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Wednesday, August 19, 2026

शक्ति केंद्र जब जागेंगे भीतर

विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन यदि कोई है तो वह 'योग' है। योग हमें अपने भीतर केंद्रित होना सिखाता है। मानव के भीतर जो सुप्त शक्तियाँ हैं, उन्हें जगाने का उपाय बताता है। मानव देह में मूलाधार पर स्थित चक्र या केंद्र पर एक सकारात्मक व एक नकारात्मक, उत्साह और आलस्य, ये दो भाव विद्यमान हैं। आलस्य सभी को सहज ही प्रकृति द्वारा दिया गया है, उत्साह बीज रूप में विद्यमान है। इसीलिए हम आज के काम को कल पर टाल देते हैं। जब तक डेड लाइन न दी जाये, लोग काम पूरा नहीं करते। परीक्षा सिर पर न हो तो विद्यार्थी पढ़ाई नहीं करते। आलस्य का अर्थ है देह में ऊर्जा की कमी का अनुभव हो रहा है। योग के द्वारा ऊर्जा प्राप्त करके मन में उत्साह के बीज को अंकुरित करके इसे जगाया जा सकता है। इसी तरह स्वाधिष्ठान केंद्र पर भी दो भाव हैं, कामनायें तथा सृजन। यदि हम अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति में ही लगे रहेंगे तो सृजन की क्षमता बीज रूप में सुप्त रहेगी। योग के द्वारा हम इस शक्ति को भी जगा सकते हैं। कला, संगीत व साहित्य की तरफ़ यदि आपका रुझान कम है तो योग साधना के बाद वह सहज ही जगने लगेगा। मणिपुर चक्र पर ध्यान करके उदारता व मुदिता के बीजों को को जगाया जा सकता है, वरना प्रकृति से प्राप्त ईर्ष्या व लोभ की भावना जीवन भर दंश देती रहेगी। ह्रदय के केंद्र पर प्रेम जगता है तो साधक को सारे विश्व के प्रति अपनापन महसूस होता है। इस केंद्र पर प्रकृति ने हमें भय की भावना दी है, जो अपने अस्तित्त्व की रक्षा के लिए आवश्यक है, किंतु यदि हृदय में केवल भय ही भय हो तो तो व्यक्ति का पूरा विकास कैसे संभव हो सकता है। प्रेम का बीज फले-फूले इसके लिए योग साधना सहायक है। विशुद्धि चक्र पर प्रकृति ने दुख का भाव अनुभव करने की क्षमता दी है, जब कोई दूर जा रहा हो तो गला भर आता है, रोते समय गला रूँध जाता है। कृतज्ञता की भावना यहाँ बीज रूप में दी गई है, जिसे जितना बढ़ाया जाएगा, जीवन में समृद्धि बढ़ती जाएगी। आज्ञा चक्र पर क्रोध स्वाभाविक भावना है, लेकिन सजगता का बीज हमें रोपना है। तभी सहस्रार पर ऊर्जा का फूल खिलकर चारों ओर अपनी सुगंध फैलाएगा। यही योग का लक्ष्य है। 

Saturday, June 1, 2024

भारत को आगे बढ़ना है

आज चुनाव का अंतिम दिन है, फिर प्रतीक्षा होगी परिणाम की। एक तरह से यह तय है कि अगली सरकार किसकी बनने वाली है। भारत जैसे महान और विशाल देश की सरकार भी मज़बूत व स्थिर होनी चाहिए। देश को आगे ले जाने में जितना हाथ सरकार का होता है, उतना ही नागरिकों का भी है, वे यदि अपने कर्त्तव्यों का पालन करेंगे तभी उनके अधिकारों की रक्षा हो पाएगी। यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान ने हमें अधिकारों के साथ कुछ कर्त्तव्य भी दिये हैं। देश में समस्याएँ अनेक हैं, लेकिन सबसे बड़ी जो समस्या है, वह भ्रष्टाचार की है। जो भी सदाचरण नहीं करता, वह दुराचरण कर रहा है, अर्थात उसका आचरण भ्रष्ट है। आज फ़ेक न्यूज़ का जमाना है, साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। इनके लिए भी कड़ा क़ानून बनाना चाहिए। टीवी पर या सोशल मीडिया में जिस किसी को कोई भी झूठ फैलाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। अदालतों  में झूठी गवाही देने वालों पर भी कदम उठाया जाना चाहिए। सड़कों  पर गंदगी फैलाने वाले, पेड़ काटने वाले, जल व विद्युत का अपव्यय करने वाले लोगों पर भी कार्यवाही होनी चाहिए। आने वाली सरकार देश की उम्मीदों पर कितनी खड़ी उतरती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन देश के नेताओं को अब अगले पाँच वर्षों के लिए दलगत राजनीति से दूर रहकर भारत को आगे ले जाना का कार्य करना चाहिए। 


