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Sunday, August 16, 2026

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

आज यह विचार करने की बहुत ज़रूरत है कि वास्तव में स्वाधीनता क्या है? क्या राजनीतिक रूप से स्वाधीन देश में निवास करने मात्र से हम स्वयं को स्वाधीन मान सकते हैं ? जब तक हम मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं होते, स्वाधीनता भ्रम ही बनी रहती है। किसी का मन यदि भय से ग्रस्त है, दूसरों से तुलना करता है, सदा कुछ न कुछ पाने की फ़िराक़ में लगा रहता है, तो वह मन परतंत्र ही कहा जायेगा। जब हम भीतर अतृप्त बने रहते हैं, जीवन की दौड़ में स्वयं को पिछड़ गया मानते हैं, तो हम उस मानसिकता के ग़ुलाम हैं, जो जीवन को एक संघर्ष में बदल देती है। जीवन एक कला है, कोई युद्ध नहीं। जिस भी परिस्थिति में किसी को रखा गया है, वह उसके विकास के लिए कोई न कोई रास्ता अवश्य दिखाती है। किंतु जो मन मुक्त नहीं है, वह इस खुले द्वार को देख ही नहीं सकता। जीवन हमारे चारों ओर हवा और धूप की तरह बिखरा है, लेकिन हम उसकी ओर नज़र नहीं उठाते। जीवन ऊर्जा श्वासों के रूप में दिन-प्रतिदिन क्षीण हो रही है, उसकी भरपाई के रूप में हमारे ऋषियों ने ध्यान-प्राणायाम की अद्भुत विद्या सिखायी है। जिसके द्वारा हम जीवन के स्रोत से जुड़ सकते हैं और स्वयं के भीतर मुक्ति का द्वार पा सकते हैं। मृत्यु यदि जीवन का अंत है तो जीवन, मृत्यु का भी अंत हुआ। इस रहस्य को भगवद् गीता में कृष्ण कहते हैं। आत्मा शाश्वत है, आत्मा ही वह जीवन है जो मृत्यु का अंत है। ध्यान में हम उसी आत्मा का अनुभव करते हैं, वहीं सच्ची मुक्ति का अहसास होता है। वहाँ कोई दूसरा नहीं है, इसलिए भय, तुलना, आगे-पीछे, छोटा-बड़ा भी कुछ नहीं है। वहाँ हर व्यक्ति स्वतंत्र है, तब स्वयं पर शासन करने की विधि ज्ञात होती है। हमारे शास्त्र हमें इसी मोक्ष की याद बार-बार दिलाते हैं। 

Tuesday, January 3, 2023

मुक्ति की जो करे कामना

सुख यानि शुभ आकाश, अपने आसपास का वातावरण जब सकारात्मक तरंगे लिए हुए हो, उसमें कोई विकार न हो। किंतु जहाँ शुभ है, वहाँ अशुभ भी हो सकता है, चाहे उस समय प्रकट नहीं हो रहा। जहाँ सकरात्मकता है, वहीं नकारात्मकता भी छिपी है। इसलिए सुख की कामना का त्याग ही मुक्ति है। इस वर्ष हमारा मूलमंत्र सुख के स्थान पर मुक्ति होना चाहिए। मुक्ति का अर्थ है, पूर्ण स्वतंत्रता, दो के द्वन्द्व  से पूरी आज़ादी ! अब न सुख की तलाश है न शुभ-अशुभ का भय ! मुक्ति का अर्थ है मन के पूर्वाग्रहों, धारणाओं, कल्पनाओं, आशंकाओं से मुक्ति ! एक ऐसे स्थान में रहने की कला जहाँ पूर्ण रिक्तता है। जहाँ इस जगत का स्रोत है। जहाँ से आवश्यक ज्ञान सभी जीवों को प्राप्त होता है, क्योंकि वह ज्ञान का भी स्रोत है। आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी पाँच तत्व भी वहीं से उपजे हैं। मुक्ति की कामना हमारे शास्त्रों का मूल मंत्र है। मोक्ष की अवधारणा केवल भारत में ऋषियों द्वारा की गयी है, यह परम कामना है। इसका अर्थ है छोटे संकीर्ण मन की दासता से मुक्ति और विशाल मन के साथ एक होने की कला या विज्ञान; यह व्यक्ति को पूर्ण बनाती है।   


