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Monday, March 6, 2023

होली के दिन दिल मिल जाते हैं

होली का उत्सव यानि प्रेम का उत्सव !  होली रंगों में भीग कर सबके साथ एक हो जाने का उत्सव है, छोटे-बड़े का भेद भुलाकर समानता का अनुभव करने का उत्सव है. हर पुरानी कड़वाहट को मिटाकर गुझिया की मिठास बांटने का उत्सव है. होली जैसा अनोखा उत्सव और कोई नहीं, जिसमें एक दिन के लिए मन अतीव उल्लास से भर जाता है. जान-पहचान हो या न हो सभी को रंग लगाने का अपने आनंद में शामिल करने का जिसमें सहज ही प्रयास होता है. मन विशाल हो जाता है, किन्तु इसे भी कुछ लोग अहंकार के कारण चूक जाते हैं. हमारे आपसी मतभेद और टकराहटें जब समष्टि के इतने बड़े आयोजन को देखकर भी दूर नहीं होते तब उनके मिटने का और कोई उपाय नजर नहीं आता.

Friday, January 13, 2023

हर उत्सव यह याद दिलाता

सत्संग, सेवा, साधना और स्वाध्याय इन चार स्तम्भों पर जब जीवन की इमारत खड़ी हो तो वह सुदृढ़ होने के साथ-साथ सहज सौन्दर्य से सुशोभित होती है. उत्सव बार-बार इसी बात को याद दिलाने आते हैं. हर उत्सव का एक सामाजिक पक्ष होता है और धार्मिक भी, यदि उसमें आध्यात्मिक पक्ष भी जोड़ दिया जाये तो उसमें चार चाँद लग जाते हैं. मकर संक्रांति ऐसा ही एक उत्सव है. इस समय प्रकृति में आया परिवर्तन हमें जीवन के इस अकाट्य सत्य की याद दिलाता है कि यहाँ सब कुछ बदल रहा है, भीषण सर्दी के बाद वसंत का आगमन होने ही वाला है. छोटे-बड़े, धनी-निर्धन आदि सब भेदभाव भुलाकर जब एक साथ लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं तो सामाजिक समरसता का विकास होता है. तिल, अन्न आदि के दान द्वारा भी सेवा का महत कार्य इस समय किया जाता है. जीवन की पूर्णता का अनुभव उत्सव के माहौल में ही हो सकता है. कृषकों द्वारा नई फसल को प्रकृति की भेंट मानकर उसका कुछ अंश अग्नि को समर्पित करने की प्रथा हमें निर्लोभी होना सिखाती है. मकर संक्रांति का त्यौहार पूरे देश में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है, हर उत्सव पर हम ईश्वर से प्रार्थना  करते हैं, उसके करीब जाते हैं, मन के उल्लास को जगाते हैं, उत्सव हमें मन को इतर  कार्यों से खाली करने का प्रयास है, अथवा तो जो भी अच्छा-बुरा जीवन में हो उसे समर्पण करके पुनः नए हो जाने का संदेश देता है. उत्सव में एक साथ मिलकर जब आनंद मनाते हैं, तो ऊर्जा का संचार होता है, भीतर एक नया जोश भर जाता है. क्षण भर के लिए ही भौतिक देह का भाव मिटने लगता है, सारे भेद गिर जाते हैं और उस अव्यक्त की झलक मिल जाती है.     


