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Friday, April 7, 2017

सारा जग अपना लागे जब

७ अप्रैल २०१७ 
'विभिन्नता में एकता' का सूत्र जितना हमारे देश की मूल भावना को दर्शाता है उतना ही मानव और प्राणी जगत की आंतरिक एकता को भी. ऊपर-ऊपर से जितना भेद दिखाई देता है, भीतर-भीतर उतना ही साम्य छिपा है. जैसे एक वृक्ष है उसकी डालियाँ और तना निकट के वृक्ष से पृथक हैं पर धरती के भीतर दोनों की जड़ें आपस में किस तरह घुल-मिल जाती हैं कि कोई भेद नजर नहीं आता. साथ ही जो हवा और प्रकाश एक की पत्तियां ग्रहण करती हैं दूसरे की भी वही. उनमें एक तरह की समानता सदा ही है, मनुष्य -मनुष्य के मध्य भी सूक्ष्म स्तर पर देखा जाये तो हवा और प्रकाश के साथ-साथ विचार की तरंगे बिना रोक-टोक एकदूसरे में प्रवेश करती हैं. चेतना का गुण-धर्म एक जैसा ही है, चाहे वह किसी के भीतर ही क्यों न हो. ध्यान में जब इसका अनुभव साधक को हो जाता है एक आत्मीयता की भावना भीतर भर जाती है. एक अपनापन जो जगत के प्राणीमात्र के प्रति प्रकट होने लगता है. 

Tuesday, September 13, 2016

द्वैत मिटेगा जब भीतर से

१३.९.२०१६ 
शिशु अबोध होता है, उसे अपने पराये का बोध नहीं होता, वह सभी को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है. वयस्क होने पर उसे भेद का बोध होता है, वह जगत को बाँट कर देखता है. राग-द्वेष जगाता है. उसका निर्दोष स्वभाव खो जाता है. उसे यदि पुनः अपने सहज स्वरूप को पाना है तो प्रतिक्रमण करना होगा. पुनः द्वैत की दुनिया के पार जाना होगा. उस ‘एक’ में गये बिना मुक्ति नहीं. साधना होगा मन को ताकि भीतर उस 'अबोधता' को पा सके जो एक शिशु के रूप में उसे सहज ही प्राप्त थी. 

Monday, August 4, 2014

उठत बैठत वही उठाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने

जनवरी २००७ 
श्रद्धा, विश्वास, प्रेम और आस्था यदि जीवन में न हों तो जीवन अधूरा है बल्कि जीवन है ही नहीं, उसका भ्रम है. प्रेम तो इस जगत का कारण ही है, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु भी प्रेम से भरे हैं. ईश्वर जो कण-कण में व्याप्त है वह भी प्रेम से प्रकट हो जाता है. ऐसा प्रेम जीवन में तब आता है जब मन में करुणा का भाव जगे, जीवन में मंत्र मिले, जो व्यथा का नाश करता है दिव्य आभा जगाता है. ऐसा मंत्र ज्ञान भी हो सकता है और भक्ति भी. ज्ञान का अर्थ है नित्य-अनित्य, सत्य-असत्य का बोध और श्रेय-प्रेय का भेद, इनमें से एक का त्याग करना है एक को प्रेम. भक्ति का अर्थ है यह सारी सृष्टि जिसने बनायी है वह यदि हमारे प्रेम का पात्र है तो जगत भी उसी का बनाया होने के कारण हमारे प्रेम का पात्र हुआ. साधक का अंतर गुरु के बताये पथ पर सारे ही फूल समेटने में लगा रहता है, जिसमें ज्ञान भी है, योग-प्राणायाम भी, कीर्तन और सेवा भी. जो भी सहज प्राप्त कार्य सम्मुख आता है उसे करने के अलावा शेष समय उसी की याद में गुजरता है जो छिपा रहता है फिर भी नजर आता है.

Thursday, May 15, 2014

काँधे पर जो गठरी भारी

मार्च २००६ 
अज्ञान दशा में किये गये सारे कर्म बंधनकारी हैं. हमारे कर्मों की गठरी जितनी छोटी होगी मुक्ति उतनी ही जल्दी मिलेगी, ज्ञान मिलने के बाद यह तो तय है कि हमारी गठरी बढ़ती नहीं है, घटती जाती है, तब हमारा अहंकार जो पहले सजीव था, निर्जीव हो जाता है, हम संसार में सभी कुछ करते हैं पर कर्ता भाव नहीं रहता. उसी दशा में सच्चा पुरुषार्थ होता है. मुक्ति के बिना भक्ति भी सम्भव नहीं. हम जानते हैं, मृत्यु निश्चित है, और यह भी कि ऊपर-ऊपर से भेद भले ही हो मूलतः हम एक हैं, सभी के भीतर एक ही चेतन सत्ता व्याप्त है, हम इसी प्रकृति के अंश हैं, जो अपना तादात्मय  प्रकृति के साथ करता है उसे दोषों का भागी होना ही पड़ेगा किन्तु जो स्वयं को चेतना जानता है वह मुक्त है, आकाश की तरह, हवा की तरह, उसमें कोई भी अभाव नहीं रहता, वह नित्य है, सदा है, आनन्द रूप है. 

