों शब्द पर्यायवाची होने चाहिए. जीवन की धारा प्रतिपल बह रही है और काल का अश्व भी निरंतर गतिमान है. दोनों अपने स्थिर होने का भ्रम देते हैं, अन्यथा क्यों कोई पत्थरों पर लाखों व्यय करता है और फूलों की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखता. जीवन की भव्यता को समझे बिना ही हम समय बिताये जाते हैं. यहाँ हर क्षण में अनंत छिपा है, संत कहते हैं जो मिला ही हुआ है उस पर तो हम पर्दे डाले जाते हैं और जो मिल ही नहीं सकता उस सुख के लोभ में दिन का चैन और रातों की नींद गंवाते हैं. योग ही वह सूत्र है जो जीवन और काल को एक कर देता है.  

Sunday, July 23, 2017

इस क्षण में ही मिल सकता वह

२४ जुलाई २०१७ 
केवल वर्तमान का यह नन्हा सा पल ही सत्य है. यही क्षण अपने भीतर अनंत को छुपाये है. जैसे एक परमाणु में असीम शक्ति छिपी है वैसे ही एक क्षण में अनंत समय छिपा है. वर्तमान में रहने की कला ही ध्यान है. यदि कोई इस कला को सीख लेता है तो वह कभी समय की कमी महसूस नहीं करता. वास्तव में वर्तमान के सिवा कोई समय ही नहीं है, सब कुछ इसी क्षण में है और इसी वक्त है. अनंत काल जो बीत गया और अनंत काल जो आने वाला है, वह इसी क्षण में है अन्यथा नहीं है. जो आज अतीत बन गया है, वह तो अभी है नहीं, जो भावी है वह भी अभी नहीं है. धर्म का अनुभव वर्तमान में ही हो सकता है. 

Thursday, May 11, 2017

चिर नूतन जगती का मेला

११ मई २०१७ 
अनंत काल से यह सृष्टि चल रही है, लाखों मानव आये और चले गये, कितने नक्षत्र बने और टूटे. कितनी विचार धाराएँ पनपी और बिखर गयीं. कितने देश बने और लुप्त हो गये. इतिहास की नजर जहाँ तक जाती है सृष्टि उससे भी पुरानी है, फिर एक मानव का सत्तर-अस्सी वर्ष का छोटा सा जीवन क्या एक बूंद जैसा नहीं लगता इस महासागर में, व्यर्थ की चिंताओं में फंसकर वह इसे बोझिल बना लेता है. हर प्रातः जैसे एक नया जन्म होता है, दिनभर क्रीड़ा करने के बाद जैसे एक बालक निशंक माँ की गोद में सो जाता है, वैसे ही हर जीव प्रकृति की गोद में सुरक्षित है. यदि जीवन में एक सादगी हो, आवश्यकताएं कम हों और हृदय परम के प्रति श्रद्धा से भरा हो तो हर दिन एक उत्सव है और हर रात्रि परम विश्रांति का अवसर !  

Monday, May 18, 2015

तृष्णा मिटेगी परम प्रेम से

फरवरी २००९ 
हर संवेदनशील व्यक्ति को एक न एक दिन खुद को पहचानने की यात्रा शुरू करनी होगी, तन मिट्टी से बना है, मन ज्योति से बना है. मन को भरना इस संसार से सम्भव नहीं हो सकता, वह विराट चाहता है, अनंत ही उसकी प्यास को बुझा सकता है. हमारा मन जब अपने मूलरूप को पहचान लेता है, घर लौट आता है तो उसका आचरण, उसका बाहरी दुनिया से संपर्क का तौर-तरीका ही बदल जाता है. प्रेम, शांति और अपनापन वह परमात्मा से पाता है सो बाहर लुटाता है, जितना वह लुटाता है उतना-उतना परमात्मा उसे भरता ही जाता है. स्वयं की पहचान उसे सभी मानवों से जोड़ती है सभी जैसे उसी के भाग हैं, कोई पृथक नहीं, सभी का भला ही उसकी एकमात्र चाह रह जाती है, उसके जीवन में मानो फूल ही फूल खिल जाते हैं !    