Wednesday, November 9, 2022

बन जाए जीवन जब उत्सव

जीवन एक प्रसाद की तरह हमें मिला है।हमारा तन, पाँच इंद्रियाँ, मन तथा बुद्धि इस प्रसाद को ग्रहण करने में सहायक बन सकते हैं, यदि हम उनके प्रति सम्मान का भाव रखें। अपने शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए जब हम सृष्टि कर्ता  के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करते हैं तब हमारे सम्मुख एक नया आयाम खुलने लगता है। मन उसे जान नहीं सकता पर वह स्वयं मन को अपना आभास कराता है। जब जगत और अपने शरीर के प्रति हमारे भीतर सम्मान की भावना होती है तो अहंकार अपने शुद्ध रूप में प्रकट होता है। ऐसी स्थिति में हम स्वयं को जगत से पृथक मानकर स्वार्थ पूर्ति में लिप्त नहीं रहते बल्कि जगत का अंश मानकर स्वयं को उन कार्यों में लीन पाते हैं जो अपने साथ-साथ सबके लिए सुख का कारण बनें। छोटी-छोटी बातें अब व्यथित नहीं करतीं, एक गहन शांति का घेरा सदा ही चारों ओर बना रहता है और हम उस आनंद का अनुभव करते हैं जिसका कोई बाहरी कारण दिखायी नहीं देता। जीवन हमारे लिए एक अनवरत चलने वाला उत्सव बन जाता है। 


Wednesday, January 12, 2022

उत्सव एक रूप अनेक

मकर संक्रांति का उत्सव किसी न किसी रूप में सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है।पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू  में इसे फसल का त्योहार माना  जाता है, कृषकगण  लोहरी और माघी के रूप में मनाते हैं; अग्नि के चारों ओर नृत्य करते हुए युवा नाचते और गाते हैं। उत्तर भारत में इसका नाम खिचड़ी है, तिल और गुड़ के साथ दाल-चावल का दान भी किया जाता है। राजस्थान और गुजरात में इसी पर्व को सूर्य के उत्तरी गोलार्ध के सूर्य के सम्मुख आने के कारण  उत्तरायण कहा जाता है। इस दिन आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ायी जाती हैं। तमिलनाडु में यही पोंगल है जब खुले में चूल्हे पर दाल-चावल बनाए जाते हैं। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र,केरल  और कर्नाटक में इसे संक्रांति कहा जाता है, तीन दिनों तक इस उत्सव को मनाते हैं। पश्चिम बंगाल में इसे पौष  संक्रांति कहा जाता है। असम में इसे भोगाली बीहू कहा जाता है जब पीठा, तिल व नारियल के लड्डू व विभिन प्रकार के पारंपरिक व्यंजन  बनाए जाते हैं।इस प्रकार यह पर्व पूरे देश को एक सूत्र में जोड़ता है। 


Monday, November 16, 2020

रहे अटूट यह पावन नाता

 

आज भाई दूज है, इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। प्रत्येक बहन की हार्दिक इच्छा होती है कि उसका भाई सदा सुरक्षित रहे और भाई यही चाहता है उसकी बहन सदा सुखी रहे। अनादि काल से भाई-बहन के मध्य निश्छल प्रेम को प्रोत्साहित करने, सौमनस्य और सद्भावना का प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखने के लिए संभवत: यह पर्व मनाया जाता रहा है। पुराणों में इस पर्व की कथा इस प्रकार कही गई है। सूर्य को संज्ञा से दो संतानें थीं, पुत्र यम और पुत्री यमुना । संज्ञा सूर्य का ताप सहन  न कर पाने के कारण अपनी छाया मूर्ति का निर्माण कर उसे ही अपने पुत्र और पुत्री को सौंप कर वहाँ से चली गई। छाया को यम और यमुना से कोई लगाव नहीं था पर दोनों का आपस में बहुत प्रेम था। विवाह उपरांत भी यमुना अपने भाई के यहाँ जाकर उसका हाल-चाल लेती रहती किन्तु व्यस्तता और दायित्व बोझ के कारण यम के पास समय नहीं था। एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को अचानक यम अपनी बहन के यहाँ जा पहुँचे। बहन ने बड़ा आदर सत्कार किया, विविध व्यंजन खिलाए और मस्तक पर तिलक लगाया। यम अति प्रसन्न हुए और उसे भेंट समर्पित की। चलते समय यमुना से कोई वर मांगने को कहा। यमुना ने कहा, यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो यही मांगती हूँ कि प्रतिवर्ष आज के दिन आप मेरे यहाँ आयें, और जो भाई आज के दिन बहन के घर जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे और उसे भेंट दे, उसकी रक्षा हो। इस दिन यम-पूजा और यमुना में स्नान का विशेष महत्व है। भारत की अनुपम परंपरा और संस्कृति में हर संबंध की गरिमा को बढ़ाने वाले पर्व व उत्सव पिरोये हुए हैं।

