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Thursday, July 8, 2021

करत करत अभ्यास ते

 हम प्रतिदिन अपने घर और आसपास की सफ़ाई करते हैं, वस्त्रों को स्वच्छ करते हैं किंतु गंदगी अपने आप ही आ जाती है। इसी तरह देह को स्वस्थ रखने और मन को प्रसन्न रखने का हमें अभ्यास करना होता है, मन में दुःख या चिंता अपने आप ही जाती है। यदि हमने साधना के द्वारा सुखी या संतुष्ट होने का अभ्यास नहीं किया तो मन स्वतः नकार की ओर जाता है। यदि मन में कामना है तो दुःख आने ही वाला है, यदि स्वयं में सुख लेने की कला सीख ली है तो कामनाएँ अपने आप ही सूखे पुष्पों की तरह झर जाती हैं। ज्ञान में स्थिर होने का अर्थ ही यही है कि हर परिस्थिति में मन की समता बनाए रखें। सुख में सुखी और दुःख में दुखी तो सभी होते हैं लेकिन जिसने अभ्यास किया है वही विचलित नहीं होता। 


Monday, May 10, 2021

सहज मिले जो सुख टिकता है

सन्त और शास्त्र बार-बार कहते हैं, जो सुख किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से हमें प्राप्त होता है, वह सीमित है तथा उसकी कीमत भी हमें चुकानी पड़ती है. हर सुख के पीछे उतनी ही मात्रा का दुःख छिपा है, जो देर-सबेर हमें सहन करना होगा. जो आज मित्र की तरह व्यवहार कर रहा है, वह कब क्रोध से भर जाये, कौन जानता है ? जो वस्तुएं आज हमारे पास हैं, जो व्यापार आज खड़ा किया है, उनके लिए कितना श्रम किया है. जो बगीचा आज बनाया है, उसको बनाते समय कितनी रातों की नींद गंवाई होगी. अब कुछ लोग जो यह बात समझते हैं, वे दुःख को दुःख नहीं मानते, सुख की प्राप्ति का एक साधन मानते हैं और हँसते-हँसते हर दुःख उठा लेते हैं, पर वे ये भूल जाते हैं जिसके लिए इतना श्रम कर रहे हैं वह सुख कितनी देर टिकेगा ? एक कीमती वस्तु या कोई आभूषण पाने के लिए श्रम किया पर जब मिल गया तो कुछ क्षण या कुछ दिन उसकी ख़ुशी मिली फिर तो वह तिजोरी में बन्द पड़ा है. उसकी सुध भी नहीं आती. यह सुख जो शर्तों पर टिका है, वह ऐसा ही होता है. आनंद जो बेशर्त है, वह असीम है. वह हमारा स्वभाव है, जब मन में कोई कामना न हो ऐसे किसी क्षण में वह सहज सुख भीतर ही भीतर रिसता है, पर हम उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते, हमारा ध्यान तो बाहरी संसार पर ही अटका रहता है. 

 

Monday, September 7, 2020

शुभ पथ का जो भी राही है

 महाभारत  युद्ध के पश्चात युधिष्ठिर भीष्म पितामह से ज्ञान प्राप्त करने जाते हैं, जो शरीर शय्या पर लेटे हुए उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे. एक प्रश्न में उन्होंने मोक्ष प्राप्ति का उपाय पूछा. भीष्म जी बोले - जो मार्ग पूर्व की तरफ जाता है, वह पश्चिम की ओर नहीं जा सकता. इसी प्रकार मोक्ष का भी एक ही मार्ग है; सुनो, इस मार्ग के पथिक को चाहिए कि क्षमा से क्रोध का, संकल्प त्याग से कामनाओं का, सात्विक गुणों से अधिक निद्रा का, अप्रमाद से भय का, आत्मा के चिंतन से श्वास की अस्थिरता  का, धैर्य से द्वेष का नाश करे. शास्त्र और गुरु वचनों के द्वारा भ्रम, मोह और  संशय  रूप आवरण को हटाये. ज्ञान के अभ्यास से अपने लक्ष्य को विस्मृत न होने दे. रोगों का हितकारी, सुपाच्य और परिमित आहार से, लोभ और मोह का सन्तोष से तथा विषयों का एक तत्व के ध्यान से नाश करे. अधर्म को दया से, आशा को भविष्य चिंतन का त्याग करके, और अर्थ को आसक्ति के त्याग से जीते. वस्तुओं की अनित्यता का चिंतन करके मोह युक्त स्नेह का, योगाभ्यास से क्षुधा का, करुणा के द्वारा अभिमान का और सन्तोष से तृष्णा का त्याग करे. यही मोक्ष का शुद्ध और निर्मल मार्ग है. 


