हमारी संस्कृति में धर्म मात्र पढ़ने-पढ़ाने के लिये या विचारों तक ही सीमित रखने के लिए
नहीं है. उसे जीवन में उतारने के हजारों ढंग हैं. धार्मिक होना एक संकीर्ण अर्थ
में लोग जब लेते हैं तभी विवाद होता है. धार्मिकता का अर्थ तो है उदारता,
सहिष्णुता, प्रेम, करुणा और उस परम आत्मा का साक्षात्कार इसी जीवन में, अपने
इन्हीं नेत्रों से...उसको जानना और उस से बल पाकर सबको अपनाने का भाव जगाना. साधक
के जीवन का यही लक्ष्य है.