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Wednesday, November 12, 2014

कोई नहीं वहाँ रहता अब

अप्रैल २००७ 
साधक का मन जब ख़ाली हो जाता है, कोई वस्तु नहीं मांगता, कुछ नहीं चाहता, जैसे यह है ही नहीं ! कुछ छूट भी  जाये तो भीतर एक कतरा भी न हिलता, कुछ हो तभी न हिलेगा, मन की गहराई में कुछ भी नहीं है वहाँ सब कुछ अचल है वहाँ कोई हलचल नहीं... वहां से केवल एक पुकार आती है कि कैसे इस जगत को कुछ दे दें, देने की बात ही अब प्रमुख है. प्रभु भी तो हर पल दे ही रहा है. अपना प्रेम, करुणा, और कृपा..सद्गुरु भी यही कर रहे हैं. साधक उनके जैसे बनने का प्रयत्न तो कर ही सकता है ! वह दे और बस ! एक क्षण भी वहाँ रुके नहीं, उस लेने वाले का आभार लेने के लिए बल्कि उसका आभारी हो कि वह वहाँ है ताकि उसके भीतर प्रेम जगे... न जाने कितने जन्मों से वह लेता आया है..अब और नहीं !


Tuesday, September 2, 2014

भक्ति करे कोई सूरमा

फरवरी २००७ 
भक्ति स्वयं प्रकाशित है, वह मणि है, जिसे न हवा का डर है न उसे जलाने के लिए तेल चाहिए. जैसे ज्ञान के दीपक को जलाने के लिए स्वाध्याय का तेल चाहिए. अन्य सभी साधनों में भी निरंतर अभ्यास की आवश्यकता हैं क्योंकि साधक स्वयं पर निर्भर है पर भक्ति में उसका भार स्वयं प्रभु ले लेते हैं. उसे तो बस पूर्ण समर्पण करना है. जब भक्त पूरी तरह से उन पर निर्भर हो जाता है तब भगवान उसके दोषों की तरफ नहीं देखते. उसके प्रति प्रेम वह जल है जो  त्रितापों से हमें बचाता है. जिसे हम प्रेम करते हैं उसे सुख मिले भक्त के हृदय में यह भावना दृढ़ होती है तभी उसके भीतर प्रेम नित-नित बढ़ता जाता है.


Monday, July 21, 2014

ढाई आखर प्रेम का

अक्तूबर २००६ 
नारद भक्ति सूत्रों के अनुसार प्रेम अनिर्वचनीय है. भावुकता प्रेम नहीं है, वह तो भाव से भी परे है. भीतर की दृढ़ता ही प्रेम है, सत्य प्रियता ही प्रेम है और असीम शांति भी प्रेम का ही रूप है. भीतर ही भीतर जो मधुर झरने सा झरता रहता है वह भी तो प्रेम है. प्रभु हर पल हम पर प्रेम लुटा रहे हैं. तारों का प्रकाश, चाँद, सूर्य की प्रभा, पवन का डोलना तथा पुष्पों की गंध सभी तो प्रेम का फैलाव हैं. प्रकृति हमसे प्रेम करती है. घास का कोमल स्पर्श, वर्षा की बूंदों की छुअन सब कुछ तो प्रेम ही है. वृद्ध की आँखों में प्रेम ही झलकता है, शिशु की मुस्कान में भी प्रेम ही बसता है. प्रेम हमारा स्वभाव है और प्रेम से ही हम बने हैं. 

Wednesday, July 9, 2014

तेरा तुझको अर्पण

सितम्बर २००६ 
संतजन कहते हैं परमात्मा को अपना प्रेम अर्पित करो तो कृपा रूप में वही वापस मिलेगा. प्रसाद भी वही होता है जो प्रभु के चरणों में अर्पित करके वापस मिलता है. जो हम देते हैं उससे कई गुणा लौटा कर वह हमें देते हैं. परमात्मा का बखान करना सूर्य को दीप दिखाने जैसा ही है फिर भी हृदय चाहता है कि वाणी उसका बखान करे, आँखें चाहती हैं कि आँसू उनका बखान करें और मन चाहता है कि भाव उसका अनुभव कर शब्दों के माध्यम से उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैलाएं ! ‘रसो वैः सा’ वह परमात्मा रस पूर्ण है, पर उसका स्वाद तो उसकी अनुभूति होने पर ही मिल सकता है. एक न एक दिन तो सभी को उस पथ का राही बनना है.

