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Tuesday, August 18, 2020

स्व के भाव को जानेगा जो


योग और अध्यात्म का आश्रय लेकर ही हम देह और मन को स्वस्थ व प्रसन्न  रख सकते हैं. योग का अर्थ है जुड़ना, स्वंय  का इस सम्पूर्ण अस्तित्त्व के साथ जुड़ाव ही योग है. पतंजलि के अष्टांग योग की साधना के द्वारा इसे अनुभव किया जा सकता है, किन्तु ‘स्वयं’ का सही परिचय हमें अध्यात्म से प्राप्त होता है. शरीर, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का अध्ययन करके अपने स्व को पहचानना ही अध्यात्म है. देह एक निश्चित आयु पूर्ण करके मिट्टी में मिल जाने वाली है. मन अधूरी कामनाओं को लेकर एक नए शरीर में प्रवेश करने वाला है, किन्तु स्व अथवा निजता को जिसने जान लिया वह जन्म और मृत्यु के इस चक्र से बाहर हो जाता है. वह होश में मरता है और होश में ही नयी देह धारण करता है, ऐसे ही मानव जन्म से संत अथवा सिद्ध होते हैं. शास्त्र और संत कहते हैं मृत्यु से पहले जिसने अपने आपको जान लिया, उसने उस कार्य को सिद्ध कर लिया जिसके लिए उसे मानव देह मिली थी.  


Sunday, April 19, 2020

हीरा जनम अमोल था


सन्त और शास्त्र कहते हैं मानव जन्म दुर्लभ है. मानव यदि इस बात पर यकीन करता तो अपने जीवन से खिलवाड़ न करता. आज के हालात में देखा जाये तो जो लोग अनुशासन का पालन नहीं कर रहे हैं, अपने जीवन से खिलवाड़ ही कर रहे हैं. आज काल अपना मुख खोले जीवन को ग्रसने के लिए तैयार खड़ा है, जरा सी असावधानी से कोई स्वयं को एक ऐसे रोग से ग्रस्त कर सकता है जिसका कोई इलाज अभी तक ईजाद नहीं हुआ है. यहाँ मेरा तात्पर्य मात्र कोरोना से भी नहीं है, एक और रोग है जिससे मानव ग्रसित है, यह रोग है प्रमाद, जिसका कोई इलाज डॉक्टरों के पास नहीं है, इसका इलाज तो हमें स्वयं ही करना है. प्रमाद का सबसे बड़ा प्रमाण है कि हमें अपने जीवन का मोल नहीं पता, क्या होता यदि हम मानव देह में न होकर किसी अन्य योनि में जन्मते, अथवा तो अभी तक लाखों आत्माओं की तरह देह पाने के लिए प्रतीक्षारत ही रहे होते. मानव देह पाकर इसका मोल समझने का अर्थ है कि हम स्वयं के वास्तविक स्वरूप से परिचित होने की तरफ सजग हों, किसी अन्य योनि में यह सम्भव ही नहीं है. वशिष्ठ मुनि से इसी का ज्ञान पाकर राम, राम हो पाते हैं, अष्टावक्र से ज्ञान पाकर जनक विदेह बनते हैं.  