Friday, February 27, 2015

हो निर्भार परम तक पहुंचें

जनवरी २००८ 
इन्द्रियगत ज्ञान सीमित है वह हमें विस्मय से नहीं भरता, स्वरूपगत ज्ञान अनंत है, वह विस्मय से भर देता है. आनंद की झलक दिखाता है. अज्ञान को स्वीकारने से ऐसा ज्ञान मिलता है. इस विशाल सृष्टि में हम कितने नगण्य हैं, कितना कम जानते हैं, बहुत कुछ है जो जान नहीं सकते यह अहसास हमें झूठे अभिमान से मुक्त कर देता है, हम हल्के हो जाते हैं. उतने ही हम सत्य के निकटतर होते जाते हैं. जानने का बोझ उठाये हम थकते ही हैं, उस जानने से न हमारा कोई लाभ होता है न किसी अन्य का, क्योंकि सभी को यह भ्रम है कि वही जानता है. ज्ञेय सदा ज्ञान से छोटा है, हम ज्ञेय में ही उलझे रहते हैं. दृश्य से हटकर दृष्टा में आना ही योग का प्रथम चरण है. विस्मय से परे वह तत्व है जहाँ स्तब्धता है, मौन है, आनंद है और वैराग्य है. तृष्णा का वहाँ कोई स्थान नहीं. परम शांति है, प्रेम है !  

Thursday, March 6, 2014

सदा सजग हो करें साधना

सितम्बर २००५ 
भाग्य क्या है ? जो कर्म हम पहले कर चुके हैं उनका फल ही भाग्य के रूप में हमारे सामने आता है. अभी जो कर्म हम कर रहे हैं वही भविष्य में हमारे सामने आएंगे. प्रारब्ध में जो है वह तो हमें स्वीकारना होगा पर हम इस क्षण से सजग हो जाएँ कि नये कर्मों की फसल नहीं बोयेंगे. सर्वप्रथम तो स्वयं को देह मानने की भूल से मुक्त होना है, मन व बुद्धि के द्वार से और भीतर जाना है, स्वयं में स्थित होकर किया गया कर्म हमें बांधता नहीं है. आत्मा की अनुभूति हो जाने के बाद इस जगत से इतना ही प्रयोजन रह जाता है जितना भूख मिटने के बाद भोजन से. तब निज सुख के लिए करने जैसा कोई काम रह ही कहाँ जाता है. तब तो सहज ही कर्त्तव्य पालन होता है तथा देह को टिकाये रखने के लिए आवश्यक कर्म होते हैं. ये दोनों ही बाँधने वाले नहीं हैं. मानव की देह लेकर आना हुआ तो एक उद्देश्य था स्वयं की अनन्तता का अनुभव करना, इस उद्देश्य को पाने का साधन है देह, जगत भी साधन है. इन साधनों का उपयोग करके जिसने अपने आप को जान लिया, अपने शुद्ध, बुद्ध, मुक्त शाश्वत स्वरूप को देखकर जिसे लगा कि यही तो वह है, वही तो यह है...भीतर बाहर एक ही चेतना के दर्शन वह करता है.  


Sunday, December 1, 2013

आज तोड़ दें सब जंजीरें

अप्रैल २००५ 
अनंत धैर्य तथा अखंड भरोसा हमें शुभ की ओर ले जाता है. हमारा मन जो आज हमारा शत्रु प्रतीत होता है, साधना की अग्नि में तपकर मित्र हो जाता है. फिर वह स्वतः ही परम की ओर जाता है, आत्मा के सान्निध्य का रस प्राप्त करने के बाद  पुनः झूठे रस को पाकर संतुष्ट नहीं होता, बल्कि उसी दिव्य रस को चखना चाहता है. वर्तमान के क्षण में वही दिव्यता हमें मिलती है, हर आने वाला क्षण अपने भीतर अनंत प्रेम छिपाए है. शुद्ध वर्तमान हमें मुक्त कर देता है. उसमें रहने वाला मन एक उन्मुक्त पंछी की तरह खुले गगन में उड़ान भर सकता है, अन्यथा भूत तथा भावी की जंजीरें बंधीं हो तो पंछी कैसे उड़ेगा. अतीत का पश्चाताप तथा भविष्य की आशंका की जंजीरें बांध दें तो वह नहीं उड़ पायेगा, ज्ञान की तलवार से इन्हें काट सकते हैं. भूत कभी लौट कर नहीं आता और भविष्य अनिश्चित है, जिन पर न हमारा वश है और जो न हमें तृप्त कर सकते हैं. जिसके मन में पूर्ण की चाह उठे वह सदा वर्तमान में ही रहता है वही ज्ञानी है और वही पूर्ण तृप्ति का अनुभव करता है.