Monday, June 2, 2014

तेरा साहिब घट के भीतर

अप्रैल २००६ 
प्रेम से प्रभु प्रकटता है, प्रेम विश्वास से, विश्वास ज्ञान से, ज्ञान श्रद्धा से, श्रद्धा समता से और समता सत्य से और सत्य प्रभु ही है. हमारा हृदय जब समता से भर जाता है तब ही मानना चाहिए परम में हमारी स्थिति है, वह हम सभी के भीतर अनंत सुख के रूप में विद्यमान है. जब तक उसका ज्ञान नहीं होता तभी तक सारी बेचैनी है, उसके बाद तो मन मस्ती में डूब जाता है. हमारे भीतर जो मोती भरे छिपे हैं, जो अमृत भरा है उसे ध्यान की डुबकी लगा कर हम पा सकते हैं. भीतर उसका प्रकाश है, संगीत है, ऊर्जा है, आनंद है उस सारी सम्पत्ति को हम सहज ही पा सकते हैं. जगत के अभाव नित्य हैं, परमात्मा का भाव नित्य है. हमें भाव चाहिए, अभाव नहीं. 

Wednesday, May 14, 2014

मित्र वही जो बने सहायक

मार्च २००६ 
जीवन में कोई एक मंत्र हो, एक मित्र हो और एक सूत्र हो जो हमारी रक्षा करे. मंत्र, मित्र तथा सूत्र तीनों एक भी हो सकते हैं, एक ही सद्गुरु में समा सकते हैं जो हमारी रक्षा करता है. आत्मा भी एक मंत्र है, मित्र भी वह है, और सूत्र तो वह है ही. जो आत्मा में वास करता है सदा उसकी रक्षा होती है. ईश्वर भी हमारा मित्र है, उसका नाम मंत्र है, उसका ‘ध्यान’ ही सूत्र है. हमारा नेत्र भी मंत्र, मित्र तथा सूत्र हो सकता है. हमारी दृष्टि जितनी पवित्र होगी उतनी ही हमारी रक्षा होती रहेगी. दृष्टिकोण सकारात्मक हो, भाव उच्च हों तो हमारा अनिष्ट कैसे हो सकता है. हमारी दृष्टि जब धूमिल हो जाती है, चीजों को हम उनके सही रूप में नहीं देखते तभी हमारा अंतःकरण मलिन होता है. मूल रूप में सब पवित्र है. हमारा जीवन आनंद के लिए है, प्रभु को प्रेम करते करते त्याग करते हुए ग्रहण करने के लिए है न कि संसार के पीछे भागकर दुखी होके जीने के लिए. 

Tuesday, February 11, 2014

आनन्दित हो जाए हर पल

अगस्त २००५ 
जीवन प्रभु का दिया अमूल्य उपहार है, आनन्द से इसका एक-एक क्षण भरा है, जो डूबता है इसमें वही उबरता है. इसमें छिपे खजाने को पा लेता है, वही जीवन के रहस्य को जान जाता है. इतना सुखमय जीवन क्यों किसी के लिए दुःख का कारण बना रहता है ? परम तत्व को पाए बिना जो जीवन बीतता है वह अधूरेपन का शिकार रहता ही है ! मन को यदि एकाग्र करना आता नहीं तो विकारों से मुक्त नहीं हो सकते. साधना से यह कला सीखी जा सकती है, जीवन में सत्संग, सेवा, स्वाध्याय और ध्यान के फूल खिलने लगते हैं और जीवन एक उत्सव बन जाता है. ऐसे जीवन में ही परम का अवतरण होता है.

सेवा भी साधना है

अगस्त २००५ 
सेवा स्नेहवश होती है, वहाँ स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए, चाहिये तो केवल सेव्य की प्रसन्नता, सेवक यदि अपना सुख चाहे, अपनी रूचि को सेव्य पर लादे तो वह अपनी ही सेवा कर रहा है. हनुमान सेवक हैं, उनके प्रेम की धारा सदा आराध्य की ओर बहती है. वह राम की सेवा के अवसर खोजते हैं. हम लोग अपनी सुविधा देखकर सेवा करते हैं, तभी उसका फल नहीं मिलता. सच्ची सेवा करने से अन्तःकर्ण की शुद्ध होती है, अहंकार गलता है. सेवा हमें प्रभु के पास ले जा सकती है. 

