Showing posts with label संत. Show all posts
Showing posts with label संत. Show all posts

Tuesday, January 16, 2024

श्रद्धावान लभते ज्ञानम

संत कहते हैं, मन में श्रद्धा स्थायी हो जाये तो आनंद स्वभाव में बस जाता है.  मीरा के पैरों में ही घुंघरू नहीं बंधे थे, उसके दिल के भीतर भी बजे थे। सागर की गहराई में एक ऐसी दुनिया है जहाँ सौंदर्य बिखरा हुआ है, हमें उस पर यक़ीन नहीं होता। आश्चर्य की बात है कि इतने संतों और सद्गुरुओं रूपी गोताखोरों को देखकर भी नहीं होती. कोई-कोई ही उसकी तलाश में भीतर जाता है, जबकि भीतर जाना अपने हाथ में है, अपने ही को तो देखना है, अपने को ही तो बेधना है परत दर परत जो हमने ओढ़ी है उसे उतार कर फेंक देना है. हम नितांत जैसे हैं वैसे ही रह सकें तो सदा सहजता ही है। हम सोचते हैं कि बाहर कोई कारण होगा तभी भीतर ख़ुशी फूटी पड़ रही है पर सन्त कहते हैं भीतर ख़ुशी है तभी तो बाहर उसकी झलक मिल रही है हमें भीतर जाने का मार्ग मिल सकता है पर उसके लिए उस मार्ग को छोड़ना होगा जो बाहर जाता है एक साथ दो मार्गों पर हम चल नहीं सकते. बाहर का मार्ग है अहंकार का मार्ग, कुछ कर दिखाने का मार्ग भीतर का मार्ग है, समर्पण का मार्ग, स्वयं हो जाने का मार्ग !  


Sunday, January 15, 2023

चेतन, अमल, अजर अविनाशी

संत कहते हैं “मैं कौन हूँ” इस सवाल का जवाब खोजने जाएँ तो भीतर एक गहन शांति के अतिरिक्त कुछ जान नहीं पड़ता। एक ऐसा भान होता है, जो अनंत है, विस्तीर्ण है, जो होना मात्र है, केवल शुद्ध चिन्मय तत्व है। वहाँ भौतिकता का लेश मात्र भी नहीं।जो मात्र जानने वाला है। न कर्ता है न भोक्ता , न उसे कुछ चाहिए, न उसे निज सुख के लिए कुछ करना है। जो स्वयं पूर्ण है, आनंद स्वरूप है, जो परमात्मा का अंश है। जो हर जगह है, हर काल में है। जिसका कभी नाश नहीं होता। जो सहज ही उपलब्ध है पर जिसके प्रति हम आँख मूँदे हैं। जो मन का आधार है। जो मन को विश्राम देता है। जो प्रेम, शांति, शक्ति व ज्ञान का स्रोत है। वही आत्मा, परमात्मा और गुरू है।  


Monday, February 21, 2022

भक्ति करे कोई सूरमा

संत कहते हैं, मानव के मन के भीतर आश्चर्यों का खजाना है, हजारों रहस्य छुपे हैं आत्मा में. जो कुछ बाहर है वह सब भीतर भी है. मानव यदि परमात्मा को भूल भी जाये तो वह किसी न किसी उपाय से याद दिला देता है. एक बार कोई उससे प्रेम करे तो वह कभी साथ नहीं छोड़ता. वह असीम धैर्यवान है, वह सदा सब पर नजर रखे हुए है, साथ है, उन्हें बस नजर भर कर देखना है. उसे देखना भी हरेक के लिए बहुत निजी है, बस मन ही मन उसे चाहना है, कोई ऊपर से जान भी न पाए और उससे मिला जा सकता है. उसके लिए अनेक शास्त्रों को पढ़ने की जरूरत नहीं, कठोर तप करने की जरूरत नहीं, बस भीतर प्रेम जगाने की जरूरत है. सच्चा प्रेम, सहज प्रेम, सत्य के लिए, भलाई के लिए, सृष्टि के लिए, अपने लिए और परमात्मा के लिए..जिस प्रेम में कभी परदोष देखने की भावना नहीं होती, कोई अपेक्षा नहीं होती, जो सदा एक सा रहता है, वह शुद्ध प्रेम है, वही भक्ति है. जिस प्रेम में अपेक्षा हो वह सिवाय दुःख के क्या दे सकता है ? दुःख का एक कतरा भी यदि भीतर हो, मन का एक भी परमाणु यदि विचलित हो तो मानना होगा कि मूर्छा टूटी नहीं है, मोह बना हुआ है. इस जगत में किसी भी मानव को जो भी परिस्थिति मिली है, उसके ही कर्मों का फल है. राग-द्वेष के बिना यदि उसे वह स्वीकारे तो कर्म कटेंगे वरना नये कर्म बंधने लगेंगे. 


