Showing posts with label नींद. Show all posts
Showing posts with label नींद. Show all posts

Sunday, November 28, 2021

माटी में मिल जाए माटी

जैसे गागर माटी की बनी है, टूट जाए तो माटी का कुछ नहीं बिगड़ता, वैसे ही मन आत्मज्योति से उपजा है; मन उदास हो, चिंतित हो तो ज्योति का कुछ नहीं घटता। आत्मा का न कोई आकार है न ही उसमें कभी कोई विकार होता है। मन को सुख और पूर्ण विश्राम पाना हो तो कुछ देर के लिए सब कुछ भुलाकर स्वयं से मिलना सीखना होगा। मन का काम है सोचना, वह कभी एक जगह टिककर रहना नहीं जानता, इसी कारण अपनी ऊर्जा को व्यर्थ ही खर्च करता है, आत्मा ऊर्जा का स्रोत है, उससे जुड़कर वह सहज ही अपनी शक्ति को कई गुणा बढ़ा  सकता है। मन जब यह जान लेता है तो अपने मूल से जुड़ जाता है, गहरी नींद में व ध्यान में मन वहीं पहुँच जाता है। आत्मा के साथ एक होकर वह उसी तरह अमरता का अनुभव करता है जैसे घड़ा मिट्टी में मिलकर उससे एक हो जाता है, जिसका कभी नाश नहीं होता। 


Thursday, September 10, 2020

दुःख से जो भी चाहे मुक्ति

 जीवन से परिचय पाना हो तो नींद से जागना होगा. एक नींद तो वह है जो हम रात्रि में विश्राम के लिए लेते हैं और सुबह जाग जाते हैं, एक और नींद है जो हम अधूरे ज्ञान की चादर ओढ़ कर ले रहे हैं. हमारी छोटी सी बुद्धि इस अनंत सृष्टि के एक कण का राज भी नहीं जानती पर उसे लगता है वह सब कुछ जानती है. एक छोटा सा उपकरण भी हो उसके साथ एक किताब आती है जो उसके बारे में सम्पूर्ण जानकारी देती है, पर अफ़सोस की इस  देह, मन, बुद्धि के साथ कोई पुस्तक नहीं आती. हम जितना ज्ञान किताबों से और बड़ों से, विद्यालय से प्राप्त कर लेते हैं, सोचते हैं उतना इसे चलाने के लिए पर्याप्त है. एक दिन ऐसा आता है जब अपनी ही देह रोगी होकर, मन उदास होकर, बुद्धि भ्रमित होकर हमारे दुःख का कारण बन जाते हैं. इसका अर्थ हुआ कि हमारे ज्ञान में कुछ तो कमी है, ऐसे में किसी सदगुरू का जीवन में पदार्पण अथवा सन्त वाणी का श्रवण ही उस ज्ञान से हमारा परिचय कराता है जो हर दुःख से मुक्त कराके सुख की सौगात देता है. 


Wednesday, September 13, 2017

विस्मय से जब मन भर जाये

१३ सितम्बर २०१७ 
जीवन में कदम-कदम पर हमें कितनी ही आश्चर्यजनक स्थितियों का अनुभव होता है पर ज्यादातर हम उनका कोई न कोई उत्तर खोज कर मन को शांत कर देते हैं. विज्ञान के द्वारा जगत के कार्यकलापों का कारण खोजने लगते हैं. एक ऐसा आश्चर्य जिसका कोई निराकरण न हो सके विस्मय कहलाता है, और गहराई से देखें तो इस जगत का एक नन्हा सा रेत का कण भी मन को विस्मय से भर देने के लिए पर्याप्त है. हमारी देह की एक कोशिका भी अपने भीतर कितने रहस्य छिपाए है. विज्ञान के जवाब हमें भ्रमित करते हैं, ऐसा लगता है हम इसके बारे में सब जान सकते हैं. नींद भी एक रहस्य है और स्वप्न भी. चारों तरफ जैसे एक तिलिस्म छाया है. विस्मय से भरा मन ही फिर उस अज्ञात के सामने झुक जाता है. वह भी जैसे उस रहस्य का ही एक भाग बन जाता है.

