कर्म ही वह बीज है, जो हम प्रतिपल मन की माटी में बोते हैं, सुख-दूख रूपी फल उसी से उत्पन्न वृक्ष में लगते हैं. मनसा वाचा कर्मणा जो भी हम कर रहे हैं, उनके द्वारा हम हर घड़ी अपने भाग्य का निर्माण कर रहे हैं. कर्म करने की शक्ति हरेक के भीतर निहित है, इसे भूलकर यदि कोई भाग्य के सहारे बैठा रहेगा तो उसे कौन समझा सकता है. हर व्यक्ति कुछ न कुछ देने की क्षमता रखता है, हरेक के भीतर कोई न कोई योग्यता, विशेषता रहती है, जिसके द्वारा वह समाज का कुछ भला कर सकता है, उसे न देकर यदि हम सदा कुछ न कुछ मांगते ही रहेंगे तो अपनी शक्तियों का प्रयोग नहीं करेंगे और एक दिन उन्हें भूल ही जायेंगे. यदि देने का भाव किसी के भीतर जगे तो अल्पहीनता का भाव अपने आप मिट जाता है. इसके बाद ही मन में सन्तोष का जन्म होता है और तब बिना मांगे ही अस्तित्त्व की कृपा का अनुभव होने लगता है. मन स्वतः ही परम के प्रति झुक जाता है और तब हर कर्म से उसकी ही पूजा होती है, ऐसा अनुभव होता है. मानव को ईश्वर की दया दृष्टि की कामना नहीं करनी है, वह तो सदा ही मिल रही है, बस हमें अपनी दृष्टि में परिवर्तन करना है जो अभी अपने कर्मों से केवल अपने सुख की मांग करती है.
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Sunday, April 4, 2021
Sunday, July 19, 2020
कोरोना से जो बचना चाहे
वर्तमान समय, जीवन जब एक तरफ कोरोना के कारण आपदा में घिरा है तो दूसरी ओर मानवीय शक्ति और क्षमता को परखने का स्वर्ण काल भी है. जीवन को किस तरह बचाएं इसके लिए दुनिया भर में वैज्ञानिक शोध कार्य कर रहे हैं. कम साधनों में किस तरह जीवन चलाएं इसके प्रति भी लोग सजग हो रहे हैं. भौतिकता को त्याग सादा जीवन उच्च विचार की परिपाटी पर चलने का समय भी यही है. कितने ही व्यवसाय बन्द हो चुके हैं, साथ ही कार्य के नए - नए क्षेत्र भी खुल रहे हैं. निराश होकर उदास होने का समय नहीं है, यह सजग और सतर्क रहकर जीवन को इस प्रकार जीने का समय है कि कम से कम ऊर्जा की खपत हो और अधिक से अधिक साधन बचाये जा सकें. वैज्ञानिकों की मानें तो कोरोना काल अभी लम्बा खिंचने वाला है. देश को अधिक दवाइयों, स्वास्थ्यकर्मियों व अस्पतालों की जरूरत होगी, साथ ही देशवासियों को अधिक मनोबल और मानसिक शक्ति की भी जरूरत होगी. नियमित जीवनशैली अपना कर, जिसमें योग, ध्यान हो, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले आहार हों तथा समाज व देश के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने की ललक हो तो हम इस विपदा काल में भार नहीं बनेंगे बल्कि भार वाहक बन सकते हैं.
