Monday, September 7, 2020

शुभ पथ का जो भी राही है

 महाभारत  युद्ध के पश्चात युधिष्ठिर भीष्म पितामह से ज्ञान प्राप्त करने जाते हैं, जो शरीर शय्या पर लेटे हुए उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे. एक प्रश्न में उन्होंने मोक्ष प्राप्ति का उपाय पूछा. भीष्म जी बोले - जो मार्ग पूर्व की तरफ जाता है, वह पश्चिम की ओर नहीं जा सकता. इसी प्रकार मोक्ष का भी एक ही मार्ग है; सुनो, इस मार्ग के पथिक को चाहिए कि क्षमा से क्रोध का, संकल्प त्याग से कामनाओं का, सात्विक गुणों से अधिक निद्रा का, अप्रमाद से भय का, आत्मा के चिंतन से श्वास की अस्थिरता  का, धैर्य से द्वेष का नाश करे. शास्त्र और गुरु वचनों के द्वारा भ्रम, मोह और  संशय  रूप आवरण को हटाये. ज्ञान के अभ्यास से अपने लक्ष्य को विस्मृत न होने दे. रोगों का हितकारी, सुपाच्य और परिमित आहार से, लोभ और मोह का सन्तोष से तथा विषयों का एक तत्व के ध्यान से नाश करे. अधर्म को दया से, आशा को भविष्य चिंतन का त्याग करके, और अर्थ को आसक्ति के त्याग से जीते. वस्तुओं की अनित्यता का चिंतन करके मोह युक्त स्नेह का, योगाभ्यास से क्षुधा का, करुणा के द्वारा अभिमान का और सन्तोष से तृष्णा का त्याग करे. यही मोक्ष का शुद्ध और निर्मल मार्ग है. 


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