Wednesday, January 29, 2014

प्रेम ही पूजा प्रेम ही अर्चन

जुलाई २००५ 
ध्यान प्रार्थना की पराकाष्ठा है, जिस प्रभु को हम अपने से दूर मानकर उसकी पूजा करते हैं, ध्यान में वही हमारे भीतर उतर आता है. ऐसे तो वह सदा से वहीं है पर हमें इसका ज्ञान नहीं है. ध्यान में उससे थोड़ी सी भी दूरी नहीं रह जाती. उसके और हमारे बीच की दूरी केवल मन द्वारा मानी हुई है. मन में संकल्प-विकल्प न रहें तो जो बचता है वह वही है. वह सागर है तो हम उसकी लहरें. वह है तो हम हैं, वही हम हुए हैं इसकी अनुभूति जब भीतर जगती है तो प्रेम जगता है. शुद्ध प्रेम जब उतरता है तो उसका कोई लक्ष्य नहीं होता वह सभी के लिए होता है बिना किसी भेदभाव के. चेतन-अचेतन सभी प्राणियों, वस्तुओं के लिए. इस सृष्टि में सब कुछ प्रेम से ही उपजा है, जो भी विकृति यहाँ दिखाई देती है , वह प्रेम में आई विकृति है. हमें पुनः शुद्ध प्रेम को जगाना है, जो स्वयं में इतना परिपूर्ण है कि उसकी सारी शर्तें खो जाती हैं. पूर्ण में यदि कुछ जुड़े तो भी पूर्ण ही रहेगा और कुछ घटे तब भी, परमात्मा ऐसा ही पूर्ण प्रेम है. 

Wednesday, December 25, 2013

हर राह उसी तक लाती है

मई २००५ 
“पहाड़ के नीचे की घास बनकर रहो, आंगन में उगा चमेली का वृक्ष बन कर रहो, मुसीबत आने पर पत्थर की चट्टान बन कर रहो और दीन-दुखियों के लिए शक्कर और गुड़ बन कर रहो”

एक महान कन्नड़ सन्त की सूक्तियां हैं ये. पहाड़ के नीचे की घास का अर्थ है अहंकार रहित होकर जीना, अहंकार युक्त मन ही प्रभु से दूर ले जाता है. चमेली का बिरवा अपने घर के साथ-साथ बाहर भी सुगंध फैलाता है. मन हमें उससे दूर ले जाता है जब हम अपने सुख में किसी अन्य को शामिल नहीं करते. मन यदि स्वार्थी है तो ही भीरु भी है, निडर, संवेदनशील मन जो दया से भरा हो किसी भी परिस्थिति में समता बनाये रह सकता है. जितना सम्भव हो सके स्वयं को सबके लिए उपलब्ध करा सकें तो जीवन अपने आप ही मधुर हो जायेगा, जो स्वयं के लिए गुड़ है वही तो अन्यों के लिए भी हो सकता है. परमात्मा की राह पर चलने वाले साधक को तो इतना सजग रहना ही होगा.