Tuesday, November 9, 2021

जीवन का जो मान करे

जीवन हमें उपहार रूप में मिला है। मन, बुद्धि व संस्कार के रूप में अथवा इच्छा, ज्ञान और कर्म  के रूप में हमारे भीतर अस्तित्त्व ने तीन शक्तियाँ प्रदान की हैं। पंच इंद्रियों के माध्यम से हम इस जगत का एक सीमित रूप ही अनुभव कर पाते हैं, जो स्थूल है, किंतु स्वप्न में हम सूक्ष्म जगत की झलक भी पाते हैं। इन दोनों के पार है कारण जगत जो गहरी नींद में जाने पर आत्मा को अनुभव में आता है किंतु मन या बुद्धि को उसकी कोई खबर नहीं मिलती। आत्मा उसके भी पार है जिसका अनुभव केवल ध्यान में किया जा सकता है। संत और शास्त्र इसलिए ध्यान का इतना महत्व बताते हैं। उस अवस्था में हम मन और बुद्धि को अपने अनुकूल व्यवहार करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं अन्यथा वे राग-द्वेष के चलाए चलते हैं और अक्सर अपनी ही हानि कर बैठते हैं। मन में उठने वाला तनाव, चिंता, उदासी अथवा कोई भी नकारात्मक भाव इसी कारण से होता है, जिसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। 


Tuesday, March 23, 2021

चोर न लूटे, खर्च न फूटे

 हम एक बेशकीमती रत्न  को अपने भीतर कहीं मन की गहराई में छिपाकर भूल गए हैं, जो अनमोल है और जिसे जितना भी खर्च किया जाये चुकेगा नहीं. नानक तभी कहते हैं वह बेअंत है. हजारों-हजारों संतों, ऋषियों ने उसी अनमोल धरोहर से संपदा पायी, पा रहे हैं और लुटा रहे हैं। यह जो संतों के यहाँ लाखों की भीड़ जुटती है वह उस हीरे की चौंध की झलक मात्र पाने हेतु ही तो, जबकि वह हीरा अपने भीतर भी है। संत इसी चमक का स्मरण कराते हैं। हम हवा के घोड़े पर सवार रहते हैं। सांसारिक कामों को निपटाने की बड़ी जल्दी रहती है हमें। सब कुछ पा लेने की फिराक में, जल्दी से जल्दी गाड़ी, बंगला, रुतबा, शोहरत इन्हें पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, बिना सोचे कि ये सब हमें ले जाने वाले हैं एक दिन अग्नि की लपटों में। हमारी मंजिल यदि शमशान घाट ही है, चाहे वह आज हो या पचास वर्ष बाद, तो क्या हासिल किया। एक रहस्य जिसे दुनिया भगवान कहती है, हमारे माध्यम से स्वयं को प्रकट करने हेतु सदा ही निकट है। वही जो प्रकृति के कण-कण से व्यक्त हो रहा है। वह एक अजेय मुस्कान की तरह हमारे अधरों पर टिकना चाहता है और करुणा की तरह आँखों से बहना चाहता है। वह प्रियतम बनकर गीतों में बसना चाहता है। संगीत बनकर स्वरों में गूंजना चाहता है। वही कला है, वही शिल्प है, वही नृत्य है, पूजा है। वही अंतरतम में बसने वाली समाधि है। वही प्रज्ञा और मेधा है।