Wednesday, October 16, 2013

प्रभु जी ! तुम चन्दन हम पानी

मार्च २००५ 
मन रे कर सुमिरन हरि नाम ! नाम लिए से मिट जाते हैं जन्म-जन्म के काम ! ईश्वर के बिना हमारे लिए कोई रक्षक नहीं, हमारे तथाकथित प्रेम आदि (मोह) ही हमें दुःख की ओर लिए जाते हैं, बंधन में डालने वाला यह स्वार्थ ही तो है, ईश्वर हमें इससे छुड़ाता है और अमरता के उस परम पद तक पहुंचा देता है जहाँ से फिर पतन नहीं होता. वह हमारा हितैषी है, सुह्रद है, अकारण दयालु है, प्रेममय है, रस मय है, वह जो है, जैसा है आज तक कोई बखान नहीं कर पाया. वह हमारे कुम्हलाये हुए मन को ताजगी से भर देता है, अनंत शक्ति का भंडार है, वह हमें अनेकों बार सम्भलने का मौका देता है, सदा हमारी रखवाली करता है, जैसे ही हम उसकी ओर कदम बढ़ते हैं, वह हाथ थाम लेता है. हमारे साथ प्रेम का आदान-प्रदान करने के लिए सदा तत्पर है. एक बार प्रेम से पुकारते ही वह हमारे मन को अपने जवाब से भर देता है. उसे हमारी योग्यता की नहीं हमारे प्रेम की चाह है, वही सच्चा प्रेमी है, हम तो प्रेम के नाम पर व्यापार करते हैं. वह परमात्मा हमारी आत्मा की भी आत्मा है.


Wednesday, September 25, 2013

खाली हुआ जो वही भरा

मार्च २००५ 
निर्मलता शांति को प्रकट करती है. आकाश यदि घनमालाओं से आवृत हो तो इतना विशाल प्रतीत नहीं होता, शुभ्र गगन अनंत शांति को प्रकट करता है. उसी तरह चिदाकाश भी जब वृत्तियों से रहित होता है तो निर्मलता को प्रकट करता है. सहज प्रेम भी उसी से फूटता है. भक्त फूल की तरह, नदी व सूर्य की तरह देना चाहता है, वह अपना आप खाली कर देना चाहता है, क्योंकि वह उसमें अनंत को भरना चाहता है, एक तरफ वह खाली होता जाता है और दूसरी तरफ भरता जाता है. पूर्ण मदा पूर्ण मिदं, पूर्णात पूर्ण मुदच्यत...अपने जीवन में जीता है. सत्य को अपने जीवन में घटते देखता है. शास्त्रों में जो लिखा है, वह अनुभूत सत्य है, जब भक्त के जीवन में वह घटित होता है तो शास्त्र के प्रति उसका प्रेम और बढ़ जाता है. ईश्वर की यह सृष्टि कितनी अद्भुत है.

