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Friday, September 14, 2012

बने बांसुरी कान्हा की जो


अगस्त २००३ 


शंकर कहते हैं, भज गोविन्दं, भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढ़ मते...वे मानव को मूढ़ कहते हैं, कितना झकझोरता है उनका वचन, संत निर्भीक होता है, उसे समाज से कुछ तो चाहिए नहीं वह  सिर्फ देता है, और जो देना जनता है वह डांट भी सकता है. हम वास्तव में कितने धार्मिक हैं इसका इसका पता संत के सम्मुख जाने से ही चलता है. उनकी बातें एक आईना हैं जिसमें हमें अपना वास्तविक चेहरा दिखाई देता है. वह सत्यस्वरूप हैं और उनके सम्मुख जाते ही हमारा झूठ उजागर हो जाता है. हम जो प्रेम से अपने अंतर को भर लेते हैं उनके प्रति, ईश्वर के प्रति, क्यों कठोर हो जाते हैं जब जगत से व्यवहार करते हैं. ईश्वर को माता-पिता मानकर आराधनाएं तो करते हैं, पर वास्तविक माता-पिता की सेवा से क्यों घबराते हैं. आदर्शवादिता की बातें तो बहुत करते हैं पर जीवन में उन्हें उतारने से पीछे हट जाते हैं. सद्गुरु उस बांसुरी की तरह हैं जो स्वयं पीड़ा सहकर राग उत्पन्न करती है, वह कटती है, तपती है, विरह की पीड़ा सहती है, तभी कृष्ण के अधरों से लगती है. वैसे ही संत संत होने पूर्व विरह की आग में जलते हैं, तभी प्रभु का दीदार होता है, और उसके मुख बन जाते हैं, वह उसकी तरफ से बोलते हैं. हमारे जीवन में स्वार्थ नहीं रहता, झूठा गर्व नहीं रहता, हम भी प्रभु का साधन बन जाते हैं वह हमसे काम करवाने लगता है, और हमारे कुशल-क्षेम का भार अपने ऊपर ले लेता है.

Tuesday, August 14, 2012

छल छल छलक रहा है घट


जुलाई २००३ 
भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़ मते..आदि गुरु शंकराचार्य ने कितना उचित कहा है कि जीव मूढ़ मति रखता है और उसी के सहारे सुख पाना चाहता है. ज्ञान, कृपा और ईश्वर का सानिध्य मिले बिना सुख नहीं मिल सकता और ये सब मति के शुद्ध होने पर ही मिलते हैं. उस परमात्मा ने इतना कुछ देकर हमें मालामाल कर दिया है, उसके कृतज्ञ होने के बजाय हमारी प्रार्थनाएँ मांगपत्र बन जाती हैं, जो कुछ उस प्रभु ने दिया है उसे सजाने संवारने में हम दाता को ही भूल जाते हैं. पर सदगुरु की अपार कृपा है कि वह हमें हर क्षण चेताते रहते हैं. निरंतर जगत की ओर ही नजर हो तो चिंता, तनाव, विकारों से मन भर जाता है, ईश्वर की ओर नजर हो तो भीतर भक्ति, सेवा और आनंद का उदय होता है. अहंकार का पेट कभी नहीं भरता, प्रेम का घट छलके बिना रहता नहीं है तभी तो भक्त उस अखिल ब्रह्मांड के स्वामी को एक फूल और जरा सा जल अर्पित करके भी तृप्ति का अनुभव कर लेते हैं.