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Sunday, July 2, 2023

गुरु ज्ञान जीवन में आये

सद्गुरु कहते हैं जीवन गुरूतत्व से सदा ही घिरा है. गुरु ज्ञान का ही दूसरा नाम है. अपने जीवन पर प्रकाश डालकर हमें ज्ञान का सम्मान करना है, अर्थात सही-गलत का भेद जानकर जीवन में आने वाले दुखों से सीखकर ज्ञान को धारण करना है, ताकि पुनः वे दुःख न झेलने पड़ें. मन ही माया को रचता है और अपने बनाये हुए लेंस से दुनिया को देखता है. साधक वह है जो कोई आग्रह नहीं रखता न ही प्रदर्शन करता है. देने वाला दिए जा रहा है, झोली भरती ही जाती है. हमें वाणी का वरदान भी मिला है और मेधा भी बांटी है उसने. यदि उसे सेवा में लगायें जीवन तब सार्थक होता जाता है. भक्ति और कृतज्ञता के भाव पुष्प जब भीतर खिलते हैं, मन चन्द्रमा सा खिल जाता है, गुरु पूर्णिमा तब मनती है. 

Thursday, September 22, 2022

जीवन इक उपहार अनोखा

सेवा के रूप में किए गए कृत्य हमें वर्तमान में बनाए रखते हैं क्योंकि हमें उनसे भविष्य में कुछ भी पाने की चाह नहीं होती। जब हम जीवन को साक्षी भाव से देखते हैं तो चीजें स्पष्ट दिखायी देती हैं। जितना हम सामान्य बातों से ऊपर उठ जाते हैं तो वे बातें जो पहले बड़ी लगती थीं, अपना महत्व खो देती हैं। हमें यह जीवन उपहार स्वरूप दिया गया है, मन में इसके लिए अस्तित्त्व के प्रति कृतज्ञता जगे तो कभी किसी अभाव का अनुभव नहीं होता। नियमित साधना, सेवा तथा जाप करने से मन तृप्त रहता है। जितना-जितना हम साधना के लिये समर्पित होंगे, आंतरिक ऊर्जा बढ़ती रहेगी और सहज उत्साह बना रहेगा। ऐसी स्थिति में हमारा हर कार्य भीतर के आनंद की अभिव्यक्ति के लिए होगा न कि भविष्य में आनंद पाने की लालसा में किया गया होगा। इसके लिए समय का उचित प्रबंधन और हर क्षेत्र में संयमित रहना है। संबंधों में मधुरता तभी बनी राह सकती है जब वे प्रेम बाँटने के लिए बने हों न कि प्रेम की माँग करने के लिए। 


Monday, March 29, 2021

सत की नाव खेवटिया सदगुरू

हर वह कर्म जो निज सुख की चाह में किया जाता है, हमें बांधता है. जो स्वार्थ पर आधारित हों वे संबंध हमें दुःख देने के कारण बनते हैं. जब हम अपना सुख भीतर से लेने लगते हैं तब स्वार्थ उसी तरह झर जाता है जैसे पतझड़ में पत्ते, तभी जीवन में सेवा और प्रेम की नयी कोंपलें फूटती हैं. जब संबंधों का आधार प्रेम हो तभी उनकी ख़ुशबू जीवन को महका देती है. रजस हमें अपने ही सुख की चिंता करना सिखाता है, तमस उसके लिए असत्य का सहारा लेने से भी नहीं झिझकता. सत का पदार्पण ही ज्ञान की मशाल लेकर वास्तविकता का परिचय कराता है. जीवन में सत्व की वृद्धि करनी हो तो सत्संग उसकी पहली सीढ़ी है. शास्त्रों का अध्ययन व नियमित साधना उसके सिद्ध  मार्ग हैं. सत्व हमें अपने आप से जोड़े रखता है. यह अनावश्यक कर्मों से हमने बचाता है और कर्म हीनता से भी दूर रखता है. सत ही आत्मबल और मेधा को बढ़ाता है. 


