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Monday, November 1, 2021

जीवन में जब सत्व जगेगा

नित्य सुख, नित्य ज्ञान, नित्य आनंद मानव की मूलभूत आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति सत्संग से होती है. जीवन की अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति की भांति सत्संग की ओर भी वही परमात्मा ही ले जाता है, वह उन्हें उनसे ज्यादा जानता है. उनकी उन्नति की उसे उनसे अधिक परवाह है. कुछ ऐसा मानते हैं, वह जिससे प्रसन्न होता है उसे सांसारिक आकर्षणों से वियुक्त करता है और जिससे रुष्ट होता है उनके तमोगुण व रजोगुण की वृद्धि देता है. किंतु सत्य यह है कि जो उसके प्रति कृतज्ञ है, आभारी है, वह सत्व गुणों को धारण करने लगता है।  सात्विक भावों का आदर करने की क्षमता उसे ही मिलती है जिसे सहज ही सत्य और अहिंसा प्रिय है. जगत का अनुभव है कि मृत्यु के क्षण में इस दुनिया में हर कोई पूर्णत: अकेला है, उस समय सिवाय परमात्मा के वह किसी पर भी निर्भर नहीं हो सकता. हरेक की अपनी दुनिया होती है जो उसने स्वयं ही बनाई है पर जब उस दुनिया में परमात्मा अपना अधिकार कर लेते हैं तो वह अकेलापन एकांत में बदल जाता है।

Thursday, October 1, 2020

सत्य, अहिंसा मूल धर्म के

 आज बापू का जन्मदिन है और शास्त्री जी का भी. वर्तमान पीढ़ी को इन दोनों महापुरुषों से बहुत कुछ सीखना है. दोनों का जीवन सादगी भरा था,  दिखावे और बनावट के लिए उसमें कोई स्थान नहीं था. पर्यावरण के प्रति इतना लगाव था कि आश्रम के बाहर बहती नदी के बावजूद गांधी जी थोड़े से पानी से अपना काम चलाते थे. लिखने के लिए कागज का पूरा उपयोग करते, यहां तक कि छोटे-छोटे पुर्जों पर भी लिखने में उन्हें संकोच नहीं होता था. मितव्ययता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जब की देश और दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही है, हमें अपने विलासिता पूर्ण खर्चों को घटाकर उनकी सहायता करनी चाहिए जिनके पास कुछ भी नहीं है या बहुत कम है. किसानों के प्रति दोनों के मन में सम्मान था, वे उन्हें अन्नदाता कहते थे. किसानों की आय बढ़े, वे शिक्षित हों तथा जमींदारों के चंगुल से बचें इसके लिए गाँधी जी ने बहुत काम किया. शास्त्री जी ने तो ‘जय किसान’ का नारा ही दिया था. हिंसा के इस दौर में भी गाँधी जी प्रासंगिकता बढ़ जाती है, वे मन, वचन, काया किसी भी प्रकार की हिंसा को पाप का मूल समझते थे. उनके जीवन में हास्य-विनोद का भी बहुत बड़ा स्थान था, वह कहते थे हँसी मन की गाठों को खोल देती है. वह मानव जीवन को एक बड़े उद्देश्य के लिए मिला हुआ अवसर मानते थे. उनका कहना था शिक्षा का काम है छात्र या छात्रा के अंदर छुपी सभी प्रकार की शक्तियों को बाहर लाना, जो शिक्षा ऐसा नहीं करती वह सफल नहीं है. बचपन से ही बालकों को चरित्र निर्माण की शिक्षा मिले जिससे वे जीवन में आने वाली किसी भी बाधा से घबराये नहीं, ऐसी शिक्षा के वह पक्षधर थे. आज के दिन हमें अपनी भावी पीढ़ी को उन आदर्शों और मूल्यों के बारे में बताना चाहिए जिसके लिए बापू और शास्त्री जी  ने अपना जीवन ही दे दिया.  


Thursday, August 3, 2017

अहिंसा परमो धर्मः

४ अगस्त २०१७ 
एक बार यदि साधक यह निर्णय ले लेता है कि उसे योग मार्ग पर आगे बढ़ना है, जीवन के परम लक्ष्य को पाना है अर्थात सर्वदुखों से सर्वकाल के लिए मुक्त होना है तो तत्क्षण उसे साधना आरम्भ कर देनी चाहिए. चाहे आधा घंटा ही की जाये, प्रतिदिन नियमित की गयी साधना फल देने लगती है. भूतकाल में किसी न किसी को दुःख दिया होगा, मन ही मन उससे क्षमा मांगकर भविष्य में किसी को कोई दुःख नहीं देना है अर्थात अहिंसा के पालन का व्रत भी ले लेना चाहिए. क्रोध हिंसा का ही एक रूप है. दोष दृष्टि भी हिंसा है. मन में क्षोभ का भाव जगे अथवा द्वेष का ये सभी हिंसा हैं. मन को शांत रखने के लिए अहिंसा का पालन अति आवश्यक है.


