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Friday, February 27, 2015

हो निर्भार परम तक पहुंचें

जनवरी २००८ 
इन्द्रियगत ज्ञान सीमित है वह हमें विस्मय से नहीं भरता, स्वरूपगत ज्ञान अनंत है, वह विस्मय से भर देता है. आनंद की झलक दिखाता है. अज्ञान को स्वीकारने से ऐसा ज्ञान मिलता है. इस विशाल सृष्टि में हम कितने नगण्य हैं, कितना कम जानते हैं, बहुत कुछ है जो जान नहीं सकते यह अहसास हमें झूठे अभिमान से मुक्त कर देता है, हम हल्के हो जाते हैं. उतने ही हम सत्य के निकटतर होते जाते हैं. जानने का बोझ उठाये हम थकते ही हैं, उस जानने से न हमारा कोई लाभ होता है न किसी अन्य का, क्योंकि सभी को यह भ्रम है कि वही जानता है. ज्ञेय सदा ज्ञान से छोटा है, हम ज्ञेय में ही उलझे रहते हैं. दृश्य से हटकर दृष्टा में आना ही योग का प्रथम चरण है. विस्मय से परे वह तत्व है जहाँ स्तब्धता है, मौन है, आनंद है और वैराग्य है. तृष्णा का वहाँ कोई स्थान नहीं. परम शांति है, प्रेम है !  

Friday, April 4, 2014

अद्वैत ही साधना है

दिसम्बर २००५ 
योग वशिष्ठ में लिखा है, इस जगत का कारण मन ही है, मन ही दृश्य है और मन ही द्रष्टा भी, एक न रहे तो दूसरा भी नहीं रहेगा, तब स्वयं ही स्वयं में स्थित रहेगा. हमारी सारी परेशानियों, चिंताओं का कारण मन ही है. मन के पार कोई दुःख नहीं और यह मन वास्तव में कुछ नहीं एक परछाई है, इसे जानकर उससे पार हुआ जा सकता है वरना यह हम पर हावी हो जाता है और हम इसके कहे अनुसार चलते रहते हैं. जब भी हम दूसरे का दोष देखते हैं, हममें भेद बुद्धि आ जाती है. हम भेद करते हैं, जबकि यहाँ दो हैं ही नहीं, सब उसी एक का पसारा है. जो हम हैं वही अन्य भी हैं, तो कोई भी गलत नहीं है, सभी निर्दोष हैं, अपनी-अपनी जगह पर सही. हमें अद्वैत साधना है तभी हमारी साधना आगे बढ़ेगी.