Sunday, April 18, 2021

'है' को जो मन स्वीकार करे

 जो ‘है’ उस हम चाहते नहीं. क्योंकि वह है ही, जो ‘नहीं’ है उसे हम चाहते हैं और वह चाह हमें अशुद्ध करती है। कोई भी इच्छा हमें अपने स्वरूप से नीचे लाती है। तो क्या हम इच्छा करना ही छोड़ दें, नहीं, यदि छोड़ना ही है तो देहाभिमान को छोड़ना होगा। हर इच्छा देह से आरंभ होती है। जीव भाव छोड़ना होगा, यश की इच्छा जीव से जुड़ी होती है। अहंकार को छोड़ना होगा, कर्ता भाव अहंकार से जुड़ा है। मोक्ष कुछ करके हासिल नहीं किया जा सकता। यह एक भावदशा का नाम है, ऐसी भाव दशा का, जिसमें मन पूर्णत: रिक्त होता है, भूत या भविष्य का कोई विचार उसे प्रभावित नहीं करता, कोई चाह उसे अशुद्ध नहीं करती। मन जो निपट वर्तमान में है और स्वयं के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहता, वह मुक्त ही है।  


Monday, September 7, 2020

शुभ पथ का जो भी राही है

 महाभारत  युद्ध के पश्चात युधिष्ठिर भीष्म पितामह से ज्ञान प्राप्त करने जाते हैं, जो शरीर शय्या पर लेटे हुए उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे. एक प्रश्न में उन्होंने मोक्ष प्राप्ति का उपाय पूछा. भीष्म जी बोले - जो मार्ग पूर्व की तरफ जाता है, वह पश्चिम की ओर नहीं जा सकता. इसी प्रकार मोक्ष का भी एक ही मार्ग है; सुनो, इस मार्ग के पथिक को चाहिए कि क्षमा से क्रोध का, संकल्प त्याग से कामनाओं का, सात्विक गुणों से अधिक निद्रा का, अप्रमाद से भय का, आत्मा के चिंतन से श्वास की अस्थिरता  का, धैर्य से द्वेष का नाश करे. शास्त्र और गुरु वचनों के द्वारा भ्रम, मोह और  संशय  रूप आवरण को हटाये. ज्ञान के अभ्यास से अपने लक्ष्य को विस्मृत न होने दे. रोगों का हितकारी, सुपाच्य और परिमित आहार से, लोभ और मोह का सन्तोष से तथा विषयों का एक तत्व के ध्यान से नाश करे. अधर्म को दया से, आशा को भविष्य चिंतन का त्याग करके, और अर्थ को आसक्ति के त्याग से जीते. वस्तुओं की अनित्यता का चिंतन करके मोह युक्त स्नेह का, योगाभ्यास से क्षुधा का, करुणा के द्वारा अभिमान का और सन्तोष से तृष्णा का त्याग करे. यही मोक्ष का शुद्ध और निर्मल मार्ग है. 


Thursday, September 7, 2017

जीवन का जो मर्म जान ले

८ सितम्बर २०१७ 
जीवन कितना पुराना है कोई नहीं बता सकता, वैज्ञानिकों को मानव के लाखों वर्ष पुराने जीवाष्म भी  मिले हैं. हम न जाने कितनी बार इस धरती पर आये हैं और भिन्न देहें धारण करके सुख-दुःख का भोग कर चुके हैं. शास्त्र कहते हैं यह देह हमें दो कारणों के लिए मिली है भोग और मोक्ष, पहला अनुभव तो हो चुका, जब तक दूसरा नहीं होगा, बार-बार देह लेकर आना होगा और मृत्यु को प्राप्त होना होगा. यदि त्याग पूर्वक भोग किया जाये तो मुक्ति का अनुभव इसी जन्म में हो सकता है. मानव जीवन के चार पुरुषार्थ भी यही कहते हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का कर्म कहता है कि धर्म पूर्वक प्राप्त किया गया अर्थ ही कामनाओं के त्याग का हेतु बनता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है. यदि धन अनीति से प्राप्त किया गया है वह कामनाओं को बढ़ाने वाला ही होगा. उस स्थिति में दुखों से मुक्ति सम्भव ही नहीं है. 

Wednesday, November 2, 2016

मुक्ति की जब जगे कामना

३ नवम्बर २०१६ 

परमात्मा ने मानव को परम स्वतन्त्रता भी दी है और साथ ही परम परतन्त्रता भी. हम आजाद हैं चाहे भला करें या बुरा करें. किन्तु अस्तित्त्व के नियम बड़े सूक्ष्म हैं, जो पल-पल पीछा किया करते हैं और हमारे हर कृत्य का फल हमें भोगना ही पड़ता है ! चाहे वह कर्म मानसिक हो वाचिक हो या शारीरिक हो. कर्म करने की हमें पूर्ण स्वतन्त्रता है पर फल पर हमारा कोई अधिकार नहीं, उसे हम तिल मात्र भी बदल नहीं सकते. कर्म के फल ही हमें बांधते हैं. कर्म का फल हमें दो रूप में मिलता है, एक तात्कालिक सुख या दुख के रूप में और दूसरा संस्कार के रूप में. संस्कार वश हम बार-बार वही कर्म किये चले जाते हैं जिनसे अतीत में दुःख भी पा चुके हैं. इस चक्रव्यूह से निकलने का नाम ही मोक्ष है.