Tuesday, December 3, 2013

पार हुआ जो तीन गुणों से

अप्रैल २००५ 
ईश्वर अकारण दयालु है, परम मित्र है, परम स्नेही है, सुह्रद है, हितैषी है, अपना है और सदा हमारे साथ है. इतना सब होते हुए भी मानव दुखी है, यह कैसा विरोधाभास है, कैसे विडम्बना है ? हम ईश्वर की तथाकथित भक्ति तो करते हैं पर उससे दूर-दूर ही रहते हैं उससे डरते हैं, या तो अपने आप से डरते हैं या ईश्वर इतना शुद्ध है कि हमारे भीतर की अशुद्धता उसके निकट  जाते ही स्पष्ट दिखाई देने लगती है, या हम ईश्वर से दूर-दूर का ही नाता रखना चाहते हैं, हम डरते हैं कि प्रभु हमसे कुछ छीन न ले, हम निरे बच्चों का सा व्यवहार करते हैं उसके सम्मुख ! हम नाटक करते हैं, स्वयं को धोखा देते हैं, क्योंकि उसे तो धोखा दिया ही नहीं जा सकता. कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति अपने गुणों के अनुसार ही वर्तती है और गुणों के वशीभूत हुए प्राणी भिन्न-भिन्न व्यवहार करते हैं, और यह गुण उन्हें कर्मों के अनुसार मिलते हैं, हमारा अधिकार कर्म करने तक ही है. पूर्व आदतों के अनुसार ही यदि कर्म करते रहे तो जीवन पूर्ववत ही बना रहेगा, ध्यान से हम संस्कारों को बदल सकते हैं जिनसे सात्विक स्वभाव को प्रप्त होंगे. गुणों को बदलना हमारे हाथ है यह जानने के बाद कौन है जो प्रकृति के वशीभूत होकर कर्म करेगा, सजग व्यक्ति अपना निर्माता स्वयं होता है.


Monday, November 11, 2013

मुक्त हुआ मन भजे परम को

अप्रैल २००५ 
प्रभु प्रेम का महासागर है और मन उस प्रेम की एक लहर है, एक बूंद है, यह मन परमात्मा से मिलकर ही संतुष्टि का अनुभव करता है. जब तक वह उससे दूर है, तो भीतर एक कचोट है उठती है, वह विरह की पीड़ा है, जब वह विरह बढ़ने लगता है, प्रभु को पाने की चाह हमारे भीतर बढ़ने लगती है. जब यह चाह पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है तो परम अपने को प्रकट कर  देता है. तब हमें अपनी आत्मा का परिचय होता है, स्वयं से मिलने के बाद साधक के जीवन में केवल एक ही कार्य शेष रह जाता है, वह है प्रेम, उसके लिए जगत में एक ही वस्तु रह जाती है वह है परमात्मा, ईश्वर और प्रेम दो नहीं हैं, एक के ही दो नाम हैं ठीक उसी तरह जैसे भाग्य और पुरुषार्थ दो नहीं हैं एक हैं, हमारे पूर्व में किया गया कार्य यानि पुरुषार्थ ही वर्तमान में भाग्य बनकर सामने आ जाता है. वैसे ही जीवन में ईश्वर हो तो प्रेम स्वतः ही पनपता है और प्रेम प्रकट हो जाये तो ईश्वर स्वयं ही खींचे चले जाते हैं. मन मयूर तब नृत्य कर उठता है, भीतर कोई रस फूट पड़ता है, मस्ती की लहर हिलोरे लेती है. रोम-रोम में उस राम का नाम प्रतीत होता है. जीवन का शुभारम्भ वास्तव में तभी से होता है, उसके पूर्व तो मन, इन्द्रियों का गुलाम था, सदा अधीन रहता था, पराधीन को सुख कहाँ, जोमुक्त है वही सुखी है, मुक्ति ही भक्ति है.


Thursday, September 19, 2013

'मैं' से' 'मैं' तक

फरवरी २००५ 
प्रभु ! तू याद आता क्यों नहीं है
इस दिल में समाता क्यों नहीं है

हमारी सोच ‘मैं’ से शुरू होती है और ‘मैं’ पर खत्म भी होगी. हम जो भी कर्म कर रहे होते हैं चाहे वे अपने लिए हों या दूसरों के लिए, ‘मैं’ की धुरी के इर्द-गिर्द ही होते हैं. अस्तित्त्व से जुड़े बिना हमारे कार्यों, वाणी तथा विचारों में गहराई नहीं आती, हम सतही स्तर पर ही जीवन जिए चले जाते हैं, पर जब हम अपने भीतर की सत्यता का अनुभव करते हैं तो हमारा ‘मैं’ जो पहले संकीर्ण था, अब सब कुछ उसमें समा जाता है, जीवन जैसा आता है उसे वैसा स्वीकारने की क्षमता पैदा होती है. हमारे ‘स्व’ का विस्तार होता है, सभी के भीतर उसी एक अस्तित्त्व का दर्शन हमें होता है. 