Tuesday, June 23, 2020

बहे ऊर्जा पल-पल उसकी

जीवन अपार संभावनाएं लिए हमारे सम्मुख खड़ा है. हम ही उससे आँखें चुराए अपने आपको एक बंधे-बंधाये क्रम में ढाल कर अपनी ऊर्जा को व्यक्त होने से रोकते हैं. परमात्मा की ऊर्जा भिन्न-भिन्न आकारों से पल-पल व्यक्त हो रही है. कोई कलाकार एक अनगढ़ पत्थर को सुंदर शिल्प में बदल देता है, कोई सात सुरों से ऐसी मोहक धुन निकालता है कि जड़-चेतन सभी उसे सुनकर ठिठक जाते हैं. कहीं वह परमात्मा वीरों के रूप में प्रकट हो रहा है तो कहीं संतों के रूप में. अनेकानेक फूलों, पंछियों और तितलियों के रूप में भी तो वही ऊर्जा व्यक्त हो रही है. इस ऊर्जा का स्वभाव है प्रेम और आनंद ! ध्यान की गहराई में इसका अनुभव होता है और सेवा के रूप में जगत में यह प्रकट होती है. उन कर्मों से यह प्रकट होती है जो जगत के प्रति प्रेम से प्रकटे हों या आनंद के अतिरेक में सहज ही होते हों. मन जब इतर कामनाओं से खाली हो, तब इस ऊर्जा का अनुभव कण-कण में उसे होता है. शास्त्र इसे ही भक्ति कहते हैं. भक्त का अंतर जब इस भक्ति का स्वाद ले लेता है तो जगत के अन्य स्वाद उसे नहीं भाते. जीवन में उसे कुछ पाने का नहीं सहज होकर जीने का मार्ग भाता है. भविष्य की कल्पनाएं और अतीत की उपाधियों से परे वह केवल वर्तमान में ही रहने लगता है. 

Monday, September 2, 2019

सेवा का जो मर्म जान ले



परमात्मा की बनाई इस सुंदर सृष्टि में हममें से हरेक को अपनी भूमिका निभानी है. एक ही सत्ता जड़ और चेतन के अनंत-अनंत रूपों में प्रकट हो रही है. जहाँ सभी किसी न किसी तरह से एक-दूसरे पर निर्भर हैं. गणपति की लीला भी यही बताती है, उनका वाहन मूषक है, और सर्प को उन्होंने अपने उदर पर बाँधा हुआ है. मूषक सर्प का आहार है, सर्प मोर का आहार है, जो कार्तिकेय का वाहन है. वन में सभी जीव एक-दूसरे पर आश्रित हैं. एक समर्थ मानव पर अनेकों जन आश्रित होते हैं. जिस का हृदय सहज ही अन्यों की सहायता करने के लिए तत्पर हो जाता है, उसे वैसी सामर्थ्य भी अस्तित्त्व द्वारा मिलने लगती है. साधना में योग, स्वाध्याय, ईश्वर भक्ति के साथ-साथ सेवा का भी समान महत्व है, बल्कि साधना की सिद्धि के बाद तो सेवा के अतिरिक्त कुछ करने को भी साधक के पास नहीं रह जाता. गणपति उत्सव में भी अन्य सामाजिक उत्सवों व पर्वों की तरह समाज के अनगिनत जन किसी न किसी प्रकार की सेवा देते हैं. अंतर इतना ही है, एक सिद्ध व्यक्ति इस सत्य को जानकर सेवा करता है कि अपने हर सेवा कर्म में वह परमात्मा की ही सेवा कर रहा है. साधक अपने अहंकार को मिटाने के लिए सेवा करता है और अज्ञानी व्यक्ति अहंकार के पोषण के लिए सेवा करता है.