Saturday, May 23, 2020
दुःख में जो जागना सीखे
जीवन कितने ही रूपों में हमारे सम्मुख आता है. कभी शांत तो कभी रौद्र, कभी सरल तो कभी कठिन. हम उसे किस रूप में ग्रहण करते हैं यह हम पर निर्भर है. जीवन में यदि सब कुछ ठीक चल रहा हो तो हम अपनी ऊर्जा को व्यर्थ ही इधर-उधर के कामों में लगा देते हैं. यदि कोई विपदा आती है तो हम सजग हो जाते हैं और अपना सारा समय और ऊर्जा उस दुःख से बाहर निकलने में लगाते हैं. उस समय जीवन में एक लक्ष्य होता है जीवन धारा एक ओर ही बहती है. आज पूरे विश्व के आगे एक समस्या है, सरकारें सजगतापूर्वक अपने-अपने देशवासियों के लिए नए-नए प्रोजेक्ट आरंभ कर रही हैं. लोग स्वास्थ्य के प्रति सजग हो रहे हैं. धन की दौड़ में जो अपने गांव छोड़कर चले गए थे वे घर लौट रहे हैं. परिवार का जो महत्व खोता जा रहा था, अब वापस स्थापित हो रहा है. दुःख की घड़ी में सब एक हो जाते हैं, शायद इसीलिए प्रकृति कभी-कभी क्रुद्ध होती है. मानव अपने पर्यावरण से जुड़े, लोग आपस में जुड़ें, सभी को अपने कर्त्तव्य पालन का बोध हो, इसका भान कराने के लिए ही महामारी जैसी विपदाएं समय-समय पर युगों से आती हैं. जो समर्थ हैं उन्हें सेवा का अवसर मिले और जो संकट ग्रस्त हैं उन्हें अपनी आंतरिक शक्तियों का भान हो. समाज आपस में जुड़े और अकर्मण्यता का जो दानव मानवता को ग्रस रहा था उसका नाश हो. जीवन में एक गहरा परिवर्तन हो, माता-पिता और बच्चों में संवाद हो, पीढ़ियों का अंतर घटे, भोजन में शुद्धता का ध्यान रखा जाये. स्वच्छता का मानदण्ड बढ़े, ये सारे छोटे-छोटे पर महत्वपूर्ण लक्ष्य हैं जो आज किसी न किसी रूप में प्राप्त हो रहे हैं.
Friday, January 31, 2020
मिलजुल रहना जब सीखेंगे
जब चारों ओर अफरातफरी मची हो, कोई किसी की बात सुनने को ही तैयार न हो. समाज में भय का वातावरण बनाया जा रहा हो और भीड़ को बहकाया जा रहा हो, भीड़ जो भेड़चाल चलती है, जो विरोध करते-करते कभी हिंसक भी हो जाती है. समाज जब ऐसे दौर से गुजर रहा हो तो सही बात पीछे रह जाती है. यदि सभी अपना-अपना निर्धारित काम सही ढंग से करें, तो समाज को आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है. भारत भूमि पर रहने वाला हर व्यक्ति भारत के विकास के लिए उत्तरदायी है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी भी वर्ग, वर्ण, आश्रम, समुदाय या प्रदेश का रहने वाला व्यक्ति समान है, उसके अधिकार समान हैं और कर्तव्य भी. आज सभी अधिकारों की बात करते हैं पर जिसे जहाँ जो कार्य करना चाहिए, उसकी बात नहीं करता. विश्व विद्यालय अध्ययन व अध्यापन करने-कराने की जगह आंदोलन का केंद्र न बनें. बगीचे टहलने व खेलने के स्थान पर संघर्ष के लिए केंद्र न बनें. भारत जिस बात के लिए विश्व प्रसिद्ध है उस सौहार्द, आत्मीयता और ज्ञान को कोई भुलाए नहीं, जिसके बिना आपसी मतभेद को दूर करना बहुत कठिन है.
Thursday, March 29, 2018
बन जाएगा मन विशाल जब
२९ मार्च २०१८
हमारा छोटा सा मन खुद को नहीं जानता
और एक सीमित दायरे में सिकुड़ा रहता है. जैसे एक छोटी सी तलैया स्वयं को विशाल
समुन्दर से कितना छोटा मानती है पर दोनों में ही जल है, अर्थात गुणवत्ता की दृष्टि
से दोनों समान हैं. मन जिस स्रोत से आया है वह अनंत सम्भावनाओं का केंद्र है, किंतु
स्वयं को अपनी धारणाओं और मान्यताओं की कैद में सीमित मानता है. यदि वह एक बार
इन्हें तोड़कर अपने भीतर झाँके तो शक्ति का एक सागर उसे नजर आता है. हम अपनी
क्षमताओं को ही नहीं पहचानते और उत्तरदायित्वों से बचने का बहाना ढूँढ़ते हैं. समाज
के लिए हम कुछ कर सकते हैं, ऐसी भावना ही तभी जन्मती है जब मन अपनी छोटी-छोटी
जरूरतों के पार निकल जाता है. ध्यान ही वह साधना है जो हमें अपनी छिपी हुई
शक्तियों से परिचित कराती है. जीवन में सत्य का जागरण हो उसके लिए नियमित साधना और
स्वाध्याय ही प्रथम और अंतिम आवश्यकता है.