Saturday, June 10, 2017

भीतर का जब दिखे गगन

१० जून २०१७ 
मन हर पल कल्पनाओं अथवा स्मृतियों के गलीचे बुनता रहता है. इसी व्यस्तता में वह आत्मा का निर्मल स्पर्श चूक जाता है. हमारे चारों ओर वह अव्यक्त सत्ता हर पल विद्यमान है. किन्तु मन के पर्दे पर अनवरत खेल चलता रहता है तो वह पर्दा कभी खाली ही नहीं होता और उसका होना छिपा ही रहता है. जैसे आकाश पर यदि सदा ही बादल बने रहें तो कोई आकाश को कैसे देखेगा, आत्मा के आकाश पर मन के बादल कभी विलीन ही नहीं होते. मन का होना आत्मा पर ही निर्भर है पर यह उसके अस्तित्त्व से ही बेखबर है, इसी को संतों ने माया कहा है. नींद में जब चेतन मन सो जाता है तब आत्मा का स्वाद मिलता है, तभी नींद इतनी प्रिय होती है. किन्तु नींद में उससे मुलाकात नहीं हो पाती, यह तो ध्यान में ही सम्भव है, जब मन भी न रहे और बुद्धि का सीधा साक्षात्कार आत्मा से हो सके.

Monday, December 26, 2016

खिले ध्यान का कुसुम जहाँ

२६ दिसम्बर २०१६ 
इस जगत में आने से पूर्व हम अकेले थे और यहाँ से जाने के बाद भी अकेले होंगे, इस जगत में भी नींद में हम अकेले होते हैं. ध्यान इसी अकेले होने की किंतु परम के साथ होने की कला है. नींद में हम अनजाने में अस्तित्त्व के साथ होते हैं, हमें उसकी उपस्थिति का भान नहीं होता, बस जगने के बाद भीतर ताजगी का अनुभव होता है. ध्यान में बोधपूर्वक हम अस्तित्त्व के साथ हो सकते हैं और तब हमें सारी सीमाएं टूटती हुई लगती हैं. भीतर एक अचलता का पता चलते ही भय मात्र से मुक्ति का अनुभव होता है. 

Wednesday, August 27, 2014

मृत्योहम शिवोहम

फरवरी २००७ 
रात्रि काल में हम जो स्वप्न देखते हैं, वे हमारी इच्छा से नहीं आते, एक तरह से वे हम पर थोपे जाते हैं. जब भीतर की चेतना जगती है, तब सपनों पर हमारा अधिकार हो जाता है. जो स्वयं को सोये हुए देख लेता है वह भय से छूट जाता है साधना के द्वारा योगी मृत्यु का भी ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं. अपने अगले जन्म की तैयारी हम इसी जन्म में कर सकते हैं. भगवान शिव ने पार्वती को जीवन और मृत्यु का यह अद्भुत ज्ञान दिया था.


Thursday, July 18, 2013

ध्यान एक साधना उत्तम

अक्तूबर २००४ 
मृत्यु, नींद, ध्यान और प्रेम  सभी में समवाय सम्बन्ध है, ध्यान में हमें काल का भान नहीं रहता, परिवेश का ध्यान नहीं रहता. हमारा छोटा मन जैसे लुप्त हो जाता है, चेतना विस्तार पा जाती है, वह तो पहले से ही विस्तृत है, पर हमारा क्षुद्र अहंकार उसे उसी प्रकार ढके रहता है जैसे सूर्य को बादल का छोटा सा टुकड़ा. सूर्य तो सदा चमकता रहता है चाहे बादल कितने भी घने हों, उसी तरह हमारी चेतना निरंतर एकरस रहती है चाहे तन, मन में कितने ही तूफान आते-जाते रहें. हमें उसी चेतना में स्थिर रहना है. जीते जी मृत्यु का अनुभव ध्यान, नींद और प्रेम तीनों में होता है, जब हमें अपने होने का तो भान रहता है पर हम कौन हैं, क्या है, कहाँ हैं यह भान नहीं रहता. मृत्यु का क्षण भी ऐसा ही होगा. मृत्यु के बाद भी हम तो होंगे, पर कोई आकार नहीं होगा.


