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Sunday, August 16, 2026

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

आज यह विचार करने की बहुत ज़रूरत है कि वास्तव में स्वाधीनता क्या है? क्या राजनीतिक रूप से स्वाधीन देश में निवास करने मात्र से हम स्वयं को स्वाधीन मान सकते हैं ? जब तक हम मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होते, स्वाधीनता भ्रम ही बनी रहती है। किसी का मन यदि भय से ग्रस्त है, दूसरों से तुलना करता है, सदा कुछ न कुछ पाने की फ़िराक़ में लगा रहता है, तो वह मन परतंत्र ही कहा जायेगा। जब हम भीतर अतृप्त बने रहते हैं, जीवन की दौड़ में स्वयं को पिछड़ गया मानते हैं, तो हम उस मानसिकता के ग़ुलाम हैं, जो जीवन को एक संघर्ष में बदल देती है। जीवन एक कला है, कोई युद्ध नहीं। जिस भी परिस्थिति में किसी को रखा गया है, वह उसके विकास के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य दिखाती है। किंतु जो मन मुक्त नहीं है, वह इस खुले द्वार को देख ही नहीं सकता। जीवन हमारे चारों ओर हवा और धूप की तरह बिखरा है, लेकिन हम उसकी ओर नज़र नहीं उठाते। जीवन ऊर्जा श्वासों के रूप में दिन-प्रतिदिन क्षीण हो रही है, उसकी भरपाई के रूप में हमारे ऋषियों ने ध्यान-प्राणायाम की अद्भुत विद्या सिखायी है। जिसके द्वारा हम जीवन के स्रोत से जुड़ सकते हैं और स्वयं के भीतर मुक्ति का द्वार पा सकते हैं। मृत्यु यदि जीवन का अंत है तो जीवन, मृत्यु का भी अंत हुआ। इस रहस्य को भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं। आत्मा शाश्वत है, आत्मा ही वह जीवन है जो मृत्यु का अंत है। ध्यान में हम उसी आत्मा का अनुभव करते हैं, वहीं सच्ची मुक्ति का अहसास होता है। वहाँ कोई दूसरा नहीं है, इसलिए भय, तुलना, आगे-पीछे, छोटा-बड़ा भी कुछ नहीं है। वहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्र है, तब स्वयं पर शासन करने की विधि ज्ञात होती है। हमारे शास्त्र हमें इसी मोक्ष की याद बार-बार दिलाते हैं। 

Wednesday, July 15, 2026

मुक्ति की यदि चाह है भीतर

सत्य के साधक को हर तरह से आत्मनिर्भर होना है। अपने जीवन में आने वाले हर सुख-दुख का उत्तरदायित्व स्वयं पर लेना है। इस जगत में कोई किसी को आराम तो पहुँचा सकता है, पर सुखी तो भगवान भी नहीं कर सकता। इसलिए अपने सुख के लिए किसी पर निर्भर होना या किसी अन्य को अपने दुख के लिए ज़िम्मेदार मानना ऐसा ही है, जैसे पानी को तलवार से काटना। किसी के पास सारे ऐशो-आराम हों किन्तु यदि उसे अपने सुख के लिए किसी का मुँह देखना पड़ता है तो वह उसका ग़ुलाम है। सबसे बड़ी आज़ादी है, अपने सुख के लिए स्वयं पर निर्भर होना। दुनिया की किसी भी वस्तु का मोहताज न होना पड़े, किसी भी व्यक्ति और किसी भी परिस्थिति को अपने दुख के लिए ज़िम्मेदार मानने की भूल न करे तभी  इस पथ में वह आगे बढ़ सकता है। इस जगत में आज तक न कोई किसी को उसकी मर्ज़ी के बिना सुखी या दुखी कर सका है, न ही कर पाएगा। इसीलिए कृष्ण ने भगवद् गीता में जगत से मिलने वाले सुख-दुख, हानि-लाभ व जय-पराजय में व्यक्ति को समता में टिके रहने को कहा है। जो समता में स्थित होना सीख जाता है, वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ा ही चुका है। 