Monday, October 19, 2020

भीतर का शिव जागेगा जिस पल

 जीवन जब यांत्रिक होने लगता है, तब मन में एकरसता छा जाती है. प्रकृति नित्य नवीन रूप धर कर आती है, इसलिए सदा इतनी मनमोहक लगती है. मानव मन नित्य की एक सी दिनचर्या से  ऊब जाता है. उत्सव आकर इस एकरसता को तोड़ते हैं. विशेष तौर पर महामारी के इस काल में जब कहीं आना-जाना भी आशंकित कर देता हो तब घर में सुबह-शाम आरती के स्वर गूँजें, सात्विक किन्तु स्वादिष्ट भोजन बने और सुंदर पौराणिक कथाओं का पाठ हो तो हृदय में एक उल्लास का जन्म होना स्वाभाविक है. योग साधना के द्वारा पार्वती ने शिव को प्राप्त किया और पार्वती के प्रति प्रेम के कारण शिव सन्यासी का एकाकी जीवन त्यागकर गृहस्थ बने. इसका तात्विक अर्थ देखें तो पता चलता है योगसाधना के द्वारा मन आत्मा को प्राप्त करता है और आत्मा अकर्ता होता हुआ भी प्रेम के कारण भीतर से मन को निर्देशित करने वाला साथी बनने को तैयार हो जाता है. अभी हमारे भीतर शिव तत्व सोया हुआ है, निरपेक्ष है, जब मन की ऊर्जा सात्विक बनेगी, तब उस तत्व को जागना ही होगा और प्रेम व आनंद से मन भर जायेगा. नवरात्रि का पर्व भी भरत के अन्य पर्वों की तरह यही गूढ़ संदेश लेकर आता है.

Tuesday, October 13, 2020

ऊर्जावान बने जग सारा

 ऋतुओं के सन्धिकाल में नवरात्रि का उत्सव हर वर्ष आता है और वातावरण के प्रति हमारी सजगता को बढ़ाता है. वर्षा ऋतु का अंत हो रहा है और पतझर या शरद का आगमन है. हमारी महान संस्कृति में सामान्य जन को इस संक्रमण काल में सुरक्षित रखने के लिए ही वर्ष में दो नव-रात्रियों का विधान किया गया है. हमारा जीवन तभी सुचारूरूप से चल सकता है जब देह में प्राण शक्ति सबल हो. वर्षा ऋतु में जब सब तरफ सीलन और नमी भर जाती है, उसका असर शरीर व मन पर भी पड़ता है. हमारी शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक ऊर्जा को सन्तुलित करने के लिए ही नौ दिनों के व्रत का विधान शास्त्रों में किया गया है. ग्रहों की स्थिति भी इन दिनों ऐसी होती है कि इन दिनों में किया गया ध्यान और साधन शीघ्र फलित होता है. देवी का हर रूप शक्ति का प्रतीक है, ऐसी शक्ति जो हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. सात्विक भोजन, नियमित जीवन शैली, स्वाध्याय और ध्यान का अभ्यास हमें न केवल आने वाली सर्दी की ऋतु के लिए ऊर्जा वान बना देगा बल्कि कोरोना जैसी महामारी से सुरक्षित रहने का सरल उपाय भी देगा. इन नौ दिनों में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रात: काल से ही हम शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्मांडा, स्कंद माता, कात्यायनी, काल रात्रि, महागौरी, सिद्धिरात्रि आदि नौ रूपों में देवी के एक- एक रूप का प्रतिदिन आह्वान करें और अपने भीतर उसकी उपस्थिति को ध्यान द्वारा अनुभव कर सकें तो नवरात्रि का उत्सव सही अर्थों में हम मनाएंगे. 


