टीवी पर आजकल 'महाभारत' दिखाया जा रहा है. पहले भी देखा है पर रामायण की तरह यह कथा भी इतनी अनोखी है कि बार-बार देखने पर भी नई जैसी लगती है. कहते हैं जो महाभारत में नहीं है वह कहीं नहीं है अर्थात इस दुनिया में जो कुछ भी है उसका जिक्र कहीं न कहीं महाभारत में हो चुका है. एक लाख से अधिक श्लोकों के द्वारा चन्द्रवंशी राजाओं की यह कथा भारत के भव्य इतिहास को भी बताती है और विश्व का प्रथम महाकाव्य होने का गौरव भी रखती है. इसे पंचम वेद भी कहते हैं और पुराण भी कहा जाता है. वेद व्यास ने इस अद्भुत ग्रन्थ को लिखवाने का कार्य गणपति को सौंपा था. भगवद्गीता महाभारत का ही एक भाग है, जो भारत का प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ है. वर्तमान पीढ़ी को इसे मूल रूप में पढ़ने का अवसर तो नहीं मिलेगा पर धारावाहिक के रूप में ही वे इससे परिचित हो रहे हैं और अपनी प्राचीन गौरवशाली परंपरा पर गर्व कर रहे हैं. इसके विभिन्न पात्रों पर कितने ही नाटकों व उपन्यासों की रचना हो चुकी है. भारत के कण-कण में इन प्राचीन गाथाओं की गन्ध बसी है. मानव मन की कितनी ही गाँठों को खोलती हैं इसकी कथाएं. कोरोना के कारण घरों में रहने को विवश नागरिकों के लिए अपने अतीत से परिचित होने का यह एक सुअवसर भी है.
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Monday, May 4, 2020
Sunday, May 3, 2020
विपदा में जो हाथ बढ़ेगा
विश्व के अन्य कई देशों की तरह भारत में भी लॉक डाउन अभी खत्म नहीं हुआ है, कोरोना ने पूरी दुनिया में मजबूती से अपने पैर पसार लिए हैं और वह जल्दी विदा लेने के मूड में नजर आता नहीं दिख रहा है. वैज्ञानिक अभी तक कोई वैक्सीन नहीं खोज पाए हैं, हमें ही इससे बचाव करते हुए जीना सीखना होगा. अनावश्यक घर से बाहर न निकलना पहला नियम है. भीड़भाड़ से बचाव इससे स्वतः ही हो जायेगा. सरकार ने जिन्हें छूट दी है वे दुकानें तथा प्रतिष्ठान खुल रहे हैं किन्तु उनमें जाने से पहले हरेक को सजगता बरतनी है. मास्क का उपयोग तथा सेनिटाइजर का बार-बार प्रयोग स्वभाव में ही शामिल कर लेना होगा. जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक है, उन्हें बेशर्त दूसरों की सहायता के लिए आगे आना होगा. इतिहास में ऐसे अवसर कभी-कभी ही आते हैं जब पूरी मानवता का अस्तित्त्व ही खतरे में पड़ जाता है, तब दुनिया समर्थ और सक्षम का आश्रय लेती है. जिस तरह से भी हो सके हमें मदद के लिए हाथ बढ़ाना है. हर धर्म में दान धर्म का बहुत महत्व बताया गया है. सरकार ने अपने भंडार असमर्थों के लिए खोल दिए हैं, हमें भी उसकी सहायता के लिए तत्पर रहना होगा.
