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Monday, June 27, 2022

प्रेम गली अति सांकरी

प्रेम प्रदर्शन की वस्तु नहीं, यह तो दिल में सम्भाल कर रखने जैसा क़ीमती रत्न है। प्रेम पूँजी है। प्रेम एक बीज की तरह है जिसे कोमल भावनाओं से सिंचित मन की भूमि चाहिए, जिसमें क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा या स्वार्थ के खर-पतवार न उगे हों। जहाँ भक्ति की शीतल पवन बहती हो और ज्ञान का सूरज भी अपनी किरणें बिखेरता हो। ऐसे मन में ही  प्रेम का वृक्ष पनपता है जो स्वयं को और अपने इर्द गिर्द अन्यों को भी छाया देता है। हम प्रेम को पाकर इतराते हैं और उसे ही अभिमान में बदल देते हैं तो वह बीज सूखने लगता है। प्रेम ऐसा कोमल है जो भाषा की रुक्षता भी सह नहीं पाता, जो ओस की बूँद की तरह नाज़ुक है जो द्वेष की हल्की सी रेखा से भी मलिन हो जाता है। इस अनमोल वरदान को जो हमें जन्म से ही मिलता है, जगत की आपाधापी में गँवा न दें। मिथ्या कठोरता का आवरण ओढ़कर हम उसे बचाए रख सकते हैं, ऐसा हम सोचते हैं पर वह किसी के काम नहीं आएगा। पहले पश्चाताप के आंसुओं में उस आवरण को गलाना होगा,पत्थर जैसे हो गए हृदय को पिघलना होगा फिर उसमें अंकुर फूटेगा जो प्रेम की अनेक शाखा प्रशाखाओं को जन्म देगा जो हमें जीवन की धूप से बचाएँगी तथा औरों को भी विश्रांति देंगी।  


Sunday, October 10, 2021

उसको अपना माना जिसने


संत कहते हैं, जिसे अपने पता नहीं है उसे ही अभिमान, ममता, लोभ सताते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते. खुद को जानना ही जीवन जीने की कला है. हम  स्वयं के कण-कण से परिचित हों, मन और तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब कौन सा विकार मन में उठ रहा है इसके प्रति तो विशेष सजग रहें. आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से हम सभी ग्रसित हैं, जो क्रमशः मन, तन और धन के रोग हैं, इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन यदि समाहित रहे तो कोई दुःख नहीं बचता. क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे क्रोध छू भी नहीं पाता, भीतर एक ठोस आधार मिल जाता है, चट्टान की तरह दृढ़. तब कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसी को हमसे भयभीत होने की आवश्यकता रहती है. वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है. अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते ही सारे अज्ञान और अविद्या से पर्दा हट जाता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, सुख पाने हेतु नहीं ! मन सात्विक भावों को प्रश्रय देने का स्थल बन जाता है,  विकारों की आश्रय स्थली नहीं. तन के रोग हों या मन की पीड़ा सभी का अंत उसका आश्रय लेने पर हो जाता है. सद्गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, वे उनके सच्चे स्वरूप के दर्शन कराते हैं, उसके बाद तो वह सांवला सलोना स्वयं ही आकर हाथ थाम लेता है, उसको एक बार अपने मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग होने नहीं देता !


Thursday, July 2, 2020

खोने को जो होगा राजी

जब हम उसे ढूँढते हैं तो वह हमें नहीं मिलता. पर जब उसे ढूँढते-ढूँढते खो जाते हैं तो वह हमें ढूँढता है. परमात्मा के मार्ग की रीत बिल्कुल उलटी है यहाँ मिलता उसी को है जो छोड़ने को तैयार हो. हमें तो बस उसे याद करते जाना है. हमारी हर श्वास पर उसका अधिकार है, क्योंकि हमारा अस्तित्त्व ही उसपर टिका है. हमारे पास अभिमान करने जैसा कुछ है तो यही कि हमने मानव जन्म पाया है और सत्संग के द्वारा सत्य के प्रति आस्था मन में जगी है. अब इस आस्था को पोषित करना है या छोटी-छोटी बातों में उड़ा देना है इसका निर्णय हमें करना है. इस काल को सार्थक करना या इसे व्यर्थ बिता देना हमारे अपने हाथ में है.