Thursday, August 8, 2019

सर्वे भवन्तु सुखिनः



कश्मीर की वादियों में आज सन्नाटा है, लेकिन यह सन्नाटा तूफान से पहले का सन्नाटा नहीं है. यह शांति तो उस उत्सव की राह देख रही है जो आतंकवाद, गरीबी, अलगाव और अशिक्षा को दूर करके अमन और खुशहाली के माहौल में वहाँ मनाया जाने वाला है. पिछले चार दशकों से जो खून बहा है, उसकी कीमत तो कोई नहीं चुका सकता, किंतु जिस नफरत की आग को कुछ स्वार्थी तत्वों ने भड़काया है, उसके बुझने का प्रबंध धारा तीन सौ सत्तर को निष्प्रभावी बनाने के साथ किया जा चुका है. भारत की वीर सेना और देश को सर्वोपरि मानने वाली निर्भीक राजनीतिक इच्छा शक्ति ने जो कदम उठाया है, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जायेगा. हर देशवासी के मन में यही आकांक्षा है कि एक बार पुनः काश्मीर में शिकारों पर गीत फिल्माए जाएँ, केसर की क्यारियां महकें. धरती का जन्नत कश्मीर संतों और सूफियों का एक सा स्वागत करे. हर घर में तिरंगा फहरे और हर कश्मीरी फख्र से कह सके, वह भी एक सच्चा भारतीय है.  


Friday, June 7, 2019

पाना था सो मिला हुआ है



जगत में हम जब तक कुछ पाने की इच्छा से विचरते हैं, हम सत्य से चूक जाते हैं. कुछ लाभ की आशा में हमारा मन तनाव से भरा रहता है, क्यों कि जो भी मिलेगा वह भविष्य में ही मिलेगा. इसी उहापोह में हम वर्तमान के पल से चूक जाते हैं. सृष्टि में प्रतिपल उत्सव चल रहा है, इसमें भागीदार होना है न कि निज के सुख की आशा कुछ न कुछ संग्रह किये जाना है. पंछी गा ही रहे हैं, आकाश की नीलिमा हजारों मील तक फैली है, हवा में फूलों की गंध बिन बुलाये ही चली आती है. परमात्मा हर ढंग से हमें आनन्दित करने को आतुर है. हम न जाने क्या चाहते हैं जो भविष्य की आशा में प्रकृति के इस विशाल आयोजन को अनदेखा कर देते हैं. किसी तितली के पीछे भागते नन्हे बच्चे को उस क्षण में क्या मिल जाता है जब एक पल को तितली किसी फूल पर ठहर जाती है. उसका मन खो जाता है और उसका पूरा अस्तित्त्व ही उस तितली से एकाकार हो जाता है, उसी में वह आनन्दित हो जाता है. हमारा मन जब वर्तमान के पल में सहज होकर जीना सीख लेता है, अतीत का भूत उसका पीछा नहीं करता, भविष्य की कल्पना के जाल में नहीं उलझता, तब प्रकृति अपना द्वार खोल देती है.

