Monday, March 6, 2023
होली के दिन दिल मिल जाते हैं
Friday, January 13, 2023
हर उत्सव यह याद दिलाता
सत्संग, सेवा, साधना और स्वाध्याय इन चार स्तम्भों पर जब जीवन की इमारत खड़ी हो तो वह सुदृढ़ होने के साथ-साथ सहज सौन्दर्य से सुशोभित होती है. उत्सव बार-बार इसी बात को याद दिलाने आते हैं. हर उत्सव का एक सामाजिक पक्ष होता है और धार्मिक भी, यदि उसमें आध्यात्मिक पक्ष भी जोड़ दिया जाये तो उसमें चार चाँद लग जाते हैं. मकर संक्रांति ऐसा ही एक उत्सव है. इस समय प्रकृति में आया परिवर्तन हमें जीवन के इस अकाट्य सत्य की याद दिलाता है कि यहाँ सब कुछ बदल रहा है, भीषण सर्दी के बाद वसंत का आगमन होने ही वाला है. छोटे-बड़े, धनी-निर्धन आदि सब भेदभाव भुलाकर जब एक साथ लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं तो सामाजिक समरसता का विकास होता है. तिल, अन्न आदि के दान द्वारा भी सेवा का महत कार्य इस समय किया जाता है. जीवन की पूर्णता का अनुभव उत्सव के माहौल में ही हो सकता है. कृषकों द्वारा नई फसल को प्रकृति की भेंट मानकर उसका कुछ अंश अग्नि को समर्पित करने की प्रथा हमें निर्लोभी होना सिखाती है. मकर संक्रांति का त्यौहार पूरे देश में भिन्न-भिन्न नामों से मनाया जाता है, हर उत्सव पर हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, उसके करीब जाते हैं, मन के उल्लास को जगाते हैं, उत्सव हमें मन को इतर कार्यों से खाली करने का प्रयास है, अथवा तो जो भी अच्छा-बुरा जीवन में हो उसे समर्पण करके पुनः नए हो जाने का संदेश देता है. उत्सव में एक साथ मिलकर जब आनंद मनाते हैं, तो ऊर्जा का संचार होता है, भीतर एक नया जोश भर जाता है. क्षण भर के लिए ही भौतिक देह का भाव मिटने लगता है, सारे भेद गिर जाते हैं और उस अव्यक्त की झलक मिल जाती है.
Wednesday, November 9, 2022
बन जाए जीवन जब उत्सव
जीवन एक प्रसाद की तरह हमें मिला है।हमारा तन, पाँच इंद्रियाँ, मन तथा बुद्धि इस प्रसाद को ग्रहण करने में सहायक बन सकते हैं, यदि हम उनके प्रति सम्मान का भाव रखें। अपने शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए जब हम सृष्टि कर्ता के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करते हैं तब हमारे सम्मुख एक नया आयाम खुलने लगता है। मन उसे जान नहीं सकता पर वह स्वयं मन को अपना आभास कराता है। जब जगत और अपने शरीर के प्रति हमारे भीतर सम्मान की भावना होती है तो अहंकार अपने शुद्ध रूप में प्रकट होता है। ऐसी स्थिति में हम स्वयं को जगत से पृथक मानकर स्वार्थ पूर्ति में लिप्त नहीं रहते बल्कि जगत का अंश मानकर स्वयं को उन कार्यों में लीन पाते हैं जो अपने साथ-साथ सबके लिए सुख का कारण बनें। छोटी-छोटी बातें अब व्यथित नहीं करतीं, एक गहन शांति का घेरा सदा ही चारों ओर बना रहता है और हम उस आनंद का अनुभव करते हैं जिसका कोई बाहरी कारण दिखायी नहीं देता। जीवन हमारे लिए एक अनवरत चलने वाला उत्सव बन जाता है।
Wednesday, January 12, 2022
उत्सव एक रूप अनेक
मकर संक्रांति का उत्सव किसी न किसी रूप में सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है।पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू में इसे फसल का त्योहार माना जाता है, कृषकगण लोहरी और माघी के रूप में मनाते हैं; अग्नि के चारों ओर नृत्य करते हुए युवा नाचते और गाते हैं। उत्तर भारत में इसका नाम खिचड़ी है, तिल और गुड़ के साथ दाल-चावल का दान भी किया जाता है। राजस्थान और गुजरात में इसी पर्व को सूर्य के उत्तरी गोलार्ध के सूर्य के सम्मुख आने के कारण उत्तरायण कहा जाता है। इस दिन आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ायी जाती हैं। तमिलनाडु में यही पोंगल है जब खुले में चूल्हे पर दाल-चावल बनाए जाते हैं। आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र,केरल और कर्नाटक में इसे संक्रांति कहा जाता है, तीन दिनों तक इस उत्सव को मनाते हैं। पश्चिम बंगाल में इसे पौष संक्रांति कहा जाता है। असम में इसे भोगाली बीहू कहा जाता है जब पीठा, तिल व नारियल के लड्डू व विभिन प्रकार के पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं।इस प्रकार यह पर्व पूरे देश को एक सूत्र में जोड़ता है।
Monday, November 16, 2020
रहे अटूट यह पावन नाता
आज भाई दूज है, इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। प्रत्येक बहन की हार्दिक इच्छा होती है कि उसका भाई सदा
