Tuesday, March 23, 2021

चोर न लूटे, खर्च न फूटे

 हम एक बेशकीमती रत्न  को अपने भीतर कहीं मन की गहराई में छिपाकर भूल गए हैं, जो अनमोल है और जिसे जितना भी खर्च किया जाये चुकेगा नहीं. नानक तभी कहते हैं वह बेअंत है. हजारों-हजारों संतों, ऋषियों ने उसी अनमोल धरोहर से संपदा पायी, पा रहे हैं और लुटा रहे हैं। यह जो संतों के यहाँ लाखों की भीड़ जुटती है वह उस हीरे की चौंध की झलक मात्र पाने हेतु ही तो, जबकि वह हीरा अपने भीतर भी है। संत इसी चमक का स्मरण कराते हैं। हम हवा के घोड़े पर सवार रहते हैं। सांसारिक कामों को निपटाने की बड़ी जल्दी रहती है हमें। सब कुछ पा लेने की फिराक में, जल्दी से जल्दी गाड़ी, बंगला, रुतबा, शोहरत इन्हें पाने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, बिना सोचे कि ये सब हमें ले जाने वाले हैं एक दिन अग्नि की लपटों में। हमारी मंजिल यदि शमशान घाट ही है, चाहे वह आज हो या पचास वर्ष बाद, तो क्या हासिल किया। एक रहस्य जिसे दुनिया भगवान कहती है, हमारे माध्यम से स्वयं को प्रकट करने हेतु सदा ही निकट है। वही जो प्रकृति के कण-कण से व्यक्त हो रहा है। वह एक अजेय मुस्कान की तरह हमारे अधरों पर टिकना चाहता है और करुणा की तरह आँखों से बहना चाहता है। वह प्रियतम बनकर गीतों में बसना चाहता है। संगीत बनकर स्वरों में गूंजना चाहता है। वही कला है, वही शिल्प है, वही नृत्य है, पूजा है। वही अंतरतम में बसने वाली समाधि है। वही प्रज्ञा और मेधा है।

6 comments:

  1. वह एक अजेय मुस्कान की तरह हमारे अधरों पर टिकना चाहता है और करुणा की तरह आँखों से बहना चाहता है। वह प्रियतम बनकर गीतों में बसना चाहता है। संगीत बनकर स्वरों में गूंजना चाहता है। वही कला है, वही शिल्प है, वही नृत्य है, पूजा है। वही अंतरतम में बसने वाली समाधि है। वही प्रज्ञा और मेधा है।

    आम इंसान इतना कहाँ सोच , समझ पाटा है .... विचारणीय .

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    1. स्वागत व आभार संगीता जी !

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" ( 2078...पीपल की कोमल कोंपलें बजतीं हैं डमरू-सीं पुरवाई में... ) पर गुरुवार 25 मार्च 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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