Tuesday, March 16, 2021

हीरा जन्म अमोल है

 जगत को देखने का नजरिया सबका अलग-अलग है। एक ज्ञानी उसे अपना ही विस्तार मानता है, भक्त उसे परमात्मा की अनुपम कृति के रूप में देखता है।सामान्य जन उसे अपने सुख का साधन मानता है। कोई पत्थर में भी ईश्वर को देख लेता है तो किसी को जीवित मनुष्य में भी  जीवन नजर नहीं आता। यह दुनिया हमें वैसी ही नजर आती है जैसा हम देखना चाहते हैं। यदि हमारा मन श्रद्धा से भरा है तो ऐसे ही लोगों की तरफ हमारा झुकाव होगा। संतों, महात्माओं व ईश्वर के प्रति सहज ही भीतर आकर्षण होगा। उनकी संगति से भीतर का कलुष धुल जाएगा और एक दिन वह सत्य जो सदा ही सबके भीतर विराजमान है, प्रकट हो जाएगा। अध्यात्म का अर्थ है आत्म जागृति, यानि स्वयं के बारे में सही-सही ज्ञान प्राप्त करना। उस स्वयं के बारे में जो हमें जन्म से ही प्राप्त है, जिसमें दुनिया का ज्ञान कोई इजाफा नहीं करता, बल्कि जो भी हमने उसके ऊपर परत दर परत चढ़ा लिया है, उसे उतार देना है। जैसे कोई हीरा यदि मिट्टी की परतों से ढका हो तो उसे साफ करते हैं वैसे ही साधना के द्वारा स्वयं पर चढ़े इच्छाओं, अपेक्षाओं आदि के आवरण को धो भर देना है। 


Friday, March 5, 2021

तोर मन दर्पण कहलाये

 मन दर्पण है, परमात्मा बिम्ब है, जीव प्रतिबिंब है, यदि दर्पण साफ नहीं हो तो उसमें प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं पड़ेगा। संसार भी तब तक निर्दोष नहीं दिखेगा जब तक मन निर्मल नहीं होगा। हम अपने मन के मैल को जगत पर आरोपित कर देते हैं और व्यर्थ ही जगत को दोषी मानते हैं। जब कभी हमने किसी को दोषी माना, उस पर अपना ही मत थोपा है। हर कोई जैसा है वैसा है।  अपनी समझ के अनुसार ही हम निर्णायक बनते हैं, हमारी समझ कोई पूर्ण तो है नहीं। यदि भीतर क्रोध है तो वह बाहर आने का रास्ता खोजेगा। यदि भीतर काम है तो वह जगत में उसी को आरोपित करेगा। दृष्टि जैसी होगी सृष्टि वैसा ही रूप धर लेती है। यदि कोई दृष्टिकोण ही न हो तो दुनिया जैसी है वैसी ही दिखेगी, इससे हमारी शांति भंग नहीं होगी। इसलिए संत कहते हैं अहंकार को छोड़े बिना सत्य का साक्षात्कार नहीं हो सकता। अहंकार है किसी भी उपाधि से स्वयं को पहचानना।  उपाधि का अर्थ है किसी वस्तु को स्वयं पर आरोपित कर लेना। आत्मा मुक्त है नित्य है उस पर देह को आरोपित करके स्वयं को मोटा, पतला, काला, गोरा, स्वस्थ, अस्वस्थ मानने लगते हैं। मन व बुद्धि को आरोपित करके स्वयं को सुखी-दुखी मानने लगते हैं। यदि न भीतर कोई आरोपण हो न बाहर ही, तो जीवन फूल की तरह हल्का व सुगंध बिखेरने वाला बन जाएगा।