Tuesday, August 18, 2020

स्व के भाव को जानेगा जो


योग और अध्यात्म का आश्रय लेकर ही हम देह और मन को स्वस्थ व प्रसन्न  रख सकते हैं. योग का अर्थ है जुड़ना, स्वंय  का इस सम्पूर्ण अस्तित्त्व के साथ जुड़ाव ही योग है. पतंजलि के अष्टांग योग की साधना के द्वारा इसे अनुभव किया जा सकता है, किन्तु ‘स्वयं’ का सही परिचय हमें अध्यात्म से प्राप्त होता है. शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का अध्ययन करके अपने स्व को पहचानना ही अध्यात्म है. देह एक निश्चित आयु पूर्ण करके मिट्टी में मिल जाने वाली है. मन अधूरी कामनाओं को लेकर एक नए शरीर में प्रवेश करने वाला है, किन्तु स्व अथवा निजता को जिसने जान लिया वह जन्म और मृत्यु के इस चक्र से बाहर हो जाता है. वह होश में मरता है और होश में ही नयी देह धारण करता है, ऐसे ही मानव जन्म से संत अथवा सिद्ध होते हैं. शास्त्र और संत कहते हैं मृत्यु से पहले जिसने अपने आपको जान लिया, उसने उस कार्य को सिद्ध कर लिया जिसके लिए उसे मानव देह मिली थी.  


Monday, June 1, 2020

भक्ति की जब जगे जिज्ञासा

आज से गुरूजी ने 'नारद भक्ति सूत्र' पर बोलना आरंभ किया है. उन्होंने कहा, जब जीवन में उत्कृष्टता की चाह जगती है, तब भक्ति के प्रति जिज्ञासा मन में जगती है. जिनके जीवन में भक्ति रस प्रकट हुआ है वही भक्ति के बारे में बता सकता है. नारद कहते हैं, भक्ति प्रेम स्वरूपा है, प्रेम के बिना इस जगत में कोई रह नहीं सकता. प्रेम से ही सब कुछ प्रकट होता है पर  प्रेम विकारों के बिना नहीं मिलता. भक्ति वह प्रेम है जो अविकारी है, वह अमृतस्वरूप है. प्रेम का लक्षण है शाश्वतता का अनुभव होना. ईश्वर को प्रेम करना भक्ति का प्रथम लक्षण है, जो दिखता नहीं उस अदृश्य से प्रेम करने पर तृप्ति का अनुभव होता है. समय की अनुभूति जब होती है तब हम अमरता का अनुभव नहीं करते. ईश्वर के प्रति प्रेम जगते ही भीतर एक शांत, प्रसन्न चेतना जगती है. भक्त के जीवन में द्वेष नहीं रहता, शोक नहीं रहता. ज्ञान मन के विकारों को दूर करता है पर ज्ञान के ऊपर है भक्ति. ज्ञान हमें पूर्णता का अनुभव नहीं कराता. भक्त अपने भीतर एक मस्ती का अनुभव करता है, स्तब्धता का अनुभव करता है. ज्ञान का उदय होता है और क्षय होता है पर भक्ति कभी कम नहीं होती जो नित वृद्धि को प्राप्त होती है. भक्त के हृदय में कोई कामना नहीं रहती, जिसकी सब कामनाएं नष्ट हो गयी हैं वही भक्ति को अनुभव कर सकता है. 

