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Sunday, November 21, 2021

सुख-दुःख के जो पार मिलेगा

जीवन सुख-दुःख का मिश्रण है, पर इसको देखने वाला मन यदि इसके पार जाने की कला सीख ले तो जीवन एक खेल बन जाता है। अनादि काल से न जाने कितने लोग इस भूमि पर जन्मे और चले गए। प्रतिक्षण नए सितारों के जन्म हो रहे हैं और कुछ काल के गाल में समा रहे हैं। थोड़ा सा समय और कुछ ऊर्जा हमें मिली है कि अपने भीतर उस स्रोत को पा लें जो सुख-दुःख के पार है। मन यदि स्वयं में संतुष्ट होना सीख जाए तो खुद के परे जाने की हिम्मत कर सकता है, जो मन अभी तृप्त नहीं हुआ,  वह तो संसार को पाने की उधेड़बुन में ही लगा रहेगा। मन यदि रिक्तता का अनुभव करेगा तो उसे भोजन, धन, वस्तुएँ, यश आदि से भरना चाहेगा, इस भरने में वह कभी सफल नहीं हो सकता क्योंकि ख़ाली होना मन का स्वभाव है। उसे शून्य के अतिरिक्त किसी भी वस्तु से भरा नहीं जा सकता। इच्छाओं की पूर्ति के द्वारा न अतीत में न ही भविष्य में कोई सुख-दुःख के पार जा सकता है। ध्यान-साधना के द्वारा मन के इस स्वभाव को जानना है और अपने भीतर आनंद के स्रोत का अनुभव करना है, जो सुख-दुःख दोनों के पार है। 


Sunday, July 19, 2020

कोरोना से जो बचना चाहे


वर्तमान समय, जीवन जब एक तरफ कोरोना के कारण आपदा में घिरा है तो दूसरी ओर मानवीय शक्ति और क्षमता को परखने का स्वर्ण काल भी है. जीवन को किस तरह बचाएं इसके लिए दुनिया भर में वैज्ञानिक शोध कार्य कर रहे हैं. कम साधनों में किस तरह जीवन चलाएं इसके प्रति भी लोग सजग हो रहे हैं. भौतिकता को त्याग सादा जीवन उच्च विचार की परिपाटी पर चलने का समय भी यही है. कितने ही व्यवसाय बन्द हो चुके हैं, साथ ही कार्य के नए - नए क्षेत्र भी खुल रहे हैं. निराश होकर उदास होने का समय नहीं है, यह सजग और सतर्क रहकर जीवन को इस प्रकार जीने का समय है कि कम से कम ऊर्जा की खपत हो और अधिक से अधिक साधन बचाये जा सकें. वैज्ञानिकों की मानें तो कोरोना काल अभी लम्बा खिंचने वाला है. देश को अधिक दवाइयों, स्वास्थ्यकर्मियों व अस्पतालों की जरूरत होगी, साथ ही देशवासियों को अधिक मनोबल और मानसिक शक्ति की भी जरूरत होगी. नियमित जीवनशैली अपना कर, जिसमें योग, ध्यान हो, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आहार हों तथा समाज व देश के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने की ललक हो तो हम इस विपदा काल में भार नहीं बनेंगे बल्कि भार वाहक बन सकते हैं. 

Sunday, April 19, 2020

हीरा जनम अमोल था


सन्त और शास्त्र कहते हैं मानव जन्म दुर्लभ है. मानव यदि इस बात पर यकीन करता तो अपने जीवन से खिलवाड़ न करता. आज के हालात में देखा जाये तो जो लोग अनुशासन का पालन नहीं कर रहे हैं, अपने जीवन से खिलवाड़ ही कर रहे हैं. आज काल अपना मुख खोले जीवन को ग्रसने के लिए तैयार खड़ा है, जरा सी असावधानी से कोई स्वयं को एक ऐसे रोग से ग्रस्त कर सकता है जिसका कोई इलाज अभी तक ईजाद नहीं हुआ है. यहाँ मेरा तात्पर्य मात्र कोरोना से भी नहीं है, एक और रोग है जिससे मानव ग्रसित है, यह रोग है प्रमाद, जिसका कोई इलाज डॉक्टरों के पास नहीं है, इसका इलाज तो हमें स्वयं ही करना है. प्रमाद का सबसे बड़ा प्रमाण है कि हमें अपने जीवन का मोल नहीं पता, क्या होता यदि हम मानव देह में न होकर किसी अन्य योनि में जन्मते, अथवा तो अभी तक लाखों आत्माओं की तरह देह पाने के लिए प्रतीक्षारत ही रहे होते. मानव देह पाकर इसका मोल समझने का अर्थ है कि हम स्वयं के वास्तविक स्वरूप से परिचित होने की तरफ सजग हों, किसी अन्य योनि में यह सम्भव ही नहीं है. वशिष्ठ मुनि से इसी का ज्ञान पाकर राम, राम हो पाते हैं, अष्टावक्र से ज्ञान पाकर जनक विदेह बनते हैं.  