Saturday, May 11, 2024

लोकतन्त्र का पर्व मनाएँ


भारत में चुनावों का मौसम चल रहा है। यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व है।चारों ओर एक उत्सव का सा माहौल नज़र आता है। हर सड़क, गली, नुक्कड़ और चौपाल पर चहल-पहल है।देश ही नहीं विदेशों में भी भारत के चुनाव का जादू चल गया लगता है। कनाडा निज्जर और अमेरिका पन्नू पर अटक गया है। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को जहाँ प्रश्रय मिलता है, ऐसे भारत को विश्व सलाहें दे रहा है। जिस देश में विवाह के अवसर पर ‘गालियों’ को लोग सिर माथे लगाते हैं। होली पर लट्ठमारने की सुविधा दी जाती है; भला वहाँ चुनावों में एक-दूसरे की बखिया उधाड़ने में लोग पीछे क्यों रह जायें।आज सभी पार्टियों के नेतागण जमकर मन की भड़ास निकाल रहे हैं।विदेशी भूमि पर भारत की अखंडता को मिटाने का षड्यंत्र रचने वालों को महिमामंडित किया जा रहा है। ऐसे लोगों द्वारा जो यूक्रेन और इज़राइल को लाखों डालर देकर हज़ारों निर्दोषों को मरवा चुके है, भारत पर विदेशी भूमि पर लोगों को मरवाने का आरोप लगाया जा रहा है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है ! आज विदेशों में पढ़ने वाले कितने ही छात्र हिंसा का शिकार हो रहे हैं।पड़ोसी देश की भाषा बोलने वाले कुछ लोग भारत में बैठे हैं, जो उनके बम का हवाला देकर भयभीत कर रहे हैं। वह अपने क़ब्ज़े वाले कश्मीर को आटा तक मुहैया नहीं करवा पा रहा और भारत के कश्मीर में उसे खून की नदियाँ बहती दिखायी पड़ती हैं; पता नहीं कौन सा चश्मा उसने चढ़ाया हुआ है। इस चुनाव में कई तेजस्वी और निर्भीक महिलाओं ने भी समाज को दिशा दिखाने का बीड़ा उठाया है।यू ट्यूबर्स की भी आज जैसे बाढ़ आ गई है, जो भविष्यवाणियाँ कर रहे हैं। सबसे बड़े भविष्यवक्ता तो मतदाता हैं, जिनके हाथ में भारत का भविष्य है। आधा रास्ता तय हो गया है, आधा सफ़र शेष है। जो इसी तरह टीवी डिबेट्स देखकर हँसते-हँसाते निकल जाएगा। जय भारत ! जय श्रीराम !  


Friday, September 30, 2022

गांधी जी ने यही कहा था

बापू के जीवन से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। वह सत्य और अहिंसा के प्रति पूर्ण समर्पित थे। वह समय के पाबंद थे, नियमित भ्रमण करते थे, शाम को उनके सत्संग का भी समय निश्चित था। वह सात्विक व शाकाहारी भोजन के हिमायती थे। उनके आश्रमों के नियम बहुत कठोर थे और उस समय के लिए संभवतः आवश्यक भी थे। देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं को उन्हें गढ़ना था। वह वस्तुओं का समुचित उपयोग करना चाहते थे, काग़ज़ का एक टुकड़ा हो या पैर रगड़ने वाला छोटा सा पत्थर, उनके लिए महत्वपूर्ण थे। उन्होंने अपने लिए अनेक मर्यादाओं को तय किया और उनका पालन किया। सत्य या ईश्वर की खोज उनके जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण स्थान रखती थी जितना देश को आज़ाद कराना। उन्होंने सविनय अवज्ञा व सत्याग्रह आदि जितने आंदोलन किए, अपने आदर्शों को सदा आगे रखा। दक्षिण अफ़्रीका में भारतीयों की दशा देखकर उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा का आरंभ किया, आज भी वहाँ उन्हें आदर से याद किया जाता है और नेल्सन मंडेला के उनके रास्ते पर चलकर अपने देश को आज़ाद कराया। गांधी जी ने अस्पृश्यता जैसे सामाजिक रोग को दूर करने के लिए बहुत कार्य किया। नारियों की शक्ति को पहचान कर उन्हें शिक्षा प्राप्त करने व सामाजिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं और गांधी वांग्मय नाम से उनके लिखे लेखों, भाषणों व पत्रों का एक विशाल भंडार है जो आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित कर सकता है। वह भारत में रामराज्य की स्थापना करना चाहते थे। सभी धर्मों के प्रति उनके मन में आदर था। अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को आगे लाना उनकी प्राथमिकता थी। विश्व के हर कोने में गांधी जी को सम्मान मिला। वर्तमान में कुछ लोग भले ही कुछ बातों के लिए उनका विरोध करते हों, पर उनके असाधारण कार्यों के लिए सभी के दिल में उनके लिए अपार आदर है। 


