Monday, April 4, 2022
यही सनातन धर्म सिखाता
Thursday, August 26, 2021
निज संस्कृति का सम्मान करे जो
भारतीय संस्कृति अनूठी है, यहाँ जीवन को उसकी समग्रता में सम्मानित करने का भाव है. जीवन के आरम्भ होने से पूर्व ही उसे संस्कार के द्वारा परिष्कृत करने की व्यवस्था है. यदि सही अर्थ के साथ वेद मन्त्रों का पाठ तथा अध्ययन किया जाये तो जीवन को दिशा देने वाले सूत्र उनमें छिपे हैं. हमारी प्रार्थनाएं विश्व कल्याण की कामना लिए हुए हैं. सर्वे भवन्तु सुखिनः.. यदि हम नित्य प्रति अर्थ की प्रतीति करते हुए गाते हैं तो संसार के समस्त जीवों की शुभ भावना से भर जाते हैं. असतो मा सद गमय.. आदि तीन प्रार्थनाएं जीवन को उसके अंतिम लक्ष्य मोक्ष की तरफ ले जाने वाली हैं और त्वमेव माता च पिता त्वमेव.. परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना का भीतर सहज ही संचार करती है, जिससे भीतर अभय का जन्म होता है. या देवी सर्वभूतानां... में देवी को विद्या, निद्रा, क्षुधा, शक्ति आदि जीवन के हर रंग के रूप में देखा गया है. हमारी पाचन अग्नि के रूप में स्वयं कृष्ण भोजन को पचाते हैं तथा वाणी के रूप में वाग देवी कंठ में निवास करती हैं. हमारे मूलाधार में गणेश का वास है. यहां शरीर को देवालय कहा गया है. जिसके नौ द्वार बाहर की ओर खुलते हैं तथा दसवां द्वार भीतर की ओर. जीवन का इतना सम्मान जहाँ हो वहाँ प्रेम, करुणा और उदारता के उदहारण हजारों के रूप में मिलते हैं इसमें आश्चर्य कैसा ?
Monday, February 8, 2021
निज संस्कृति का सम्मान करे जो
आज भारत में कोरोना से पीड़ित व्यक्तियों की संख्या अन्य देशों की तुलना में काफी कम है और स्वस्थ होने की दर भी अधिक है. काफी हद तक इसका श्रेय जन-जन में बसे आयुर्वेद के ज्ञान को दिया जा सकता है. हम बचपन से ही घरेलू वस्तुओं जैसे अदरक, हल्दी, हींग, तुलसी, त्रिफला, मुलेठी, अजवायन, जीरा, सौंफ आदि का सामान्य रोगों के लिए उपयोग करते आ रहे हैं. किसी वस्तु की तासीर या प्रकृति गर्म है या ठंडी इसका निर्देश वास्तव में आयुर्वेद में ही दिया गया है. भारतीय संस्कृति विश्व की पुरातन संस्कृति होने के साथ-साथ अपने भीतर ज्ञान के अथाह सागर को समेटे हुए है. इसके मूल स्रोत और आधार वेद हैं. इन्हीं वेदों का एक उपवेद आयुर्वेद विश्व का प्राचीनतम चिकित्सा शास्त्र है. आयुर्वेद का उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना है और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना है. इसमें इलाज से भी ज्यादा महत्व पथ्य-अपथ्य को दिया जाता है. इसके अनुसार पहले रोग उत्पन्न करने वाले कारणों का त्याग करना चाहिए.यह बताता है कि रोग से कैसे बचा जाए और यदि रोग किसी कारण से हो भी जाये तो उसे पूरी तरह से कैसे दूर किया जाये. इस पद्धति व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है जिससे उस पर रोग का आक्रमण ही न हो. अस्वस्थ होने पर रोग के मूल कारण को पहचान कर पहले उस कारण को दूर किया जाता है, केवल रोग के लक्षणों को दूर करके रोगी को आराम नहीं पहुंचाया जाता. आज जरूरत है कि हम आयुर्वेद से अधिक से अधिक परिचित हों और घर-घर में मिलने वाली इन औषधियों के प्रयोग से स्वयं को सबल बनाएं.