Sunday, March 29, 2020

बाहर से जो भी उबरेगा


यह विचित्र युग है, आज इतिहास बन रहा है, आज से सौ वर्षों बाद इतिहास की किसी किताब में कोई पढ़ रहा होगा कि कोरोना-महामारी ने कैसे दुनिया को हैरान-परेशान कर दिया था. हवाई जहाज, रेल,बसें, कारें सभी थम गए थे और हजारों लोगों ने अपने प्राण गंवाए थे. इस महामारी का आर्थिक विश्लेषण भी किया जायेगा और राजनीतिक भी. वर्तमान में जो भी घट रहा है हम उसके साक्षी हैं, जो कोरोना के शिकार हुए हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य नहीं रहा, उनके दुःख का अंदाजा हम नहीं लगा सकते. जिनका रोजगार छिन गया, जिनके घर छूट गये, उनका दुःख तो समय के साथ कम हो जायेगा, किंतु उसका असर किसी न किसी रूप में बना ही रहेगा. स्थिति को सुधारने के लिए हममें से हरेक अपने तौर पर कुछ न कुछ मदद कर सकता है, और कुछ न भी कर सके घर में बने रहकर बीमारी से बच सकता है और अंततः औरों को बचा सकता है. जब ऊर्जा को बाहर जाने का कोई अवसर नहीं मिलता तो वह गतिशील होने के कारण भीतर ही तो जाएगी, आज हमें अवसर मिला है कुछ दिन अपने साथ रहने का, अपने भीतर जाने का. जीवन की इस उहापोह भरी स्थिति में जब बाहर कोई आधार नहीं मिलता हो तब भीतर के केंद्र को पाकर उसे आधार बनाकर हम जीवन के मर्म को समझ सकते हैं. 

4 comments:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (31 -3-2020 ) को " सर्वे भवन्तु सुखिनः " ( चर्चाअंक - 3657) पर भी होगी,
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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    कामिनी सिन्हा

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