Friday, October 26, 2012

जिन ढूंढा तिन पाइयाँ


प्रभु अपने भक्तों को अपना दर्शन देते हैं, वे उसको अपना पता बताते हैं जो उनसे पूछता है. वे उसके लिए अपना भेद खोल देते हैं जो उन्हें प्रेम करता है. वे हमारी बुद्धि को प्रज्ञा में बदलते हैं. वे ही हमें इस क्रीड़ास्थल पर भेजते हैं और वे ही इस खेल के नियम भी बतलाते हैं और परिणाम भी. हमें इसे खेल भावना से खेलना है तभी हम इसका पूरा आनंद ले सकते हैं. लेकिन अन्ततः घर लौटना है, वह  घर है उसका सान्निध्य, वहाँ पुष्ट होकर पुनः पुनः इस जगत में आना होता है, पर जिसका मन इस खेल से भर जाये वह सदा के लिए उनके सान्निध्य में रह सकता है. इसे ही निर्वाण कहते हैं. निर्वाण का अनुभव इस जगत में भी हम करते हैं, गहरी नींद में जब हमें अपना भान नहीं रहता, हम प्रायः मृत ही हो जाते हैं, पुनः जगते हैं अथवा जन्मते हैं. ध्यान में भी जब देह का भान नहीं रहे, समय का पता न चले तब उसकी झलक पाते हैं. यह सब मौन में ही अनुभव होता है, अत्यंत सूक्ष्म यह भाव टिकता नहीं पर इसकी स्मृति ही ताजगी से भर देती है.

Wednesday, October 10, 2012

जग वैसा जैसा हम देखें


जब तक हमारे भीतर विकार है तभी तक हमारी दृष्टि दूसरों में विकार देखती है. जब हमारा चित्त पूरी तरह निर्मल हो जाता है तो दुनिया में कहीं भी कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती. संतों का ऐसा कहना है. यदि दिखाई दे भी तो उसके प्रति द्वेष नहीं जगता बल्कि स्नेह से उसे दूर करने का प्रयास अथवा तो शक्ति वह जगत को देता है. हम दोष देखकर स्वयं को ही पीड़ित करते हैं, और अपनी ऊर्जा का ह्रास करते हैं. हमें प्रतिक्रिया व्यक्त न करके उसके लिए कुछ करना होगा. यदि हम कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हैं तो अपने मन की शांति तो बनाये रख ही सकते हैं, उतना ही पर्याप्त होगा. यह जगत वैसा ही दिखाई पड़ता है जैसा हम इसे देखना चाहें, यह जगत उस प्रभु का ही तो उपहार है, वह स्वयं भी इसके कण-कण में ओत-प्रोत है. “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मुरति देखि तिन तैसी”. हम अपने अपने स्वभाव, रूचि और मन स्थिति के अनुसार एक कल्पना गढ़ लेते हैं और अस्तित्त्व की आवाज को अनसुना करते हैं, जो मन की कल्पनाओं से परे है, वह आनन्दमय, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और अनंत है. आकाश की तरह वह सभी कुछ अपने में समेटे हुए है अच्छा-बुरा उसके लिए समान है, वह राग-द्वेष से परे है. उसके सान्निध्य में रहकर हृदय में कोई अशुभ विचार टिक नहीं सकता, तत्काल भीतर से एक संदेश आता है और कोई सद्वचन जैसे हवा के झोंके की तरह आकर उस नकारात्मकता को अपने साथ लिए जाता है. 