Wednesday, July 26, 2017

सारा जग जब मीत बनेगा

२६ जुलाई २०१७ 
क्रोध और मोह से विहीन, राग-द्वेष से मुक्त जीवन ही असली जीवन है. यदि हम इन विकारों से मुक्त नहीं हो पाते तो इसका कारण बाहर नहीं है. हमारी असफलता का कारण भीतर ही है. सुख की कामना ही मोह है. मोह के कारण ही हमें भय सताता है और अज्ञान के कारण ही इस सत्य को हम देख नहीं पाते. सुख के जिन साधनों के पीछे जाकर पहले-पहल हम मुग्ध होते हैं बाद में वही दुःख का कारण बन जाते हैं. हमारे सुख में जो बाधक हो उसके प्रति द्वेष करते हैं पर नहीं जानते कि शुद्ध अहिंसा जब किसी हृदय में घटती है उसके लिए कोई पराया नहीं रह जाता. जग के साथ वह एक हो जाता है और उसके अंतर्मन में करुणा जल अनायास ही बहने लगता है.

Wednesday, August 21, 2013

अभय हुये जो बनें अहिंसक

जनवरी २०१३ 
भय और हिंसा समानार्थी शब्द हैं, अभय और अहिंसा का एक ही अर्थ है. यदि हमें रोग, बुढ़ापे तथा मृत्यु का भय है तो हम हिंसक हैं, किसी भी प्रकार का तनाव हिंसा ही है, यदि हम मन को समत्व भाव स्थित नहीं रख पाते, अनुकूल परिस्थिति में प्रसन्न तथा प्रतिकूल परिस्थिति में दुखी हो जाते हैं तो भी हम हिंसा में विश्वास रखते हैं. अहिंसा का पालन करने वाला कभी भयभीत नहीं होता. पूर्णता में जीना और पूर्णता में मरना उसके लिए सहज होता है.

Friday, February 15, 2013

चेतन ही है सारी सृष्टि


मार्च २००४ 
परमेश्वर को जान लिया, यह कहना ही गलत है क्योंकि परमेश्वर ज्ञेय वस्तु नहीं है, वह स्वयं ज्ञान है, वही वह शक्ति है जिससे जाना जाता है. वह स्थिति अनिर्वचनीय है. यदि हम कहें जिसे जानना था जान गए तो जड़ता का भय रहता है, जो अनजाना है उसे जानने की उत्सुकता ही हमें चेतन बनाये रखती है. ध्यान में हम जड़ शरीर से व मन, बुद्धि से भी स्वयं को परे देखने लगते हैं, द्रष्टा भाव में जब हम आ जाते हैं तो अपने मन के विचारों को भी देखना सीख लेते हैं, तब अपने चेतन स्वरूप का ज्ञान होता है. तब जीवन अहिंसामय होता है, सात्विक होता है. ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार आदि दोषों को भीतर देखना जब आ जाता है तभी तो उन्हें दूर कर सकते हैं, तभी जीवन सजगता पूर्वक जीने की कला आती है, भीतर की शक्तियाँ प्रकट होने लगती हैं, भीतर जो जड़ता थी वह समाप्त होने लगती है, तब प्रकृति में भी सजीवता का दर्शन होता है. कण-कण में उसी प्रभु की सत्ता का दीदार तब होता है. 

Wednesday, January 9, 2013

शांति है जहां प्रगति है वहाँ


जनवरी २००४ 
शान्ति पूर्वक सहअस्तित्त्व हमारी पहली आवश्यकता है, तभी किसी भी तरह का विकास सम्भव है. अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना ही नहीं है, बल्कि हमें इसके सूक्ष्म स्वरूप को भी जानना होगा. क्रोध का कोई भी रूप हिंसा है, द्वंद्व भी हिंसा है, द्वन्द्वातीत हुए बिना मन शांत नहीं हो सकता. अहिंसा का प्रारम्भ सर्वप्रथम घर से होता है, आज समाज के बदले हुए वातावरण में घरेलू हिंसा का शिकार वृद्ध, महिलाएं, बच्चे, अशक्त सभी किसी न किसी रूप में हो रहे हैं, आये दिन जो समाचार तथा आंकड़े मिलते हैं, उन्हें देखकर आश्चर्य होता है कि क्या हम एक सभ्य समाज के नागरिक हैं? धर्म जब तक जीवन का एक मह्त्वपूर्ण अंग नहीं बन जाता, आचरण में नहीं उतरता, परिवर्तन नहीं होगा. घरों में नियमित संध्या, ध्यान तथा सद्ग्रन्थों का पाठ होता रहे तो बच्चों को संस्कार मिलते रहते हैं. आज पीढियों का अंतर बढ़ता जा रहा है इसे दूर करने का सबसे सुंदर उपाय है धर्म तथा अध्यात्म, जहां किसी भी तरह का कोई भेद नही होता.