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Thursday, April 20, 2023

सच की राह चले जो धीर

श्वास एक भी व्यर्थ न जाये, काम किसी के आये, 

गुरु की वाणी है अनमोल, पग-पग राह दिखाए ! 

समय तब व्यर्थ जाता है जब हम दुनियादारी में फँसकर अपने सच्चे  स्वरूप की स्मृति को भुला देते हैं।सही-ग़लत में भेद करना छोड़ देते हैं। समाज में चल रहे ग़लत रीति-रिवाजों को सही न मानते हुए भी उनमें अपना मूक समर्थन देते रहते हैं। किसी न किसी को खुश करने के लिए ऐसी बातें भी मान लेते हैं, जिनके प्रति हमारा ह्रदय गवाही नहीं देता। हम अन्याय का प्रतिकार नहीं करते, ताकि ऊपरी सुख-शांति बनी रहे, चाहे गहराई में असंतुष्टि बनी रहे। जीवन चाहता है हम प्रामाणिक बनें। सत्यवान हों, चाहे उसके लिए कितने ही विरोधों का सामना क्यों न करना पड़े।


Tuesday, July 7, 2020

श्वासों पर जो ध्यान टिकाये


हमारे जीवन में कुछ बातें बार-बार होती हैं, जिन बातों से हम बचना चाहते हैं वे ही नया-नया रूप लेकर आती हैं. यहाँ तक कि कभी-कभी हम स्वयं ही चौंक जाते हैं, ये वार्तालाप तो ऐसा का ऐसा पहले भी हुआ है. हमने सामने वाले की बात पर जिस तरह पहले प्रतिक्रिया की थी वैसी ही फिर करते हैं. जिस आदत को छोड़ने का मन बना लिया था वह पुनः पकड़ लेती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी पहुँच अचेतन मन तक नहीं है, चेतन मन से हम कोई प्रण लेते हैं पर उसकी खबर भीतर वाले मन को होती ही नहीं, वह तो अपने पुराने कार्यक्रम के अनुसार ही चलता रहता है. जीवन गोल-गोल एक चक्र में घूमता रहता है. यदि इस चक्र को तोड़ना है तो ध्यान ही सरल उपाय है. ध्यान में ही पुराने संस्कारों का दर्शन होता है और उनसे छुटकारा पाया जा सकता है. भगवान बुद्ध ने विपासना ध्यान की सरल विधि दी जिसमें स्वतः चलने वाली श्वासों के प्रति साधक को सजग रहना है. 

Thursday, July 2, 2020

खोने को जो होगा राजी

जब हम उसे ढूँढते हैं तो वह हमें नहीं मिलता. पर जब उसे ढूँढते-ढूँढते खो जाते हैं तो वह हमें ढूँढता है. परमात्मा के मार्ग की रीत बिल्कुल उलटी है यहाँ मिलता उसी को है जो छोड़ने को तैयार हो. हमें तो बस उसे याद करते जाना है. हमारी हर श्वास पर उसका अधिकार है, क्योंकि हमारा अस्तित्त्व ही उसपर टिका है. हमारे पास अभिमान करने जैसा कुछ है तो यही कि हमने मानव जन्म पाया है और सत्संग के द्वारा सत्य के प्रति आस्था मन में जगी है. अब इस आस्था को पोषित करना है या छोटी-छोटी बातों में उड़ा देना है इसका निर्णय हमें करना है. इस काल को सार्थक करना या इसे व्यर्थ बिता देना हमारे अपने हाथ में है.