Friday, July 11, 2025

गुरु पूर्णिमा पर अनमोल संदेश

गुरुदेव कहते हैं  “न अभाव में रहो, न प्रभाव में रहो बल्कि स्वभाव में रहो”. अभाव मानव का  सहज स्वभाव नहीं है क्योंकि वास्तव में मानव पूर्ण है. अपूर्णता ऊपर से ओढ़ी गयी है, और चाहे कितनी ही इच्छा पूर्ति क्यों न हो जाये यह मिटने वाली नहीं. आप मुक्त होना चाहते हैं जबकि मुक्त तो आप हैं ही, बंधन खुद के बनाये हुए हैं, ये प्रतीत भर होते हैं. ईश्वर से आपका सम्बन्ध सनातन है, आप उसी के अंश हैं. अज्ञान वश जब आप इस सम्बन्ध को भूल जाते हैं तथा प्रेम को स्वार्थ सम्बन्धों में ढूंढने का प्रयास करते हैं तो दुःख को प्राप्त होते हैं.  आपको अपने जीवन के प्रति जागना है. कुछ बनने की दौड़ में जो द्वंद्व आप भीतर खड़े कर लेते हैं उसके प्रति जागना है. आपके मन को जो अकड़ जकड़ लेती है, असजगता की निशानी है. खाली मन जागरण की खबर देता है , क्योंकि मन का स्वभाव ही ऐसा है कि इसे किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता इसमें नीचे पेंदा ही नहीं है, तो क्यों न इसे खाली ही रहने दिया जाये. मुक्ति का अहसास उसी दिन होता है, जब सबसे आगे बढ़ने की वासना से मुक्ति मिल जाती है.


Thursday, May 2, 2024

ध्यान, मुक्ति में भेद नहीं है

संत कहते हैं, साधक को हर सुबह अपने दिन की शुरुआत ऐसे करनी चाहिए जैसे कि वह पहली बार जगत को देख रहा है। ध्यान का अर्थ ही है,  हर पल को गहराई से महसूस करना, हर पल ओस की तरह ताज़ा है, अभी है अभी नहीं रहेगा। अतीत मृत हो चुका है। जब हम अतीत को भुला देते हैं तो भविष्य की आशंका भी नहीं रहती।केवल शुद्ध वर्तमान रह जाता है। परमात्मा की उपलब्धि वर्तमान में ही हो सकती है। अतीत और भविष्य हमें स्मृति या कल्पना से बांधे रखते हैं। जबकि हर आत्मा की पुकार स्वतंत्रता है।शिशु भी मुक्त होना चाहता है और वृद्ध भी, किसी को भी आदेश या शासन में रहना नहीं भाता। अनुशासन का अर्थ है, स्वयं पर स्वयं का लगाया गया प्रतिबंध, जिसके भीतर हम मुक्त हैं। जब अतीत का बोझ नहीं है और आने वाले कल की चिंता नहीं है तभी मन अपने शुद्ध व मुक्त स्वरूप का अनुभव कर सकता है। यही ध्यान है। 


Sunday, November 26, 2023

जिस पल में मन मुक्त हुआ

संत कहते हैं और यह हमारा अनुभव भी है कि ज्ञान मन को मुक्त कर देता है. जब तक हमें किसी बात की पूरी जानकारी नहीं है, मन में संशय बने रहते हैं, पर ज्ञान होते ही मन ठहर जाता है। ठहरे हुए मन में अपने आप ही आनंद का अनुभव होता है, क्योंकि मन का मूल अथवा आत्मा आनंदस्वरूप  ही है। आत्मा का ज्ञान पाकर ही बुद्धि भी वास्तव में बुद्धि कहलाने की अधिकारिणी है. उसके पहले मन तो अज्ञान के पाश में बंधा होता है, बुद्धि भी एक अधीनता का जीवन जीती है. बुद्धि मन की आधीन, इन्द्रियों की आधीन, धन, प्रसिद्धि, प्रशंसा की आधीन, मोह, क्रोध, अहंकार की आधीन होती है। इसके अतिरिक्त अवचेतन मन की सुप्त प्रवृत्तियों की अधीनता भी उसे स्वीकारनी पड़ती है. किन्तु आत्मा का ज्ञान होने के बाद जैसे कोई परदा उठ जाता है. मन, बुद्धि स्वयं को हल्का महसूस करते हैं. 