Wednesday, March 28, 2018

तेरी महिमा तू ही जाने


२८ मार्च २०१८ 
हमारे शास्त्र कितने अद्भुत हैं, सचमुच वे परमात्मा की वाणी ही हो सकते हैं, मानव का अंतर उस विशालता का अनुभव कैसे कर सकता है जिसका वर्णन शास्त्रों में मिलता है. उस विराट पुरुष का जो हिरण्यगर्भ है. जिसके भीतर यह अनंत ब्रह्मांड समाया है. जो कभी वृद्ध नहीं होता, अजर है, अमर है, यह जगत जिसकी क्रीड़ास्थली है. जो सदा है, हर काल और देश में है और देश-काल से परे भी है. जो हर आत्मा की गहराई में भी है. जिसे कण भर भी छूकर मन तृप्त हो जाता है. नाम-रूप से बना यह जगत कितना भी मोहक क्यों न हो, उस असीम की शोभा निराली है. जिसके होने मात्र से ब्रह्मांड बनते और बिगड़ते हैं, मन, बुद्धियाँ चलायमान होती हैं, उस परम के प्रति श्रद्धा का जन्म भी उसकी कृपा से ही होता है.

Thursday, September 14, 2017

सादा जीवन उच्च विचार यही सुखी जीवन का सार

१५ सितम्बर २०१७ 
यह काल संक्रमण का काल है. मूल्य बदल रहे हैं, संस्कृतियाँ और सभ्यताएं बदल रही हैं. देशों की सीमाएं बदल रही हैं. विश्व की उन्नति का आधार आर्थिक विकास माना जाने लगा है. व्यापारिक संबंध बढ़ रहे हैं, देश निकट आ रहे हैं. किन्तु इस सबके साथ मानव को विकास की बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ रही है. एक पीढ़ी पहले तक भी एक व्यक्ति को परिवार का सहयोग और प्रेम सहज ही मिल जाता था, जिसके कारण उसके भीतर मानवीय मूल्यों की स्थापना घर से ही आरम्भ हो जाती थी और विद्यालय उसमें विस्तार करता था. आज एकल परिवार होने के कारण बच्चे उस स्नेह और विश्वास से वंचित हैं, स्कूल भी इस कमी को पूरा नहीं कर पा रहा है. आये दिन स्कूलों में होने वाले हादसे अभिभावकों और बच्चों में एक भय की भावना भर रहे हैं. यदि मानव अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर ले, लोभ और दिखावे पर नियन्त्रण रखे. ध्यान और योग को अपना कर सुख के अविनाशी स्रोत को अपने भीतर ही खोज ले तो स्वतः ही उसकी यह अंधी दौड़ समाप्त हो जाएगी.  

Wednesday, March 19, 2014

शरणागति कीमिया है इक

अक्तूबर २००५ 
शरण में यदि हम आ जाते हैं तो समय-समय पर हमें भीतर से प्रेरणा मिलती है, उत्साह बढ़ता है तथा हमें प्रतीत होता है कि हम किसी की छत्रछाया में है, हमें इन्द्रियातीत आनन्द का बोध भी होता है. सुख-दुःख में सम रहने की कला भी सीखते हैं. शरणागति विनम्र बनाती है. विनम्रता के बिना हुआ बोध अहंकार को बढ़ाता है. अपने सच्चे कर्त्तव्य का ज्ञान होता है. कई सत्य उद्घाटित होने लगते हैं. सुख-दुःख जो प्रारब्ध वश है वह तो अपने-आप मिलेगा ही. संसार हमें जितना मिलना है वह मिलेगा ही आदि. पर ईश्वर प्राप्ति का संकल्प करते ही हमारे भीतर एक अद्भुत शांति का उदय होता है. धीरे-धीरे यह सम्बन्ध इतना दृढ़ हो जाता है कि उसमें देश, काल का भी कोई भेद नहीं रहता, वह हर काल में, हर स्थान पर साथ-साथ रहता है.