Wednesday, April 8, 2020

साध सके जो मन का मौन


आज जबकि हम घरों में बंद हैं, एक कार्य जो हमारे शास्त्र, आचार्य और संत कहते आये हैं, बखूबी कर सकते हैं. वह कार्य है मौन की साधना. दिन भर में चाहे एक घन्टा ही सही, यदि हम पुरे मौन का पालन करें, तो अपनी बहुत सी ऊर्जा को बचा सकते हैं. उस एक घण्टे में हमें न केवल किसी अन्य से वार्तालाप नहीं करना है वरन अपने आप से भी नहीं करना है. जो मन सदा ही कुछ न कुछ योजना बनाता है अथवा पुरानी बात को सामने लाकर उस पर टीका-टिप्पणी करता है, उसे पूरा मौन करना सिखाना है. जो बात वह कई बार सोच चुका है, उसे जुगाली करने की उसकी आदत को तोड़ना है. किसी अप्रिय बात को स्मरण करके जो वह झुंझला जाता है, उसे भी छोड़ना है. वास्तव में अतीत में गया मन एक छाया के सिवा कुछ भी नहीं है, छाया को यदि मिटाना है तो प्रकाश की तरफ आना होगा, वर्तमान के प्रकाश में सारी छायाएं मिट जाती हैं. जो कहीं है ही नहीं हम उससे परेशानी खड़ी कर लेते हैं. जो अभी घटा ही नहीं उसकी आशंका मन जगाये तो फिर उसे वर्तमान में ले आना है और उसका सबसे सरल उपाय है, अपनी श्वास पर ध्यान देना. श्वास सदा वर्तमान में रहती है, वह परमात्मा से जोड़े रखने वाली डोरी है. डोरी भी ऐसी कि यदि श्वास एकतार हो जाये तो परमात्मा की सुवास उसमें से बहकर आने लगती है. शांति का एक बादल हमारे चारों ओर छाने लगता है. हाथ में आये इस समय में से नियमित मौन का अभ्यास करके हम आने वाले दिनों के लिए स्वयं को तैयार रख सकते हैं.  

Monday, February 6, 2017

सरल अति हो जीवन अपना

६ फरवरी २०१७ 
मानव के शरीर में हर क्षण कुछ न कुछ घट रहा है. श्वास का आना-जाना कितना सहज है पर इसके पीछे का विज्ञान कितना जटिल है. इसी तरह इस विशाल प्रकृति में पल-पल कितना कुछ घट रहा है, इसे जानना सबके वश में नहीं है पर इन सबके साथ एक मैत्री भाव का अनुभव करना, इन्हें अपना जानना हर किसी के हाथ में है. जीवन तब सरल हो जाता है, जब सारा संसार अपना घर लगता है, पर ऐसी स्थिति तक पहुंचने के लिए अपने  छोटे से  घर से ममता का त्याग करना होगा, अंतर को इतना विशाल बनाने के लिए लघु से मोह को तो छोड़ना ही होगा. अहंकार के लिए तब कोई काम नहीं बचेगा, क्योंकि अपना कहने जैसा तब कुछ भी नहीं होगा, सृष्टि जितनी अपनी है उतनी ही हर किसी की, सहजता और सरलता तब जीवन के सूत्र बन जायेंगे. 

Monday, October 17, 2016

श्वास श्वास में वही बसा

१८ अक्तूबर २०१६ 
सुबह से शाम तक हम जो भी करते हैं, यदि सचेत होकर करें तो कितनी ऊर्जा बचा सकते हैं. सजग होते ही हमारे मन में एक ठहराव आने लगता है, जो आवश्यक को सहेजता है और अनावश्यक को जाने देता है. यदि पुराने संस्कारों वश कुछ ऐसे कार्य भी हम करते हैं जिनसे बाद में  हानि ही होने वाली है तो धीरे-धीरे वे संस्कार भी खत्म होने लगते हैं. क्योंकि जानबूझकर कोई आग में हाथ नहीं डालता. भगवान बुद्ध तो हर श्वास के प्रति सजग रहने को कहते थे. ध्यान देने से श्वास की गति तेज रह ही नहीं सकती और श्वास यदि धीमी है तो विचारों की गति स्वत: ही धीमी हो जाती है. 