Sunday, January 29, 2023

डरना जिसने छोड़ दिया है

भय से मुक्ति मिले बिना मानव को विश्रांति प्राप्त नहीं हो सकती। जो कुछ उसके पास है, वह छिन जाने का भय, रिश्तों के टूट जाने का भय अथवा उनके सदा एक सा न बने रहने  का भय। दूसरों के मन में अपने प्रति स्नेह व सम्मान  को खो देने का भय। समाज में अकेले रह जाने का भय और दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं, इसका भय। असुंदर, अयश, निर्धन, अपकीर्ति, असफल  होने का भय; और भी न जाने कितने भय हैं जिनसे मन घिरा रहता है। सबसे बड़ा भय रोग अथवा मृत्यु का है, यह भी मानव मन को जकड़े रहता है। जहाँ भय है वहाँ प्रेम खो जाता है। संत जब ईश्वर से प्रेम करने की बात कहते हैं तो भयभीत व्यक्ति उसका अनुभव नहीं कर पाता, अथवा तो उन क्षणों में नहीं कर पाता जब इनमें से कोई भय मन की ऊपरी सतह पर आ गया है।अधिकतर समय तो ये भय अवचेतन में दबे रहते हैं और इनका भास नहीं होता। कोई परिस्थिति आने पर यदि मन डावाँडोल हो रहा है तो कोई न कोई भय सिर उठा रहा है। ऐसे में एक ही उपाय है इनसे मुक्ति का, साक्षी हो जाना। ये भय हमारे सत्य स्वरूप को छू भी नहीं पाते। जब कोई स्वयं की अनंतता को अनुभव कर लेता है तो सारे भय खो जाते हैं। साधना के द्वारा बार-बार अपने आप में स्थित होना सीखना है, एक दिन जब सारे भय अवचेतन से निकल कर सामने आ जाएँगे और मन में हलचल नहीं होगी उस क्षण हम इनसे सदा के लिए मुक्त हो जाएँगे।   


Wednesday, January 4, 2023

मन जो अमन हुआ टिक जाए

संत कहते हैं, मन को विकारों का ही तो बंधन है, हम जो मुक्ति की बात करते हैं, वह मुक्ति विकारों से ही तो चाहिए. यदि धर्म धारण किया है तो विकार धीरे-धीरे ही सही पर निकलने शुरू हो जाते हैं. यदि नहीं होते अथवा बढ़ते हैं तो ऐसा धर्म किस काम का ? केवल पाठ करने या धार्मिक चर्चा करने मात्र से हम धार्मिक नहीं हो जाते. राग-द्वेष सब विकारों की जड़ हैं। वीतरागी तथा वीतद्वेषी होने के लिये मन पर संस्कारों की गहरी लकीर नहीं पड़नी चाहिए. हृदय से मैत्री व करुणा की धारा बहने लगे तो शीघ्र ही मन निर्द्वन्द्व हो जाता है. ऐसा तब होता है जब मन ध्यानस्थ होने लगता है। मन की गहराई में मैत्री व करुणा का साम्राज्य है, पर मन उसके प्रवाह में रोड़े अटकाता है, जब मन न रहे तभी अमन अर्थात शांति का अनुभव होता है। 

Tuesday, January 3, 2023

मुक्ति की जो करे कामना

सुख यानि शुभ आकाश, अपने आसपास का वातावरण जब सकारात्मक तरंगे लिए हुए हो, उसमें कोई विकार न हो। किंतु जहाँ शुभ है, वहाँ अशुभ भी हो सकता है, चाहे उस समय प्रकट नहीं हो रहा। जहाँ सकरात्मकता है, वहीं नकारात्मकता भी छिपी है। इसलिए सुख की कामना का त्याग ही मुक्ति है। इस वर्ष हमारा मूलमंत्र सुख के स्थान पर मुक्ति होना चाहिए। मुक्ति का अर्थ है, पूर्ण स्वतंत्रता, दो के द्वन्द्व  से पूरी आज़ादी ! अब न सुख की तलाश है न शुभ-अशुभ का भय ! मुक्ति का अर्थ है मन के पूर्वाग्रहों, धारणाओं, कल्पनाओं, आशंकाओं से मुक्ति ! एक ऐसे स्थान में रहने की कला जहाँ पूर्ण रिक्तता है। जहाँ इस जगत का स्रोत है। जहाँ से आवश्यक ज्ञान सभी जीवों को प्राप्त होता है, क्योंकि वह ज्ञान का भी स्रोत है। आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी पाँच तत्व भी वहीं से उपजे हैं। मुक्ति की कामना हमारे शास्त्रों का मूल मंत्र है। मोक्ष की अवधारणा केवल भारत में ऋषियों द्वारा की गयी है, यह परम कामना है। इसका अर्थ है छोटे संकीर्ण मन की दासता से मुक्ति और विशाल मन के साथ एक होने की कला या विज्ञान; यह व्यक्ति को पूर्ण बनाती है।   