सुरक्षित रहे और भाई यही चाहता है उसकी बहन सदा सुखी रहे। अनादि काल से भाई-बहन के मध्य निश्छल प्रेम को प्रोत्साहित करने, सौमनस्य
और सद्भावना का प्रवाह अनवरत प्रवाहित रखने के लिए संभवत: यह पर्व मनाया जाता रहा है।
पुराणों में इस पर्व की कथा इस प्रकार कही गई है। सूर्य को संज्ञा से दो संतानें थीं,
पुत्र यम और पुत्री यमुना । संज्ञा सूर्य का ताप सहन न कर पाने के कारण अपनी छाया मूर्ति का निर्माण कर
उसे ही अपने पुत्र और पुत्री को सौंप कर वहाँ से चली गई। छाया को यम और यमुना से कोई
लगाव नहीं था पर दोनों का आपस में बहुत प्रेम था। विवाह उपरांत भी यमुना अपने भाई के
यहाँ जाकर उसका हाल-चाल लेती रहती किन्तु व्यस्तता और दायित्व बोझ के कारण यम के पास
समय नहीं था। एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया
को अचानक यम अपनी बहन के यहाँ जा पहुँचे। बहन ने बड़ा आदर सत्कार किया, विविध व्यंजन
खिलाए और मस्तक पर तिलक लगाया। यम अति प्रसन्न हुए और उसे भेंट समर्पित की। चलते समय
यमुना से कोई वर मांगने को कहा। यमुना ने कहा, यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो यही
मांगती हूँ कि प्रतिवर्ष आज के दिन आप मेरे यहाँ आयें, और जो भाई आज के दिन बहन के
घर जाकर उसका आतिथ्य स्वीकार करे और उसे भेंट दे, उसकी रक्षा हो। इस दिन यम-पूजा और
यमुना में स्नान का विशेष महत्व है। भारत की अनुपम परंपरा और संस्कृति में हर संबंध
की गरिमा को बढ़ाने वाले पर्व व उत्सव पिरोये हुए हैं।
Monday, October 19, 2020
भीतर का शिव जागेगा जिस पल
जीवन जब यांत्रिक होने लगता है, तब मन में एकरसता छा जाती है. प्रकृति नित्य नवीन रूप धर कर आती है, इसलिए सदा इतनी मनमोहक लगती है. मानव मन नित्य की एक सी दिनचर्या से ऊब जाता है. उत्सव आकर इस एकरसता को तोड़ते हैं. विशेष तौर पर महामारी के इस काल में जब कहीं आना-जाना भी आशंकित कर देता हो तब घर में सुबह-शाम आरती के स्वर गूँजें, सात्विक किन्तु स्वादिष्ट भोजन बने और सुंदर पौराणिक कथाओं का पाठ हो तो हृदय में एक उल्लास का जन्म होना स्वाभाविक है. योग साधना के द्वारा पार्वती ने शिव को प्राप्त किया और पार्वती के प्रति प्रेम के कारण शिव सन्यासी का एकाकी जीवन त्यागकर गृहस्थ बने. इसका तात्विक अर्थ देखें तो पता चलता है योगसाधना के द्वारा मन आत्मा को प्राप्त करता है और आत्मा अकर्ता होता हुआ भी प्रेम के कारण भीतर से मन को निर्देशित करने वाला साथी बनने को तैयार हो जाता है. अभी हमारे भीतर शिव तत्व सोया हुआ है, निरपेक्ष है, जब मन की ऊर्जा सात्विक बनेगी, तब उस तत्व को जागना ही होगा और प्रेम व आनंद से मन भर जायेगा. नवरात्रि का पर्व भी भरत के अन्य पर्वों की तरह यही गूढ़ संदेश लेकर आता है.
Tuesday, October 13, 2020
ऊर्जावान बने जग सारा
ऋतुओं के सन्धिकाल में नवरात्रि का उत्सव हर वर्ष आता है और वातावरण के प्रति हमारी सजगता को बढ़ाता है. वर्षा ऋतु का अंत हो रहा है और पतझर या शरद का आगमन है. हमारी महान संस्कृति में सामान्य जन को इस संक्रमण काल में सुरक्षित रखने के लिए ही वर्ष में दो नव-रात्रियों का विधान किया गया है. हमारा जीवन तभी सुचारूरूप से चल सकता है जब देह में प्राण शक्ति सबल हो. वर्षा ऋतु में जब सब तरफ सीलन और नमी भर जाती है, उसका असर शरीर व मन पर भी पड़ता है. हमारी शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक ऊर्जा को सन्तुलित करने के लिए ही नौ दिनों के व्रत का विधान शास्त्रों में किया गया है. ग्रहों की स्थिति भी इन दिनों ऐसी होती है कि इन दिनों में किया गया ध्यान और साधन शीघ्र फलित होता है. देवी का हर रूप शक्ति का प्रतीक है, ऐसी शक्ति जो हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है. सात्विक भोजन, नियमित जीवन शैली, स्वाध्याय और ध्यान का अभ्यास हमें न केवल आने वाली सर्दी की ऋतु के लिए ऊर्जा वान बना देगा बल्कि कोरोना जैसी महामारी से सुरक्षित रहने का सरल उपाय भी देगा. इन नौ दिनों में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रात: काल से ही हम शैल पुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुष्मांडा, स्कंद माता, कात्यायनी, काल रात्रि, महागौरी, सिद्धिरात्रि आदि नौ रूपों में देवी के एक- एक रूप का प्रतिदिन आह्वान करें और अपने भीतर उसकी उपस्थिति को ध्यान द्वारा अनुभव कर सकें तो नवरात्रि का उत्सव सही अर्थों में हम मनाएंगे.