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Monday, January 29, 2018

दूर नहीं है मंजिल अपनी

३० जनवरी २०१८ 
संत कहते हैं, हम स्वयं ही अपनी गति हैं. हम जहाँ पहुँचना चाहते हैं, पहुँचे ही हुए हैं, जो पाना चाहते हैं, हमें मिला ही हुआ है. हम ही राही हैं और मंजिल भी हम ही हैं. जब पहुँचे ही हुए हैं तो राह है ही नहीं, चलना नहीं है, कहीं जाना नहीं है. जहाँ हैं, वहाँ विश्राम करना है. ऐसा कोई पल खोजना है जब देह के साथ चेतना भी पूर्ण विश्राम में हो, मन में न कोई हलचल हो न कोई संवेदना ही. विचार थम जाएँ और चेतना अपने आप में ठहर जाये, ऐसा एक भी पल हमें अपनी मंजिल का पता बता देता है. उसकी झलक दे देता है, फिर जगत में सभी कार्य करते हुए भी उस घर की याद बनी रहती है. 

Tuesday, June 2, 2015

गुरू के द्वारे जो पहुँचा है

मई २००९ 
मंजिल पर पहुंच सकें इसलिए वाहन मिला है, जीवन की लालसा हमें इस वाहन में बैठे रहने पर विवश करती है. जिसे मंजिल का पता चल गया है उसे मृत्यु से भय नहीं लगता, असली जीवन इसके बाद ही आरम्भ होता है. मानव इस सत्य से अनभिज्ञ रहकर ही सारा जीवन गुजार देता है. मृत्यु उसे डराती है और वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है. अविद्या, अज्ञान और अशिक्षा सबसे बड़े रोग हैं, स्कूली शिक्षा नहीं बल्कि जीवन की शिक्षा जो अध्यात्म देता है. लेकिन हम गुरू द्वार तक पहुंच ही नहीं पाते परमात्मा जिस शांति का घर है गुरू उसका द्वार है, लेकिन उस शांति का अनुभव विरले ही कर पाते हैं. 

Wednesday, October 17, 2012

जगा हुआ सोया सोया सा


सितम्बर २००३ 
नींद भी प्राकृतिक समाधि ही तो है, नींद में सोया व्यक्ति लोभ, क्रोध, मोह से परे हो जाता है, उसका चेहरा कितना निष्पाप लगता है. वह सारे सुखों-दुखों से परे हो जाता है. ध्यान में भी हम ऐसी ही अवस्था का अनुभव करते हैं किन्तु जागते हुए. ऐसी अवस्था में कई गांठें जो हमारे भीतर बंधी थीं अपने आप खुलने लगती हैं. जो भी घटना भीतर घटेगी वह अपने आप ही होगी, हमारा प्रयास कुछ भी नहीं कर पायेगा, हम जो भी करेंगे वह बुद्धि के स्तर पर ही होगा, पर हमें तो बुद्धि के परे जाना है. बुद्धि के पार प्रज्ञा है जो बुद्धि को तीक्ष्ण और तीक्ष्णतर करते जाने से प्राप्त होती है. भावलोक भी वहीं से प्रारम्भ होता है, वहीं से दिव्यता हमारा हाथ थामकर आगे ले जाती है, वह हमें हमारी क्षमता के अनुसार राह दिखाती है और एक बार मंजिल की झलक भी दिखा देती है. 

Friday, May 18, 2012

एक यात्रा पर जाना है


मार्च २००३ 
कोई भी घटना, व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति हमें आत्मसुख से वंचित करे उसमें इतना बल नहीं है, सुखी अथवा दुखी होना हमारे ही हाथ में है. हम मौन में रहकर जिस आत्मशक्ति का संचय करते हैं, उसे मिथ्या अहंकार वश पल भर में गंवा देते हैं. सुबह साधना करते हैं, शाम को निंदा करते हैं, तो हिसाब-किताब बराबर, और हम वहीं के वहीं रह जाते हैं. कोई छोटी से छोटी बात हमें हिला जाती है. तूफ़ान में एक पत्ते की तरह हम कांपते हैं. अपने मन को आत्मनिष्ठ बनाना हमारे अपने हाथ में ही है. स्वयं को दुखी होने से बचाना हमारे खुद के हाथ में है. अस्वस्थ हुआ तो शरीर हुआ, कोई दुःख हुआ तो मन को हुआ पर हम न तो शरीर हैं न मन. स्वयं को इन दोनों से पृथक जानना ही होगा. ध्यान यही कला है. जीवन को एक योद्धा की तरह जीना है, सदा सन्नद्ध व सजग, ताकि कोई भीरुता न भीतर घर कर जाये, जीवन एक यात्रा ही तो है, जैसे एक यात्रा में कुछ सामान साथ लेकर  चलना पड़ता है, सजग रहना होता है और मंजिल की ओर ही ले जाये ऐसे कदम बढ़ाने होते हैं वैसे ही जीवन रूपी यात्रा में हमें साहस व श्रद्धा का सामान लेकर आनंद रूपी मंजिल तक जाना है. हम यदि सजग यात्री हैं तो मंजिल स्वयं आयेगी. हमारे संकल्प शुभ होते हैं तो प्रकृति भी हमारा सहयोग करती है. ईश्वर तो अकारण हमारा मित्र है, वह हमसे जितना प्रेम करता है हम शतांश भी नहीं कर सकते.