Tuesday, August 16, 2022

कर्त्तव्यों का जिसे भान रहे

 किसी भी राष्ट्र को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए केवल सरकार ज़िम्मेदार नहीं होती, उसके नागरिकों का योगदान भी उसमें बहुत प्रमुख भूमिका निभाता है। एक बार यदि बहुमत से कोई सरकार चुन ली जाती है तो उसकी नीतियों को ज़मीनी स्तर पर उतारने के लिए जनता की भागीदारी की अत्यंत आवश्यकता है। संविधान में भारतीय नागरिक के मूल कर्तव्यों की चर्चा की  गयी है। हर नागरिक को उसका ज्ञान होना आवश्यक है. स्वच्छता अभियान पर सरकार चाहे करोड़ों रुपया खर्च करे, यदि देशवासी अपने आसपास गंदगी फैलाते रहेंगे, वन, झील, नदियों को दूषित करेंगे तो स्वच्छ भारत का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो सकता। हर गाँव में सरकारी स्कूल खोले जाएँ पर लोग अपने बच्चों को पढ़ने न भेजें तो संविधान की अवहेलना होती है। हमारी प्राचीन धरोहरों  का सम्मान न करके यदि कोई उन्हें हानि पहुँचाए तो हम अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर रहे। जल का सरंक्षण हो या ऊर्जा का, जनता को इसमें आगे आकर सम्मिलित होना होगा। सामाजिक कुरीतियों और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ने में भी आम आदमी को आगे आना होगा। यदि भारत का हर नागरिक सजग होकर हर प्रकार के उत्कर्ष को ही अपना ध्येय बनाएगा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत विकसित देशों के साथ खड़ा होगा। 

Monday, April 4, 2022

यही सनातन धर्म सिखाता

कहीं युद्ध, कहीं भयावह आर्थिक संकट, कहीं महामारी का बढ़ता हुआ प्रकोप तो कहीं राजनीतिक अस्थिरता, विश्व के अनेक देश आज इन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। अपने देश में देखें तो किसी राज्य में राजनीतिक हिंसा, कहीं धार्मिक कट्टरता के कारण उपजा द्वेष कहीं नक्सलवाद, कहीं अलगाववाद किंतु इन सबके मध्य भी अध्यात्म और योग के कारण एक समरसता की भावना भी छायी है, जिसके स्वर मंद चाहे हों पर बहुत शक्तिशाली हैं। भारत का बढ़ता हुआ आयात, आर्थिक सम्पन्नता, पड़ोसी देशों को निस्वार्थ सहयोग और कई राज्यों में शांति और विकास की लहर इसकी गवाही देती है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं, यह सनातन धर्म की पहचान है। मानव जीवन के वास्तविक लक्ष्य को यहाँ का आम आदमी भी जानता है, मोक्ष का विचार यहाँ की हवा में घुला है। यहाँ एक जन्म की बात नहीं की जाती, एक अनंत जीवन हम पीछे छोड़ आए हैं और हम जानते हैं कि आने वाले अनेक जन्मों का सुख-दुःख हमारे आज के कर्मों पर निर्भर है। हर बार श्रेष्ठता की ओर बढ़ना है। कृष्ण की गीता को चाहे सबने न भी पढ़ा हो पर केवल परमात्मा  का नाम ही सत्य है, इससे कौन अनभिज्ञ है। भारत की इस संस्कृति का हमें सम्मान करना है और इसकी गूंज सारे विश्व तक पहुँचे इसलिए इसका पालन और विस्तार करना है।   

