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Tuesday, July 25, 2023

‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’

आदिगुरु शंकराचार्य  उसी तरह कहते हैं, ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’. जैसे कोई कहे वस्त्र सत्य है उस पर पड़ी सिलवटें मिथ्या हैं, धागा सत्य है उस पर पड़ी गाँठ मिथ्या है अथवा तो सागर सत्य है, उसमें उठने वाली लहरें, झाग व बूंदें मिथ्या हैं। सिलवटें, गाठें, लहरें और बूंदें पहले नहीं थीं, बाद में भी नहीं रहेंगी, वस्त्र, धागा और सागर पहले भी थे और बाद में भी हैं. इसी तरह हम कह सकते हैं, मन सत्य है उसमें उठने वाले विचार, कल्पनाएँ, स्मृतियाँ मिथ्या हैं, जो पल भर पहले नहीं थीं और पल भर में ही खो जाने वाली हैं. विचार की उम्र कितनी अल्प होती है यह कोई कवि ही जानता है, एक क्षण पहले जो मन में जीवंत था, न लिखो तो ओस की बूंद की तरह ही खो जाता है. आनंदपूर्ण जीवन के लिए हमें सत्य को देखना है, इस बदलते रहने वाले संसार के पीछे छिपे सत्य परमात्मा को अपना अराध्य बनाना है. 


Thursday, August 30, 2018

एक ऊर्जा बहती भीतर


३१ अगस्त २०१८ 
संत कहते हैं, ब्रह्म सत्यं, जगत मिथ्या...सत्य इतना सरल है कि उस पर दृष्टि ही नहीं जाती, इसलिए ब्रह्म से हम अनजाने ही बने रहते हैं. जगत इतना विषम है कि उलझा लेता है, जो उलझा हुआ है वह भला क्या समझेगा, इसलिए जगत की असलियत से भी हम अनजान ही बने रहते हैं. जगत मिथ्या है, इसका भान ही नहीं कर पाते. जीवन जो एक अवसर के रूप में हमें मिला था, एक दिन चुक जाता है और हम इस जगत से खाली हाथ ही प्रयाण कर जाते हैं, दुबारा उसी जाल में उलझने के लिए. जीवन एक ऊर्जा है, जो पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं और मनुष्यों के द्वारा प्रवाहित हो रही है. वनस्पति जगत हो या जीव जगत उन्हें इसका कोई अहंकार नहीं है, पर मनुष्य को लगता है, वह इस ऊर्जा का निर्माता है. वह अपनी इच्छा से जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है, प्रकृति का दोहन करके अपने लिए सुख-सुविधाओं के अम्बार लगा सकता है. मनुष्य यदि यह समझ ले कि वह भी इस विशाल आयोजन का एक पुर्जा ही है, ऊर्जा उसके माध्यम से व्यक्त भर हो रही है, वह उसका निर्माता नहीं है. ऐसा करते ही भीतर एक परिवर्तन आता है, कुछ बनने की, कुछ प्राप्त करने की लालसा एक सहज कर्म प्रवाह में बदल जाती है. जीवन की जिस क्षण जो मांग है उतना भर होता है और शेष समय अंतर एक सहज स्थिति का अनुभव करता है.  

Wednesday, December 27, 2017

अदृश्य पर दृष्टि जिसकी

२७ दिसम्बर २०१७ 
शंकर कहते हैं, ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’. जैसे कोई कहे वस्त्र सत्य है उस पर पड़ी सिलवटें मिथ्या हैं, धागा सत्य है उस पर पड़ी गाँठ मिथ्या है अथवा तो सागर सत्य है, उसमें उठने वाली लहरें, झाग व बूंदें मिथ्या. सिलवटें, गाठें, लहरें और बूंदें पहले नहीं थीं, बाद में भी नहीं रहेंगी, वस्त्र, धागा और सागर पहले भी थे और बाद में भी हैं. इसी तरह हमकह सकते हैं, मन सत्य है उसमें उठने वाले विचार, कल्पनाएँ, स्मृतियाँ मिथ्या हैं, जो पल भर पहले नहीं थीं और पल भर में ही खो जाने वाली हैं. विचार की उम्र कितनी अल्प होती है यह कोई कवि ही जानता है, एक क्षण पहले जो मन में जीवंत था, न लिखो तो ओस की बूंद की तरह ही खो जाता है. आनंदपूर्ण जीवन के लिए हमें सत्य को देखना है, इस बदलते रहने वाले संसार के पीछे छिपे सत्य परमात्मा को अपना अराध्य बनाना है. 