Monday, August 18, 2014

ज्ञान की अग्नि जलाएं

जनवरी २००७ 
अनियंत्रित कामना के कारण ही क्रोध आता है. जो ज्ञानी हैं, उनका क्रोध पानी पर लकीर जैसा होता है, जो ज्ञान की साधना कर रहे हैं उनका क्रोध बालू पर लकीर जैसा, जो ज्ञान के इच्छुक हैं वे उतनी देर तक क्रोध में बने रहते हैं जितनी देर मिट्टी पर लकीर रहती है और जो अभी ज्ञान के पथ पर नहीं आये हैं, उनके हृदय में क्रोध उतनी देर तक बना रहता है जितनी देर लोहे पर लकीर. कामना विजातीय है, क्रोध भी विजातीय है, तभी हम उन्हें भीतर नहीं रख पाते, झट  प्रकट कर देते हैं. मनोजयी साधक प्रसन्नता को प्राप्त होता है, हर पल उसे आनन्द ही बना रहता है. साधक की कई बार परीक्षा भी होती है. उपलब्धि को यदि वह कृपा मानता है तो अभिमान से बचा रहता है. साधना का पहला सोपान है अंतःकरण की पवित्रता और अन्तिम सोपान है अंतःकरण की पवित्रता, यह साधना निरंतर चलती रहती है. मन जब निर्मल होता है तब ही उसमें समता आ पाती है, तब हर तरह की परिस्थिति में वह शांत रहता है. ज्ञान की अग्नि से कामना जल जाती है. 

Saturday, August 16, 2014

कर्ता है जो वही भोक्ता

जनवरी २००७ 
उपवास, जप, तप, ध्यान, भक्ति आदि शुभ क्रियाएं हैं किन्तु इन्हें करते समय मन का भाव कैसा है इसका भी ध्यान रखना होगा, यदि मन में अभिमान जगता है तो फल विपरीत हो जाता है. क्रियाएं स्थूल हैं और उनके करने से प्रशंसा के रूप में उसका स्थूल फल तो हमें मिल ही जाता है. प्रशंसा से हम अभिमानी हो जाते हैं और शुभ कर्म पुण्य नहीं देता. शुभ कर्म तो हमारे पूर्व के कर्मों के फल रूप में हमें प्राप्त होते हैं, किन्तु कर्ता होकर यदि हम ध्यान आदि करते हैं तो यह कर्म बंधन कारी है. कर्मों की निर्जरा अर्थात कर्मों की समाप्ति धार्मिक कृत्यों से नहीं होती है. आत्मा में स्थित रहकर जो स्वयं को कर्ता नहीं मानता है, कर्म तो उसके ही कटते हैं. क्रोध, मान, माया, लोभ, अहंकार का यदि लेशमात्र भी रहे तो हम नीचे ही जाते हैं. 

Sunday, March 16, 2014

बुरा जो देखन मैं चला

अक्तूबर २००५ 
भीतर प्रेम भरा हो तो सारा जगत ही प्रेममय लगता है, कितना सच कहते हैं शास्त्र और संतजन, हमारे भीतर ही वह प्रेम का खजाना है, शांति और आनन्द का खजाना है. हमारे हाथ जब उसकी चाबी लग जाती है तो जीवन धन्य हो जाता है. उस चाबी की तलाश में ही कोई लग जाये तो उसका जीवन अर्थवान हो जाता है, हमें संतजन ही बताते हैं कि वह चाबी कहाँ मिलेगी, कैसे मिलेगी ? लेकिन उसे खोजने की इच्छा हमारे भीतर जगे ऐसी परिस्थितियाँ ईश्वर हमारे जीवन में उत्पन्न करते हैं. ईश्वर और संतजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए हमें विनम्रता के साथ ज्ञान को धारण करना होगा. अन्यों के दोष देखने लगे तो हमारा अभिमान रूपी दोष ही दिखाई देता है. ईश्वर हमें इन सारे दोषों से बचाना चाहता है इसलिए वह हमें वे दोष दिखाता है न कि स्वयं को विशिष्ट समझने के लिए. प्रभु कितना दयालु है !  