Monday, April 26, 2021

मिलकर जब सब करें सामना

 कोरोना के खिलाफ जो जंग भारत ने लगभग जीत ही ली थी, सकुचाते हुए जिसकी विजय का जश्न भी मनाया था. उसे फिर हार न जाएं ऐसा डर आज हम सभी के मनों में समाया है। ऐसा लग रहा है जैसे हम सोते ही रहे और दुश्मन घर तक आ गया, और देखते ही देखते हर शहर, हर गली मोहल्ले में छा गया. आज सब ओर भय का वातावरण है लेकिन हमें याद रखना होगा, जो भयभीत है वह मन है। जो  उस भय को देखता है, वह हम हैं। जब हम कहते हैं मुझे भय लग रहा है, हम मन के साथ एकात्म हो जाते हैं. मन माया है. हम माया से बंध जाते हैं. जो जानता है, वह हम हैं जानने में एक दूरी है। इस दूरी का अनुभव करते हुए हम पुन: जीतेंगे इस दुगने विश्वास से लड़ना है. लॉक डाउन का पालन बड़ी सख्ती से करना है जीवनचर्या में प्राणायाम को शामिल कर प्राणों में नैसर्गिक वायु भरनी है. न कि अस्पतालों में आक्सीजन के लिए लंबी कतारें खड़ी करनी हैं.  हम भूल गए कि वायरस अभी जिंदा है, हर मौत जो किसी की कहीं हुई, उसके लिए हर भारतीय शर्मिंदा है। किन्तु हमें इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने देना है। हर नागरिक हर नियम का कड़ाई से पालन करे, इस मुश्किल घड़ी में हमें मिलकर सुरक्षित निकलना है। अगली लहर आए उससे पहले ही मुस्तैदी से तैयार रहना है। स्वच्छता का दामन थाम पौष्टिकता का ध्यान रखना है। वैक्सीन लगवा कर प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करना है। सब उपाय करके अब घर-घर से वायरस को विदा करना  है। 



Monday, February 8, 2021

निज संस्कृति का सम्मान करे जो

 आज भारत में कोरोना से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या अन्य देशों की तुलना में काफी कम है और स्वस्थ होने की दर भी अधिक है. काफी हद तक इसका श्रेय जन-जन में बसे आयुर्वेद के ज्ञान को दिया जा सकता है. हम बचपन से ही घरेलू वस्तुओं जैसे अदरक, हल्दी, हींग, तुलसी, त्रिफला, मुलेठी, अजवायन, जीरा, सौंफ आदि का  सामान्य रोगों के लिए उपयोग करते आ रहे हैं. किसी वस्तु की तासीर या प्रकृति गर्म है या ठंडी इसका निर्देश वास्तव में आयुर्वेद में ही दिया गया है.  भारतीय संस्कृति विश्व की पुरातन संस्कृति होने के साथ-साथ अपने भीतर ज्ञान के अथाह सागर को समेटे हुए है. इसके मूल स्रोत और आधार वेद हैं. इन्हीं वेदों का एक उपवेद  आयुर्वेद विश्व का प्राचीनतम चिकित्सा शास्त्र है. आयुर्वेद का उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना है और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना है. इसमें इलाज से भी ज्यादा महत्व पथ्य-अपथ्य को दिया जाता है. इसके अनुसार पहले रोग उत्पन्न करने वाले कारणों का त्याग करना चाहिए.यह बताता है कि रोग से कैसे बचा जाए और यदि रोग किसी कारण से हो भी जाये तो उसे पूरी तरह से कैसे दूर किया जाये. इस पद्धति व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है जिससे उस पर रोग का आक्रमण ही न हो. अस्वस्थ होने पर रोग के मूल कारण को पहचान कर पहले उस कारण को  दूर किया जाता है, केवल रोग के लक्षणों को दूर करके रोगी को आराम नहीं पहुंचाया जाता. आज जरूरत है कि हम आयुर्वेद से अधिक से अधिक परिचित हों और घर-घर में मिलने वाली इन औषधियों के प्रयोग से स्वयं को सबल बनाएं. 