Thursday, September 28, 2017
एक चेतना सबको जोड़े
२८ सितम्बर २०१७
जब हम कहते हैं ‘घट घट में
राम’, तब हम सभी के मध्य अनुस्यूत एक समान धारा को देखने का प्रयास कर रहे होते हैं. मानवों के स्वभाव
पृथक-पृथक हैं, ज्ञान का स्तर भी एक नहीं है, रूप-रंग में एक देश के लोग दूसरे देश
के लोगों के समान नहीं होते, किंतु उन्हें एक करती है भीतर की चेतना, वही उन्हें
निकट लाती है और वही उन्हें सशक्त करती है. व्यक्ति चेतना से जितना दूर निकल जाते
हैं, समाज में विघटन उतना ज्यादा होता है. जहाँ वर्गभेद भारी हो, लोगों को आपस में
जुड़ने के लिए कोई तो समानता चाहिए. समान रूचि वाले व्यक्ति जुड़ जाते हैं, क्योंकि
उनकी चेतना किसी एक दिशा में प्रवाहित होती है. जितना-जितना व्यक्ति चेतना को मुखर
होने का अवसर देगा, उसे भेद गिरते नजर आयेंगे. समाज में एकता बढ़ेगी और एकता में ही
शक्ति है. शक्ति की पूजा के पर्व पर इसे याद रखना होगा.
Wednesday, August 23, 2017
श्रेष्ठता का चयन करे जो
२४ अगस्त २०१७
जीवन निरंतर गतिशील
है. यदि गति ऊपर की ओर हो अर्थात उन्नतिशील हो तो सद्गति कहलाएगी और यदि नीचे की
ओर हो पतनशील हो तो दुर्गति कहलाएगी. कोई भी एक स्थान पर बने नहीं रह सकता. शिशु
बालक बन रहा है, यदि उसका लालन-पालन उचित नहीं हुआ तो वह निरंकुश बालक बन जायेगा. बालक
को यदि उचित वातावरण नहीं मिला तो वह दिशाहीन किशोर बन सकता है. किशोरावस्था में
मार्गदर्शन न मिलने के कारण कितने ही युवा बुरी आदतों का शिकार हो जाते हैं. इसके
विपरीत यदि शिशु को पर्याप्त स्नेह और संस्कार से सिंचित किया जाता है तो वह आदर्श
बालक व कुशाग्र किशोर बनकर समाज के लिए उदाहरण बन सकता है. भगवद गीता में कृष्ण
कहते हैं, कोई व्यक्ति किसी भी स्थिति में हो यदि उस क्षण वह तय कर ले कि उच्च
जीवन को अपनाना है, उसकी दिशा और दशा तत्क्षण बदलने लगती है. हर क्षण हमारे जीवन
की दिशा का चुनाव हमारे ही हाथ में होता है.
Thursday, August 1, 2013
नजर बदली तो नजारे बदले
दिसम्बर २००४
वस्तुओं को देखने का हमारा नजरिया यदि संकुचित होगा तो हमें
दोष ही दोष दिखाई देंगे, हमें अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाना होगा, लोगों की
मानसिकता को समझना होगा, यदि समाज में विषमता है, भ्रष्टाचार है तो उसके लिए हम भी
जिम्मेदार हैं. हमें स्वयं को सुधारने का प्रयत्न करना है. यदि एक अंगुली हम समाज
की ओर उठाते हैं तो चार अपनी ओर भी उठती हैं. समाज में रहकर हम उसके गुण-दोषों से
बच नहीं सकते साथ ही हमें इस बात का भी निरंतर ध्यान रखना होगा कि सृष्टिकर्ता की
नजर से कुछ बचा नहीं है, प्रकृति के कानून से कोई बच नहीं सकता. कुछ वस्तुएं हमें
कितनी भी भयावह दिखाई देती हों पर उनकी भी उपयोगिता है, इसका अर्थ यह नहीं कि हम
हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाएँ, बल्कि यह कि हम बिना प्रभावित हुए अपनी क्षमता के
अनुसार कार्य हाथ में लें. हम यदि अपने इर्द-गिर्द परिवर्तन लाना चाहते हैं तो
हमें अपने भीतर परिवर्तन लाना होगा, हम सभी को स्वीकार कर चलें तो मन से विरोध का
भाव चला जाता है. ईश्वर की जो अनुभूति हमें अपने भीतर होती है, वह कण-कण में होने
लगेगी. हर मन की गहराई में वही परमात्मा है. हमें हर एक के भीतर छिपी उस शक्ति तक
पहुंचना है. आत्मा में स्थित रहकर हम जगत को एक खेल की भांति ही देखते हैं, यहाँ
सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है. यहाँ कुछ लोग जगे हैं, कुछ सोये हैं, कुछ बेहोश हैं.