Sunday, March 10, 2019

लोकतंत्र की सदा विजय हो


चुनावों की तिथियाँ घोषित हो चुकी हैं और आचार संहिता भी लागू हो गयी है. उम्मीद की जा सकती है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में हिंसा रहित और निष्पक्ष चुनाव होंगे. एक उत्सव की तरह सारा देश इसमें पूरे मन से भाग लेगा और आने वाले दिनों में समाचार पत्रों व टीवी पर विरोधी पक्ष एक दूसरे के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे. एक सामान्य भारतीय नागरिक होने के नाते इतनी उम्मीद तो रखी जा सकती है कि कोई भी दल आचार संहिता का उल्लंघन नहीं करेगा और देश का वातावरण सौहार्दपूर्ण बना रहेगा. देश के भीतर तथा आदेश के बाहर कुछ ऐसे तत्व हैं जो आपसी विवादों का गलत उपयोग करते हैं, उन्हें इसका अवसर न मिले ऐसा प्रयास हर नागरिक व पार्टी को करना ही चाहिए. कृपया आने वाले चुनावों में अपना मत देकर लोकतंत्र के इस उत्सव में आप सभी सम्मिलित हों.

Tuesday, November 13, 2018

नमन करें हम सूर्यदेव को


१३ नवम्बर २०१८ 
भारत अति प्राचीन देश है, शास्त्रों के अनुसार जितनी पुरानी यह सृष्टि है उतनी ही प्राचीन हमारी संस्कृति है. वेदों, उपनिषदों, पुराणों और स्मृतियों के रूप में हमें असीमित ज्ञान संपदा मिली है. भारतीय मनीषियों ने जीवन को एक लीला के रूप में देखा है, इसी कारण उत्सवों के क्षेत्र में भारत सर्वाधिक समृद्ध है. आज छठ का एक अनोखा पर्व सोल्लास मनाया जा रहा है, सर्वप्रथम जिसका जिक्र महाभारत व पुराणों में मिलता है. प्रकृति के साथ जोड़ने वाला यह उत्सव समाज को अनेक सुंदर संदेश देता है, नदियों को स्वच्छ रखने का संदेश और परिवार में सौहार्द और प्रेम को बढ़ावा देने का संदेश भी. इस पर्व में हमें भारत की लोक संस्कृति की अद्भुत झलक मिलती है. समाज के सभी वर्ग मिलजुल कर एक साथ उगते व अस्त होते हुए सूर्य को जब अर्घ्य देते हैं, वह दृश्य दर्शनीय होता है.

Monday, November 12, 2018

मन मौसम को पढ़ना होगा


१२ नवम्बर २०१८ 
दीपावली का उत्सव मधुर स्मृतियों से उर आंगन को सजा कर विदा हो गया. दीपकों की झालरें अब नजर नहीं आतीं, पटाखों का शोर भी कम हो गया है. जीवन उसी पुराने क्रम में लौट आया है. मौसम में बदलाव स्पष्ट नजर आने लगा है. सर्दियों के वस्त्रों को धूप दिखाई जा रही है, और सूती वस्त्रों को आलमारी में सहेज कर रखने के दिन आ गये हैं. बाहर के मौसम की तरह मन का मौसम भी बदलता रहता है. कभी सतोगुणी मन परमात्मा के प्रति समर्पण भाव से भर जाता है तो कभी रजोगुण कर्म में रचाबसा देता है. तमोगुण को बढ़ने का अवसर मिल जाये तो अच्छे-भले दिन में अलस भर जाता है, फिर कहीं चैन नहीं मिलता. साधक का लक्ष्य नियमित साधना के द्वारा तीनों गुणों के पार निकल जाना है, फिर तीनों का मालिक बनकर या तीनों का साक्षी बनकर वह सदा मुक्त ही बना रह सकता है.  