Saturday, April 18, 2020

भारत पर जो नाज करेगा


हम भारत के लोग हमारे संविधान में यह पंक्ति सबसे पहले लिखी गयी है, और यही है भारत की असीम शक्ति का स्रोत ! मुझे इस बात का अनुभव् कई बार हुआ है और आज  मैं आपके साथ अपना यह अनुभव साझा कर रही हूँ. मेरा जन्मस्थान उत्तरप्रदेश में है, जीवन के आरंभिक पचीस वर्ष वहाँ के भिन्न शहरों में बीते। सरकारी नौकरी के कारण पिताजी किसी भी स्थान पर तीन या चार वर्ष से अधिक नहीं रहते थे. हर बार नए शहर में, नये घर में जाने पर हमें अपने आस-पास एक ही जैसे लोग मिले. हर जगह राम और कृष्ण की कहानियाँ कहने-सुनने वाले लोग, आपस में मिलकर होली, दीवाली आदि त्योहार मनाने वाले लोग. विवाह के बाद वर्षों असम में रहना हुआ, जहाँ पूरे भारत से आये भिन्न भाषा-भाषी लोगों से मिलने का सौभाग्य मिला. उड़िया, बंगाली, तमिल, तेलगु, कन्नड़, पंजाबी, सिख, नागा, मिजो गढ़वाली सभी प्रदेशों के लोग वहाँ एक साथ रहते हैं. सभी को आपस में जुड़ने के लिए कोई विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता. सबको जोड़ती है भारत की प्राचीन गौरवशाली संस्कृति ! भारत को एक सूत्र में बाँधा है यहां की नदियों के प्रति आस्था ने, पर्वतों पर बने देव स्थानों ने और परब्रह्म के प्रति अटूट श्रद्धा ने ! हर भारतीय सहज ही श्रद्धावान  है, उसके जीवन में व्रत का स्थान है  तभी वह अनुशासन का पालन कर सकता है. हम केवल भौतिक अस्तित्त्व को ही नहीं देखते उसके परे जो दैविक और आध्यात्मिक है उसे भी साथ लेकर चलते हैं. आपकी तरह मुझे भी भारत पर गर्व है और गर्व है हजारों वर्षों से चली आ रही इसकी अक्षुण्ण सांस्कृतिक धारा पर. आइये हम भारत के लोग मिलकर देश के इस आपद काल में अपना-अपना कर्त्तव्य निभाएं. घर में रहें और स्वस्थ रहें. 

Sunday, February 9, 2020

ज्ञान का दीपक सदा जल रहा



उत्तर में हिमालय से दक्षिणी तट के अंतिम छोर तक भारत बसता है, प्रान्त-प्रान्त में अपनी अनोखी संस्कृति के साथ भारत हँसता है. वाकई सारी दुनिया में सबसे अनोखा है भारत, जो हजारों वर्षों से अपनी छवि को बरकरार रखे हुए है. इसके पीछे एक ही कारण नजर आता है, यहां की माटी में अध्यात्म रचा-बसा है. वेद मन्त्रों का गायन, यज्ञ, होम, हवन और अंतर को निर्मल करने वाले उपनिषदों का अध्ययन इसे शाश्वतता प्रदान करता है. ऋषि-मुनियों की अंतर्दृष्टि से उपजे सृष्टि के अनोखे रहस्यों को उजागर करते महान ग्रन्थ आज भी यहाँ मौजूद हैं. भले ही आक्रांताओं द्वारा पुस्तकालयों को नष्ट कर दिया गया हो, ज्ञान की वह मशाल जो एक बार किसी ज्ञानी के अंतर में जल जाती है, दुनिया के किसी जल से बुझाई नहीं जा सकती. राम हों या कृष्ण, बुद्ध हों या महावीर, कबीर हों या मीरा, सभी ने भारत भूमि को गौरवान्वित किया है, कर रहे हैं और करते रहेंगे. यहाँ शिव की पूजा शिव होकर की जाती है, भगवान को अपने से दूर नहीं बल्कि स्वयं में ही देखना सिखाया जाता है. मस्ती भरी एक उदासीनता, एक फक्कड़पन यहाँ की जलवायु में घुला-मिला है. भारत के इस गौरव को बनाये रखने और बढ़ाने में हर भारतीय अपना योगदान दे सकता है. पर्यावरण के प्रति सजग होकर, अपने नियत कार्य को भली प्रकार करके, एक नागरिक के कर्त्तव्यों को निभाकर और सबसे आवश्यक आने वाली पीढ़ी को इसके प्राचीन अनमोल साहित्य से परिचित कराकर हम सभी यह कार्य कर सकते हैं.