Wednesday, February 12, 2014

कालातीत से प्रीत लगायें

अगस्त २००५ 
भूत का शोक, भविष्य से भय तथा वर्तमान में मोह जब तक बना हुआ है तब तक हम काल के वश में हैं. जब कालातीत भगवान से प्रीति हो जाती है तब ही पहली बार आनन्द का अनुभव होता है. जब हमें धर्म-अधर्म, श्रेय-प्रेय, उचित-अनुचित का बोध होता रहता है, वर्तमान में टिकना सहज होता है. जो जिस क्षण में घटता है वह उस क्षण की मांग होती है, यह स्वीकार करने से न भूत का शोक होता है न भविष्य से भय लगता है. यदि मन में विरोध का फल बोया तो भविष्य में उसका फल खाना पड़ेगा. अतः हमें अपने हृदय की समता बनाये रखनी है और काल के बंधन से मुक्त होना है.

Thursday, January 30, 2014

कौन पुकारे पल-पल हमको

जुलाई २००५ 
काल से प्रेरित होकर हम अपने जीवन को किसी न किसी दिशा में ले जाते हैं, ईश्वर चाहते हैं, हम शीघ्र अति शीघ्र उसके पास पहुंचें, वह तरह-तरह से हमें प्रेरित करते हैं, जगाने का प्रयत्न करते हैं. जब हम अपनी इच्छा से उसकी ओर चलना आरम्भ करते हैं तो सुख-दुःख के चक्र से बाहर निकल जाते हैं, द्रष्टा मात्र रहकर हम जीवन को गति देते हैं. तब न कुछ होने का भाव सताता है न कुछ पाने का, जीवन में अभय का गुण आता है. मन की समता बनी रहकर, मन शांत रहता है. शांति से ही कर्त्तव्य कर्म करने की योग्यता पनपती है, उद्ग्विन मन व्यर्थ ही अपनी ऊर्जा को गंवाता है. ऊर्जा यदि भीतर रहे तो मन प्रसन्न रहता है. वास्तव में ईश्वर की निकटता, सत्य की निकटता, सद्गुरु का सान्निध्य, आत्मा की निकटता सभी हमारे लिए परम लक्ष्य हैं, जीवन का एक क्षण भी यदि इनके बिना बीतता है तो इनकी लालसा में ही बीतता है. हमारे जाने या अनजाने उसी की तलाश चलती रहती है. 

Wednesday, May 22, 2013

जिस मरने से जग डरे


सितम्बर २००४ 
मृत्यु को जीतने का अर्थ है, मृत्यु के भय पर विजय पाना, अपने भीतर अमृत तत्व को पाने का अर्थ भी यही है, आत्मा ही व अमृत है जिसे हमें अपने मन रूपी सागर से मंथन करके निकालना है. हमारे शरीर में जो चेतन तत्व है वह हर काल व हर देश में एक सा है, उसे जान लेने पर शरीर का उतना महत्व नहीं रह जाता, ठीक है वह शरीर के माध्यम से कार्य कर रहा है, मन, बुद्धि आदि उसके सहायक हैं, पर वह कार्य कर ही क्यों रहा है ? वह स्वयं को जानने के लिए ही कार्य कर रहा है, आत्मा से ही आत्मा को जाना जा सकता है. वह मन, बुद्धि से परे है , पर इनके न रहने पर, शरीर के न रहने पर वह स्वयं को जान भी नहीं सकता. यह एक पहेली जैसा लगता है पर यही तो माया है. जीव ही ब्रह्म है यह जानने के लिए उसे माया का आवरण पार करना ही है. एक खेल है जो युगों-युगों से खेला जा रहा है, इस खेल में रोमांच भी है, आनन्द भी है, साहस भी है. जीव, माया को ही लक्ष्य मानकर भटकता रहता है, फिर सद्गुरु का उपदेश पाकर वह स्वयं को बदलता है और ब्रह्म को जानने का प्रयास करता है.