Wednesday, March 13, 2013

संध्याकाल में मिलता है वह


मई २००४ 
  सुबह जब नींद पूरी तरह खुली भी नहीं हो और न ही हम सोये हों, तो उसकी स्मृति लानी है, ऐसे वक्त में अपने मन को वहाँ ले जाना है जहाँ से सारे विचार उठते हैं. ईश्वर का नाम हर स्थिति में सुखदायी है पर संधिबेला में उसका प्रभाव अधिक होता है, वह दाहक भी है और पावक भी, वह अशुभ संसकारों को दग्ध करता है और मन को पावन करता है. ध्यान में सुख है पर हमारे व्यवहार की परीक्षा तो जगत में रहकर ही होती है. मन समता में टिका है या नहीं यह तभी पता चलता है. वर्षों साथ रहने पर भी लोग एक-दूसरे को कहाँ समझ पाते हैं. आत्मा के स्तर पर जाकर ही कोई दूसरे को समझ पाता है, जब ‘मैं कौन हूँ’ का जवाब मिल जाता है तो ‘तुम कौन हो’ का जवाब ढूँढना नहीं पड़ता. जो मैं हूँ वही तू है, फिर कोई भेद नहीं रह जाता, कोई तब दूसरा होता ही नहीं. यह जगत मिथ्या है, का अर्थ यही है कि भेद मिथ्या है, सभी के भीतर उसी चैतन्य का प्रकाश है, सभी एक ही  मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं.

Wednesday, October 17, 2012

जगा हुआ सोया सोया सा


सितम्बर २००३ 
नींद भी प्राकृतिक समाधि ही तो है, नींद में सोया व्यक्ति लोभ, क्रोध, मोह से परे हो जाता है, उसका चेहरा कितना निष्पाप लगता है. वह सारे सुखों-दुखों से परे हो जाता है. ध्यान में भी हम ऐसी ही अवस्था का अनुभव करते हैं किन्तु जागते हुए. ऐसी अवस्था में कई गांठें जो हमारे भीतर बंधी थीं अपने आप खुलने लगती हैं. जो भी घटना भीतर घटेगी वह अपने आप ही होगी, हमारा प्रयास कुछ भी नहीं कर पायेगा, हम जो भी करेंगे वह बुद्धि के स्तर पर ही होगा, पर हमें तो बुद्धि के परे जाना है. बुद्धि के पार प्रज्ञा है जो बुद्धि को तीक्ष्ण और तीक्ष्णतर करते जाने से प्राप्त होती है. भावलोक भी वहीं से प्रारम्भ होता है, वहीं से दिव्यता हमारा हाथ थामकर आगे ले जाती है, वह हमें हमारी क्षमता के अनुसार राह दिखाती है और एक बार मंजिल की झलक भी दिखा देती है. 

Sunday, February 26, 2012

जगती आँखों का स्वप्न


जनवरी २००३ 
संत कहते हैं यह जगत रात के स्वप्न की तरह है. मनोराज्य भी एक स्वप्न ही है, सत्य नहीं है. हमें यह जगत उसी दिन असत्य प्रतीत होगा जिस दिन हम अज्ञान के अंधकार से जाग जायेंगे. रात का स्वप्न तो सुबह नींद खुलते ही समाप्त हो जाता है, पर जागती हुई आँखों का यह स्वप्न बहुत गहरा है. अज्ञान की निद्रा बहुत गहरी है. ज्ञान होते ही हम स्वयं को शरीर व मन से पृथक देखने लगते हैं. शरीर का प्रभाव मन पर व मन का प्रभाव तन पर पड़ता है पर आत्मा इससे प्रभावित नहीं होता. इसी क्षण वर्तमान के इसी क्षण में इसका अनुभव हो सकता है बस नींद से जागने भर की देर है. द्रष्टा होकर ही इस नींद से परे हम जा सकते हैं. मन को देखने की कला ही साक्षी है. साक्षी ही हम हैं. 

Wednesday, October 5, 2011

जागृत मन


मई २००२ 
मन सोया है या जाग गया है इसका पता कैसे चले तो शास्त्र बताते हैं कि सजगतापूर्वक वर्तमान में रहना इसकी पहली निशानी है. भूत का पश्चाताप भीतर न चलता हो भविष्य की कल्पना में संकल्प न उठते हों जिस क्षण जो कार्य हम कर रहे हों पूर्ण रूप से मन वहीं टिका हो तो ऊर्जा बचती है. दूसरी पहचान है मन सहज ही आनन्दित हो कुछ करके या कुछ पाकर खुश होना सोये मन का काम है, समाहित मन तो भीतर अपने मूल से जुड़ा होने कारण सहज ही प्रसन्न होता है. अहंकार वर्तमान में नहीं होता अहंकार भूत या भविष्य के साथ ही जुड़ा है और दुख का कारण वही है. जो वस्तु, व्यक्ति, या परिस्थिति हमारे सामने आये सहज बुद्धि से उसके साथ व्यवहार करने के बाद यदि मन खाली रहता है तो मन जाग गया है. यदि प्रभाव में आ जाता है तो सोया है.