Monday, August 4, 2014

मुक्ति का जब बोध रहे

जनवरी २००७ 
हर कामना की पूर्ति के बाद हम मोक्ष का अनुभव करते ही हैं तथा बोध तो आकाश की तरह हर जगह है. हर श्वास के साथ जैसे निश्वास है वैसे ही हर कर्म के पीछे उससे मुक्ति तो है ही, न हो तो जो सुख हमें कर्म से मिल रहा है वह दुःख में बदल जायेगा. छोटे-छोटे कार्यों में जब हम मुक्ति का अनुभव करते हैं तो एक दिन उस परम मुक्ति का भी अनुभव हो जाता है जिसे पाकर कुछ पाना शेष नहीं रहता. 

Wednesday, June 18, 2014

धर्म वही जो मुक्त करे

जून २००६ 
सद्गुरु कहते हैं, जो भीतर गया वह भी तर गया, अपने में शिफ्ट होकर ही कोई तर सकता है. मुक्ति का आनंद न तो गिफ्ट में मिलता है न ही किसी के द्वारा दी लिफ्ट में मिलता है, वह तो अपने में शिफ्ट होने पर मिलता है. जीवन में मुक्ति की साधना करनी है तभी हम स्वयं में आ सकते हैं, यानि पहले देहस्थ फिर मनस्थ और अंत में आत्मस्थ. अभी तो हमारा मन चौबीस घंटे बाहर ही भागता रहता है. यद्यपि हम जो भी करते हैं मुक्ति के लिए ही करते हैं पर उसका अंत बंधन में होता है. हमारा प्रेम भी बंधन हो जाता है और ज्ञान भी. स्वयं में गये बिना मोक्ष सम्भव नहीं है.                                                                                                                    

Monday, August 27, 2012

प्रेम गली अति सांकरी


जुलाई २००३ 
चींटी को अगर हिमालय जितना विशाल मिश्री का पहाड़  मिल जाये तो वह उसका कितना अनुभव कर सकती है? उसी तरह उस परमात्मा का बखान हमारी अल्प मति कितना कर सकती है.? वह अनंत है उसे जानने के लिए किये हमारे सारे प्रयत्न विफल हो जाते हैं. उसकी कृपा सदा ही बरस रही है, हमने अहंकार का छाता लगा लिया है जिसके कारण वह हमें छूती ही नहीं. पर जब उसकी कृपा को हम महसूस करते हैं, तब वह हमारे भीतर शक्ति देता है, मोक्ष की इच्छा को जन्म देता है. वह हमारे मन को हर लेता है, वह ज्ञान की कुंजी देता है. उसने हमें अपने समान बनाया है, हमारे भीतर ज्ञान, प्रेम और ऊर्जा का अनंत स्रोत उसने दिया है. नश्वर सम्बन्ध बनाकर हम उस भूले रहते हैं और जीवन समाप्त हो जाता है. रेत की दीवारों पर खड़ा यह जगत हमें सदा खुद से मिलने में बाधा बना रहता है. उसके और खुद के मिलने में कोई अंतर नहीं है. उसके घर का रास्ता खुद से होकर ही जाता है और जब वहाँ से साधक लौटता है तो दो नहीं होते, एक ही रहता है. 

Monday, July 30, 2012

खिला रहे भीतर इक सूरज


जून २००३ 
आदि शंकराचार्य ने प्रार्थना की थी कि उन्हें मोक्ष भी नहीं चाहिए, क्योंकि वे भक्ति को मोक्ष से बढ़कर मानते थे. भक्ति हमें जीते जी मोक्ष प्रदान करती है. भक्ति रूपी सूर्य जब भीतर के आकाश में खिलता है तो विकार अंधकार दूर होता है, ज्ञान कमल खिल जाता है. लेकिन यह सूर्य सदा खिला रहे पुनः हम मोह निशा में न सो जाएं इसके लिए सतत् प्रयास करना होता है. इस प्रयास में हम अकेले नहीं होते, सत्शास्त्रों का सँग, सदगुरु का प्रेम और सबसे बढ़कर हमारी आत्मा में स्थित परमात्मा की सद्प्रेरणा, सभी हमारे साथ हैं. हमारे भीतर अनंत प्रेम है वही रूप बदल-बदल कर काम, मोह तथा आसक्ति का रूप ले लेता है. जैसे शुद्ध आत्मा ही विकारी बुद्धि, चित्त व अहंकार का रूप ले लेती है. आकाश अपने आप में शुद्ध है अनंत है पर उस पर बादल छा जाते हैं तो उसका निज स्वरूप स्पष्ट नहीं होता. ऐसे ही प्रेम को हमें यदि उसके शुद्ध स्वरूप में जानना है तो काम, मोह और आसक्ति को मोड़ देना होगा, कामना भी उसी की, मोह भी उसी का, आसक्ति भी उसी में तो ये सभी प्रेम में बदल जाती हैं.