Sunday, March 17, 2013

कबिरा गरब न कीजिये


मई २००४ 
यदि कोई समर्थ होकर भी अभिमानी नहीं है तो उसके जीवन में सद्गुरु है अथवा उसे ईश्वर की कृपा प्राप्त है. उसके आस-पास एक पवित्र वातावरण बन जाता है, उसके भीतर कोई आक्रामकता नहीं रहती, वह शांत, सौम्य और द्वेष रहित होता है. इस जगत में हर क्षण हजारों जीवन जन्मते और मरते हैं, बहुत कुछ बनता व बिगड़ता है, लेकिन ईश्वर उससे प्रभावित नहीं होता, प्रकृति से जो बना है वह नष्ट होने ही वाला है, यह प्रकृति का नियम है, पर पुरुष उससे अलग है, हमारा तन-मन प्रकृति से बना है पर हम परम से बने हैं, हमारे भीतर एक केन्द्र है जो इतने सारे तूफानों के बीच भी अडोल रहता है, जो देखने वाला है, उसके साथ पहचान करना ही सारी साधना का लक्ष्य है, उसके साथ पहचान होते ही अभिमान विदा हो जाता है. तब किसका अभिमान करें जो बदलना वाला है, स्थिर नहीं है उसका कैसे करें और जो सदा एक सा है वह तो स्वयं परमात्मा का अंश है, उसमें हमारा क्या ? सभी के भीतर एक ही चेतन शक्ति है, जो ज्ञानमयी, आनन्दमयी तथा शांतिमयी है.

Saturday, February 23, 2013

बिन फेरे हम तेरे



हम ईश्वर के हैं जब इस भाव में हम स्थिर हो जाते हैं तो अभिमान से दूर हो जाते हैं, सभी का आदर करते हैं. जब हम स्वयं को संसार का समझते हैं तो अभिमान से भर जाते हैं. ईश्वर की दुनिया में दिखावे का कोई स्थान नहीं, अत कपट भी वहाँ नहीं होता. वहाँ कोई दूसरा नहीं सो अभिमान किसे दिखायेंगे, वहाँ केवल प्रेम का ही जोर चलता है, क्योंकि प्रेम अपने आप में ही पूर्ण है, उसे कोई पात्र भी न मिले तो स्वयं को ही तृप्त करता है और स्वयं ही आनन्दित होता है. संसार में हम जितने के अधिकारी हैं उतना ही हमें मिलता है पर कृपा असीम है, हम उसे समेट ही नहीं पाते, संसार में हम सागर के किनारे बैठकर भी प्यासे रह जाते हैं, जीवन का एक-एक क्षण कितना कीमती है, इसकी प्रवाह किये बिना हम व्यर्थ ही संसार के पीछे दौड़ते रहते हैं. परम हर ओर से हमें घेरे है, उसकी तरफ आँख उठाकर देखते ही भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है.

Monday, February 18, 2013

मुक्त गगन आवाज दे रहा


अप्रैल २००४ 
हमारे भीतर चेतना के विभिन्न स्तर हैं, जब हम चेतना के उच्चतम स्तर पर होते हैं तभी हम मुक्त हो सकते हैं. धीरे-धीरे हम सोपान चढ़ते हैं. जब हमारा शिवत्व दब जाता है तो हम पुनः नीचे आ जाते हैं, और शिवत्व तब दबता है जब हम कपट आरम्भ करते हैं, साधारण लाभ के लिए जब हम असत्य आचरण करते हैं. भक्ति में जब दंभ न रहे, ज्ञान का अभिमान न रहे श्रद्धा अटूट हो तभी मन एकाग्र होगा और एकाग्र मन ही इतर लाभ की चिंता नहीं करता. उसके भीतर कोई द्वार खुल जाता है, जहां से कोई उसे आवाज देता है. तब निपट निरालों की तरह उसकी अपनी एक दुनिया होती है. जहां प्रेम, शांति, आनंद का साम्राज्य है. संसार उसे बार-बार नीचे बुलाता है पर जिसने उसका हाथ पकड़ लिय वह कब तक बंधा रहेगा, वह तो मुक्त गगन का वासी बन ही जाता है.