Wednesday, March 13, 2019

खाली होगा मन का घट जब



जैसे पैर में कोई काँटा लगा हो तो पीड़ा का अहसास दिलाता है, वैसे ही मन में जगी कोई भी कामना हमारे मन को व्यथित कर देती है. यदि हम उस पीड़ा से बचने के लिए कामना को पूरा कर लेते हैं  तो उस क्षण तो एक सुख का अहसास होता है पर संस्कार रूप में वह कामना मन में अपना अधिकार जमा लेती है. दुःख से बचने के लिए पुनः-पुनः उसे पूर्ण करते रहना होगा, किन्तु हर बार पहले से ज्यादा गहरा संस्कार मन पर चढ़ता जायेगा. व्यसन इसी तरह व्यक्ति को अपना शिकार बना लेते हैं. यदि हम उस कामना को पूर्ण नहीं करते और उस पीड़ा को समता भाव से सह लेते हैं तो उस संस्कार को मिटाने के लिए मानो हमने जल बहाया. पहली बार में वह संस्कार मिटने वाला नहीं  है किन्तु बार-बार मन को दृढ़ता से रोका तो एक दिन ऐसा अवश्य आएगा कि वह कामना नहीं जगेगी, जगी भी तो मन को पकड़ेगी नहीं.

Sunday, December 9, 2018

स्वयं में ही विश्रांति मिले जब


१० दिसम्बर २०१८ 
मन में कामना उठती है किसी न किसी अभाव का अनुभव करने के कारण. उस अभाव की पूर्ति के लिए हम कर्म में तत्पर होते हैं. कर्म का एक संस्कार भीतर पड़ता है और भविष्य में उसका निर्धारित फल भी मिलने ही वाला है. उदाहरण के लिए यदि हमारे भीतर कहीं जाने की कामना उत्पन्न हुई, इसका अर्थ है हम जहाँ हैं वहाँ कोई अभाव है, गन्तव्य पर जाकर हम पूर्णता का अनुभव करेंगे. यात्रा के दौरान कितने ही संस्कार मन पर पड़े और लक्ष्य पर पहुँच कर जिस प्रसन्नता का हमने अनुभव किया, उसे पुनः-पुनः अनुभव करने की नई कामना ने भीतर जन्म लिया. अब उस स्थान पर भी भीतर अभाव का अनुभव होगा, यही बंधन है. जीवन इसी चक्र का दूसरा नाम है, हम जिस कामना की पूर्ति के लिए इतना श्रम करते हैं, वह हमें पुनः वहीँ पहुँचा देती है, जहाँ से हम चले थे. क्या कोई ऐसा क्षण हो सकता है, जब भीतर कोई अभाव न हो, पूर्ण तृप्ति का अनुभव हो और हम पूर्ण स्वाधीनता का अनुभव करें. मन की धारा यदि बाहर से लौट आए और भीतर की तरफ यात्रा करे एक बिंदु पर आकर वह स्वयं में खो जाती है और जो शेष रहता है वही सहज विश्राम है, जिसमें कोई अभाव नहीं रहता.

Wednesday, August 15, 2018

मार्ग उसे जिस पल देंगे हम


१६ अगस्त २०१८ 
आत्मा रूप से परमात्मा हरेक के भीतर समान रूप से विद्यमान है. वह हमारे कर्मों द्वारा प्रकट होना चाहता है. संत उसे मार्ग दे देते हैं और हम उसके मार्ग में अड़ कर खड़े हो जाते हैं. हमारी कामनाएं उसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं, ध्यान की गहराई में जब मन खो जाता है, वही वह रह जाता है. प्रकृति उसे सहज रूप से अभिव्यक्त होने दे रही है, इसी लिए इतनी आकर्षक प्रतीत होती है. नन्हे पंछी और शावक भी उसी को अभिव्यक्त कर रहे हैं और सुकोमल फूल भी. मानव का मन यदि स्वच्छ पानी की तरह निर्मल और हर पात्र में ढल जाने वाला हो, नमनीय हो, तो परमात्मा उसमें से स्वयं को व्यक्त कर सकता है. हमारा स्वभाव यदि पर्वत की तरह कठोर है, झुकना ही नहीं जानता हो तो श्वास से भी सूक्ष्म परमात्मा उसमें से कैसे प्रकटेगा.