Friday, January 31, 2020

मिलजुल रहना जब सीखेंगे


जब चारों ओर अफरातफरी मची हो, कोई किसी की बात सुनने को ही तैयार न हो.  समाज में भय का वातावरण बनाया जा रहा हो और भीड़ को बहकाया जा रहा हो, भीड़ जो भेड़चाल चलती है, जो विरोध करते-करते  कभी हिंसक भी हो जाती है. समाज जब ऐसे दौर से गुजर रहा हो तो सही बात पीछे रह जाती है. यदि सभी अपना-अपना निर्धारित काम सही ढंग से करें,   तो समाज को आगे बढ़ने से कौन रोक सकता है. भारत भूमि पर रहने वाला हर व्यक्ति भारत के विकास के लिए उत्तरदायी है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी भी वर्ग, वर्ण, आश्रम, समुदाय या प्रदेश का रहने वाला व्यक्ति समान है, उसके अधिकार समान हैं और कर्तव्य भी. आज सभी अधिकारों की बात करते हैं पर जिसे जहाँ जो कार्य करना चाहिए, उसकी बात नहीं करता. विश्व विद्यालय अध्ययन व अध्यापन करने-कराने की जगह आंदोलन का केंद्र न बनें. बगीचे टहलने व खेलने के स्थान पर संघर्ष के लिए केंद्र न बनें. भारत जिस बात के लिए विश्व प्रसिद्ध है उस सौहार्द, आत्मीयता और ज्ञान को कोई  भुलाए नहीं, जिसके बिना आपसी मतभेद को दूर करना बहुत कठिन है.

Tuesday, August 27, 2019

हे जन्मभूमि भारत



भारत में परिवर्तन की हवाएं चल रही हैं. ये हवाएं अपने साथ कितने ही संदेश लेकर आ रही हैं. दुनिया आज भारत की ओर आशा भरी नजर से देख रही है. आधुनिकता के नाम पर जब धरती के सारे स्रोतों को नष्ट किया जा रहा हो, तब वेदों में दिए गये संदेश जैसे उसके घावों पर मरहम रखते से लगते हैं, जिनमें कहा गया है धरती हमारी माँ है और हम उसके पुत्र हैं, माँ जो प्रेम की मूरत है, वह अपना सब कुछ संतानों पर लुटाने को तैयार ही है. नदियों की पूजा करने का वास्तविक अर्थ क्या है आज उसे समझने व समझाने का समय आ गया है. वृक्षों को आराध्य मानना और पंच तत्वों को परमात्मा का स्थूल शरीर मानना क्या हमें अपने पर्यावरण को सरंक्षित रखने का संदेश नहीं देता. अध्यात्म की सुगंध यहाँ की हवा में बसी हुई है, भौतिक उन्नति के शिखर पर पहुँचा हुआ व्यक्ति भी यहाँ संतों के चरणों में अपना सिर झुकाने में स्वयं को भाग्यशाली मानता है. जीवन के मर्म को समझने के लिए आदिकाल से हर देश के यात्री भारत आते रहे हैं, हम कितने भाग्यशाली हैं कि पृथ्वी के इस भूभाग में हमारा जन्म हुआ है, जिसका अर्थ ही है प्रकाश. जैसे प्रकाश के अभाव में जगत होते हुए भी दिखाई नहीं देता वैसे ही ज्ञान रूपी प्रकाश के न होने पर ही दुःख रूपी अंधकार ने हमें घेर लिया है, ऐसा भ्रम होने लगता है.