Wednesday, April 27, 2022

कण-कण में जो देखे उसको

हम जिस वस्तु, व्यक्ति अथवा परिस्थिति का हृदय से सम्मान करते हैं, उससे मुक्तता का अनुभव करते हैं अर्थात उनके अवाँछित प्रभाव या अभाव का अनुभव नहीं करते। सम्मानित होते ही वे हमारे भीतर लालसा का पात्र नहीं रहते। यदि हम सभी का सम्मान करें तत्क्षण मुक्ति का अनुभव होता है. इसीलिए ऋषियों ने सारे जगत को ईश्वर से युक्त बताया है. अन्न में ब्रह्म को अनुभव करने वाला व्यक्ति कभी उसका अपमान नहीं कर सकता, भोजन में पवित्रता का ध्यान रखता है. शब्द में ब्रह्म को अनुभव करने वाला वाणी का दुरूपयोग नहीं करेगा। स्वयं को समता में रखने के लिए, वैराग्य के महान सुख का अनुभव करने के लिए, कमलवत जीवन के लिए आवश्यक है इस सुंदर सृष्टि और जगत के प्रति असीम सम्मान का अनुभव करना। 

Wednesday, September 1, 2021

मुक्ति का जो मार्ग चुनेगा

जब मन सीमित होता है  तब असीम को जान नहीं पाता। उधेड़बुन में लगा रहता है तो विश्राम नहीं पाता । जब कुछ न कुछ चाहता है तब उतना ही पाता है। जिस क्षण भी हर चाह  खो जाती है,  अस्तित्त्व बरस जाता है। ध्यान का अर्थ है हर चाह, हर क्रिया, हर पहचान  खो जाए, वही रहे  जो सदा से है और सदा रहेगा। वहीं से प्रेम और शांति का दरिया बहेगा । उन पलों में कोई बोझ नहीं उठाना होगा, किसी को कुछ करके नहीं दिखाना होगा। ऊर्जा निर्बाध तन में बहेगी, प्रकृति  जिसका उपयोग सहज ही करेगी। कृत्य होंगे पर कर्ता नहीं होगा। ध्यान मुक्ति का मार्ग दिखाता है और  स्वयं से मिलाता है। 


Tuesday, October 27, 2020

पल-पल सजग रहे जो मन

अतीत में जो भी अच्छे-बुरे कर्म  हमसे हुए हैं, उसके संस्कार मन पर पड़े हैं तथा उनके फल सुख-दुख के रूप में हमें प्राप्त हो रहे हैं। सुख आने पर यदि हम गर्वित न हों, दुख आने पर व्यथित न हों तो अतीत हम पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकता। यदि दुख में दुखी होना और सुख में अभिमान से भर जाना हमारे लिए स्वाभाविक है तो भविष्य भी ऐसा ही होने वाला है। अतीत जब पत्थर बन कर राह में आ जाए तो वर्तमान का दर्शन हमें होता ही नहीं। संत कहते हैं भूख-प्यास और नींद के अलावा वर्तमान में कौन सा दुख है, सारे मानसिक दुख व चिंता अतीत के ही हैं, और यदि हमारा मन किसी भी कारण से परेशान रहता है तो अतीत के हाथों वह जकड़ा हुआ है। वर्तमान का क्षण निर्दोष है, परमात्मा की कृपा का अनुभव सदा वर्तमान में ही होता है। आज यदि हम हर कर्म को सजग होकर करते हैं तो पुराने संस्कार क्षीण पड़  जाएंगे और शुभ कर्मों के संस्कार पड़ेंगे, यही मुक्ति का मार्ग है।