जगे हुए लोगों का साथ हमें भी सजग रखता है. सद्गुरु के अनुसार मन हम नहीं हैं, मन
कल्पनाओं का एक समूह है जो हमें भ्रमित करता है, हमारा उद्गम अनंत है और अनंत ही
हमारा स्वरूप है. यदि हमारे भीतर कोई वासना शेष न रहे तो हम उस ब्रह्म के निकट आ
जाते हैं, वही हमारा लक्ष्य है.
Wednesday, July 24, 2013
वसुधैव कुटुम्बकम
नवम्बर २०१३
हमारे समाज में बहुत विषमता है, कुछ सोने के चम्मच से खाते
हैं, कुछ के पास भोजन ही नहीं है. इसका एक कारण सामुदायिकता की चेतना का अभाव भी है.
यह चेतना कैसे व्यापक हो इसका हल वेदांत के पास है. वेदांत के अनुसार ब्रह्म एक
है, सभी के भीतर मूल संस्कार एक से हैं पर इसका भान नहीं है. जब हमें अपने भीतर
आत्मा का भास होने लगता है तो दृष्टिकोण विशाल हो जाता है, जीवन शैली बदलने लगती
है, व्यवहार बदलने लगता है, सारा समाज, सारा देश, सारा विश्व हमारा परिवार बनने
लगता है. साधकों के लिए यह अत्यंत जरूरी है कि व्यक्तिवादी मनोवृत्ति को बढ़ावा न
मिले, सभी के भीतर उसी चेतना को देखने का अभ्यास हो.
Tuesday, July 23, 2013
बन जायें मुरली कान्हा की
नवम्बर २००४
अध्यात्म के क्षेत्र में हम निरपेक्ष हैं, किन्तु समाज में
रहते हुए हमें कितनों की सहायता अपने जीवन में लेनी पडती है. वहीं हमारी साधना की
परीक्षा होती है.. जिसने ईश्वर का मार्ग अपनाया है, उसे अपनी ऊर्जा समाज के लिए
निस्वार्थ भाव से लगानी होगी, अन्यथा वह उसका करेगा भी क्या. हमारे सन्त जो स्वयं
पूर्णकाम हैं लोगों के जीवन में प्रकाश फ़ैलाने का कार्य करते हैं. साधक से यदि कोई
ऐसा काम न हो जिससे किसी को चोट पहुंचे तो उसके कर्म भी शुद्ध होते जायेंगे. ईश्वर
उसके माध्यम से स्वयं को प्रकट करेंगे. एक ही चेतना भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट
हो रही है, हमारे भीतर भी वह विद्यमान है, प्रकट होने की राह देख रही है. हमें उसे
मार्ग देना है, मिथ्या अभिमान तथा अज्ञान की पर्त को हटाकर उसे जगाना है. आत्मशक्ति
का जागरण ही आध्यात्मिकता है.
Friday, September 14, 2012
बने बांसुरी कान्हा की जो
अगस्त २००३
शंकर कहते हैं, भज गोविन्दं, भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढ़ मते...वे मानव को मूढ़
कहते हैं, कितना झकझोरता है उनका वचन, संत निर्भीक होता है, उसे समाज से कुछ तो
चाहिए नहीं वह सिर्फ देता है, और जो देना
जनता है वह डांट भी सकता है. हम वास्तव में कितने धार्मिक हैं इसका इसका पता संत
के सम्मुख जाने से ही चलता है. उनकी बातें एक आईना हैं जिसमें हमें अपना वास्तविक
चेहरा दिखाई देता है. वह सत्यस्वरूप हैं और उनके सम्मुख जाते ही हमारा झूठ उजागर
हो जाता है. हम जो प्रेम से अपने अंतर को भर लेते हैं उनके प्रति, ईश्वर के प्रति,
क्यों कठोर हो जाते हैं जब जगत से व्यवहार करते हैं. ईश्वर को माता-पिता मानकर
आराधनाएं तो करते हैं, पर वास्तविक माता-पिता की सेवा से क्यों घबराते हैं. आदर्शवादिता
की बातें तो बहुत करते हैं पर जीवन में उन्हें उतारने से पीछे हट जाते हैं.