Friday, April 10, 2020
बदल रहा चलन दुनिया का
अब हम अपने जीवन के इतिहास को बताने के लिए समय को दो भागों में बाँट कर कहेंगे, पहला कोरोना वायरस के आने के पहले का काल और दूसरा उसके आगमन के बाद का. उदाहरण के लिए हम कहेंगे, जब वायरस नहीं पनपा था तब हम विदेश घूमने गए थे। उन दिनों हम सब एक साथ घूमने जाते थे, घरों में सामूहिक भोज का आयोजन करते थे. वर्तमान में हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. लॉक डाउन खुलने के बाद भी हमारा जीवन पहले का सा नहीं रह जायेगा. अगले कई वर्षों तक हमें पूरी सावधानी रखनी होगी, हममें से जो भी बुजुर्ग हैं या किसी न किसी रोग से ग्रसित हैं, उन्हें तो विशेष रूप से घर पर रहने के लिए ही कहा जायेगा. बच्चे स्कूल जाने की अपेक्षा ऑन लाइन पढ़ना ज्यादा पसन्द करेंगे. पहले की तरह हम सामान्य रूप से मॉल, बाजार और प्रदर्शनियों में जाकर खरीदारी नहीं कर सकेंगे. बाहर निकलते समय मास्क पहनना सामान्य बात हो जाएगी. फ़िल्में भी सिनेमाघरों की बजाय ऑन लाइन ही रिलीज होंगी. घरों व सड़कों की सफाई पर ज्यादा ध्यान दिया जायेगा. मन्दिरों में अब पहले की तरह भीड़ नहीं होगी, लोग नेट पर ही दर्शन करेंगे और घरों में पूजा करेंगे. योग और ध्यान जीवन का एक अभिन्न अंग बन जायेगा. विदेश यात्रा का मोह कम हो जायेगा और छात्रों में अपने ही देश में रहकर पढ़ने को बेहतर कहेंगे. पारिवारिक मूल्य फिर से स्थापित होंगे और अनावश्यक घूमना-खरीदारी बंद हो जायेंगे. लोगों में दूसरों की मदद करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी और जीवन सरल और सादा होगा.
Sunday, March 29, 2020
बाहर से जो भी उबरेगा
यह विचित्र युग है, आज इतिहास बन रहा है, आज से सौ वर्षों बाद इतिहास की किसी किताब में कोई पढ़ रहा होगा कि कोरोना-महामारी ने कैसे दुनिया को हैरान-परेशान कर दिया था. हवाई जहाज, रेल,बसें, कारें सभी थम गए थे और हजारों लोगों ने अपने प्राण गंवाए थे. इस महामारी का आर्थिक विश्लेषण भी किया जायेगा और राजनीतिक भी. वर्तमान में जो भी घट रहा है हम उसके साक्षी हैं, जो कोरोना के शिकार हुए हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य नहीं रहा, उनके दुःख का अंदाजा हम नहीं लगा सकते. जिनका रोजगार छिन गया, जिनके घर छूट गये, उनका दुःख तो समय के साथ कम हो जायेगा, किंतु उसका असर किसी न किसी रूप में बना ही रहेगा. स्थिति को सुधारने के लिए हममें से हरेक अपने तौर पर कुछ न कुछ मदद कर सकता है, और कुछ न भी कर सके घर में बने रहकर बीमारी से बच सकता है और अंततः औरों को बचा सकता है. जब ऊर्जा को बाहर जाने का कोई अवसर नहीं मिलता तो वह गतिशील होने के कारण भीतर ही तो जाएगी, आज हमें अवसर मिला है कुछ दिन अपने साथ रहने का, अपने भीतर जाने का. जीवन की इस उहापोह भरी स्थिति में जब बाहर कोई आधार नहीं मिलता हो तब भीतर के केंद्र को पाकर उसे आधार बनाकर हम जीवन के मर्म को समझ सकते हैं.
Thursday, May 11, 2017
चिर नूतन जगती का मेला
११ मई २०१७
अनंत काल से यह सृष्टि चल रही है, लाखों मानव आये और चले गये, कितने नक्षत्र बने
और टूटे. कितनी विचार धाराएँ पनपी और बिखर गयीं. कितने देश बने और लुप्त हो गये.
इतिहास की नजर जहाँ तक जाती है सृष्टि उससे भी पुरानी है, फिर एक मानव का
सत्तर-अस्सी वर्ष का छोटा सा जीवन क्या एक बूंद जैसा नहीं लगता इस महासागर में,
व्यर्थ की चिंताओं में फंसकर वह इसे बोझिल बना लेता है. हर प्रातः जैसे एक नया
जन्म होता है, दिनभर क्रीड़ा करने के बाद जैसे एक बालक निशंक माँ की गोद में सो
जाता है, वैसे ही हर जीव प्रकृति की गोद में सुरक्षित है. यदि जीवन में एक सादगी
हो, आवश्यकताएं कम हों और हृदय परम के प्रति श्रद्धा से भरा हो तो हर दिन एक उत्सव
है और हर रात्रि परम विश्रांति का अवसर !
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