Tuesday, August 25, 2020

मुक्ति का जो स्वाद चखेगा

 मुक्ति कौन नहीं चाहता ? मुक्ति पुरानी आदतों से, व्यर्थ के खोखले विश्वासों तथा पूर्वाग्रहों से ! मुक्ति की कल्पना ही मन को पंख लगा देती है. मुक्त हृदय कितना शांत हो सकता है, कितना पवित्र और कितना सामर्थ्यवान. उसमें सब कुछ करने की शक्ति आ जाती है, बंधन मुक्त को दुःख कहाँ? लेकिन सारी सीमाएं, दायरे, बंधन और गुलामी की जंजीरें क्या हमारी खुद की ईजाद की हुई नहीं हैं? आदर्श से आदर्श स्थिति में भी हम अपने हृदय को नीचे गिरा लेते हैं. दुःख की कल्पनाएँ, भविष्य के प्रति आशंका, साथ ही द्वेष, कटुता और इन सबसे बचे भी रहे तो दूसरों को सुधारने का लोभ...यही सब मन को नीचे गिराता है. हम अन्यों से तो अपेक्षाएँ करते हैं पर स्वयं उनकी अपेक्षाओं पर खरे उतरे या नहीं, इसका ध्यान नहीं रखते. इस सुंदर जगत की सुंदरता को नकार कर केवल कमियों पर नजर डालना कहाँ तक उचित है. संसार में रहते हुए भी यदि मन को मुक्त रखना आ जाये तो अंतर्मन से रस का स्रोत कभी सूखेगा नहीं.


Sunday, July 12, 2020

खाली होगा मन जब अपना

सन्त कहते हैं  “न अभाव में रहो, न प्रभाव में रहो बल्कि स्वभाव में रहो”. अभाव मानव का  सहज स्वभाव नहीं है क्योंकि वह वास्तव में पूर्ण है. अपूर्णता ऊपर से ओढ़ी गयी है, और चाहे कितनी ही इच्छा पूर्ति क्यों न हो जाये यह मिटने वाली नहीं. हम मुक्त होना चाहते हैं जबकि मुक्त तो हम हैं ही, बंधन खुद के बनाये हुए हैं, ये प्रतीत भर होते हैं. प्रेम हमारा सहज स्वभाव है, हम उसी से बने  हैं. अज्ञान वश जब हम इस सत्य को भूल जाते हैं तथा प्रेम को स्वार्थ सम्बन्धों में ढूंढने का प्रयास करते हैं तो दुःख को प्राप्त होते हैं.  हमें अपने जीवन के प्रति जागना है. कुछ बनने की दौड़ में जो द्वंद्व भीतर खड़े कर लेते हैं उसके प्रति जागना है.  मन को जो अकड़  जकड़ लेती है, असजगता की निशानी है. खाली मन जागरण की खबर देता है , क्योंकि मन का स्वभाव ही ऐसा है कि इसे किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता इसमें नीचे पेंदा ही नहीं है, तो क्यों न इसे खाली ही रहने दिया जाये. मुक्ति का अहसास उसी दिन होता है जब सबसे आगे बढ़ने की वासना से मुक्ति मिल जाती है.

Friday, June 21, 2019

मुक्ति का जो मार्ग चाहता



जीवन की भव्यता और दिव्यता को समझना हो तो योग ही एकमात्र साधन है. योग ही हमें अपने पथ पर अचल रखता है. आत्मा को अल्प से सुख नहीं मिल सकता, वह अनंत से ही संतुष्ट हो सकती है. संस्कारों को दग्ध बीज किये बिना अनंत में टिका नहीं जा सकता. संस्कारों को दग्ध करने के लिए योग को अपनाना है. योगी का अंतिम गन्तव्य सन्यास अर्थात त्याग है. जो विवेक और वैराग्य का महत्व जान ले वही सन्यासी है. जो अपने भीतर के दोषों का, दुर्बलताओं का त्याग कर सकता है वही आत्मबोध प्राप्त कर सकता है. भीतर द्वंद्व हैं, लोभ है, वासना और कामना है. जो आत्मा को जंजीरों से कैद रखती है. योग है इन सबसे मुक्ति का मार्ग !