Sunday, September 8, 2019

सहज हुए से मिले अविनाशी




जीवन जितना सरल है उतना ही जटिल भी. जिसने यह राज समझ लिया वह सरलता और जटिलता दोनों से ऊपर उठ जाता है. जिस क्षण में जीवन जैसा मिलता है, उसे वह वैसा ही स्वीकार करता है. वन में जहरीले वृक्ष भी हैं और रसीले भी, गुलाब में कंटक भी हैं और फूल भी, यदि हम एक को स्वीकारते हैं और दूसरे को अस्वीकारते हैं तो मन सदा एक संघर्ष की स्थिति में ही बना रहता है. ध्यान में जाने का पहला मन्त्र है मन को सभी धारणाओं से मुक्त कर लेना. जो जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लेना. सभी द्वन्द्वों के साक्षी बनकर ही पूर्ण विश्राम का अनुभव किया जा सकता है. जहाँ कोई अपेक्षा नहीं, वहीं पूर्ण स्वतन्त्रता है, स्वतन्त्रता हर आत्मा की आन्तरिक पुकार है. मन का सारा तनाव परतन्त्रता से ही उत्पन्न होता है. हम कुछ चाहते हैं पर कर नहीं सकते, यही संघर्ष भीतर चलता रहता है. हर इच्छा हमें गुलामी की ओर धकेलती है. जगत हमें कुछ देता है तो उसकी कीमत भी वसूलता है, यह चक्र न जाने कब से चल रहा है, संत और शास्त्र हमें एक नये जीवन की झलक दिखाते हैं, जिसमें सहजता है, सरलता है आनंद है पर उसके विपरीत कुछ भी नहीं, यहाँ पूर्ण स्वतन्त्रता है, यहाँ अनंत नीले नभ की निर्मलता का अनुभव भी सहज ही किया जा सकता है. यही ध्यान है, यही अपने स्वरूप में स्थित होना है.

Monday, July 29, 2019

भीतर बाहर एक हुआ जो


एक जीवन बाहर है और एक जीवन भीतर है. साधना का लक्ष्य है दोनों में समरसता लाना. हम घर में रहते हैं और बाहर भी जाते हैं. साधना का लक्ष्य है दोनों जगह हमारे मन का भाव रसमय बना रहे. यदि भीतर अशांति है तो लाख न चाहने पर भी हमारे व्यवहार में वह झलक ही जाएगी. यदि भीतर शांति है तो बाहर के शोरगुल में भी हमारा व्यवहार सौम्य बना रह सकता है. साधक के जीवन में एक दिन ऐसा भी आता है जब भीतर और बाहर का सारा भेद खो जाता है, तब उसके व्यवहार में सहजता प्रकट होती है. उसी दिन वह अपनी दृष्टि में प्रामाणिक होता है, और जगत में उसके लिए कोई पराया नहीं रह जाता. संत व शास्त्र बताते हैं इसके लिए स्वयं को जानना पहला कदम है. ध्यानपूर्वक जब हम अपने मन को देखना आरंभ करते हैं तो वह सारी चतुराई छोड़ने को तैयार हो जाता है. पहले पहल विकार प्रबल होते हुए लगते हैं पर धैर्यपूर्वक उनका दर्शन करने से वे अपना असर खोने लगते हैं. मन की गहराई में छिपा रस प्रकट होने लगता है और सहज ही बाहर जीवन बदलने लगता है.  

Thursday, June 27, 2019

स्वयं को जान लिया है जिसने



संत और शास्त्र कहते हैं, 'स्वयं को जानो', इसके पीछे क्या कारण है ? अभी हम स्वयं को देह मानते हैं, इस कारण जरा और मृत्यु का भय कभी छूटता ही नहीं. देह वृद्ध होगी और एक न एक दिन उसे त्यागना होगा. यदि कोई स्वयं को प्राण ऊर्जा मानता है, तो उसे भूख व प्यास सदा सताते रहेंगे. समय पर या पसंद का भोजन न मिले तो कितने लोग संतुलन ही खो देते हैं. भोजन के प्रति आसक्ति का कारण है प्राणमय कोष में निवास. कोई-कोई इससे आगे बढ़ जाते हैं और मन में रहने लगते हैं, कलाकार, कवि, लेखक उनका मन ही उनका संसार होता है. पर मन कभी शोक और मोह से मुक्त होता ही नहीं. अतीत का शोक और भविष्य के प्रति मोह उन्हें चैन से कहाँ रहने देता है. जब हम स्वयं को शुद्ध चेतन स्वरूप में जान जाते हैं, जरा-मृत्यु, भूख-प्यास, शोक-मोह सभी से परे जा सकते हैं. अपने भीतर एक शांत, आनन्दमयी स्थिति को अखंड रूप से अनुभव कर सकते हैं, तब भी देह अशक्त होगी, इसका अंत भी होगा पर इसका भय नहीं होगा. भूख लगने पर भोजन भी करेंगे और प्यास लगने पर जल भी ग्रहण करेंगे पर इनके प्रति आसक्ति नहीं होगी. समुचित आहार स्वस्थ रहने में भी सहायक होगा. विषाद का सदा के लिए अंत हो जायेगा और मोह की जगह निस्वार्थ प्रेम सहज ही प्रकट होगा. इसीलिए शास्त्र कहते हैं, स्वयं को जानना खुद के लिए ही सच्चा सौदा है.