Monday, June 24, 2019

परहित सरिस धर्म नहीं भाई



परोपकार का अर्थ है, दूसरों के जीवन को आसान बनाना. जरूरत पड़ने पर किसी का हाथ बंटा देना. यदि खुद में सामर्थ्य है तो किसी की मदद करने का अवसर आने पर पीछे न हटना. यह सब करते हुए यदि भीतर यह भाव जगाया कि हम अन्यों से श्रेष्ठ हैं, हम सेवा करते हैं, तो यह परोपकार नहीं कहा जायेगा. इसमें अपनी हानि छिपी है, जो काम स्वयं के लिए ही लाभप्रद नहीं है वह दूसरों के लिए भी आनंद का सृजन नहीं कर सकता. सहयोग करके हमें किसी के स्वाभिमान, सम्मान तथा निजता का हनन नहीं करना है और न ही स्वयं की किसी से तुलना करनी है. यदि मन तृप्त है, परम से जुड़ा हुआ है तो उसमें से सहज ही मैत्री भाव जगता है. इसी भाव से युक्त होकर संत जगत में कार्य करते हैं, जिन्हें हम परोपकार कहते हैं.

Thursday, June 7, 2018

मुक्त सदा जो मन तनाव से


८ जून २०१८ 
आज के युग में तनाव या डिप्रेशन का होना एक सामान्य सी घटना हो गयी है. व्यक्ति चाहे किसी भी उम्र का हो, किसी भी वर्ग, धर्म, जाति या लिंग का हो, तनाव से ग्रस्त होना जैसे उसका मौलिक अधिकार बन गया है. आये दिन समाचार पत्रों में इसके बार में हम पढ़ते ही रहते हैं. क्या इसका कोई समाधान है, संत कहते हैं, जीवन आनंद से भरा है, शांति और प्रेम के धागों से बुना है, सुख और ज्ञान इसके फल हैं. ऐसा जीवन पाने की एक ही शर्त है पवित्रता और आत्मशक्ति ! यदि जीवन में अनुशासन हो, ध्यान और साधना के द्वारा आत्मशक्ति का संवर्धन हो तो तनाव उसी तरह दूर रहता है जैसे प्रकाश के सम्मुख अँधेरा. कृष्ण कहते हैं, योग के मार्ग पर किया गया अल्पप्रयास भी महान फल देने वाला होता है. स्वाध्याय, सत्संग, सेवा और साधना के चार पहियों पर जीवन की गाड़ी सहज ही नई मंजिलों की ओर ले जाती है. यह एक ऐसा मार्ग है जिसमें हर कदम पर पूर्णता भी है और आगे बढ़ते रहने की ललक भी. जहाँ प्रियतम के साथ संयोग और वियोग एक साथ घटते हैं.

Saturday, January 13, 2018

अग्नि सम उन्नत हो जीवन

१३ जनवरी २०१८ 
सत्संग, सेवा, साधना और स्वाध्याय इन चार स्तम्भों पर जब जीवन की इमारत खड़ी हो तो वह सुदृढ़ होने के साथ-साथ सहज सौन्दर्य से सुशोभित होती है. उत्सव बार-बार इसी बात को याद दिलाने आते हैं. हर उत्सव का एक सामाजिक पक्ष होता है और धार्मिक भी, यदि उसमें आध्यात्मिक पक्ष भी जोड़ दिया जाये तो उसमें चार चाँद लग जाते हैं. मकर संक्रांति ऐसा ही एक उत्सव है. इस समय प्रकृति में आया परिवर्तन हमें जीवन के इस अकाट्य सत्य की याद दिलाता है कि यहाँ सब कुछ बदल रहा है, भीषण सर्दी के बाद वसंत का आगमन होने ही वाला है. छोटे-बड़े, धनी-निर्धन आदि सब भेदभाव भुलाकर जब एक साथ लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं तो सामाजिक समरसता का विकास होता है. तिल, अन्न आदि के दान द्वारा भी सेवा का महत कार्य इस समय किया जाता है. जीवन की पूर्णता का अनुभव उत्सव के माहौल में ही हो सकता है. कृषकों द्वारा नई फसल को प्रकृति की भेंट मानकर उसका कुछ अंश अग्नि को समर्पित करने की प्रथा हमें निर्लोभी होना सिखाती है.     