Tuesday, August 20, 2019

साधो, सहज समाधि भली



जीवन में हमें जो कुछ भी मिलता है वह हमारे विकास के लिए आवश्यक है, ऐसा जो जान लेता है अर्थात हृदय से मान लेता है और बुद्धि से स्वीकार कर लेता है, उसका जीवन सहज हो जाता है. हर सुख का क्षण यदि हमें अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता से भर दे और हर दुःख का क्षण जीवन के प्रति जिज्ञासा से भर दे तभी हम सहजता की ओर बढ़ रहे हैं. सहजता का अर्थ है उस तरह होना जैसे कोई फूल उगा हो या कोई झरना बहता हो, जिसे अपने को श्रेष्ठ होने के लिए कुछ सिद्ध नहीं करना पड़ता. मानव सदा स्वयं को 'कुछ' होने की दौड़ में लगाये रखता है, वह अन्य की तुलना में विकसित होना चाहता है. एक जन्म के बाद दूसरा जन्म और जन्मों की एक लम्बी श्रृंखला चलती चली जाती है, हम विकास की उस ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाते जिसके बाद इस चक्र में दुबारा नहीं आना पड़ता. आज वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो मानव की बुद्धि चरम सीमा तक पहुँच चुकी है, किंतु अस्तित्त्वगत दृष्टि से मानव की चेतना उपनिषदों के ऋषि की चेतना तक भी नहीं बढ़ पायी है. आज ध्यान को भी हमने संसार में उन्नति के लिए साधन बना लिया है, किंतु जिस क्षण तक ध्यान में होना एक सहज अनुभव न हो जाये, जीवन के मर्म का ज्ञान नहीं हो पाता.

Thursday, June 6, 2019

निकट आ गया जो स्वयं के ही



दिन-रात, सुबह-शाम, सर्दी-गर्मी सभी कुछ तो अपने आप हो रहे हैं. जन्म-मृत्यु, स्वास्थ्य-रोग, सुख-दुःख, यश-अपयश भी अपने आप आते-जाते हैं. मानव की भूमिका इसमें कहाँ आरम्भ होती है ? कितना अच्छा हो कि पूर्वजों की सीख के अनुसार वह दिन में पूरी निष्ठा से कार्य करे और रात्रि को विश्राम करे. सुबह-शाम दोनों समय संध्या करे अर्थात कुछ देर शांत होकर बैठे और अस्तित्त्व के साथ अपनेपन को अनुभव करे. सर्दी में सर्दियों का आहार-विहार अपनाये और गर्मियों में उस ऋतु के अनुसार स्वयं को ढाले. जन्म-मृत्यु दोनों का स्वागत करे, स्वास्थ्य-रोग दोनों में पथ्य-अपथ्य का ध्यान रखे. सुख-दुःख में मन को समता में रखे. यश-अपयश को साक्षी भाव से सहन करे. आज विश्राम खो गया है, संध्या खो गयी है, ऋतुु के अनूरूप आहार-विहार खो गया है और भक्ष्य-अभक्ष्य का विवेक भी नहीं रहा. जन्म को रोका जा रहा है, मृत्यु को दूर खिसकाया जा रहा है. नकली मुस्कान को सुख का पर्यायवाची मान लिया गया है और दुःख से सीखने की बजाय किसी न किसी तरह उसे भुलाने का प्रयत्न चलता है. स्वयं ही स्वयं का यशगान होता है और जरा सी उपेक्षा आहत कर देती है. मानव जैसे अस्तित्त्व से दूर हो गया है. जरूरत है एक बार फिर अपने भीतर लौटने की, और सब कुछ बदल जाता है.