Wednesday, March 27, 2019

ज्ञान के पथ पर चलता है जो


संत कहते हैं जैसे एक ही धातु से भिन्न भिन्न आकार व क्षमता वाले उपकरण बनाये जा सकते हैं,  एक धातु से ही भगवान की मूर्ति भी बन सकती है और हथियार भी गढ़े जा सकते हैं. उसी प्रकार चेतना शक्ति एक ही है उसी से प्रेम भी प्रकट हो सकता है और नफरत भी. अक्षर वही हैं, एकता  का संदेश भी दे सकते हैं और वैमनस्य की आग भी फैला सकते हैं. सुर और असुर एक ही ऋषि की संताने हैं. यह हमारे ज्ञान पर निर्भर करता है कि हम किसे चुनते हैं और किस वस्तु का प्रयोग किस प्रकार करते हैं. अंततः अज्ञान ही सारे क्लेशों के मूल में है और विवेक ज्ञान द्वारा ही इस अज्ञान को मिटाया जा सकता है. अनुभव के स्तर पर होने वाला ज्ञान ही वास्तव में विवेक है, जो सत्य-असत्य, सही-गलत, नित्य-अनित्य का भेद करना सिखाता है. ऐसा ज्ञान ही वक्त पड़ने पर हमारे काम आता है.

Wednesday, February 27, 2019

झुक जाये जो उन चरणों में


२८ फरवरी २०१९ 
संत व शास्त्र हमें बताते हैं अहंकार के पर्दे के पीछे ही छिपा है हमारा शाश्वत स्वरूप, जिसे पहचान कर हम अखंड शांति का अनुभव कर सकते हैं, जो हमें पूर्ण स्वाधीनता का अनुभव कराता है. एक स्वाधीन व्यक्ति सहज ही आनंदित रहता है. हमारी अशांति का कारण क्या है, हम किन-किन बन्धनों को अनुभव करते हैं, और क्या है जो हमें सहज रहने से रोकता है, इन प्रश्नों के उत्तर खोजना अहंकार से मुक्त होने का प्रथम कदम है. कई बार हम स्वाभिमान और अहंकार के भेद को नहीं समझते इसलिए अहंकार को बढ़ाए चले जाते हैं, यह जानते हुए भी कि ऐसा करने से हम अपने लक्ष्य से दूर ही जाते हैं. स्वयं को ऋषियों की परंपरा का वाहक मानना, परमात्मा की सृष्टि का एक अंग मानना और शुद्ध आत्मा मानना स्वाभिमान है, जिसकी रक्षा हमें करनी है. स्वयं को पद, धन, हुनर, जाति, लिंग, पन्थ से जोड़कर एक सामान्य व्यक्ति मानना अहंकार है. यदि हमारा पद बड़ा है, धन ज्यादा है, हम विभिन्न कलाओं को जानते हैं, हम किसी विशिष्ट पन्थ के अनुयायी हैं, तो हम अपने से कम पद वाले, कम धनी व्यक्ति को हीन मानकर स्वयं को विशेष अनुभव करेंगे, यही अहंकार है जो हमें सहजता से दूर रखता है. मानव होने के नाते सभी परमात्मा का अंग हैं, सभी मूलतः शुद्ध आत्माएं हैं, ऐसा भाव भीतर रखते हुए बाहर का व्यवहार चलाना है. ऐसा करने से बाहरी भेद बना ही रहेगा, लेकिन मन सदा एकत्व का अनुभव करेगा और मुक्त रहेगा.