Monday, February 19, 2018

आ अब लौट चलें


१९ फरवरी २०१८ 
हमारा मन एक विशाल मन का अंश है, पर जैसे बहते हुए दरिया से जल का एक भाग अलग-थलग पड़ जाये और एक पोखर बना ले, तो सूखने लगता है, वैसे ही अलग हुआ यह मन बेचैन हो जाता है. जब तक हम उस विराट के साथ एकत्व का अनुभव नहीं कर लेते हमारी तलाश जारी रहती है. बुद्धि यदि मोहग्रस्त है, अविद्या से मुक्त नहीं हुई है, तो मन कामना और कल्पना से मुक्त नहीं हो पाता. सुख की कामना करते हुए वह स्वयं के कल्पना जाल में इस तरह उलझ जाता है कि सत्य से बहुत दूर निकल जाता है. सत्संग के प्रभाव से या ईश्वरीय कृपा से जब बुद्धि विवेक से युक्त होती है, तब मन अपने स्वरूप की ओर लौटने लगता है.

Tuesday, November 14, 2017

मिला सदा है सुख अंतर का

१४ नवम्बर २०१७ 
शास्त्रों में कहा गया है, वैराग्य में कौन सा सुख नहीं है. हमें वस्तुओं के ग्रहण में जितना सुख मिलता है, उतना ही दुःख एक न एक दिन उनका त्याग करने अथवा होने पर मिलेगा. यदि त्याग भाव से उन्हें ग्रहण किया जाये अर्थात उनकी कामना न करके सहज भाव से जो जीवन के लिए आवश्यक है उतना ही ग्रहण किया जाये तो भविष्य में मिलने वाले दुःख से बचा जा सकता है. आत्मा सहज ही सुखस्वरूप है, मन में कामना का जन्म हुआ उसके पूर्व तक मन शांत था. कामना की पूर्ति के लिए श्रम किया, भविष्य में इसके द्वारा जो फल मिलेगा उसकी स्मृति नहीं रही, और अल्पकाल का सुख पाने के बाद मन फिर शांत हो गया, अर्थात पूर्ववत स्थिति प्राप्त हो गयी. किन्तु जो संस्कार मन पर पड़ गया वह भविष्य में फिर कामना उत्पन्न करेगा और एक चक्र में ही जीवन घूमता रहेगा.

Tuesday, September 19, 2017

मन के जो भी पार हुआ है

२० सितम्बर २०१७ 
भगवद गीता में कहा गया है, मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र है और मन ही सबसे बड़ा शत्रु ! मन यदि धन, यश और पद की कामनाओं से युक्त है तो दुःख से उसे कोई नहीं बचा सकता. मन यदि अहंकार की तृप्ति करना चाहता है तो उसे कदम-कदम पर भय और दुःख का सामना करना पड़ेगा. जो मन स्वयं में ही तृप्त है, उसे न कोई भय है न ही पीड़ा. सात्विक भाव से युक्त मन सहज प्राप्त कर्मों को इसी भांति करता जाता है जैसे समय आने पर वृक्षों में फूल व फल लगते हैं. उसे न फल की इच्छा होती है न ही नाम की, वे तो उसी प्रकार प्राप्त होते हैं जैसे सुबह होने पर वातावरण में ताजगी और आह्लाद. जीवन के मर्म को जानना हो तो मन के पार जाना ही पड़ेगा, मन को हर दिन कुछ पलों के लिए विश्राम देने से वह मित्र बन जाता है. 

Thursday, May 18, 2017

जगे प्रार्थना ऐसी भीतर

१९ मई २०१७ 
जीवन सुखमय हो ऐसी कामना सभी करते हैं, हमारे अपनों के जीवन में सदा सुख, सम्पन्नता और स्वास्थ्य बना रहे, ऐसी भी प्रार्थना हम विशेष अवसरों पर करते हैं. इसी तरह हमें भी कितनी बार अन्यों ने सुख व स्वास्थ्य की कामनाएं भेजी हैं, भेजते ही रहते हैं,. क्या हमने कभी सोचा है इन सबका कितना बड़ा असर हमारे जीवन पर पड़ता है. दिल से निकली हुई प्रार्थना कभी भी बेअसर नहीं जाती, और ऊर्जा के नियम के अनुसार भीतर से निकली हुई हर सकारात्मक ऊर्जा लौट कर हमारे ही पास आती है. ऋषि जब 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' का गायन करते थे तो उसमें उनके हृदय की सच्ची भावना जुड़ी होती थी, जो जगत के कल्याण हेतु अपना काम करती थी,  वह छोटी सी प्रार्थना लौट कर उन्हें कितना आनन्द से न भर जाती होगी. कितना अच्छा हो यदि रोज सुबह हम अपने लिए तो प्रार्थना करें या न करें स्वजनों, मित्रों और नगर, राष्ट्र तथा सम्पूर्ण सृष्टि  के कल्याण की कामना से अपने दिन का आरम्भ करें.