Wednesday, May 31, 2017

सबके हित में अपना हित हो

१ जून २०१७ 
यह ब्रह्मांड आपस में किन्हीं अदृश्य तंतुओं से जुड़ा हुआ है. मानव व अन्य सभी सूक्ष्म व स्थूल जीव अपने भौतिक अस्तित्त्व के लिए परस्पर निर्भर हैं. सभी जैसे एक विशाल देह के अंग हों. जिस प्रकार हमारी देह में हाथ अपने लिए नहीं है, पूरी देह की देखभाल के लिए है, पैर भी उसे गति प्रदान करने के लिए हैं, इसी प्रकार सभी प्राणी स्वयं के लिए नहीं हैं अन्यों के लिए हैं. जब समाज व परिवार में हर कोई अपनी उन्नति के साथ-साथ सभी की उन्नति के उपाय सोचेगा तो समाज  अपने आप समृद्धिशाली होगा. अपने पास जो भी योग्यता हो वह समाज के काम आ सके, ऐसी भावना भीतर जगते ही मन को गहरा विश्राम मिलता है. हाथों के द्वारा सेवा न भी ही सके, तो धन के द्वारा, ज्ञान के द्वारा, अपना समय देकर अथवा जगत के प्रति मंगल कामनाएं भेजकर ही हम उस ऋण को किसी हद तक उतार सकते हैं जो हमें इस सृष्टि के प्रति चुकाना है.

Tuesday, March 10, 2015

भीतर का प्रकाश जगे जब

अप्रैल २००८ 
अनेकांत हमें कहीं उलझने नहीं देता. जीवन के बारे में सच्चाई हो तो दुःख का कोई कारण नहीं. जीवन की परिस्थितियाँ बदल रही हैं, हमारे हाथ में समता में रहना है, नहीं तो प्रवाह बहा ले जा सकता है. दृष्टिकोण यदि सही हो तो मन एक समता में टिका रह सकता है. जब-जब हम प्रमाद में जाते हैं, तो संवेग नियन्त्रण की शक्ति कमजोर हो जाती है. हमारे किसी भी व्यवहार से यदि किसी को थोड़ा सा भी दुःख पहुँचे तो हमने कर्म बाँध ही लिया. हम अध्यात्म में टिके रहते हैं तो दूसरों के दोष देखना अपने आप छूट जाता है. यदि अब भी दोष दीखते हैं तो आत्मा में स्थिति दृढ़ नहीं है. परमात्मा हर जीव के भीतर है, वह सभी ओर है, सभी उसके भीतर हैं और फिर भी वह अप्रकट है, छिपा है. सभी को उसकी माया ने ढका हुआ है. वेद का ऋषि कहता है, मेरे भीतर जो परमात्मा रूपी प्रकाश है उसका आवरण हटा दो, वह उस प्रकाश से ही प्रार्थना करता है. हम इस जगत में प्रेम बांटने ही आये हैं अथवा तो सेवा करने. शरीर द्वारा सेवा व मन द्वारा प्रेम देना ही हमारा लक्ष्य है ! 



Friday, November 21, 2014

प्रेम बिना सब सूना सूना

मई २००७ 
हमारे भीतर प्रेम का अनंत खजाना है, करुणा का अथाह सागर है और सत्य तो हमारी आत्मा का स्वरूप ही है. हम इन्ही तत्वों से तो बने हैं, ये हमें कहीं से लाने नहीं, हमें इन्हें लुटाना है क्योंकि ये कभी खत्म न होने वाला भंडार है. हम देखेंगे जितना-जितना हम इसे बांटते हैं उतना-उतना यह भीतर से और स्रावित होता है. यही सेवा है. हम यदि आध्यात्मिक जीवन जीना चाहते हैं तो इस मार्ग के अलावा और कोई मार्ग नहीं. ज्ञान मुक्त करता है पर बिना प्रेम के वह मुक्ति अहंकार में बदल सकती है. ईश्वर के प्रति प्रेम हमें आनंद से भर देता है पर उस आनंद को जब हम भोगने लगते हैं तो फिर अटक जाते हैं, सेवा ही सच्चा मार्ग है, जिस पर हमें चलना है. 