Thursday, February 28, 2019

फिर से स्वर्ग बने यह धरती


१ मार्च २०१९ 
भारत के उत्तर में स्थित धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला काश्मीर अनेक दशकों से भय और आतंक के साये में जी रहा है. जिस काश्मीर के सुंदर शिकारे और बगीचे हमने फिल्मों में देखे हैं, उस काश्मीर में धर्म के नाम पर अलगाव के बीज बोये जा रहे हैं. हजारों सिपाही और आम आदमी इसमें मारे जा चुके हैं. आज पूरी दुनिया इसका कोई न कोई हल चाह रही है. जिस बात को भारत एक लम्बे समय से कहता आ रहा है, आज उसी बात को उसके मित्र देश भी कह रहे हैं. आज किसी से कश्मीर का दर्द छुपा नहीं है. वहाँ बच्चों की पढ़ाई में बाधा पड़ रही है, उनका व्यापार खत्म हो रहा है. आज जरूरत है इस समस्या का हल निकाला जाये. इस समस्या के कितने ही कारण हो सकते हैं, पर सबसे बड़ा कारण है भरोसे की कमी और असली धर्म से अपरिचय. आपसी प्रेम और विश्वास के बिना यह समस्या हल नहीं हो सकती. धर्मान्धता, अहंकार और अविश्वास के कारण ही दो पड़ोसी देश, जो कभी एक थे, भाईचारे और सौहार्द के साथ रह नहीं पा रहे हैं, जिसका खामियाजा निर्दोष नागरिकों को भुगतना पड़ता है. 

Friday, February 22, 2019

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

२३ फरवरी २०१८ 
अंतर में प्रेम हो, बुद्धि में ज्ञान हो हाथों में शक्ति हो तो जीवन संवरने लगता है. आज भारत का हर नागरिक एक नये विश्वास के साथ अपने भविष्य को गढ़ रहा है. नर हो या नारी सभी के भीतर देशभक्ति का दैवीय गुण जाग रहा है. उसके ‘मैं’ का विस्तार हो रहा है. वह एक बड़े धरातल पर खड़ा होकर सोचने की ताकत अपने भीतर महसूस कर रहा है. उसकी बात सुनी जा रही है और उसके पास कहने के लिए कुछ है इसकी उसे खबर भी लग रही है. दुनिया जब दिखावे की ओर बढ़ रही है भारत में सेवा और सत्य की राह पर चलने का संदेश पहुंचाया जा रहा है. आतंकवाद यहाँ जड़ें नहीं फैला सकता, यहाँ की मिट्टी में अद्वैत की खुशबू आती है, सेना का हर नौजवान भी यहाँ पहले दुश्मन को चेतावनी देता है, उसके बाद ही गोली चलाता है. हमें अपने पूर्वजों से एक महान संस्कृति का उपहार मिला है और हर भारतीय उसकी रक्षा करने में सक्षम है.  

Tuesday, November 13, 2018

नमन करें हम सूर्यदेव को


१३ नवम्बर २०१८ 
भारत अति प्राचीन देश है, शास्त्रों के अनुसार जितनी पुरानी यह सृष्टि है उतनी ही प्राचीन हमारी संस्कृति है. वेदों, उपनिषदों, पुराणों और स्मृतियों के रूप में हमें असीमित ज्ञान संपदा मिली है. भारतीय मनीषियों ने जीवन को एक लीला के रूप में देखा है, इसी कारण उत्सवों के क्षेत्र में भारत सर्वाधिक समृद्ध है. आज छठ का एक अनोखा पर्व सोल्लास मनाया जा रहा है, सर्वप्रथम जिसका जिक्र महाभारत व पुराणों में मिलता है. प्रकृति के साथ जोड़ने वाला यह उत्सव समाज को अनेक सुंदर संदेश देता है, नदियों को स्वच्छ रखने का संदेश और परिवार में सौहार्द और प्रेम को बढ़ावा देने का संदेश भी. इस पर्व में हमें भारत की लोक संस्कृति की अद्भुत झलक मिलती है. समाज के सभी वर्ग मिलजुल कर एक साथ उगते व अस्त होते हुए सूर्य को जब अर्घ्य देते हैं, वह दृश्य दर्शनीय होता है.

Thursday, August 16, 2018

एक युग का अवसान


१७ अगस्त २०१८ 
भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री भारतरत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी कल शाम हमारे बीच नहीं रहे. सारा देश इस महान नेता के निधन से शोक में ग्रस्त है. अटल जी की प्रशंसा किये बिना उनके विरोधी भी नहीं रह पाते थे. उनका जीवन भारत के उत्थान और विकास के लिए समर्पित था और उसमें किसी भी तरह की स्वार्थ भावना नहीं थी. उनका हृदय इतना विशाल था कि अपने विरोधियों के अच्छे कार्यों पर उन्हें बधाई देने में वे जरा भी नहीं हिचकते थे. कवि हृदय अटल जी संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देने वाले पहले भारतीय नेता थे. हर भारतीय को उनसे कुछ सीखने की आवश्यकता है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक और उत्तर-पूर्व से गुजरात तक आज हर आँख उन्हें विदाई देते हुए नम है. वह भारत को विश्व में उसका खोया हुआ गौरव दिलाने के लिए कृत संकल्प थे. भारत के इतिहास में सदा के लिए उनका नाम सुनहरे शब्दों में अंकित रहेगा.  