Saturday, August 30, 2014

पाना तो उसका ही है

फरवरी २००७ 
श्वास रुक जाएगी चलते चलते, शमा बुझ जाएगी जलते-जलते” भक्त जानता है, आज सेवा का अवसर मिला है कल जाने मिले या न मिले और मिले भी तो हम रहें या न रहें यह भी नहीं जानते. जब हम अपनी भावनाओं को कोमल और मृदु बना लेते हैं तो हम सहज रह सकते हैं. जिसके भीतर धैर्य रूपी रत्न और शौर्य रूपी आभूषण है वह इस जगत को और सुंदर बना सकता है. यह सारी सृष्टि उसी एक का रूप है, सभी प्राणी उसी के अंश हैं. हानि-लाभ की बात तब रहती ही नहीं, सर्वोच्च लाभ तो भक्त पहले ही पा चुका होता है  


Monday, August 4, 2014

मुक्ति का जब बोध रहे

जनवरी २००७ 
हर कामना की पूर्ति के बाद हम मोक्ष का अनुभव करते ही हैं तथा बोध तो आकाश की तरह हर जगह है. हर श्वास के साथ जैसे निश्वास है वैसे ही हर कर्म के पीछे उससे मुक्ति तो है ही, न हो तो जो सुख हमें कर्म से मिल रहा है वह दुःख में बदल जायेगा. छोटे-छोटे कार्यों में जब हम मुक्ति का अनुभव करते हैं तो एक दिन उस परम मुक्ति का भी अनुभव हो जाता है जिसे पाकर कुछ पाना शेष नहीं रहता. 

Tuesday, April 29, 2014

मोती सी अनमोल हैं सांसें

जनवरी २००६ 
अब न सम्भले तो रोना पड़ेगा...नर्क में गर्क होना पड़ेगा. जन्म हीरा गंवाने के काबिल नहीं है, साँस का अनमोल मोती लुटाने के काबिल नहीं है...न जाने कितनी बार ये वचन हम सुनते, पढ़ते हैं, पर इनका वास्तविक अर्थ तभी समझ में आता है जब पहली बार गुरू कृपा से भीतर उस परमात्मा की झलक मिलती है, और तब साधक की यात्रा आरम्भ होती है. उस झलक को पुनः पाने के लिए वह अपने भीतर जाता है, साधना करता है. उसे सदा यह लगता है जो प्रेम उसे अपने भीतर अनुभव हो रहा है, वह वास्तविक तो है. क्या विकार नष्ट हो रहे हैं, अहंकार घट रहा है, क्रोध, लोभ, मोह मान से ऊपर उठ रहा है या नहीं, वाणी का अपराध तो नहीं होता, प्रेम का पौधा जो अपने अंतर में पनप रहा है उस पर कांटे तो नहीं हैं, अभिमान के कांटे. पल-पल भीतर की खबर रखता हुआ वह फंक-फूंक कर कदम रखता है, अभी परमात्मा को जन्मने में समय है, समय नाजुक है, उसे उस माँ की तरह सजग होना है जो गर्भ में पल रहे अपने शिशु की रक्षा करती है.   

Monday, October 14, 2013

सांसों की माला में

मार्च २००५ 
‘ईश्वर को उसकी कृपा के बिना नहीं पाया जा सकता’. ध्यान में जब हम श्वास को देखते हैं, देखते-देखते वह सूक्ष्म हो जाती है, सूक्ष्मतर होती जाती है, उसे देखने वाला मन भी सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता जाता है. नासिका के अग्रभाग पर आती-जाती हुई श्वास एक पतले धागे की तरह प्रतीत होती है, बहुत सूक्ष्म धागे की नाईं वह भीतर वह बाहर आती जाती है.  मन में कोई विचार उठा तो श्वास पर उसका प्रभाव होता है. अप्रिय विचार हो तो ऊष्मा का, गर्मी का, जलन का अहसास होता है, सुखद विचार हो तो ठंडक या सुख का अहसास होता है. मन में उठने वाले विचारों के साथ-साथ श्वास की गति भी बदल जाती है. वह सम नहीं रह जाती, कभी तेज हो जाती है, कभी कठोर हो जाती है. मन पर कोई आघात होते ही उसका पहला भाग सजग हो जाता है, दूसरा भाग यह जानना चाहता है कि यह क्या है, तीसरा भाग उसके प्रति राग-द्वेष जगाता है, चौथा भाग उस राग-द्वेष के प्रति संवेदना जगाता है. हम देखते हैं कि देह में कुछ भी स्थूल नहीं है सब कुछ तरंग मय है, मन के विचार भी आते हैं और नष्ट हो जाते हैं. यदि पहले कदम पर ही हम सजग हो जाएँ कि जो भी सूचना बाहर से मिली है, उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करनी है तो हम दुखों से सदा के लिए बच सकते हैं.