सद्गुरु उस बांसुरी की तरह हैं जो स्वयं पीड़ा सहकर राग उत्पन्न करती है, वह कटती
है, तपती है, विरह की पीड़ा सहती है, तभी कृष्ण के अधरों से लगती है. वैसे ही संत
संत होने पूर्व विरह की आग में जलते हैं, तभी प्रभु का दीदार होता है, और उसके मुख
बन जाते हैं, वह उसकी तरफ से बोलते हैं. हमारे जीवन में स्वार्थ नहीं रहता, झूठा
गर्व नहीं रहता, हम भी प्रभु का साधन बन जाते हैं वह हमसे काम करवाने लगता है, और
हमारे कुशल-क्षेम का भार अपने ऊपर ले लेता है.
Thursday, July 12, 2012
सब उस पथ के ही राही हैं
मई २००३
ईश्वर को मानना ही नहीं जानना है क्योंकि मानना भी कल्पना है. हम अपने संस्कारों के
कारण, परिवार व समाज की मान्यता के कारण मन में ईश्वर का एक चित्र बना लेते हैं,
पर जब उसे स्वयं अनुभव करते हैं, तभी उसे वास्तव में जानते हैं. जीवन में श्रद्धा
हो, विश्वास हो, प्रेम हो, आस्था हो, अनुशासन हो, परहित की भावना हो, दोष दृष्टि न
हो, अपने दोषों को उखाड़ फेंकने की ललक हो, स्वयं को कुछ न मानते हुए उस परम सत्ता
को ही जगत का कारण मानते हुए निरहंकारी होते जाने का प्रयास हो, तभी साधना के पथ
का अधिकारी कोई बन सकता है. सभी में उसी चैतन्य का वास है, सभी अपने-अपने पथ से
उसी की ओर जा रहे हैं, सभी को वह उनकी क्षमता के अनुसार निर्देशित कर रहा है, यह
मानव जन्म हमें उस परम को जानकर आनंदित होने के लिये मिला है. जीवन का परम लक्ष्य
वही है, केवल वही, उसे पाकर कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता...
Tuesday, April 10, 2012
संशय के पार
जनवरी २००३
स्वयं पर संशय, समाज पर संशय और परमात्मा पर संशय, ये तीनों हमें प्रयत्नपूर्वक छोड़ने हैं. इनमें से एक भी हमारे प्रगति में बाधक है. इसके लिये मन की वृत्ति बिखरी हुई न हो एक ओर टिकी हो. ध्यान सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम होता जाय, तभी शक्ति व सामर्थ्य उभरता है और अंततः सारे संशयों का नाश होता है. ईश्वर सच्चिदानंद स्वरूप है, भौतिक जगत में उसका सत् स्वरूप प्रकट होता है, जीवों में उसका चैतन्य स्वरूप प्रकट होता है और भक्तों में उसका आनंद स्वरूप प्रकट होता है. दुःख का निमित्त बाहर है, दुःख मिलने पर मन में दुखाकार वृत्ति होती है उस वृत्ति से यदि हम एकाकार हों तभी दुःख गहरा होता है, यदि साक्षीभाव से देखना आ जाये तो हम उसके भागी नहीं होंगे. साधना के पथ पर जब एक बार कदम रख दें तो मन में उठने वाले प्रश्नों का जवाब किसी न किसी माध्यम से मिल ही जाता है. उस परम सत्ता पर पूर्ण विश्वास हो तो वह हमारी हर पल खबर लेता रहता है.
Wednesday, June 29, 2011
मानवता
जुलाई २०००
मानव का सतत् प्रयास यही होता है कि वह उन्नति करे, आगे ही आगे बढ़े... अनंत की ओर उसका प्रस्थान उसी ऊंचाई की तलाश है, जहाँ वह पहुंचना चाहता है. अपने आस-पास के समाज को यदि हम गहराई से देखें तो भौतिक उन्नति के चिह्न स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं, पर मात्र भौतिक उन्नति ही काफ़ी नहीं, एक और क्षेत्र है आत्मिक उन्नति का. जहाँ आगे बढ़ने के लिये ईश्वरीय प्रेरणा सहायक होती है. कुछ लोग कहते हैं कि ईश्वर को मानव ने अपने आदर्शों का मूर्त रूप बनाकर स्थापित किया है. ऐसा कहते हुए वे मानवीय चेतना को परम तक पहुंचने में समर्थ मानते हैं, वह ऐसी स्थिति है जहाँ मानव और ईश्वर के बीच कोई भेद नहीं रह जाता. कोई वहाँ पहुँच चुका है यह बात अन्यों को प्रेरणा देती है. जैसे पानी का स्वभाव है ऊपर से नीचे की ओर बहना, मानवता का स्वभाव है नीचे से ऊपर की ओर बढ़ना.
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