Wednesday, January 23, 2019

सुख की करे कामना जो भी


२४ जनवरी २०१९ 
एक संत कहते हैं और कितना सही कहते हैं कि अन्य की गलती से जो दुखी हो जाता है, उससे बड़ा बुद्धिहीन कोई नहीं है. यदि इस सूत्र को कोई हृदयंगम कर ले तो वह सदा के लिए सुखी रहना सीख जाता है. हम सुबह से शाम तक अन्यों के कारण ही तो दुखी होते हैं, यदि अपनी गलती पर दुखी हों तो कितनी शीघ्रता से खुद को बदल लें. जब तक हम संसार में व्यवहार कर रहे हैं, द्वैत रहेगा ही, अन्य व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से हमें संबंध निभाना होगा. हमारे प्रतिकूल हो ऐसे व्यवहार का हमें सामना भी करना पड़ेगा. ऐसे में यदि हमें उनकी त्रुटि नजर आती है, और हम व्याकुल हो जाते हैं, तब तो इस जगत में प्रसन्न रहने के अवसर बहुत कम रह जायेंगे. साधक वही है जो एक बार यह निश्चय कर लेता है कि प्रसन्न रहना उसकी सबसे बड़ी साधना है, और यदि दुखी होना ही है तो कम से कम बात अपने हाथ में तो हो, हमारी ख़ुशी ही यदि हम पर निर्भर न हो तो गुनगुनाते हुए झरने और गाते हुए पंछी ही हमसे बेहतर हुए. साधक को दुःख केवल अपने समय, शक्ति और सामर्थ्य का समुचित प्रयोग न कर पाने का होता है. वह स्वयं अन्यों के दुःख का कारण बनना चाहता ही नहीं क्योंकि अज्ञानवश ही कोई ऐसा करता है. उसे तो ज्ञान की साधना करनी है.

Friday, January 18, 2019

मानुष जनम अमोल है


१८ जनवरी २०१८ 
संत और शास्त्र जिस बात की ओर संकेत कर रहे हैं, वह अनमोल है. हमारे पास जो भी कीमती वस्तु हो उससे अधिक अनमोल, किन्तु हम उसका महत्व नहीं समझ पाते. वे कहते हैं, देवता भी मानव जन्म के लिए लालायित रहते हैं, क्योंकि इसी जन्म में हम अपने मूल स्रोत तक पहुंच सकते हैं. मन और बुद्धि के जो उपकरण हमें प्रकृति से मिले हैं, उनके द्वारा मानव ने कितनी उन्नति कर ली है, किन्तु वह अपने मूल से दूर निकल गया है. यदि कोई बालक कोई प्रदर्शनी देखने घर से निकल जाये और फिर वापसी का रास्ता भूल जाये तो उसे भटकना पड़ता है, उसके दुःख की कल्पना हम कर सकते हैं. मन रूपी बालक भी आत्मा रूपी माँ से बिछड़ कर संसार की रंगीनियों में खो गया है, उसे तो यह भी याद नहीं कि उसका कोई घर भी है. अपने मूल से जुड़ा हुआ मन उस नाव की तरह होता है, जिसका लंगर उसके साथ है, वह कभी डूबती नहीं. वह उस घर की तरह होता है जिसकी नींव धरती में गहरी खुदी है, जो रेत का महल नहीं है.

Friday, January 11, 2019

एक तू जो मिला


१२ जनवरी २०१९ 
शायर कहता है, ‘जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है’. आखिर उसके पास कौन सी आँख है, जिसके द्वारा उसे एक वही नजर आता है. संत और शास्त्र भी कहते हैं, ‘एकै साधे सब सधे..’ उस एक को ही पाना है, एक को ही जानना है. उस एक का रास्ता अपने भीतर से होकर जाता है, पर हम हैं कि दुनियाभर की खबर रखना चाहते हैं. ट्रम्प ने क्या कहा, मोदी के भाषण पर कितनी तालियाँ बजीं, किसे कितने लाइक मिले और कौन यूरोप घूमने गया. इतना सब कुछ करते हुए क्या हम अपने से बेखबर नहीं हैं. किसी किसी को तो एक घंटा यदि अकेले रहना पड़ जाये तो बोर हो जाता है, यानि अपना साथ ही हमें नहीं भाता. क्यों न नये वर्ष में खुद को मित्र बनाएं, दैहिक, मानसिक, सामाजिक या अध्यात्मिक कोई भी समस्या हो तो स्वयं को ठीक उसी प्रकार समझाएं जैसे किसी मित्र को समझाते आये हैं. अन्यों की हर समस्या का हल हमारे पास सदा ही तैयार रहता है. स्वयं को देह, मन, बुद्द्धि से अलग करके कभी देखा ही नहीं सो अपनी समस्या के हल के लिए अन्यों का सहारा लेते हैं. एक बार मन को समझने-समझाने वाला भीतर मिल गया, तो वह भी गायेगा, जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है !   