Wednesday, November 1, 2017

पार लगें इस भव सागर से

१ नवम्बर २०१७ 
संत कहते हैं, नाम-रूप का यह जगत मिथ्या है, सत्य है इसके पीछे का आधार, जिससे इसकी उत्पत्ति होती है. जैसे मिट्टी से बने बर्तन मिटटी ही हैं, व्यवहार करने के लिए उनमें नाम रूप की कल्पना की जाती है. सागर में जल रूप होने पर भी तरंग, फेन, बूंद आदि नाम व रूप के कारण पृथक कहे जाते हैं. मन में उठने वाले विचार, संकल्प-विकल्प, स्मृति, भावनाएं, कामनाएं, विकार सब मन ही हैं. मन से ही उत्पन्न हुए वे मन में ही समा जाते हैं और हम उन्हें सत्य मानकर सुखी-दुखी होते रहते हैं. मन में ही जन्मों के संस्कार पड़े हैं, जिनके कारण सुखद या दुखद संवेदना उठती है, उन्हें समता भाव से देखकर चले देने जाने के बजाय हम सत्य मानकर उनके अनुसार अच्छे या बुरे कर्म करने लगते हैं, जिनका फल फिर भविष्य में भोगना पड़ता है और जिनके संस्कार फिर गहरे होते जाते हैं. इसी का नाम संसार है जिससे साधक को मुक्त होना है. उपाय है कि ध्यान के द्वारा हम मन को साक्षी भाव से देखना सीख लें और बादलों की तरह आते-जाते विचारों के द्रष्टा भर बन जाएँ.   

Monday, April 27, 2015

एक स्रोत शांति का भीतर

जनवरी २०१५ 
‘ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या’ शंकराचार्य ने कहा है मिथ्या का अर्थ है जो दीखता तो है पर है नहीं, माया है, स्वप्न है, लेकिन जिस समय हम स्वप्न देखते हैं सत्य प्रतीत होता है. मिथ्या का एक अर्थ अनुपयोगी है. अनुपयोगी का अर्थ है विवेक से उपयोग करके उससे मुक्त हो जाना. यह जगत विवेक से जीने जैसा है, उपयोग करके उससे पृथक हो जाने जैसा है, इसी अर्थ में यह जगत मिथ्या है, हमारे भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म है, वही अनंत है, निरंतर उसका विस्तार हो रहा है. जगत में दूर से दूर की वस्तुएं तथा निकट से निकट का शरीर, मन बुद्धि, चित्त तथा अहंकार भी आ जाते हैं. श्वास यानि प्राण भी हमारे उपयोग में लाने जैसा है, जिसे देखते–देखते हम मन तक पहुंचते हैं, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार को जानते-जानते स्वयं तक पहुंचते हैं. चैतन्य की अनुभूति होते ही हमें अपनी शाश्वतता का प्रमाण भी मिल जाता है, मृत्यु का भय नहीं रहता, सारे द्वन्द्वों से पार उस निर्भय, निर्वैर अवस्था का अनुभव होता है, जहाँ एक अखंड शांति का सोता बह रहा है, जहाँ कोई चाह नहीं, पूर्णता है, जहाँ कोई अभाव नहीं, उस अखंड आनंद की अवस्था में भी एक विस्तार है, रहस्य है. विस्मय की वह अनोखी अवस्था ही समाधि तक पहुंचती है. जिससे प्रज्ञा का जन्म होता है, वही जानने योग्य है !   

Monday, January 26, 2015

एक आँख भीतर को खोलें


जो निकट से भी निकट है उसे जानना कठिन है, पर क्यों कठिन है ? जो हम स्वयं हैं, उससे विस्मृति कैसे हो गयी? हम स्वप्न में जी रहे हैं. स्वप्न में ही मिथ्या संबंध जोड़ लेते हैं तभी वास्तविक संबंध को पहचान नहीं पाते, वह संबंध जो हमारा अपने साथ है. इसी को अध्यास कहते हैं. हम देह को ही मैं मानते हैं क्योंकि हम इसे बाहर से ही देखते हैं, जब हम इसे भीतर से देखते हैं तत्क्षण आसक्ति छूट जाती है. वह आँख हमें पैदा करनी है जिससे हम भीतर झाँक सकें, देह का ठीक-ठीक बोध होते ही देह पर पकड़ ढीली होने लगती है तब दृष्टि चैतन्य की ओर जाती है. सत्य जानने से ही हम मुक्ति का अनुभव करते हैं. जब देह से दूरी बढ़ने लगती है तो परमात्मा से निकटता होने लगती है.


Wednesday, March 13, 2013

संध्याकाल में मिलता है वह


मई २००४ 
  सुबह जब नींद पूरी तरह खुली भी नहीं हो और न ही हम सोये हों, तो उसकी स्मृति लानी है, ऐसे वक्त में अपने मन को वहाँ ले जाना है जहाँ से सारे विचार उठते हैं. ईश्वर का नाम हर स्थिति में सुखदायी है पर संधिबेला में उसका प्रभाव अधिक होता है, वह दाहक भी है और पावक भी, वह अशुभ संसकारों को दग्ध करता है और मन को पावन करता है. ध्यान में सुख है पर हमारे व्यवहार की परीक्षा तो जगत में रहकर ही होती है. मन समता में टिका है या नहीं यह तभी पता चलता है. वर्षों साथ रहने पर भी लोग एक-दूसरे को कहाँ समझ पाते हैं. आत्मा के स्तर पर जाकर ही कोई दूसरे को समझ पाता है, जब ‘मैं कौन हूँ’ का जवाब मिल जाता है तो ‘तुम कौन हो’ का जवाब ढूँढना नहीं पड़ता. जो मैं हूँ वही तू है, फिर कोई भेद नहीं रह जाता, कोई तब दूसरा होता ही नहीं. यह जगत मिथ्या है, का अर्थ यही है कि भेद मिथ्या है, सभी के भीतर उसी चैतन्य का प्रकाश है, सभी एक ही  मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं.