बापू के जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वह सत्य और अहिंसा के प्रति पूर्ण समर्पित थे। वह समय के पाबंद थे, नियमित भ्रमण करते थे, शाम को उनके सत्संग का भी समय निश्चित था। वह सात्विक व शाकाहारी भोजन के हिमायती थे। उनके आश्रमों के नियम बहुत कठोर थे और उस समय के लिए संभवतः आवश्यक भी थे। देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं को उन्हें गढ़ना था। वह वस्तुओं का समुचित उपयोग करना चाहते थे, काग़ज़ का एक टुकड़ा हो या पैर रगड़ने वाला छोटा सा पत्थर, उनके लिए महत्वपूर्ण थे। उन्होंने अपने लिए अनेक मर्यादाओं को तय किया और उनका पालन किया। सत्य या ईश्वर की खोज उनके जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण स्थान रखती थी जितना देश को आज़ाद कराना। उन्होंने सविनय अवज्ञा व सत्याग्रह आदि जितने आंदोलन किए, अपने आदर्शों को सदा आगे रखा। दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों की दशा देखकर उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा का आरंभ किया, आज भी वहाँ उन्हें आदर से याद किया जाता है और नेल्सन मंडेला के उनके रास्ते पर चलकर अपने देश को आज़ाद कराया। गांधी जी ने अस्पृश्यता जैसे सामाजिक रोग को दूर करने के लिए बहुत कार्य किया। नारियों की शक्ति को पहचान कर उन्हें शिक्षा प्राप्त करने व सामाजिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं और गांधी वांग्मय नाम से उनके लिखे लेखों, भाषणों व पत्रों का एक विशाल भंडार है जो आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित कर सकता है। वह भारत में रामराज्य की स्थापना करना चाहते थे। सभी धर्मों के प्रति उनके मन में आदर था। अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को आगे लाना उनकी प्राथमिकता थी। विश्व के हर कोने में गांधी जी को सम्मान मिला। वर्तमान में कुछ लोग भले ही कुछ बातों के लिए उनका विरोध करते हों, पर उनके असाधारण कार्यों के लिए सभी के दिल में उनके लिए अपार आदर है।
Friday, September 30, 2022
Thursday, October 1, 2020
सत्य, अहिंसा मूल धर्म के
आज बापू का जन्मदिन है और शास्त्री जी का भी. वर्तमान पीढ़ी को इन दोनों महापुरुषों से बहुत कुछ सीखना है. दोनों का जीवन सादगी भरा था, दिखावे और बनावट के लिए उसमें कोई स्थान नहीं था. पर्यावरण के प्रति इतना लगाव था कि आश्रम के बाहर बहती नदी के बावजूद गांधी जी थोड़े से पानी से अपना काम चलाते थे. लिखने के लिए कागज का पूरा उपयोग करते, यहां तक कि छोटे-छोटे पुर्जों पर भी लिखने में उन्हें संकोच नहीं होता था. मितव्ययता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जब की देश और दुनिया मंदी के दौर से गुजर रही है, हमें अपने विलासिता पूर्ण खर्चों को घटाकर उनकी सहायता करनी चाहिए जिनके पास कुछ भी नहीं है या बहुत कम है. किसानों के प्रति दोनों के मन में सम्मान था, वे उन्हें अन्नदाता कहते थे. किसानों की आय बढ़े, वे शिक्षित हों तथा जमींदारों के चंगुल से बचें इसके लिए गाँधी जी ने बहुत काम किया. शास्त्री जी ने तो ‘जय किसान’ का नारा ही दिया था. हिंसा के इस दौर में भी गाँधी जी प्रासंगिकता बढ़ जाती है, वे मन, वचन, काया किसी भी प्रकार की हिंसा को पाप का मूल समझते थे. उनके जीवन में हास्य-विनोद का भी बहुत बड़ा स्थान था, वह कहते थे हँसी मन की गाठों को खोल देती है. वह मानव जीवन को एक बड़े उद्देश्य के लिए मिला हुआ अवसर मानते थे. उनका कहना था शिक्षा का काम है छात्र या छात्रा के अंदर छुपी सभी प्रकार की शक्तियों को बाहर लाना, जो शिक्षा ऐसा नहीं करती वह सफल नहीं है. बचपन से ही बालकों को चरित्र निर्माण की शिक्षा मिले जिससे वे जीवन में आने वाली किसी भी बाधा से घबराये नहीं, ऐसी शिक्षा के वह पक्षधर थे. आज के दिन हमें अपनी भावी पीढ़ी को उन आदर्शों और मूल्यों के बारे में बताना चाहिए जिसके लिए बापू और शास्त्री जी ने अपना जीवन ही दे दिया.