Monday, November 19, 2018

अलख, निरंजन, भव भय भंजन


२० नवम्बर २०१८ 
संत कहते हैं परमात्मा ही जगत के रूप में दिखाई देता है, और वह उससे परे भी है. इसी प्रकार हम देह, मन, बुद्धि आदि के माध्यम से व्यक्त होते हैं पर उससे परे भी हैं, अपने उस सहज आनंद स्वरूप को जानना ही साधना का लक्ष्य है. स्वयं के असंग, निरंजन, निर्विकार स्वरूप को जानकर ही संत जगत में रहते हुए भी अलिप्त दिखाई देते हैं. वह प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होते बल्कि प्रकृति के नियंता बन जाते हैं. साधक का जब अपने मन, बुद्धि अदि पर नियन्त्रण होता है वह जगत के सुख-दुःख आदि से प्रभावित नहीं होता. जीवन जिस क्षण जैसा उसके सम्मुख आता है, उसे सहज स्वीकार करके वह इस जगत से वैसे ही निकल जाता है जैसे मक्खन से बाल. कमल के पत्तों पर पड़ी पानी की बूंद जैसे उसे भिगो नहीं सकती, साधक को स्वयं के उसी स्वरूप में स्थित होना है.

Tuesday, August 28, 2018

जब जैसा तब वैसा रे


२८ अगस्त २०१८ 
जीवन जब हमारे निकट मुस्कुराता हुआ गुनगुना रहा होता है, हम किन्हीं व्यर्थ की बातों में खोये उससे नजरें नहीं मिलाते. संत कहते हैं, परमात्मा चारों ओर उसी तरह मौजूद है जैसे हवा और धूप. खिड़कियाँ बंद हों तो धूप भला अंदर आये कैसे और हवा थोड़ी बहुत आ भी गयी तो उसे ताज़ी रखने के लिए भी तो खिड़कियाँ खोलनी होंगी. हवा को कैद नहीं कर सकते न ही धूप को...उन्हें तो वे जैसे हैं, जब हैं, उसी वक्त महसूस करना है, इसी तरह परमात्मा को हर क्षण को जैसा वह है वैसा ही स्वीकार कर ही महसूस किया जा सकता है. मन पर विचारों और विकारों के पर्दे लगे हों तो उसका प्रवेश सम्भव नहीं है.

Friday, June 15, 2018

'मैं' को नहीं मुक्ति है 'मैं' से


१५ जून २०१८ 
एक व्यक्ति एक संत के पास गया और मुक्ति का मार्ग पूछा. संत ने कहा, सजगता में ही मुक्ति है. क्योंकि बंधन सदा ही असावधानी में बंधता है. असावधानी वश जो भी कार्य देह द्वारा होते हैं, उनके पीछे एक खोया हुआ मन होता है, मन के पीछे सुप्त बुद्धि होती है और होता है अहंकार. अहंकार कभी अपने को गलत नहीं मान सकता, भले ही वह जान लेता है कि बुद्धि ने उचित निर्णय नहीं लिया, मन में सही विचार नहीं आया और कृत्य सही नहीं है, पर वह उसे किसी न किसी तरह सही सिद्ध करना चाहता है. इस प्रक्रिया में वह बंधन में बंध जाता है. अब यही अहंकार पीड़ित होकर मुक्ति के उपाय खोजता है. जब तक मन वर्तमान में नहीं होगा, बुद्धि सतर्क नहीं होगी, कर्म सही नहीं हो सकते. वर्तमान के क्षण में अहंकार को टिकने के लिए कोई जगह नहीं है, सजग बुद्धि को भी किसी की अनुशंसा नहीं चाहिए, यानि अहंकार की दाल वहाँ भी नहीं गलती, कर्म जब शुद्ध होते हैं तो उनसे किसी फल की आशा नहीं रहती, क्योंकि कर्म करते समय ही सुख का अनुभव होता है. कर्तापन के मिटते ही मुक्ति का अनुभव होता है.