Wednesday, September 12, 2012

झर जाता है फूल यहाँ ज्यों


अगस्त २००३ 
ईश्वर का एक नाम काल भी है, काल अर्थात मृत्यु जो सभी के लिए तय है, यदि हम मृत्यु का स्मरण सदा हृदय में बनाये रखें तो कभी अभिमान के शिकार नहीं हो सकते. संसार में वैसे ही यदि कोई रहे जैसे फूल रहता है, जब तक डाली पर है, जगत को देता है  फिर चुपचाप झर जाता है, हम भी जब तक यहाँ हैं, जगत को कुछ न कुछ दें फिर जब जाने का समय आए तो शांत भाव से चले जाएँ, क्योकि जाना भी तो वहीं है जहां से हम आए हैं. जीवन मौन से ही शुरू होता है और मौन में ही समाप्त होता है, मौन इसलिए अतिशय प्रिय है, सन्नाटे और शांति में सुकून मिलता है, जैसे कोई मौन में भी बात कर रहा हो. बाहर का शोर भीतर हलचल मचा देता है, जैसे भीतर का शोर बाहर की अशांति का कारण भी होता है. भीतर का मौन बाहर की व्यवस्था का कारण भी होता है. हमें शांति का अनुभव करना हो तो भीतर के मौन में उतरना ही होगा, वहीं से संगीत फूटता है और वहीं से शब्दों का जन्म होता है, बाहर जो विविधता प्रतीत होती है वह ऊपर-ऊपर ही है, गहरे में सब एक है, वह एक ही संतों का आराध्य है, वह एक परब्रह्म जो इस समस्त मायाजाल के पीछे है. वह अटूट मौन में ही है, वहाँ कोई चतुराई काम नहीं आती. 

Wednesday, July 4, 2012

जल में घट, घट में जल


हमारे भीतर अनंत सम्भावनाएं छुपी हैं. हम परमात्मा के अंश होने के कारण उसकी अपरिमित शक्ति के हकदार हैं. साधना उसी शक्ति को प्रकट करती है. आनंद, सहजता, प्रेम, वर्तमान में रहने का गुण, कालातीत होना, उत्साह आदि गुण हमें इस पथ पर सहायक हैं. अहंकार सबसे बड़ी बाधा और विनम्रता सबसे पहली आवश्यकता है. हमारे पास जो कुछ भी है वह उसी का है. अभी वह हमें अपने से पृथक दिखाई पड़ता है, हमें उसकी चाह होती है. वही सब कुछ है यह जानते हुए भी अपने गुणों व उपलब्धियों पर चाहे वे कितनी भी नगण्य क्यों न हों, अभिमान कर बैठते हैं. ध्यान में भी वही है जीवन में भी वही है. हम बीच में आये कहाँ से, वास्तव में हम खुद को ही खोजने में लगे हैं और जब हम हैं ही नहीं तो खोजें किसे ? कबीर ने ऐसे ही कभी कहा होगा- घडे में पानी, पानी में घड़ा.... वह हममें है हम उसमें हैं, फिर कौन किसे मिले और कौन किससे मान करे ....?


Thursday, February 16, 2012

मन लौट के भीतर आये


दिसम्बर २०१२ 
जिसे अपने आप का ज्ञान नहीं है, उसे ही अभिमान, ममता, लोभ, मोह आदि के कारण दुःख होते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित नहीं होते. हमारा अहं तभी तक है जब तक हम स्वयं को शरीर से भिन्न व मन से अलग नहीं देखते. ऐसा तभी संभव है जब हम स्वयं के कण-कण से परिचित हों, सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब क्या मन में उठ रहा है इसे जानते रहें. जब सजगता खो जाती है तब संसार मन पर अपना अधिकार जमा लेता है. जब सजग रहते हैं तब भीतर से एक रस की धार सदा बहती रहती है उसमें आप्लावित रहते हैं. मन बाहर भी जुड़ा हुआ है और भीतर भी बुद्धि से जुड़ा है. जब वह भीतर लौट आता है नमः हो जाता है.