Thursday, March 14, 2019

मन होगा वैरागी जब



आत्मा की सबसे बड़ी मांग है स्वाधीनता. हर दुःख किसी न किसी प्रकार की पराधीनता का द्योतक है. हम अपनी इच्छाओं के गुलाम होकर जीते हैं और किसी न किसी प्रकार उन्हें पूर्ण करना चाहते हैं. यदि वे पूर्ण हो जाती हैं तो सुख उस स्वाधीनता का होता है जो उस इच्छा से मुक्त होकर हमें मिलता है न कि उस वस्तु के मिलने का जिसकी चाह पूरी हो गयी. जो इच्छा पूर्ण नहीं होती उसकी गुलामी हमें सहनी पड़ती है. शास्त्रों में कहा गया है, वैराग्यवान को कौन सा सुख नहीं मिलता? क्योंकि वह किसी की पराधीनता स्वीकार नहीं करता वह मुक्ति के सुख का अनुभव करता है. ध्यान  में जो सहज आनंद साधक को मिलता है वह भी इसी क्षणिक मुक्ति का परिणाम है. यदि कोई नियमित ध्यान साधना करता रहे तो धीरे-धीरे सभी इच्छाएं सूखे पत्तों की तरह गिरने लगती हैं. पहले व्यर्थ हटता है फिर एक अवस्था ऐसी आती है जब जो आवश्यक हो अपना आप ही उसे प्राप्त होने लगता है, किसी इच्छा की आवश्यकता ही नहीं रहती.

Wednesday, November 14, 2018

मुक्तिबोध बने साधन सुख का


१५ नवम्बर २०१८ 
चेतना यदि मुक्त है तो ही स्वयं का अनुभव कर पाती है. मन की गहराई में छिपे प्रकाश की झलक उसे मिलती है. अंतर सुख की धार में भीग कर अखंड शांति का अनुभव उसे मिलता है. मुक्ति का स्वाद जिसने एक बार भी चख लिया है वह जगत में रहकर भी बंधा हुआ नहीं है. हम भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए जितना समय व ऊर्जा व्यय करते हैं, उससे आधा भी स्वयं को जानने में नहीं लगाते. हमारे शास्त्रों का मूल मन्त्र है, “असतो मा सद गमय”. हमें उस सत्य तक पहुंचना है जो सदा एक रस है. जगत में रहते हुए सभी कुछ करते हुए भी उस सत्य का अनुभव किया जा सकता है, आवश्यकता है उसके प्रति श्रद्धा भाव जगाने की. शास्त्रों के अध्ययन व संतों के सत्संग से ही भीतर इस परम श्रद्धा का उदय व्यक्ति के भीतर होता है.  

Monday, September 3, 2018

एक हुआ जो सारे जग से


४ सितम्बर २०१८ 
हम आज जो भी हैं, इसका चुनाव हमने ही किया है. हम कल क्या हों, इसका चुनाव अब हमें करना है. पूर्वाग्रहों, मान्यताओं और आदतों के अनुसार ही जीवन चलता रहा तो भविष्य का अनुमान लगाना जरा भी कठिन नहीं, हम वही होंगे जो आज हैं. जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करने का यदि मन बना लिया और स्वयं को उसमें बाधा न बनने दिया तो भविष्य बिलकुल नया होगा. जीवन बढ़ने और चलने का नाम है, यह वाक्य सुनने में कितना भला लगता है, कदम-कदम आगे बढ़ते जाने से एक दिन हम स्वयं को बिलकुल बदला हुआ पायेंगे. योग साधना का यही लक्ष्य है, सर्व दुखों से मुक्ति का नाम ही योग है. अस्तित्त्व के साथ एक्य ही योग है. योग के आठ अंगों में से एक को जो साध लेता है, वह मंजिल की ओर चल पड़ता है. पांच यमों और पांच नियमों में से एक-एक की भी साधना यदि कोई करता है तो अन्य भी सधने लगते हैं.