Thursday, July 4, 2013

एक झलक जो पा जाये

अनंत-अनंत सुखों की राशि परमात्मा हमें सहज ही प्राप्त है, पर हम भीतर की ओर मुड़ना नहीं जानते. हमारी दृष्टि जब अन्तर्मुखी होती है, तब परमात्मा अपनी विभिन्न शक्तियों के रूप में प्रकट होने लगता है, क्षण भर को जगत का लोप हो जाता है, शब्द तब साक्षात् सरस्वती के रूप में भीतर प्रकट होते हैं. ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ऐसे ही मन्त्रों का दर्शन किया था, आज भी अनेक सन्त-महात्मा तथा सद्गुरु उस अनंत परमात्मा की झलक अपने भीतर पा लेते हैं, फिर उस आनन्द को बाहर बिखेरते हैं. उस आनन्द में कैसी मोहिनी है कि साधक भी उसकी ओर खिंचे चले जाते हैं, ऐसा लगता है जैसे भीतर कुछ घट रहा हो, कोई सोता जैसे फूट रहा है, एक अनोखी शांति भीतर छा रही है, जैसे पहले कभी नहीं छाई. संसार की किसी भी वस्तु में ऐसी शक्ति नहीं जो ऐसी अद्भुत शांति को भीतर भर दे, परमात्मा की आह्लादिनी शक्ति ही ऐसा कर सकती है. मन तब भीतर की ओर मुड़ना चाहता है, बार-बार उस स्वाद को लेना चाहता है, पर मन की ही दीवार उसमें बाधा बन जाती है, तब पीड़ा का अनुभव होता है, पीड़ा भी ऐसी कि दिल चीर कर रख दे, पीड़ित मन जब अपने ही आंसुओं से धुलता है तो पल भर के लिए दीवार ढह जाती है और झलक मिलती है, वह कह उठता है, काश ! तू सदा हमारी स्मृति में रहे.

Monday, July 1, 2013

तू अनंत.. अपार.. असीम....

अक्तूबर २००४ 
हमें मानव योनि मिली है यह प्रभु की कृपा है. हमारे जीवन का लक्ष्य मानव देह पाकर स्वयं ही निर्धारित हो जाता है, वह है अनंत का अनुभव. हमारे भीतर आत्मा का सूरज जगमगा रहा है पर उसका प्रकाश हमारे कर्मों के जाल से आच्छादित है. वह प्रकट होना चाहता है, पर प्रारब्ध कर्म, संचित कर्म तथा क्रियमाण कर्मों की लम्बी श्रंखला है जो उसे ढके हुए है, यदि हम नियमित ध्यान करें तो क्रियमाण कर्म घटते चले जायेंगे, सद्गुरु या परमात्मा की शरण में जाते ही वह हमारे संचित कर्मों को काट देते हैं. रह गये प्रारब्ध कर्म, उनका फल तो हमें भोगना ही पड़ेगा पर जीने की कला यदि आती हो तो प्रारब्ध कर्म हमें बांध नहीं सकते. आते-जाते सुखों-दुखों को देखते हुए हम मस्त रहते हैं. हम साक्षी भाव में टिकने लगते हैं तो अनंत स्वयं को छुपा नहीं सकता. हमारे जीवन का उद्देश्य यदि हर पल सामने रहेगा तो एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जायेगा, सारा उद्यम उस एक की प्राप्ति के लिए होगा तो शेष सब अपने आप व्यवस्थित होता चला जायेगा, आनन्द, शांति व प्रेम के फूल खिलने लगेंगे. अनंत अपने पूरे वैभव के साथ हमारे ही भीतर है, और वह प्रकट होना चाहता है, वहाँ कोई विरोध नहीं, कोई द्वैत नहीं, कोई अभाव नहीं.

Thursday, May 16, 2013

तू ही तू ही


सितम्बर २००४ 
ईश्वर की निकटता का अहसास ही इतना मधुर है तो स्वयं ईश्वर कैसा होगा, संतजन इसीलिए उसकी महिमा का बखान करते नहीं थकते. उससे प्रेम करो तो वे हमारी बुद्धि को शुद्ध कर देते हैं. उसकी कृपा भी अनंत है जो भक्तों के लिए साकार भी हो जाता है, कितना आश्चर्य है कि वह अनंत मानव के छोटे से मन में प्रविष्ट हो जाता है. प्रकृति पहले हमें तैयार करती है फिर अपने रहस्य खोलती है. वह एक ही है जो विविध रूपों में व्यक्त हो रहा है. वही पालनहार है वही काल है. सब कुछ बदलने वाला है, वही एक अबदल है, जो सबका आधार है.