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Monday, November 1, 2021

जीवन में जब सत्व जगेगा

नित्य सुख, नित्य ज्ञान, नित्य आनंद मानव की मूलभूत आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति सत्संग से होती है. जीवन की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की भांति सत्संग की ओर भी वही परमात्मा ही ले जाता है, वह उन्हें उनसे ज्यादा जानता है. उनकी उन्नति की उसे उनसे अधिक परवाह है. कुछ ऐसा मानते हैं, वह जिससे प्रसन्न होता है उसे सांसारिक आकर्षणों से वियुक्त करता है और जिससे रुष्ट होता है उनके तमोगुण व रजोगुण की वृद्धि देता है. किंतु सत्य यह है कि जो उसके प्रति कृतज्ञ है, आभारी है, वह सत्व गुणों को धारण करने लगता है।  सात्विक भावों का आदर करने की क्षमता उसे ही मिलती है जिसे सहज ही सत्य और अहिंसा प्रिय है. जगत का अनुभव है कि मृत्यु के क्षण में इस दुनिया में हर कोई पूर्णत: अकेला है, उस समय सिवाय परमात्मा के वह किसी पर भी निर्भर नहीं हो सकता. हरेक की अपनी दुनिया होती है जो उसने स्वयं ही बनाई है पर जब उस दुनिया में परमात्मा अपना अधिकार कर लेते हैं तो वह अकेलापन एकांत में बदल जाता है।

Thursday, July 9, 2020

सत्व गुण जब बढ़ेगा मन में


पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियाँ और मन ये सब मिलकर ग्यारह इन्द्रियां हैं. श्रवण करते समय कान, शब्द तथा मन ये तीन उपस्थित होते हैं, इसी प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय के द्वारा विषय अनुभव करते समय विषय, मन और इन्द्रिय तीन की उपस्थिति रहती है.  शब्द का आधार कान है और कान का आधार आकाश है; अतः वह आकाशरूप ही है. इसी प्रकार त्वचा, जिह्वा, नेत्र और नासिका भी क्रमशः स्पर्श, स्वाद, रूप और गंध का आश्रय तथा अपने आधार पवन, अग्नि, पृथ्वी और जल के स्वरूप हैं. इन सबका अधिष्ठान है मन. इसलिए सबके सब मन स्वरूप हैं. इनमें मन कर्ता है, विषय कर्म है और इन्द्रिय करण है. ये कर्ता, कर्म और करण रूपी तीन प्रकार के भाव बारी-बारी से उपस्थित होते हैं. इनमें से एक-एक के सात्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद होते हैं. अनुभव भी तीन प्रकार के ही हैं. हर्ष, प्रीति, आनंद, सुख और चित्त की शांति का होना सात्विक गुण का लक्षण है. असन्तोष, सन्ताप, शोक, लोभ तथा अमर्ष -ये किसी कारण से हों या अकारण, रजोगुण के चिह्न हैं. अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य -ये किसी भी तरह क्यों न हों, तमोगुण के ही नाना रूप हैं. प्रत्येक साधना का लक्ष्य सत्वगुण को बढ़ाते जाना है और रजोगुण व तमोगुण को कम करना है. 

Tuesday, December 3, 2013

पार हुआ जो तीन गुणों से

अप्रैल २००५ 
ईश्वर अकारण दयालु है, परम मित्र है, परम स्नेही है, सुह्रद है, हितैषी है, अपना है और सदा हमारे साथ है. इतना सब होते हुए भी मानव दुखी है, यह कैसा विरोधाभास है, कैसे विडम्बना है ? हम ईश्वर की तथाकथित भक्ति तो करते हैं पर उससे दूर-दूर ही रहते हैं उससे डरते हैं, या तो अपने आप से डरते हैं या ईश्वर इतना शुद्ध है कि हमारे भीतर की अशुद्धता उसके निकट  जाते ही स्पष्ट दिखाई देने लगती है, या हम ईश्वर से दूर-दूर का ही नाता रखना चाहते हैं, हम डरते हैं कि प्रभु हमसे कुछ छीन न ले, हम निरे बच्चों का सा व्यवहार करते हैं उसके सम्मुख ! हम नाटक करते हैं, स्वयं को धोखा देते हैं, क्योंकि उसे तो धोखा दिया ही नहीं जा सकता. कृष्ण कहते हैं कि प्रकृति अपने गुणों के अनुसार ही वर्तती है और गुणों के वशीभूत हुए प्राणी भिन्न-भिन्न व्यवहार करते हैं, और यह गुण उन्हें कर्मों के अनुसार मिलते हैं, हमारा अधिकार कर्म करने तक ही है. पूर्व आदतों के अनुसार ही यदि कर्म करते रहे तो जीवन पूर्ववत ही बना रहेगा, ध्यान से हम संस्कारों को बदल सकते हैं जिनसे सात्विक स्वभाव को प्रप्त होंगे. गुणों को बदलना हमारे हाथ है यह जानने के बाद कौन है जो प्रकृति के वशीभूत होकर कर्म करेगा, सजग व्यक्ति अपना निर्माता स्वयं होता है.