Friday, April 4, 2014

अद्वैत ही साधना है

दिसम्बर २००५ 
योग वशिष्ठ में लिखा है, इस जगत का कारण मन ही है, मन ही दृश्य है और मन ही द्रष्टा भी, एक न रहे तो दूसरा भी नहीं रहेगा, तब स्वयं ही स्वयं में स्थित रहेगा. हमारी सारी परेशानियों, चिंताओं का कारण मन ही है. मन के पार कोई दुःख नहीं और यह मन वास्तव में कुछ नहीं एक परछाई है, इसे जानकर उससे पार हुआ जा सकता है वरना यह हम पर हावी हो जाता है और हम इसके कहे अनुसार चलते रहते हैं. जब भी हम दूसरे का दोष देखते हैं, हममें भेद बुद्धि आ जाती है. हम भेद करते हैं, जबकि यहाँ दो हैं ही नहीं, सब उसी एक का पसारा है. जो हम हैं वही अन्य भी हैं, तो कोई भी गलत नहीं है, सभी निर्दोष हैं, अपनी-अपनी जगह पर सही. हमें अद्वैत साधना है तभी हमारी साधना आगे बढ़ेगी.


Friday, March 28, 2014

भेद-अभेद का खेल अनूठा

नवम्बर २००५ 
स्वरूप में अभेद है पर संबंध में भेद होगा ही. भक्ति में भेद का अर्थ है मर्यादा, भक्त और भगवान के मध्य भी द्वैत का अर्थ एक मर्यादा है, एक सुव्यवस्था है. जब हम पूजा करते हैं तो भी एक दूरी रहती है. जब हम प्रभु के साथ कोई संबंध बनाते हैं तो भी एक भेद रह जाता है. वह हमारी माँ, पिता, सखा, गुरू कुछ भी हो सकता है, एक भेद तब भी रहता है. गुरु शिष्य के बीच में भी एक भेद रहता है, तभी भक्ति रहती है. जिसकी भक्ति करें वहाँ विश्वास है और भक्त में श्रद्धा है. जिस श्रेष्ठ का हम वरण करें तो उसमें विश्वास हो तथा हममें श्रद्धा हो, यह भी भेद है. वह अंशी है तथा हम अंश हैं, वह गगन सदृश है हम जड़ पृथ्वी हैं. यह जगत ब्रह्म है हम सेवक हैं, यह भेद है. पर जो इस भेद का राज जानता है वह अभेद को पार करके ही आता है.

Sunday, August 4, 2013

उसी एक का सकल पसारा

दिसम्बर २००४ 
कितना कुछ हर क्षण हमारे आस-पास घटता रहता है, पल-पल कर समय आगे बढ़ता है, दिन बीतते हैं, वर्ष सदियाँ और युग बीतते हैं, हम वहीं के वहीं खड़े हैं, यह सब जो बदल रहा है उसे देखते हैं. हमारा तन बदला, मन बदला, भाव भी बदलते हैं, पर जहाँ कोई परिवर्तन नहीं, जो सदा से एक सा है, वह जो साक्षी है, वह चैतन्य जो हमारे भीतर भी है वही जो कण-कण में समाया है, उसकी उपस्थिति का भान यदि होने लगे तो समाधान मिलने लगता है, हमारा होना ही पर्याप्त होता है, तब न कहीं जाना है न आना है, न खोना है, यह जड़ता नहीं है, सहजता है, सहज होकर सारे कार्य अपने-आप होने लगते हैं, तब कर्तापन का अहंकार शेष नहीं रहता. हम प्रकृति के सहयोगी बन जाते हैं, विरोध में ऊर्जा क्षय है, द्वंद्व है. हमें द्वन्द्वातीत होना है, जहाँ कोई भेद नहीं रहता, संसार और स्वयं में भी कोई भेद नहीं रहता क्योंकि सब एक से ही उत्पन्न हुआ है. अपने ही हाथ से अपना विरोध कैसा ?     