Monday, March 30, 2015

उससे मिलना होगा इक दिन

अगस्त २००८ 
जो बाहर है वही भीतर भी है. हमारे भीतर भी एक सृष्टि है, परमात्मा को प्रेम करना उस सृष्टि में प्रवेश करने का पवेश पत्र है, न जाने कितने जन्मों से वह परमात्मा हमारी बाट जोह रहा है. पुकार रहा है. आत्मा को जीने की इच्छा है, वह सुख-दुःख का संसार खड़ा कर लेती है, तब भी उस के भीतर परम प्रेम ज्यों का त्यों रहता है, अछूता और निर्मल, उस प्रेम को पाने की शर्त यही है कि आत्मा स्वयं ही वह प्रेम बन जाए, जैसे लोहा आग बन जाता है और बीज वृक्ष बन जाता है. वे पुनः अपने रूप को पाते हैं पर बदला हुआ रूप. उस क्षण तो उन्हें मिटना ही होता है. आत्मा यदि स्वयं को क्षण भर के लिए भी असीम सत्ता में लीन कर दे तो वह क्षण उसके जीवन को बदल सकता है. ऐसे भी वह पल-पल मिट रही है, बदल रही है. यह परिवर्तन उसके न चाहने पर भी होते हैं. यदि वह इस सत्य को स्वीकार ले कि जीवन क्षण भंगुर है, इसमें कोई सार नहीं है. जन्म भर की कमाई मृत्यु के एक झटके में समाप्त हो जाती है. जबकि आत्मा का विकास कभी पतन में नहीं बदलता, वह उन्नति की ओर ही अग्रसर होता है. कैसा विरोधाभास है यहाँ, लेकिन परमात्मा के क्षेत्र में संसार के सारे नियम टूट जाते हैं. यहाँ का गणित ही उल्टा है. प्रेम, शांति, सुख, आनंद, ज्ञान, शक्ति और पवित्रता से बना परमात्मा ही हमारी असली पहचान है. न जाने वह कौन सा पल रहा होगा जब उसे भूलकर हमने यह आवरण ओढ़ा होगा. धीरे-धीरे हम इसमें फंसते गये. उसकी स्मृति आते ही वह हमें अपनी ओर आकर्षित करता है. 

Saturday, July 19, 2014

जाना है उस पार

अक्तूबर २००६ 
यह जगत तथा यह शरीर दोनों समानधर्मी हैं, परिवर्तनशील तथा सुख-दुःख के कारण, किन्तु आत्मा, परमात्मा का अंश है सो सदा अछूता है. मन इन दोनों के मध्य का पुल है, हम इस पुल पर खड़े हैं, चाहें तो भीतर के उतरें चाहे तो जगत की ओर मुड़ें जहाँ छलावा ही छलावा है, मन के इस पुल पर खड़े हमें कितने ही जन्म बीत गये हैं, हम कभी इधर का तो कभी उधर का रुख लेते हैं फिर दोनों से घबरा कर बीच में आ जाते हैं, न तो पूरी तरह से संसार के हो पाते हैं न ही पूर्ण रूप से आत्मा को जान पाते हैं. सारी साधना उस डुबकी के लिए है जो आत्मा के सागर में लगानी है.  


Tuesday, April 29, 2014

मोती सी अनमोल हैं सांसें

जनवरी २००६ 
अब न सम्भले तो रोना पड़ेगा...नर्क में गर्क होना पड़ेगा. जन्म हीरा गंवाने के काबिल नहीं है, साँस का अनमोल मोती लुटाने के काबिल नहीं है...न जाने कितनी बार ये वचन हम सुनते, पढ़ते हैं, पर इनका वास्तविक अर्थ तभी समझ में आता है जब पहली बार गुरू कृपा से भीतर उस परमात्मा की झलक मिलती है, और तब साधक की यात्रा आरम्भ होती है. उस झलक को पुनः पाने के लिए वह अपने भीतर जाता है, साधना करता है. उसे सदा यह लगता है जो प्रेम उसे अपने भीतर अनुभव हो रहा है, वह वास्तविक तो है. क्या विकार नष्ट हो रहे हैं, अहंकार घट रहा है, क्रोध, लोभ, मोह मान से ऊपर उठ रहा है या नहीं, वाणी का अपराध तो नहीं होता, प्रेम का पौधा जो अपने अंतर में पनप रहा है उस पर कांटे तो नहीं हैं, अभिमान के कांटे. पल-पल भीतर की खबर रखता हुआ वह फंक-फूंक कर कदम रखता है, अभी परमात्मा को जन्मने में समय है, समय नाजुक है, उसे उस माँ की तरह सजग होना है जो गर्भ में पल रहे अपने शिशु की रक्षा करती है.   