Tuesday, May 15, 2018

स्वयं जो जाने सो ही जाने


१६ मई २०१८ 
संत और शास्त्र हमें ‘स्वयं’ को जानने के लिए कहते हैं, जिसे ‘स्वयं’ के द्वारा ही जाना जा सकता है. जानने का साधन है बुद्धि, यदि बुद्धि स्थिर होगी, शुद्ध होगी अर्थात राग-द्वेष से रंगी हुई नहीं होगी, तभी वह भीतर जाकर ‘स्वयं’ को यानि आत्मा को दिखा सकती है. मन के द्वारा हम जगत का ज्ञान प्राप्त करते हैं. मन ही इन्द्रियों से जुड़ा है, रंग, रूप, स्वाद, गंध और स्पर्श का ज्ञान हमें मन के द्वारा होता है, बुद्धि इन्हें अच्छा या बुरा कहकर स्वीकारती या नकारती है और बुद्धि के पीछे स्थित चेतन आत्मा इसे जानता है. मन व बुद्धि जड़ हैं, दोनों चेतन आत्मा के लिए हैं. वह उनका स्वामी है और प्रेम, शांति व आनंद उसका स्वभाव है. मन, बुद्धि प्रकृति से बने हैं और आत्मा परमात्मा का अंश है. मन व बुद्धि के साथ यदि आत्मा का संबंध न हो तो वे कुछ नहीं जान पायेंगे. जैसे चन्द्रमा को यदि सूर्य का प्रकाश न मिले तो वह जरा भी प्रकाश नहीं दे पायेगा. यदि हम स्वयं को आत्मा रूप में अर्थात ज्ञाता, द्रष्टा रूप में मन, बुद्धि से पृथक जान लेते हैं तो सदा एकरस शांति का अनुभव सहज ही कर सकते हैं.  

Sunday, May 13, 2018

गुरू माता-पिता, गुरू बंधु सखा


१३ मई २०१८ 
आज मातृ दिवस है और साथ ही भारत के एक महान संत श्री श्री रविशंकर जी का जन्मदिन भी, संयोग से इस वर्ष ये दोनों उत्सव एक साथ मनाये जा रहे हैं. किसी भी व्यक्ति के जीवन में माँ और गुरू दोनों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता. कहते हैं भगवान हर जगह नहीं पहुँच सकते इसलिए उन्होंने माँ की रचना की, अर्थात माँ भगवान का ही एक रूप है. वह ब्रह्मा की तरह संतति का सृजन करती है, विष्णु की तरह पालना करती है और शिव की तरह बालक की कमियों का विनाश भी करती है. शिशु का मन कोरी स्लेट की तरह होता है, माँ के पोषण में उसे केवल आहार ही नहीं मिलता, मिलती है एक पूरी परंपरा, संस्कारों की एक श्रंखला. जितने धैर्य और प्रेम से एक माँ अपने शिशु का पालन करती है, उतना ही प्रभावशाली उसका व्यक्तित्त्व बनता है. गुरू भी माँ की तरह होता है, प्रेमपूर्ण और बिना किसी प्रत्याशा के अपने स्नेह लुटाने वाला. गुरु को भी ब्रह्मा, विष्णु, महेश का रूप कहा जाता है. वह शिष्य को द्विज बनाता है अर्थात उसका दूसरा जन्म गुरू के द्वारा होता है. शिष्य के मन के विकारों को दूर करने का उपाय बताकर गुरू उसे आत्मज्ञान प्रदान करता है. स्वयं का ज्ञान पाकर ही वह बन्धनों से स्वयं को मुक्त करता है और परमात्मा के आनंद का अनुभव करता है.