Thursday, October 25, 2018

जीवन जब उत्सव बन जाए


२५ अक्तूबर २०१८ 
जीवन हर पल हमें बुलाता है, यहाँ अवसरों की कमी नहीं है. छोटे से छोटे सा पल भी अपने भीतर एक अनंत को धारण किये है, जैसे छोटा सा परमाणु असीम ऊर्जा को अपने भीतर छिपाए है. संत कहते हैं, वास्तव में जीवन एक दर्पण है जिसमें हम वही देख लेते हैं जो देखना चाहते हैं. हमारा अंतर्मन ही हमारे व्यवहार में झलकता है और हमारी प्रतिक्रियाओं में भी, यदि भीतर भय है तो अँधेरे में हर वस्तु हमें भयभीत करने वाली नजर आयेगी. यदि भीतर क्रोध है तो छोटी-छोटी बातों पर झुंझलाहट के रूप में वह व्यक्त होगा. यदि भीतर अहंकार है तो हर कोई अपना प्रतिद्वन्दी दिखाई देगा. जीवन का हर अनुभव हमें स्वयं को परखने का जानने का एक अवसर देने के लिए है. जिस दिन भीतर कुछ नहीं रहेगा, जगत जैसा है वैसा अपने शुद्ध रूप में पहली बार दिखाई देगा. क्या सारे उत्सव इसी अंतर परिवर्तन की ओर इशारा करते प्रतीत नहीं होते हैं ? हर उत्सव में पूजा को जोड़ दिया गया है, इसका अर्थ है कि परमात्मा की आराधना करके भीतर की शक्ति को जगाना है ताकि प्रमाद, क्रोध, अहंकार अदि दानवों का नाश हो और हम अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव कर सकें.


Thursday, October 11, 2018

शक्ति जगाएं तन-मन में हम


११ अक्तूबर २०१८ 
शारदीय नवरात्रि का उत्सव अपने आप में एक अनोखा संदेश लिए हर वर्ष हमें जगाने आता है. दिन की गहमागहमी में जो मन थक जाता है, वह रात्रि की गोद में विश्राम पाता है. इस प्रकार हर रात्रि हमें पुनर्शक्ति से भर देती है. इन नौ रात्रियों में ब्रह्मांड की ऊर्जा अधिक सक्रिय होती है, इसीलिए साधना के लिए इन्हें उत्तम माना गया है. शिव की शक्ति अनंत है, उसमें से जिसकी जितनी सामर्थ्य हो वह उतनी पा सकता है. इस शक्ति का उपयोग अपने ज्ञान के अनुसार शुभ अथवा अशुभ कर्मों में कर सकता है. हमारे भीतर क्रिया, ज्ञान और इच्छा शक्ति विधान के द्वारा प्रदान की गयी है, जो लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा के प्रतीक द्वारा पूजी जाती है. शक्ति को जगाने का अर्थ है, इसका समुचित उपयोग करना. देवी के विभिन्न रूपों की आराधना करके हम विवेक से उत्पन्न शुभ कामनाओं के द्वारा अपने कर्मों को शुद्ध कर सकते हैं, जिनसे वे बंधनकारी नहीं होंगे और अंततः हम पूर्ण स्वाधीनता का अनुभव कर सकेंगे.    

Saturday, August 25, 2018

यह राखी बंधन है ऐसा


२५ अगस्त २०१८ 
इस जगत में कोई भी हृदय प्रेम से खाली नहीं, किन्तु उसे पूर्णता से महसूस करने के पल जीवन में कम ही आते हैं. कल श्रावणी पूर्णिमा है, यानि राखी का त्योहार, जिस दिन बहनें, भाई की कलाई में रक्षा सूत्र बाँधती हैं. मस्तक पर रोली-अक्षत का तिलक और हाथ में आरती से सजी थाली, जिसमें जलता हुआ दीपक कहता है, उनके जीवन में सदा प्रकाश बना रहे. बहन के हाथ में मिष्ठान से भरी थाली और भाई के हाथ में उपहार, कितना सुंदर दृश्य उपस्थित हो जाता है. प्रेम को व्यक्त करना कितना कठिन है पर इन सारे बाहरी उपायों के द्वारा अंतर के पावन भावों को व्यक्त करना कितना सहज हो जाता है. मिठाई में यदि प्रेम की मिठास न घुली हो और उपहार भी यदि प्रेम से न दिया गया हो तो उत्सव मना ही नहीं, उत्सव की भावना भीतर जगाये बिना औपचारिकता ही निभाई गयी. इसीलिए हमारे पूर्वजों ने सभी उत्सवों को पवित्रता और उपवास से जोड़ दिया गया, सुबह स्नान आदि से शुद्ध होकर बिना मुख जुठाये बहन भाई के आगमन की राह देखती है, तो उसके अंतर में छुपी भावना हृदय में पनपने लगती है. किसी भी भाव को प्रकट होने के लिए अंतर में रिक्त स्थान तो चाहिए न, उत्सव के दिन शेष दिनों के सामान्य कार्यों से छुट्टी लेकर जब हम विशेष हर्ष का उपाय करते हैं तो उल्लास, प्रेम आदि के भाव सहज ही प्रकट होने लगते हैं.