Tuesday, September 18, 2012

अति सूक्ष्म है उसकी वाणी


अगस्त २००३ 
यदि हमारे मन में कोई ऐसी बात किसी के लिए आती है जो उसके सम्मुख नहीं कह सकते तो समझना चाहिए कि मन में विकार जगा है, मन में जगा हर विकार हमें बताता है कि अभी हम प्रभु से कितनी दूर हैं, और जब हम गलती को दोहराते हैं तो वह जड़ पकड़ लेती है तब मन की संवेदनशीलता धीरे-धीरे कम होने लगती है और हम प्रभु की उपस्थिति को भी भूल जाते हैं. हमें तो हर क्षण उसकी अलख जगानी है, अपने हृदय को कोमल बनाना है, इतना कोमल कि सूक्ष्मतर विकार भी उसे आघात पहुँचाए और हम सजग हो जाएँ. अपने हृदय पर पड़ी ईश्वर की छुअन भी हम तभी अनुभव कर पाते हैं अन्यथा तो वह इतना निकट है कि उसकी आवाज हमें स्पष्ट सुनाई देनी चाहिए. उसकी उपस्थिति का भाव होता रहे तो मन कितना पवित्र महसूस करता है. मनसा, वाचा, कर्मणा हमें सजग रहना ही होगा, कहीं भी चूके तो सिवा पछतावे के कुछ भी हाथ आने वाला नहीं है. प्रभु के पवित्र नामों का उच्चारण करते समय जब मन आँसुओं से भीग जाये कि यह वही जिह्वा है जिससे न जाने कितने अपशब्द हमने बोले हैं और उसी का उपयोग हम ईश्वर के नामों का उच्चारण करने में करते हैं, तो स्मरण आए, मन तो और भी सूक्ष्म है. खाली मन ही उसका चिंतन कर सकता है.

Friday, September 14, 2012

बने बांसुरी कान्हा की जो


अगस्त २००३ 


शंकर कहते हैं, भज गोविन्दं, भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढ़ मते...वे मानव को मूढ़ कहते हैं, कितना झकझोरता है उनका वचन, संत निर्भीक होता है, उसे समाज से कुछ तो चाहिए नहीं वह  सिर्फ देता है, और जो देना जनता है वह डांट भी सकता है. हम वास्तव में कितने धार्मिक हैं इसका इसका पता संत के सम्मुख जाने से ही चलता है. उनकी बातें एक आईना हैं जिसमें हमें अपना वास्तविक चेहरा दिखाई देता है. वह सत्यस्वरूप हैं और उनके सम्मुख जाते ही हमारा झूठ उजागर हो जाता है. हम जो प्रेम से अपने अंतर को भर लेते हैं उनके प्रति, ईश्वर के प्रति, क्यों कठोर हो जाते हैं जब जगत से व्यवहार करते हैं. ईश्वर को माता-पिता मानकर आराधनाएं तो करते हैं, पर वास्तविक माता-पिता की सेवा से क्यों घबराते हैं. आदर्शवादिता की बातें तो बहुत करते हैं पर जीवन में उन्हें उतारने से पीछे हट जाते हैं. सद्गुरु उस बांसुरी की तरह हैं जो स्वयं पीड़ा सहकर राग उत्पन्न करती है, वह कटती है, तपती है, विरह की पीड़ा सहती है, तभी कृष्ण के अधरों से लगती है. वैसे ही संत संत होने पूर्व विरह की आग में जलते हैं, तभी प्रभु का दीदार होता है, और उसके मुख बन जाते हैं, वह उसकी तरफ से बोलते हैं. हमारे जीवन में स्वार्थ नहीं रहता, झूठा गर्व नहीं रहता, हम भी प्रभु का साधन बन जाते हैं वह हमसे काम करवाने लगता है, और हमारे कुशल-क्षेम का भार अपने ऊपर ले लेता है.

Sunday, August 21, 2011

जय श्री कृष्ण


कृष्णंवन्देजगद्गुरुं... कृष्ण सारे जगत के गुरु हैं. जहां कृष्ण हैं वहाँ श्री है. वे सहज हैं भीतर और बाहर एक से, युद्ध के मैदान में भी और सखाओं के साथ खेल में भी. भीतर की शुद्धता ही उन्हें सहज बनाती है. कृष्ण के प्रति श्रद्धा का भाव रखकर हम उस ज्ञान के अधिकारी बन सकते हैं, जो हमें दृढ निश्चयी बनाता है, समता सिखाता है. स्वयं को भुलाकर, अहम् त्याग कर जब हम कृष्ण के सम्मुख जाते हैं तो उनकी कृपा, जो सदा बरस ही रही है हमें भी मिलने लगती है, उनके सामने हमारी उपलब्धियों की कोई कीमत नहीं. यदि हमें मान चाहिए तो प्रभु के सम्मुख नहीं आना चाहिए. अहंकार को पोषणा नहीं है उसे तोडना है तभी हम कृष्ण के निकट आ सकते हैं.