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Thursday, November 27, 2014

चलो चलें अब निज देश में

मई २०१४ 
बोलते समय हमारी वाणी के साथ हमारे भीतर की तरंगे भी प्रभावित करती हैं, वाणी यदि मधुर होगी तो तरंगे प्रेम लेकर वाणी से पहले ही पहुंच जायेंगी और भीतर यदि कटुता है, खीझ है, क्रोध है, अहंकार है तो वाणी से पहले वही सब तरंगें लेकर जाएँगी, बात का असर नहीं होगा बल्कि हमारी बात अभी कही भी नहीं गयी उसके प्रति नकारात्मक भाव पहले ही जग उठा होगा. भीतर का वातावरण शांत हो, मधुर हो तभी तो तरंगे ऐसी होंगी और ऐसा तभी सम्भव हो सकता है जब हम भीतर उस जगह रहना सीखें जहाँ कोई विक्षेप नहीं है, जहाँ एक सी सौम्यता है, जहाँ न अतीत का दुःख है न भविष्य का डर, जहाँ निरंतर वर्तमान की सुखद वायु बहती है. मन से परे आत्मा के उस आंगन में हम अपना निवास बनाएं जहाँ प्रेम, आनंद, शान्ति के कुछ है ही नहीं. हम जब जरूरत हो तभी चित्त, बुद्धि, मन तथा अहंकार के क्षेत्र में जाएँ अपना काम करके तत्क्षण अपने घर में लौट आयें तब मन में उठे विचार भी शुद्ध होंगे, बुद्धि भी पावन होगी तथा स्मृतियाँ भी सुखद बनेंगी और शुद्ध अहंकार होगा. वाणी तथा कर्मों की शुद्धता अपने आप आने लगेगी, ऐसे में हमारी वह शक्ति जो अभी व्यर्थ चिन्तन, वाचन में चली जाती है बचेगी, ध्यान में लगेगी तथा लोकसंग्रह भी स्वतः ही होने लगेगा.

Monday, July 28, 2014

बहे ध्यान की धारा अविरल

दिसम्बर २००६ 
जब मन ध्यानस्थ होता है तो सहज स्वाभाविक प्रसन्नता तथा उजास चेहरे पर स्वयमेव छाये रहते हैं, उनके लिए प्रयास नहीं करना पड़ता. मन से सभी के लिए सद्-भावनाएँ उपजती हैं. यह दुनिया तब पहेली नहीं लगती न ही कोई भय रहता है. ध्यान से उत्पन्न शांति सामर्थ्य जगाती है और सारे कार्य थोड़े से ही प्रयास से होने लगते हैं. कर्त्तव्य पालन यदि समुचित हो तो अंतर्मन में एक अनिवर्चनीय अनुभूति होती है, ऐसा सुख जो निर्झर की तरह अंतर्मन की धरती से अपने आप फूटता है, सभी कुछ भिगोता जाता है, जीवन एक सहज सी क्रिया बन जाता है कहीं कोई संशय नहीं रह जाता.


Friday, July 11, 2014

बिन पुरुषार्थ सफल नहीं कोई

सितम्बर २००६ 
जब शरीर में पानी का स्तर कम हो जाता है तो हमें प्यास लगती है. जब मन में आनंद का स्तर कम हो जाता है तब ज्ञान की जरूरत होती है. ज्ञान हमें बताता है कि हम शुद्ध आत्मा हैं. शुद्धता शांति और सुख की जननी है. जहाँ ये चारों हैं, वहाँ प्रेम आता है, जिसके पीछे-पीछे शक्ति आ जाती है और इन सबके होने पर हमें पता चलता है कि हम आनन्द स्वरूप हैं. जब इतने सारे सद्गुण हमारे भीतर विद्यमान हैं तो हमें कमी का अहसास क्यों होता है, क्योंकि हम अपने को पहचानते नहीं, इन्हें पाने के लिए हमें वैसे ही पुरुषार्थ करना पड़ेगा जैसे भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते हैं. 

Wednesday, April 17, 2013

अंतर्मुखी सदा सुखी



हमारे जीवन का लक्ष्य सुख ही तो है, सुखी व्यक्ति अपने चारों और सुख ही बांटता है, संतुष्ट व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द संतोष का भाव फैलाता है और शांत व्यक्ति शांति. ये सभी हमें अंतर्मुखी होने से प्राप्त होते हैं. ध्यानस्थ व्यक्ति कामनाओं की आहूति देता है, कामनाएं जो अग्नि की तरह हैं, जिनकी पूर्ति होने पर वे और बढ़ती हैं, उन्हें त्याग कर ही शांति का अनुभव होता है. भीतर भी ऊर्जा का प्रवाह हो रहा है, सब कुछ गतिशील है, लेकिन इन सभी गतियों के परे ऐसा कुछ है जो अचल है, जो सदा है. हमारी श्वास के सहारे हम भीतर की यात्रा पर उतरते हैं, प्रकाश का एक बिंदु या धीमी सी गुंजन हमारा मार्ग प्रशस्त करती है, हम एक अनोखे आनंद का अनुभव करते हैं, एक ऐसा आनंद जो बाहर की दुनिया में भी हमें संतुलित करता है. भीतर का बल बाहर भी कम आता है. हम निरपेक्ष होकर जीना सीखते हैं, हमारी स्वयं की मांग शेष नहीं रहती. हम देना चाहते हैं, क्योंकि तब जगत फीका लगता है, वह उस सुख का पासंग भी नहीं दे सकता, जगत तो निरंतर बदलने वाला है, वह नश्वर है, जबकि हम सदा थे, और सदा रहेंगे.