Friday, May 22, 2015

अचल हुआ जो अपने भीतर

मार्च २००९ 
संसार की गति का कारण वह परमात्मा है जो गति नहीं करता. जब तक हमारी कोई मांग है तब तक हम अपने भीतर की स्थिरता को अनुभव नहीं कर सकते. संसार हमारे भीतर का प्रतिबिंब है. हमारे भीतर जो आकांक्षाओं का संसार है वही हमें अकम्प का भान नहीं होने देता. यह कामना यदि समझ में आ जाये तो पता चले कि वहाँ कुछ है ही नहीं ! भीतर टटोलें तो पता चलता है, जो भी है परमात्मा का है. जो आदि पूर्ण, मध्य पूर्ण तथा अंत पूर्ण है वह परमात्मा है. उसे जुड़कर ही हम पूर्ण हो जाते हैं. 

Monday, December 8, 2014

घूँघट के पट खोल रे

जून २००७ 
चंचल मन रोके नहीं रुकता और हम हेय को भी ग्रहण कर लेते हैं, उपादेय को छोड़ देते हैं, किन्तु जब मन यह जान लेता है कि अब उसकी दाल नहीं गलने वाली तो वह सारी कामनाओं का त्याग कर देता है. मन उसी क्षण खो जाता है, जब हम जाग जाते हैं. आत्मा का जन्म मन का अमन होना है. यूँ आत्मा सदा से ही थी पर मन का पर्दा पड़ा था. पर्दा हटा तो तो वह प्रकट हो जाती है.  जब हमें एक बार अपना पता चल जाता है तो मन का पर्दा रहने पर भी जब चाहे हम उसे हटा कर आत्मा के देश में प्रवेश कर सकते हैं.


Monday, August 18, 2014

ज्ञान की अग्नि जलाएं

जनवरी २००७ 
अनियंत्रित कामना के कारण ही क्रोध आता है. जो ज्ञानी हैं, उनका क्रोध पानी पर लकीर जैसा होता है, जो ज्ञान की साधना कर रहे हैं उनका क्रोध बालू पर लकीर जैसा, जो ज्ञान के इच्छुक हैं वे उतनी देर तक क्रोध में बने रहते हैं जितनी देर मिट्टी पर लकीर रहती है और जो अभी ज्ञान के पथ पर नहीं आये हैं, उनके हृदय में क्रोध उतनी देर तक बना रहता है जितनी देर लोहे पर लकीर. कामना विजातीय है, क्रोध भी विजातीय है, तभी हम उन्हें भीतर नहीं रख पाते, झट  प्रकट कर देते हैं. मनोजयी साधक प्रसन्नता को प्राप्त होता है, हर पल उसे आनन्द ही बना रहता है. साधक की कई बार परीक्षा भी होती है. उपलब्धि को यदि वह कृपा मानता है तो अभिमान से बचा रहता है. साधना का पहला सोपान है अंतःकरण की पवित्रता और अन्तिम सोपान है अंतःकरण की पवित्रता, यह साधना निरंतर चलती रहती है. मन जब निर्मल होता है तब ही उसमें समता आ पाती है, तब हर तरह की परिस्थिति में वह शांत रहता है. ज्ञान की अग्नि से कामना जल जाती है. 

Monday, August 4, 2014

मुक्ति का जब बोध रहे

जनवरी २००७ 
हर कामना की पूर्ति के बाद हम मोक्ष का अनुभव करते ही हैं तथा बोध तो आकाश की तरह हर जगह है. हर श्वास के साथ जैसे निश्वास है वैसे ही हर कर्म के पीछे उससे मुक्ति तो है ही, न हो तो जो सुख हमें कर्म से मिल रहा है वह दुःख में बदल जायेगा. छोटे-छोटे कार्यों में जब हम मुक्ति का अनुभव करते हैं तो एक दिन उस परम मुक्ति का भी अनुभव हो जाता है जिसे पाकर कुछ पाना शेष नहीं रहता. 