Friday, November 22, 2013

श्रद्धावान लभते ज्ञानम्

अप्रैल २००५ 
आनन्द की राशि, परमात्मा हमारे भीतर है तो हमें उदास होने की क्या जरूरत है, यह तो ऐसा ही हुआ कि फूलों के ढेर हमारी गोद में हैं और खुशबू हमसे दूर रहे. भीतर जब जिज्ञासा और श्रद्धा का जन्म होता है तो पहले प्रेम फिर ज्ञान का उदय होता है और आनन्द का स्रोत भीतर फूट पड़ता है. भय का नाश हो जाता है, मन झुक जाता है, भीतर खाली हो जाता है, जैसे जन्मों का बोझ उतर गया हो. भक्त को पंख मिल जाते हैं, वह कौतुक से भर जाता है, सरल, सहज हो जाता है. उसके भीतर का आनन्द बाहर भी प्रवाहित होने लगता है. वह अन्यों के मन के भाव पढ़ने लगता है. जगत के साथ उसके सम्बन्ध पारदर्शी हो जाते हैं.  

Thursday, September 5, 2013

कहाँ से उठता है यह "मैं"


देहात्म बुद्धि में यदि हम रहते हैं तो जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख, भूख-प्यास को सहना ही पड़ेगा. देह यानि हमारा अन्नमय कोष जो अन्न से बना है, जन्म लेता है व मृत्यु को प्राप्त होता है, नष्ट होकर अन्न ही हो जाता है. प्राणमय कोष वायु पर आधारित है जो भूख-प्यास सहता है, प्राण न रहें तो देह को भूख-प्यास का अनुभव नहीं होगा. मनोमय कोष वृत्तियों को धारण करता है, तथा सुख—दुःख का भागी होता है, वृत्तियाँ ही इसका भोजन हैं. विज्ञानमय कोष हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करता है. उससे भी परे है आनन्दमय कोष, जो इन सभी को अभिव्यक्ति प्रदान करता है. हम कार्य को तो देखते हैं कारण को नहीं खोजते, हमारी ‘मैं’ कारण शरीर से उठती है पर हम स्वयं को देह, मन, बुद्धि ही मानते रहते हैं, क्योंकि वहाँ तक हमारी पहुंच नहीं है. उसके पार गये बिना आत्मा का अनुभव नहीं हो सकता, और आत्मवादी हुए बिना द्वन्द्वों के इस जगत से छूटना कठिन है. जैसे नारियल पक जाये तो अपने आप छिलके से अलग हो जाता है, वैसे ही देह के भीतर रहता हुआ आत्मा जब देह, मन बुद्धि से छूट जाता है, फिर  अपनी ही गरिमा में रहता है.

Tuesday, March 5, 2013

कुछ न करे जब पल भर को मन


मई २००४ 
ध्यान में हमें कुछ न करने का सुझाव दिया जाता है, जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत मानव सदा कुछ न कुछ करता ही रहता है. सदा बाहर की ओर ही उसकी इन्द्रियाँ दौड़ती हैं, सदा कुछ न कुछ पाने की चाह, कोई न कोई इच्छा उसे निरंतर दौड़ते रहने पर मजबूर करती है, पर जब यह मन समझ जाता है कि उसकी यह दौड़ कोल्हू के बैल की तरह है जो उसे कहीं नहीं पहुंचाती, तो वह ध्यान में उत्सुक होता है. अभ्यास से मन टिकने लगता है, भूत की चिंता व भविष्य की आशंका से मुक्त हो वर्तमान के उस छोटे से द्वार में प्रवेश करना सीख लेता है जो अनंत में खुलता है.