Friday, April 20, 2018

भीतर जगे प्रार्थना ऐसी


२० अप्रैल २०१८ 
कृतज्ञता और धन्यवाद के ताने-बने से बुनी प्रार्थना अंतर को शीतलता प्रदान करती है. संत कहते हैं, मानव जन्म दुर्लभ है, उस पर भी देव भूमि भारत में जन्म लेना दुर्लभ है. शास्त्र व संतों के प्रति श्रद्धा भाव जगना और भी दुर्लभ है. जिसके जीवन में ये तीनों घट रहे हों वह धन्यवाद के भाव से न भरे तो क्या करेगा. जिस दुनिया में ऐसे मत भी हों जो अपने सिवाय किसी को कुछ न समझते हों, भारत पूरे विश्व में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का परचम लहरा रहा है. वेदों का अनुपम ज्ञान जिसकी थाती हो, प्रकृति के हर रूप को जहाँ पूज्य माना जाता हो, लोक कथाओं के माध्यम से उच्च से उच्च विचार भी जहाँ जन-जन में फैलाया जा सका हो, ऋषियों की उस प्रयोगधर्मा भूमि में जन्म लेने वाला हर मानव का हृदय कृतज्ञता के भाव से भर ही जाना चाहिए.

Friday, August 25, 2017

अँधा अंधे ठेलिए दोनों कूप पडंत

२६ अगस्त २०१७ 
अंधश्रद्धा मानव को किस कदर विवेकहीन बना देती है इसका उदाहरण हरियाणा और पंजाब में हो रहे घटनाक्रम को देख कर मिल रहा है. राष्ट्र की सम्पत्ति को हानि पहुँचाने वाले इतना सा सच भी नहीं देख पा रहे हैं कि अंततः वे अपनी ही सम्पत्ति को नष्ट कर रहे हैं. जो साधना उनमें इतना सा भी विवेक जागृत नहीं कर सकी, उसका न होना ही अच्छा है. गुरू का काम है शिष्यों के जीवन से अज्ञान का अन्धकार दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाये, किंतु आज तथाकथित गुरू लोगों की श्रद्धा का लाभ उठाकर अपने स्वार्थ के लिए उनका उपयोग करते हैं. आश्चर्य होता है जब पढ़े-लिखे लोग भी उनकी चाल में फंस जाते हैं. आज भारत के लिए कितना दुखद दिन है जब हिंसा और आगजनी की घटनाएँ एक अपराधी को बचाने के लिए हो रही हैं. सभी जागरूक लोगों को ऐसे अंधभक्तों से भारत को बचाना होगा. 

Wednesday, March 26, 2014

प्रज्ञा का इक दीप जला हो

अक्तूबर २००५ 
भारत की संस्कृति अद्भुत है, यह कहती है जब हम अपने स्वभाव में नहीं होते तब खंड-खंड होते हैं और जब कोई वस्तु या घटना हमें अपने स्वभाव में लौटा लती है तो वह हमें प्रिय हो जाती है. शास्त्र हमें वह कुंजी देते हैं जिनसे हम अपने आप में लौटते हैं. जब हम विकार ग्रस्त होते हैं तो स्वयं से दूर हो जाते हैं. कामनाओं की पूर्ति के अभाव में हम क्रोध का शिकार होते हैं, जब तक प्रज्ञा के द्वारा हमारा समाधान नहीं होता तब तक क्रोध नहीं जाता. जब तक अपेक्षाएं हैं तब तक हम क्रोध से मुक्त नहीं हो सकते, जब हम तृप्त हो जाते हैं तब इस जगत में पूर्ण शांति के साथ रह सकते हैं. तप, जप, स्मरण, वन्दन, अर्चन सारी साधनाओं का एक ही हेतु है कि अंत करण शुद्ध हो, पवित्र हो ताकि स्वभाव में टिकना सहज हो जाये.