प्रेम प्रदर्शन की वस्तु नहीं, यह तो दिल में सम्भाल कर रखने जैसा क़ीमती रत्न है। प्रेम पूँजी है। प्रेम एक बीज की तरह है जिसे कोमल भावनाओं से सिंचित मन की भूमि चाहिए, जिसमें क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा या स्वार्थ के खर-पतवार न उगे हों। जहाँ भक्ति की शीतल पवन बहती हो और ज्ञान का सूरज भी अपनी किरणें बिखेरता हो। ऐसे मन में ही प्रेम का वृक्ष पनपता है जो स्वयं को और अपने इर्द गिर्द अन्यों को भी छाया देता है। हम प्रेम को पाकर इतराते हैं और उसे ही अभिमान में बदल देते हैं तो वह बीज सूखने लगता है। प्रेम ऐसा कोमल है जो भाषा की रुक्षता भी सह नहीं पाता, जो ओस की बूँद की तरह नाज़ुक है जो द्वेष की हल्की सी रेखा से भी मलिन हो जाता है। इस अनमोल वरदान को जो हमें जन्म से ही मिलता है, जगत की आपाधापी में गँवा न दें। मिथ्या कठोरता का आवरण ओढ़कर हम उसे बचाए रख सकते हैं, ऐसा हम सोचते हैं पर वह किसी के काम नहीं आएगा। पहले पश्चाताप के आंसुओं में उस आवरण को गलाना होगा,पत्थर जैसे हो गए हृदय को पिघलना होगा फिर उसमें अंकुर फूटेगा जो प्रेम की अनेक शाखा प्रशाखाओं को जन्म देगा जो हमें जीवन की धूप से बचाएँगी तथा औरों को भी विश्रांति देंगी।
Monday, June 27, 2022
Sunday, October 10, 2021
उसको अपना माना जिसने
संत कहते हैं, जिसे अपने पता नहीं है उसे ही अभिमान, ममता, लोभ सताते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक हम अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते. खुद को जानना ही जीवन जीने की कला है. हम स्वयं के कण-कण से परिचित हों, मन और तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब कौन सा विकार मन में उठ रहा है इसके प्रति तो विशेष सजग रहें. आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से हम सभी ग्रसित हैं, जो क्रमशः मन, तन और धन के रोग हैं, इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन यदि समाहित रहे तो कोई दुःख नहीं बचता. क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे क्रोध छू भी नहीं पाता, भीतर एक ठोस आधार मिल जाता है, चट्टान की तरह दृढ़. तब कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसी को हमसे भयभीत होने की आवश्यकता रहती है. वास्तविक जीवन तभी शुरू होता है. अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते ही सारे अज्ञान और अविद्या से पर्दा हट जाता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, सुख पाने हेतु नहीं ! मन सात्विक भावों को प्रश्रय देने का स्थल बन जाता है, विकारों की आश्रय स्थली नहीं. तन के रोग हों या मन की पीड़ा सभी का अंत उसका आश्रय लेने पर हो जाता है. सद्गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, वे उनके सच्चे स्वरूप के दर्शन कराते हैं, उसके बाद तो वह सांवला सलोना स्वयं ही आकर हाथ थाम लेता है, उसको एक बार अपने मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग होने नहीं देता !