Friday, March 1, 2013

एक उसी की खोज सभी को


अप्रैल २००४ 
अस्तित्त्व आनंद स्वरूप है, वह प्रेम तथा ज्ञान स्वरूप है, वह आनन्दित होकर प्रतिक्षण अपना प्रसाद बांट रहा है. पर मानव के पास समय नहीं है कि उस आनंद को पाने के लिए जरा सा प्रयत्न भी करे. जब हम पर विपत्ति के बादल मंडराते हैं तो हम ईश्वर के निकट जाते हैं, हमारा लक्ष्य तब विपत्ति से छुटकारा मात्र होता है न कि उसके आनंद को पाना. वह अकारण दयालु है, वह हमारे जीवन में ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करता है कि हम उसके निकट आयें. यदि इतने पर भी हम नहीं समझते तो मृत्यु का झटका लगता है, पुनः जन्म होता है और पुनः मरण...अंततः हम स्वयं ही कह उठते हैं, कभी इसका अंत भी होगा...क्यों हम व्यर्थ ही दुःख उठा रहे हैं, अरे, इस जीवन का कोई प्रयोजन भी है या फिर यूँही यह आना-जाना लगा हुआ है. तब अस्तित्त्व जान लेता है कि यह वक्त उचित है कि इसे अपना आनंद प्रदान किया जाये. वह भीतर से सद्प्रेरणायें भेजने लगता है, जीवन के रहस्यों पर से पर्दा उठने लगता है. तब भीतर प्रेम जगता है, आनंद मिलता है. सद्गुरु का इसमें बड़ा हाथ है उनके प्रेम का आश्रय लेकर साधक ईश्वर की ओर चल पड़ता है.

Friday, December 21, 2012

जिस मरने से जग डरे


जिसने मृत्यु को जान लिया है, वही जीवन को भी जान सकता है. हमारा जीवन एक अनंत यात्रा है, मृत्यु जिसमें आने वाले पड़ाव हैं, यह पड़ाव कितना लम्बा होगा अथवा कितना छोटा होगा यह हम नहीं जानते. उस दौरान हम भौतिक इन्द्रियों से परे होते हैं, आत्मा को स्वयं को जानने के लिए शरीर का साथ चाहिए, यह तन दुर्लभ है तभी ऐसा कहा गया है. जब तक यह है तब तक यदि सत्य को जान लें तो अशरीरी अवस्था में भी सजगता बनी रहेगी. ध्यान की गहनता मृत्यु का ही अनुभव है. ईश्वर की लीला अचिन्त्य है, वह अपने भक्त को अपना सान्निध्य देता है, इस जन्म में, मृत्यु के बाद और अगले जन्म में भी. यह ज्ञान बंधन से मुक्त करने वाला है, यह ऐसा पथ है जहां कुछ नहीं हुआ जाता है, अहम का वहाँ कोई स्थान नहीं.  

Tuesday, April 24, 2012

स्व को जिसने जान लिया है


फरवरी २००३ 
मृत्यु कितनी सृजनात्मक है. जन्म होने की प्रक्रिया सदा एक सी है पर इंसान कितने विभिन्न तरीकों से मरते हैं. हर व्यक्ति की मृत्यु किसी न किसी खास रोग या कारण से होती है. अनगिनत रोग हैं और प्राकृतिक आपदाएं हैं. युद्ध, हिंसा, आतंक के शिकार भी होते हैं कुछ लोग और कुछ अपनी मृत्यु का चुनाव स्वयं करते हैं. जो जन्मा है वह मरेगा ही, यह ध्रुव सत्य है पर जो मरा है वह पुनः जन्मेगा ही, यह सत्य नहीं है. वह मुक्त भी हो सकता है, प्रेत भी हो सकता है . पर हर जीवित की मृत्यु तय है, फिर हमें किस बात का गर्व रहता है, इस माटी में मिल जाने वाली देह का या इस मन का जो कभी संतुष्ट होना जानता ही नहीं, जो सदा कमियों पर नजर रखता है अपनी नहीं दूसरों की...अभिमान यदि सच्चे अर्थों में हो सकता है तो ‘स्व’ का जो प्रेम, शांति, आनंद, सुख, ज्ञान, शक्ति व पवित्रता का पुंज है. मानव मात्र इस ‘स्व’ का अधिकारी है.