Friday, July 18, 2014

साक्षी भाव में जो टिक जाये

अक्तूबर २००६ 
देह बनी रहे इसके लिए भोजन चाहिए, क्षुधा आवश्यक है, पर कामना अनावश्यक है. क्षुधा मिट जाये तो संतोष होता है पर कामना मिटने से भी संतोष नहीं होता, क्योंकि मन अगले ही पल नई कामना गढ़ लेता है. मन जब तक अपने मूल को नहीं जान लेता वह ऐसा करता ही रहेगा. आत्मा को छोड़कर यहाँ सभी कुछ अस्थायी है. जो इस बात को जानकर मन में उठने वाली विचारों को सागर में उठने वाली लहरों की तरह साक्षी भाव से देखता है तो कामनाओं से मुक्त हो जाता है. वह इस जगत से अछूता ही निकल जाता है, मृत्यु भी इस मुक्तता को छीन नहीं सकती. 

Monday, May 12, 2014

मिल कर भी जो कभी न मिलता


संतजन कहते हैं, शिव तत्व सृष्टि के कण-कण में है, वह हमारे भीतर भी है, उसे जगाना ही वास्तविक पूजा है. जब मन में कामनाओं, वासनाओं तथा महत्वाकांक्षाओं का जाल न फैला हो, मन खाली हो तब वह शिव तत्व जो पहले से ही वहाँ है, प्रकट हो जाता है. हमारी शुद्ध चेतना उसी से बनी है. वह प्रेम है, सौन्दर्य है, कल्याणकारी है, अखंड है, निर्दोष है, शाश्वत है, निर्द्वन्द्व है, ज्ञान स्वरूप है. उस शिव तत्व को एक बार जान लेने के बाद उसका विस्मरण नहीं होता, उसके रहस्य धीरे-धीरे करके खुलते हैं लेकिन कभी पूरे नहीं होते. वह जान कर भी जाना नहीं जाता, वह अनुभव की वस्तु नहीं, शब्दों में नहीं आता, पर एक बार जिसे उसकी झलक भी मिल गयी वह स्वयं को तृप्त अनुभव करता है. पर यह तृप्ति उसकी प्यास को बढ़ाती है, जगत की प्यास को मिटा देती है. 

Friday, April 4, 2014

एक बूंद तेरी कृपा की जो बरसे

दिसम्बर २००५ 
परमात्मा की कृपा की एक झलक भी यदि मिल जाये तो भीतर एक उत्सव छाने लगता है. तब लगता है इस जगत में जिस क्षण भी जो भी हो रहा है, वही होना था. वही ठीक है, ऐसा ही लगता है, कोई शिकायत नहीं, जब कोई कामना ही नहीं तो शिकायत का प्रश्न ही पैदा नहीं होता. भीतर एक रस की धारा प्रकट होती है जिसने सब कुछ ढक लिया है, वही अब प्रमुख है. ईश्वर की अनुभूति की रस धार, वह निकट है, वही सुगंध बनकर समाया है, वही संगीत बनकर समाया है, वही प्रकाश बनकर और वही तरंग रूप में भीतर समाया है, वही अमृत बनकर भीतर रिस रहा है अनवरत...

Monday, March 10, 2014

एक वही तो शेष रहेगा

सितम्बर २००५
सद्गुरु कहते हैं, ईश्वर को मन तथा बुद्धि के द्वारा नहीं पाया जा सकता, उसकी कृपा जिस पर होती है, वह ही उसे जान पाता है. यह कृपा कुछ करके नहीं पायी जा सकती, जो शरण में आता है, पूर्ण समर्पित होता है, कृपा उसी पर बरसती है. शरणागति कोई कृत्य नहीं है यह एक भाव स्थिति है. जब साधक को कुछ और नहीं चाहिए केवल एक ही प्यास है, कुछ होने की चाह, कुछ पाने की चाह, कुछ देने की चाह ही हमें अकृत्रिम बनाती है. सभी तरह की कामनाओं से मुक्त होना ही समर्पण है. हम प्रयत्न द्वारा जो भी पाते हैं वह जगत का है और जब सारे प्रयत्न छूट जाते हैं, हम सहज होकर जीते हैं तो जो बचता है वही परमात्मा है. उसके अलावा जो कुछ भी हमारे पास है, वह छूट जाने वाला है, कुछ समय के लिए, खेलने के लिए मिला है.