Wednesday, April 25, 2018

हर पल याद रहेगा जब वह


२५ अप्रैल २०१८ 
जीवन में हमने कितने ही प्रसाद पाए हैं. न जाने कितनी बार हम आनंद से भर कर उस परम के प्रति कृतज्ञता के भाव से भर गये हैं. अनगिनत बार प्रकृति के सुंदर रूप देखकर मन आह्लादित हुआ है, स्वजनों के प्रेम में अभिभूत हुआ है. जीवन उत्सव और उल्लास के छोटे-छोटे पलों से मिलकर बना है. परमात्मा आनंद स्वरूप है, और वह हमें भी प्रसन्न देखना चाहता है. उषा का सुंदर वातावरण, उगता हुआ सूर्य, गाते हुए पक्षी और अलमस्त खेलते हुए बच्चों को देखकर किसका मन उत्साहित नहीं हो जाता. दोपहरी को दूर से आती कोकिल की आवाज और फूलों की गंध लिए खिड़की से आती बयार उर को एक नये ही लोक में ले जाती है. जीवन का स्पर्श इतना कोमल है और इतना सम्पूर्ण कि इसके सान्निध्य में होने पर हर चाह अर्थहीन ही है, किन्तु फिर भी हम इससे अपरिचित रह जाते हैं और छोटे-छोटे परिचित सुखों के आकर्षण में ही बंधे रहते हैं.

Friday, March 2, 2018

होली आई रे कन्हाई


३ मार्च २०१८ 
होली का उत्सव यानि प्रेम का उत्सव, होली रंगों में भीग कर सबके साथ एक हो जाने का उत्सव है, छोटे-बड़े का भेद भुलाकर समानता का अनुभव करने का उत्सव है. हर पुरानी कड़वाहट को मिटाकर गुझिया की मिठास बांटने का उत्सव है. होली जैसा अनोखा उत्सव और कोई नहीं, जिसमें एक दिन के लिए मन अतीव उल्लास से भर जाता है. जान-पहचान हो या न हो सभी को रंग लगाने का अपने आनंद में शामिल करने का जिसमें सहज ही प्रयास होता है. मन विशाल हो जाता है, किन्तु इसे भी कुछ लोग अहंकार के कारण चूक जाते हैं. हमारे आपसी मतभेद और टकराहटें जब समष्टि के इतने बड़े आयोजन को देखकर भी दूर नहीं होते तब उनके मिटने का और कोई उपाय नजर नहीं आता.