Wednesday, March 13, 2013

संध्याकाल में मिलता है वह


मई २००४ 
  सुबह जब नींद पूरी तरह खुली भी नहीं हो और न ही हम सोये हों, तो उसकी स्मृति लानी है, ऐसे वक्त में अपने मन को वहाँ ले जाना है जहाँ से सारे विचार उठते हैं. ईश्वर का नाम हर स्थिति में सुखदायी है पर संधिबेला में उसका प्रभाव अधिक होता है, वह दाहक भी है और पावक भी, वह अशुभ संसकारों को दग्ध करता है और मन को पावन करता है. ध्यान में सुख है पर हमारे व्यवहार की परीक्षा तो जगत में रहकर ही होती है. मन समता में टिका है या नहीं यह तभी पता चलता है. वर्षों साथ रहने पर भी लोग एक-दूसरे को कहाँ समझ पाते हैं. आत्मा के स्तर पर जाकर ही कोई दूसरे को समझ पाता है, जब ‘मैं कौन हूँ’ का जवाब मिल जाता है तो ‘तुम कौन हो’ का जवाब ढूँढना नहीं पड़ता. जो मैं हूँ वही तू है, फिर कोई भेद नहीं रह जाता, कोई तब दूसरा होता ही नहीं. यह जगत मिथ्या है, का अर्थ यही है कि भेद मिथ्या है, सभी के भीतर उसी चैतन्य का प्रकाश है, सभी एक ही  मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं.

Thursday, August 23, 2012

अमन हुआ जब मन


जुलाई २००३ 
जो हमें रुचता है अर्थात जो वास्तव में हम हैं उसे रुचता है- प्रेम, सत्य, सदाचार, विश्वास और श्रद्धा आदि सदगुण, कहीं से भी मिलें ग्रहण कर लेने चाहिए. इस भौतिक जगत में द्वंद्व हर जगह है, शीत-ग्रीष्म, सुख-दुःख आदि. लेकिन हमारे उस आध्यात्मिक जगत में जहाँ हम वास्तव में रहते हैं, कोई द्वंद्व है ही नहीं. वहाँ समरसता है, तो भेद सिर्फ यहीं है, जब तक देहात्म बुद्धि है तभी तक कोई अच्छा-बुरा प्रतीत होगा. समरसता तभी मिलेगी जब मन स्थिर होगा, ऐसा मन जो सभी का कल्याण चाहता है, जो प्रेम बाँटता है, जो इच्छा रहित है. तीनों गुणों के पार है. जहाँ न मान की इच्छा है न अपमान का भय, जहाँ न लोभ है न ईर्ष्या. जहाँ सत्य ही एकमात्र आश्रय है, जहाँ मद, मोह, आलस्य आदि असुरों का नाश हो चुका है. जहाँ भगवती का निवास है, जहाँ शिव का कैलाश है और कान्हा का वृन्दावन है. ऐसे मन में ही ज्ञान टिकता है. तब हमारा होना मात्र ही पर्याप्त होता है, हमारे मन में संकल्प-विकल्प नहीं उठते, सहज चेष्टा होती है, सहज, स्वतः स्फूर्त कल्याणकारी वचन निकलते हैं, तब हमें परिणाम की चाह तो होती नहीं, अतः कर्मों का बंधन नहीं होता. हमारा मन जो अभी स्वयं को द्रष्टा मानता है तब दृश्य हो जाता है और जो वास्तव में हम हैं, द्रष्टा बनकर सब देखता है, तन-मन में होने वाले छोटे छोटे परिवर्तनों को भी वह देख लेता है, मन तब अमनी भाव में आ जाता है.

Saturday, July 21, 2012

अभेद की साधना


जून २००३ 
जगत जीवन का विराट रूप है, जीवन में विषमता है, जगत में भी विषमता है, पर इसके पीछे जो समता है वही इन्हें जोड़े हुए है, हमें समता को ही पाना है, समत्व योग की साधना करनी है. विषमता ही आत्मा का हनन है. यदि स्वार्थ प्रमुख है समता सिद्ध नहीं हो सकती. परार्थ और परमार्थ जीवन में हों तभी समता आती है. मूलतः सभी एक ही सत्ता से प्रकटे हैं, सभी एक हैं, जब यह अभेद दृष्टि आ जाती है तभी समता घटती है. तभी अंतर में एक ऐसी अवस्था का अनुभव होता है जो किसी भी बाहरी कारण पर निर्भर नहीं है. वही परमात्मा है, वहाँ कोई भेद नहीं पर भक्त अपने अंतर का प्रेम व्यक्त करने के लिये भेद मान लेता है, वास्तव में यह उसी की लीला है, ईश्वर स्वयं ही स्वयं से प्रेम करने के लिये विभिन्न रूपों में प्रकट होता है. अध्यात्म की चरम स्थिति में भौतिक और अध्यात्मिक का भी कोई भेद नहीं रह जाता. जड़ के पीछे चेतन पर ही भक्त की दृष्टि रहती है.