Saturday, September 21, 2013

मोह मिटाए रहें मगन

मार्च २००५ 
विपशना ध्यान बहुत सरल है. श्वासों को आते-जाते देखना, फिर धीरे-धीरे देह में होने वाले ऊर्जा प्रवाह को देखना. तरंगो को उत्पन्न होते फिर नष्ट होते देखना. कोई विचार उठा नहीं कि  भीतर उसके सापेक्ष कोई संवेदना जगी. कोई दुखद बात सुनी कि भीतर एक विषैला प्रवाह दुःख का दौड़ने लगता है, जैसे ही पता चला वह खबर असत्य थी, परिवर्तन होने लगता है लेकिन उस विष का प्रभाव तो देह को झेलना ही पड़ा. हम यदि मोह छोड़कर जगत में रहें तो दुःख को टिकने की जगह ही न मिले. इन विकारों का जन्म हमारे ही भीतर होता है क्योंकि घटनाएँ तो हर क्षण संसार में हो रही हैं, हमें वही प्रभावित करती हैं जिनसे हम मोह से बंधे हैं.  यदि मन सुख-दुःख के प्रति निरपेक्ष रहे, प्रतिक्रिया न करे तो भीतर ऊर्जा व्यर्थ नहीं होगी. जो क्रोध हमें भीतर जलाता है वही हम बाहर अन्यों पर कर सकते हैं. हमारी चेतना सुप्त ही रहती है जब हम अहंकार वश जीवन में होने वाली घटनाओं का सूत्रधार बनना चाहते हैं. सभी कुछ घटित हो रहा है, हम साक्षी हैं.  

Sunday, July 21, 2013

शुभ संकल्प जगे हर अंतर

नवम्बर २००४ 
यदि हमें अपने परिवेश के प्रति सामंजस्य बनाये रखना है, अपने आस-पास के वातावरण को प्रेम की महक से भरना है, मन को समता में रखना है तो अपने स्वभाव को परखना होगा, उसे बदलने का संकल्प लेना होगा. संकल्प यदि गहरी श्वास के साथ लिया जाये तो अधिक प्रभावशाली हो जाता है. रात को सोने से पूर्व भी यदि कोई संकल्प लेकर सोयें तो वह अंतर में गुंजित होता रहता है. प्रेम, शांति, प्रसन्नता आदि ऐसे उपहार हैं जो बाटंने से ही मिलते हैं. सद्गुरु के प्रति अपार प्रेम का अनुभव जब भीतर होता है तो मन, प्राण व अंतरतम तृप्त हो जाते हैं.