Saturday, January 13, 2018

अग्नि सम उन्नत हो जीवन

१३ जनवरी २०१८ 
सत्संग, सेवा, साधना और स्वाध्याय इन चार स्तम्भों पर जब जीवन की इमारत खड़ी हो तो वह सुदृढ़ होने के साथ-साथ सहज सौन्दर्य से सुशोभित होती है. उत्सव बार-बार इसी बात को याद दिलाने आते हैं. हर उत्सव का एक सामाजिक पक्ष होता है और धार्मिक भी, यदि उसमें आध्यात्मिक पक्ष भी जोड़ दिया जाये तो उसमें चार चाँद लग जाते हैं. मकर संक्रांति ऐसा ही एक उत्सव है. इस समय प्रकृति में आया परिवर्तन हमें जीवन के इस अकाट्य सत्य की याद दिलाता है कि यहाँ सब कुछ बदल रहा है, भीषण सर्दी के बाद वसंत का आगमन होने ही वाला है. छोटे-बड़े, धनी-निर्धन आदि सब भेदभाव भुलाकर जब एक साथ लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं तो सामाजिक समरसता का विकास होता है. तिल, अन्न आदि के दान द्वारा भी सेवा का महत कार्य इस समय किया जाता है. जीवन की पूर्णता का अनुभव उत्सव के माहौल में ही हो सकता है. कृषकों द्वारा नई फसल को प्रकृति की भेंट मानकर उसका कुछ अंश अग्नि को समर्पित करने की प्रथा हमें निर्लोभी होना सिखाती है.     


Tuesday, September 26, 2017

शक्ति जगे जब भीतर पावन

२७ सितम्बर २०१७ 
जीवन कितना अनमोल है इसका ज्ञान उसी को होता है जो या तो अपनी अंतिम श्वासें गिन रहा हो अथवा जिसने मीरा की तरह अपने भीतर उस अनमोल रतन को पा लिया हो. नवरात्रि के ये नौ दिन इसी का स्मरण कराने आते हैं. शक्ति की पूजा का अर्थ है स्वयं के भीतर सुप्त शक्तियों को जगाना, हर मानव के भीतर देव और दानव दोनों का वास है. हममें से अधिकतर तो दोनों से ही अपरिचित रह जाते हैं. कुछ क्रोधी और अहंकारी स्वभाव वाले दानवों की भाषा बोलने लगते हैं, उनके भीतर देवी का जागरण नहीं होता. साधना के द्वारा जब शक्ति जगती है तो ही इन दानवों का विनाश होता है और एक नई चेतना से हमारा परिचय होता है. जीवन का सही अर्थ तभी दृष्टिगत होता है और तब लगता है इतना अनमोल जीवन व्यर्थ ही जा रहा था. उत्सवों का निहितार्थ कितना उद्देश्यपूर्ण है. उन्हें मात्र दिखावे या मौज-मस्ती के लिए ही न मानकर, भक्ति और ज्ञान की गहराई में जाना होगा. यही  पूजा के मर्म को सही अर्थों में ग्रहण करना होगा.  

Thursday, September 21, 2017

आत्मशक्ति की करें साधना

२१ सितम्बर २०१७ 
शरद ऋतु के आगमन के साथ ही सारा भारत जैसे भक्ति के रस में डूब जाता है. पहले नवरात्रि के नौ दिन जिनमें देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है, पश्चात दशहरा और उसके बीस दिनों बाद दीपों का पर्व दीवाली. वैदिक काल से ये उत्सव हमारे मन-प्राणों को झंकृत करते आ रहे हैं तथा  भारत को एक सूत्र में बाँध रहे हैं. पुराणों के अनुसार देवासुर-संग्राम में जब देवताओं द्वारा असुरों का नाश सम्भव नहीं हुआ तब उन्होंने शक्ति की देवी की आराधना की, सब देवताओं ने उसे अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये. सद्गुणों व दुर्गुणों के रूप में देव तथा असुर हमारे भीतर ही वास करते हैं. इसका अर्थ है हमारे भीतर की दैवीय शक्तियाँ जब संयुक्त हो जाती हैं तब ही वे विकार रूपी असुरों का नाश कर सकती हैं. सात्विक दिनचर्या अपनाकर इस आत्मशक्ति को बढ़ाने का उत्सव है नवरात्रि. नौ दिनों की शक्ति की उपासना के बाद जब साधक का मन शुद्ध हो जाता है. वह आत्मबल से युक्त हो जीवन के प्रति नवीन उत्साह से भर जाता है.