Friday, May 30, 2014

शुभता का ही वरण करे जो

मार्च २००६ 
शुभ कर्म को आरम्भ करना ही सबसे कठिन है, एक बार जब साधक शुभ पथ पर चलना आरम्भ कर देता है तब सारी सृष्टि उसकी सहायक हो जाती है. किन्तु हम आरम्भ को ही टालते रहते हैं. सत्संग सुनते समय कितने ही शुभ विचार भीतर उपजते हैं पर वे कार्यान्वित नहीं हो पाते, प्रभु मन को जानते हैं और समय आने पर अनुकूल परिस्थिति भी ला देते हैं यदि हम उसे अनदेखा न कर दें. यूँ भी साधक के पास परमात्मा से चाहने के लिए एक ही वस्तु है, उसे प्रेम करना तथा उसका प्रेम पाना. जब तक कोई उस पावन प्रेम से वंचित है तभी तक जगत की दौड़ है, वह प्रेम भीतर उपजा तो सारे में छा जाता है, फिर जीवन में सहज ही शुभ घटता है. सही रूप से सेवा का भाव जगता है. मन सारे अभावों से मुक्त हो जाता है और सारे प्रभावों से भी..अपने स्वभाव में टिक जाता है.


Tuesday, February 11, 2014

सेवा भी साधना है

अगस्त २००५ 
सेवा स्नेहवश होती है, वहाँ स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए, चाहिये तो केवल सेव्य की प्रसन्नता, सेवक यदि अपना सुख चाहे, अपनी रूचि को सेव्य पर लादे तो वह अपनी ही सेवा कर रहा है. हनुमान सेवक हैं, उनके प्रेम की धारा सदा आराध्य की ओर बहती है. वह राम की सेवा के अवसर खोजते हैं. हम लोग अपनी सुविधा देखकर सेवा करते हैं, तभी उसका फल नहीं मिलता. सच्ची सेवा करने से अन्तःकर्ण की शुद्ध होती है, अहंकार गलता है. सेवा हमें प्रभु के पास ले जा सकती है. 

Saturday, December 21, 2013

तेरा नाम सांचा

मई २००५ 
किसी ने कितना सही कहा है, “सुबह का बचपन हँसते देखा, दोपहर की मस्त जवानी, शाम बुढ़ापा ढलते देखा, रात को खत्म कहानी” अज्ञानता में भी वैराग्य छा जाता है, लेकिन यह क्षणिक होता है जैसे श्मशान वैराग्य, जब भीतर सत्य की झलक मिल जाती है तो बाहर से राग अपने आप ही छूट जाता है. वास्तव में तो सत्य सदा ही भीतर है, अज्ञान का आवरण ही उसे ढके रहता है. लेकिन संसार से वैराग्य होने का अर्थ उसका अनादर नहीं है न ही उदासीनता, बल्कि उसका सत्यता को जानकर उसके अनुरूप व्यवहार करना है. प्रेमपूर्ण व्यवहार तो करना है पर फंसना भी नहीं है. यदि हम नित्य को छोड़कर अनित्य पर भरोसा करते हैं तो हमें धोखा खाना ही पड़ेगा. नित्य पर किया विश्वास हमें नित्य सुख की ओर ले जाता है. राग हो ईश्वर से और सेवा हो जगत की तो मन खाली रहता है क्योंकि जग से कुछ लेने की कामना तो है नहीं और ईश्वर को कितना भी भर लो वह तो आकाश की तरह है. 