Wednesday, April 17, 2013

अंतर्मुखी सदा सुखी



हमारे जीवन का लक्ष्य सुख ही तो है, सुखी व्यक्ति अपने चारों और सुख ही बांटता है, संतुष्ट व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द संतोष का भाव फैलाता है और शांत व्यक्ति शांति. ये सभी हमें अंतर्मुखी होने से प्राप्त होते हैं. ध्यानस्थ व्यक्ति कामनाओं की आहूति देता है, कामनाएं जो अग्नि की तरह हैं, जिनकी पूर्ति होने पर वे और बढ़ती हैं, उन्हें त्याग कर ही शांति का अनुभव होता है. भीतर भी ऊर्जा का प्रवाह हो रहा है, सब कुछ गतिशील है, लेकिन इन सभी गतियों के परे ऐसा कुछ है जो अचल है, जो सदा है. हमारी श्वास के सहारे हम भीतर की यात्रा पर उतरते हैं, प्रकाश का एक बिंदु या धीमी सी गुंजन हमारा मार्ग प्रशस्त करती है, हम एक अनोखे आनंद का अनुभव करते हैं, एक ऐसा आनंद जो बाहर की दुनिया में भी हमें संतुलित करता है. भीतर का बल बाहर भी कम आता है. हम निरपेक्ष होकर जीना सीखते हैं, हमारी स्वयं की मांग शेष नहीं रहती. हम देना चाहते हैं, क्योंकि तब जगत फीका लगता है, वह उस सुख का पासंग भी नहीं दे सकता, जगत तो निरंतर बदलने वाला है, वह नश्वर है, जबकि हम सदा थे, और सदा रहेंगे. 

Thursday, March 14, 2013

बुद्धं शरणम गच्छामि


भगवान बुद्ध के चार आर्य सत्य हैं- “संसार में दुःख है, दुःख का कारण है, कारण का निवारण है, एक अवस्था ऐसी है जहाँ कोई दुःख नहीं है”. यदि कोई संवेदनशील है तो पहले सत्य का अनुभव कर  सकता है, दुःख का तो सबको पता है पर जिन बातों को हम सुख मानते हैं उनका अंत भी दुःख में होता है, यह वह स्पष्ट देख पाता है, क्योंकि संसार द्वन्द्व के नियम से ही चलता है. विपासना ध्यान में हम अपने भीतर उतरते हैं, शरीर को देखते हैं, श्वास-प्रश्वास को देखते हैं. देखते-देखते मन की सच्चाईयों को देखने लगते हैं. मन विकार जगाता है, फिर दुःख होता है, जब विकार को त्यागता है तब शांत हो जाता है. जहाँ से विकार जगते हैं यदि हम उस मूल तक पहुंच जाएँ, कौन है हमारे भीतर, जो विकार जगाता है, क्या वह सत्य है, क्योंकि आत्मा तो स्वयंपूर्ण है, उसे जगत से क्या चाहिए, सत्य वही है, तो जो असत है वही विकार जगाता है, भीतर जाकर पता चलता है, वास्तव में वह है ही नहीं, मात्र प्रतीत होता है. 

Friday, December 28, 2012

साध्य ही जब बनता साधन


दिसंबर २००३ 
हमारा प्राप्तव्य यदि ऊँचा होगा तो साधन भी उत्तम अपनाएंगे. साध्य और साधन जब एक हो जाते हैं, तब जीवन में समता आती है. हृदय जब समभाव में स्थित रहता है तब कर्मों के बंधन नहीं बंधते. लक्ष्य यदि विस्मृत हो गया तो जीवन में पुलक नहीं रहती, रंग नहीं रहता और ऐसा जीवन भारस्वरूप ही होता है खुद के लिए और अन्यों के लिए भी. मृत्यु का सामना करने की तैयारी यदि हमने नहीं की तो सिवाय पछताने के कुछ हाथ नहीं आयेगा. उस समय जो हमारे साथ जायेगी वह  हमारी चेतना होगी, प्रज्ञावान चेतना...प्रज्ञा तभी जगेगी जब जीवन में ध्यान होगा, मन स्थिर होगा, उसके लिए ज्ञान चाहिए, ज्ञान भक्ति के बिना नहीं टिकता. भक्ति तभी मिलेगी जब सुमिरन होता रहे औए सुमिरन तभी होगा जब परम ही हमारा लक्ष्य हो, उसे जानने व पाने की चाह भीतर उठे. मन रूपी चरखे में जब श्वास रूपी धागा काता जाता है, और उन श्वासों में उसके नाम की गूंज उठती है तब जो चादर बिनी जाती है वही प्रज्ञा है. तब अंतर में आनंद का स्रोत छलकता है, उस सोते में सारे शिकवे-शिकायतें, चाहते डूब जाती हैं, रह जाती है मात्र शीतलता और सहजता.