Friday, June 15, 2018

'मैं' को नहीं मुक्ति है 'मैं' से


१५ जून २०१८ 
एक व्यक्ति एक संत के पास गया और मुक्ति का मार्ग पूछा. संत ने कहा, सजगता में ही मुक्ति है. क्योंकि बंधन सदा ही असावधानी में बंधता है. असावधानी वश जो भी कार्य देह द्वारा होते हैं, उनके पीछे एक खोया हुआ मन होता है, मन के पीछे सुप्त बुद्धि होती है और होता है अहंकार. अहंकार कभी अपने को गलत नहीं मान सकता, भले ही वह जान लेता है कि बुद्धि ने उचित निर्णय नहीं लिया, मन में सही विचार नहीं आया और कृत्य सही नहीं है, पर वह उसे किसी न किसी तरह सही सिद्ध करना चाहता है. इस प्रक्रिया में वह बंधन में बंध जाता है. अब यही अहंकार पीड़ित होकर मुक्ति के उपाय खोजता है. जब तक मन वर्तमान में नहीं होगा, बुद्धि सतर्क नहीं होगी, कर्म सही नहीं हो सकते. वर्तमान के क्षण में अहंकार को टिकने के लिए कोई जगह नहीं है, सजग बुद्धि को भी किसी की अनुशंसा नहीं चाहिए, यानि अहंकार की दाल वहाँ भी नहीं गलती, कर्म जब शुद्ध होते हैं तो उनसे किसी फल की आशा नहीं रहती, क्योंकि कर्म करते समय ही सुख का अनुभव होता है. कर्तापन के मिटते ही मुक्ति का अनुभव होता है.

Wednesday, April 11, 2018

जिस पल जानेगा मन खुद को


११ अप्रैल २०१८
देह और मन को जोड़कर रखने वाली शक्ति ही प्राण है. प्राणायाम के द्वारा इस बन्धन को ढीला किया जाता है. देह रूपी धरती के इर्दगिर्द घूमता हुआ चन्द्रमा रूपी मन तब स्वयं का अनुभव करता है. उसे पहली बार आत्मा रूपी सूर्य का बोध होता है और यह ज्ञान होता है, उसका सारा प्रकाश तो सूर्य से ही आता है, वह स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता. देह के प्रति आसक्ति को त्याग वह आत्मा की परिक्रमा करने लगता है. किन्तु मन का स्वभाव उसे बार-बार देह की तरफ ले जाता है, पूर्व के संस्कार इतनी जल्दी नहीं मिटते इसलिए प्रतिदिन का अभ्यास आवश्यक है. जगत के प्रति सारा आकर्षण देह से ही आरम्भ होता है, वैराग्य का अर्थ यही है कि मन स्वयं को आत्मा से जुड़ा हुआ माने, जिसे सुख के लिए किसी पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं है. मृत्यु के समय पहली बार देहातीत अवस्था का अनुभव होता है. राजा जनक को विदेह इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने देहभाव से मुक्ति का अनुभव जीतेजी कर लिया था.

Thursday, January 5, 2017

चेतन अमल सहज सुख राशि

५ जनवरी २०१७ 
अध्यात्म हमें सिखाता है कि देह से परे चेतना का एक स्वतंत्र अस्तित्त्व है और वह अपने आप में सम्पूर्ण है. संसार हमें शरीर को रखने में सहायक हो सकता है पर अखंड आनंद का अनुभव नहीं करा सकता, उसे पाने का रास्ता अध्यात्म ने बताया है. जिसके द्वारा मानव सारे भयों से मुक्त हो सकता है, व्यर्थ के कार्यों से बच सकता है, अपनी ऊर्जा का पूरा सदुपयोग कर सकता है. अपने आस-पास के वातावरण को सुखमय तथा सुंदर बनाने में मदद कर सकता है. भीतर की शक्ति का अनुभव कराके वह दिव्यता को प्राप्त करा सकता है. जड़ अनित्य है, वह प्रतिक्षण बदल रहा है, चेतन अविनाशी है. उसे पाने का प्रयास नहीं करना पड़ता. जड़ से दृष्टि हटते ही वह स्वयं प्रकट हो जाता है. सारे क्लेशों से मुक्ति का नाम ही चेतना में स्थित होना है.