Friday, April 20, 2012

सार सार को गहि रहे


साहित्य में हंस को नीर-क्षीर विवेक ग्राही माना गया है. ऐसा व्यक्ति जो संसार से सत् को तो ग्रहण करे असत् को त्यागता जाये, हंस कहा जाता है, जैसे रामकृष्ण, परमहंस कहलाते हैं. हमने भी अपने जीवन में सार्थक क्षणों को अपनाना है, सार्थक कार्य करने है, सार्थक शब्दों का उच्चारण करना है. इस छोटे से जीवन में इतना समय किसके पास है कि सभी कुछ ग्रहण करता चले, मन को जितना- जितना खाली रखें उतना अच्छा है. अपने लक्ष्य की ओर पहुँचाने वाले साधनों को अपनाना ही अच्छा होगा. यदि किसी का लक्ष्य परम आनंद या शांति को पाना हो तो सेवा, सत्संग व साधना इसके साधन हैं, वाणी का संयम, प्रमाद का त्याग, स्वस्थ तन व मन इसके उपकरण हैं, संत कहते हैं, सेवा से कर्म शुद्धि होती है, ध्यान से मन शुद्धि व योग साधना से तन शुद्धि. मनसा, वाचा, कर्मणा कुछ भी ऐसा न हो जो शास्त्र विरुद्ध हो, जो हिंसा में आता हो, जिससे किसी को पीड़ा हो. ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा रखते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए शेष समय का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये लगाना होगा. जब तक ज्ञान में स्थिति नहीं होगी, द्वंद्वों से मुक्ति नहीं मिलेगी. 

Thursday, April 12, 2012

रहना असली घर में है


फरवरी २००३ 
संसार एक क्रीडास्थल है, जहाँ खेलते समय हमें ध्यान रखना है कि कोई ऐसा स्थान भी है जहाँ हम विश्राम लेते हैं, पुष्टि व तुष्टि पाते हैं. वह हमारा असली घर है. उस खेल में सफलता है मन की प्रसन्नता, तृप्ति और संतोष. भीतर की कंपकपी, दर्द, पीड़ा तब चले जाते हैं जब हमारे मन में छिपा प्रेम का स्रोत हमें मिल जाता है. जीवन में जो भक्ति घटित होती है वही वास्तविक शक्ति है. भजन गाते समय जब अंग-अंग भजन मय हो जाये तब भीतर आरती घटित होती है. हमारी आत्मा का चरित्र प्रकट होने लगता है. जीवन में सत्य का सँग साथ हो, स्वध्याय हो, सेवा हो और साधना हो तो ही खेल पूर्ण होता है. हमारे सम्पर्क में आने वाले भी हमारे लिये प्रसन्नता का स्रोत बन जाते हैं क्योंकि उनके साथ हमें अपना प्रेम व आनंद बाँटने का अवसर मिलता है.  

Tuesday, July 12, 2011

श्रद्धा

मन रूपी मार्ग पर दिन भर विचारों के यात्री आते-जाते रहते हैं. हमें उन पर प्रतिबंध लगाना है, यात्री कम होंगे तो मार्ग स्वच्छ रहेगा, और धीरे-धीरे उन यात्रियों का आना-जाना इतना कम हो जाये कि मन दर्पण की भांति चमकने लगे, और आत्मा झलकने लगे. सत्संग, सेवा और साधना इसमें हमारी सहायता करते हैं, सत्संग में सद्वचन मिलते हैं जिससे आत्मा व परमात्मा के प्रति श्रद्धा का भाव उपजता है, श्रद्धाहीन व्यक्ति रसहीन होता है, वह चतुर या ज्ञानी तो हो सकता है पर उस सहज सुख से वह वंचित रहता है जो ईश्वर के नाम स्मरण मात्र से मिलता है. 

Saturday, May 28, 2011

निस्वार्थ सेवा

मार्च २००० 
निस्वार्थ सेवा हमें साधारण मानव से ऊपर उठाती है, सेवा का सुयोग आने पर उसका लाभ उठाना ही चाहिए, यह हमारी आध्यात्मिक परीक्षा का समय भी होता है. आत्मा के अखंड शांति स्रोत से जुड़े रहने पर सहज ही यह हो सकता है. हो सकता है इसमें हमें कष्ट भी उठाना पड़े, पर यह पीड़ा भी आनंदकारी होगी,  हृदय की अशांति का कारण नहीं. उसके लिए कई अन्य कारण हो सकते हैं जैसे अन्यों को जज करने की प्रवृत्ति, शासन करने की प्रवृत्ति, स्वयं को देह या मन मानने का अज्ञान. तन या मन की अस्वस्थता भी हमारे शुद्ध स्वरूप को प्रभावित नहीं कर सकती, वह अस्पृश्य है.