Monday, July 9, 2012

सजग रहना है श्वासोच्छवास के प्रति


श्वास के माध्यम से हम निरंतर आत्मा में स्थित रह सकते हैं, श्वास की माला सदा चल रही है, यदि हम उसके प्रति सचेत भर हो जायें तो वर्तमान में रहने लगते हैं. शांति, आनंद तथा प्रेम हमारे भीतर की गहराई में हैं ही, हृदयरूपी सागर से मथ कर हमें इन्हें ऊपर भर लाना है. वर्तमान सदा तृप्त है, वह काल के अनंत फैलाव में एक सा है, श्वास के प्रति सजग होते ही विचारों के प्रति सजगता बढ़ जाती है. विचार ही कर्म को जन्म देते हैं. अन्ततः श्वास ही मन का आधार है. श्वास ही ऊर्जा है.


Tuesday, May 15, 2012

जिन खोजा तीन पाइयाँ


मन के इस नगर में कहीं तो वह छुपा हुआ है, उसे खोजना है. बार-बार हमें उस पथ पर जानेके लिये उठना है, हम एक बार गिरे तो कहीं गिरते ही न चले जाएँ, यात्रा आसान नहीं है, मन जब उज्ज्वल होता है तभी रंग चढ़ता है. जहाँ-जहाँ वह अटके उसे लौटा लाना है, वह कहीं दूर नहीं है बस पर्दा उठाने भर की देर है. तब बुद्धि स्वतः उस शुद्ध स्वभाव में ठहरने लगती है. एक विचार उठा दूसरा अभी आने को है बीच का संधि काल उसी परमात्मा का शुद्ध ज्ञान है, उसी में टिकना है. श्वास को आते-जाते देखते समय भी मन ठहर जाये तो हृदय में ऋत उत्पन्न होता है.

Tuesday, August 9, 2011

सहज ध्यान

अगस्त २००१ 

यह जीवन जो हमें ईश्वर से उपहार स्वरूप मिला है, उसी का दिया है, वही इसे चलाता, पोषता और सम्भालता है. फिर भी हम कहते हैं उसके लिए हमारे पास समय नहीं है. सारा समय तो उसी का है. उसको पाना कितना सरल है., कितना सहज जैसे श्वास लेना लेकिन हम ढंग से श्वास भी तो लेना नहीं जानते. उथली श्वास लेते हैं जो उथले विचारों को दर्शाती है. श्वास के प्रति जागरूक रहकर हम वर्तमान में रह सकते हैं अन्यथा भूत या भविष्य की कल्पनाएँ हमारा पीछा नहीं छोडती. यह सहज ध्यान है.

Thursday, July 28, 2011

ध्यान की शक्ति


ध्यान के समय जब मन किसी वस्तु का चिंतन करने लगे तो यह भाव करना होगा कि उस वस्तु को देखने वाला मानस चक्षु और सोचने वाला मानस भी उसी आत्मा का ही अंश है. अपनी श्वास पर ध्यान ले जाने से भी ध्यान पुनः टिक जाता है. हमारी श्वास तथा विचारों में बड़ा सम्बन्ध हैं, साँस को नियंत्रित करके हम अपनी भावनाओं को भी नियंत्रित कर सकते हैं. शरीर में होने वाले कई रोग जो नकारात्मक भावनाओं के परिणाम हैं, दूर किये जा सकते हैं. श्वास के द्वारा पहले हमें भावनाओं को सकारात्मक बनाना है और फिर ध्यान के द्वारा सुप्त शक्तियों को जगाना है प्रेम की शक्ति और ज्ञान की शक्ति.