Showing posts with label आदत. Show all posts
Showing posts with label आदत. Show all posts

Tuesday, February 23, 2021

सुख की जिसे न रहे कामना

हमारे कर्म बांधने वाले न हों, इसके लिए आवश्यक है कि हम उनसे न फल की आशा रखें और न ही उनका कोई संस्कार मन पर पड़ने दें। दो ही तरह से कर्म बंधनकारी है यदि वह भविष्य में कोई फल दे या बाध्य  होकर हमें पुन: उस कर्म को करना पड़े। उदाहरण के लिए यदि हमने किसी अखाद्य पदार्थ का सेवन किया तो उसका परिणाम रोग के रूप में मिलेगा तथा उसकी छाप मन पर पड़ जाएगी तथा भविष्य में हम पुन: उसे ग्रहण करने के लिए लालायित होंगे। यदि हमारी आदतें आज दुख का कारण हैं तो हमने ही उन्हें करते समय सुख की कामना की थी और इससे उनका संस्कार गहरा हो गया था। वास्तव में बांधती है सुख की कामना। यदि कोई चीनी का कण कहे, मुझे मीठा खाना है, तो कोई क्या कहेगा ? यदि कोयल कहे, मुझे पंचम राग सीखना है तो ? यदि फूल कहे मुझे खिलना है तो ? जो मिठास है वही तो चीनी है, जो पंचम सुर में गा सकती है वही तो कोयल है। पर हम सुख स्वरूप हैं इसे भुलाकर हमें सुख चाहिए का राग अलापते हैं। आत्मा स्वयं प्रेम स्वरूप है और इसके उसके दो मीठे बोलों की कामना करती रहती है। यदि कोई न दे तो हम अपमानित महसूस करते हैं। यह अपमानित महसूस करना ही कर्म का बंधन है जो हमने किसी से मीठे बोल बोलते समय अपने हृदय पर बांधा था। जबकि हृदय में प्रेम का सागर भरा है, पर उस बंधन के कारण वह गहराई में ही रह जाता है और हम जीवन के उत्सव में शामिल होने से वंचित ही रह जाते हैं। 

 

Tuesday, July 7, 2020

श्वासों पर जो ध्यान टिकाये


हमारे जीवन में कुछ बातें बार-बार होती हैं, जिन बातों से हम बचना चाहते हैं वे ही नया-नया रूप लेकर आती हैं. यहाँ तक कि कभी-कभी हम स्वयं ही चौंक जाते हैं, ये वार्तालाप तो ऐसा का ऐसा पहले भी हुआ है. हमने सामने वाले की बात पर जिस तरह पहले प्रतिक्रिया की थी वैसी ही फिर करते हैं. जिस आदत को छोड़ने का मन बना लिया था वह पुनः पकड़ लेती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी पहुँच अचेतन मन तक नहीं है, चेतन मन से हम कोई प्रण लेते हैं पर उसकी खबर भीतर वाले मन को होती ही नहीं, वह तो अपने पुराने कार्यक्रम के अनुसार ही चलता रहता है. जीवन गोल-गोल एक चक्र में घूमता रहता है. यदि इस चक्र को तोड़ना है तो ध्यान ही सरल उपाय है. ध्यान में ही पुराने संस्कारों का दर्शन होता है और उनसे छुटकारा पाया जा सकता है. भगवान बुद्ध ने विपासना ध्यान की सरल विधि दी जिसमें स्वतः चलने वाली श्वासों के प्रति साधक को सजग रहना है. 

Wednesday, July 10, 2019

पल पल सजग रहे जो मन



मन सदा ही परिचित मार्गों पर जाना चाहता है. नयापन उसे डराता है अथवा तो उसकी उस जड़ता को तोड़ता है, जिसकी मन को आदत हो गयी है. किसी दार्शनिक ने कहा है, मनुष्य आदतों का पुतला है. हम बहुत कुछ केवल स्वभाव वश ही करते हैं, जो आदतें हमारे लिए हानिकारक भी हैं, जिनका हमें ज्ञान भी है, फिर भी हम उन्हें त्यागना नहीं चाहते. जो आदतें अच्छी हैं उनको भी हम यदि असजग होकर दोहराते रहते हैं तो जितना लाभ मिलना चाहिए उतना नहीं ले पाते. जैसे किसी को यदि सुबह उठकर गीता पाठ करने का नियम है और वह बिना भाव के या अर्थ समझे ही उसका नित्य पाठ करता रहे, तो यह अच्छी आदत होते हुए भी उसके जीवन में विशेष परिवर्तन नहीं ला सकती. हम जो भी करते हैं उसकी पूरी जिम्मेदारी हमारी है, उसका जो भी फल मिलेगा उसका भागीदार हमें ही होना है. असजगता हमें अपने शुद्ध स्वरूप से दूर ले जाती है, अथवा तो जब भी हम अपने मूल स्वभाव से दूर होते हैं, असजग होते हैं. योग का अर्थ है, स्वयं के शुद्ध स्वरूप से जुड़े रहना, इसी योग की साधना हमें करनी है.

Monday, February 11, 2013

तू भी मेरे जैसा है


मार्च २००४ 
हम जब भी किसी को उसकी किसी आदत के लिए टोकते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि कई बार वही गलती हम भी कर चुके हैं. जीसस के अनुसार क्या हमें पहले अपनी आँख का लट्ठा नहीं निकालना होगा, तभी हम दूसरे की आँख का तिनका निकाल सकेंगे. ईश्वर ने हमारी अनेकों भूलों को क्षमा किया है, क्योंकि वह हमसे प्रेम करता है, हमें भी खुद सा बनने की प्रेरणा देकर वह हमारे मन को स्वच्छ करता है, वह हमें अपना मित्र बनाना चाहता है, हर क्षण ऊपर उठाना चाहता है, न जाने कितने उपायों से वह हमारी उन्नति चाहता है, करुणा, प्रेम, सत्य आदि हमारे भीतर बीज रूप सुप्त शक्तियाँ हैं, उन्हें श्रद्धा द्वारा जगा कर हम उससे एक हो सकते हैं.