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Sunday, February 16, 2014

मिलता वह एक पल में ही है

अगस्त २००५ 
जो सहज अवस्था है वह सभी को नित्य प्राप्त हो सकती है पर अप्राप्त है, जो जानना चाहता है उसी को वह प्राप्त होती है, उसके लिए जब जिज्ञासा जोरदार होगी तभी वह मिलेगी. जो सदा है, हर काल में है तो भी हमें प्रतीत नहीं होता इसका अर्थ है हमारे ही भीतर उसको पाने की तड़प कम है. अंतःकरण की शुद्धि धीरे-धीरे होती है तभी हमें ईश्वर का अनुभव धीरे-धीरे होता हुआ लगता है, किन्तु वह वर्तमान की जरूरत है, वह इतना निकट है कि उससे निकट कुछ और हो भी नहीं सकता, वह इतना दूर भी भी है कि संसार ही दीखता है वह कहीं नजर नहीं आता, फिर लगता है शायद कभी भविष्य में मिलेगा, पर वह वर्तमान में ही मिलेगा, मिलेगा कहना भी ठीक नहीं है, वह तो सदा मिला ही हुआ है हम ही आँखें बंद किये बैठे हैं. ऊपर-ऊपर से ऐसा लगता है ज्ञान से दूर हो रहे है पर भीतर जाते ही वही पुनः प्रकट हो जाता है, जैसा थोड़ी सी धूल को झाड़ देने से ही स्वच्छता प्रकट हो जाती है. 

Monday, November 5, 2012

एक नाम ही आधारा..


अक्तूबर २००३ 
एक ओंकार सतनाम ! जब चित्त शांत हो उसमें संकल्प-विकल्प की लहरें न उठ रही हों, तब एक-एक मोती को, जो श्वास के मोती हैं, प्रभु के नाम के धागे में पिरोते-पिरोते ध्यान में डूबना है. जाग्रत, सुषुप्ति और स्वप्न हम तीन अवस्थाओं को ही जानते हैं, चौथी का हमें पता नहीं, जो ध्यान में घटती है, और ध्यान तभी घटता है जब मन सुमिरन में डूब जाये. जीवन की घटनाएँ उसे छूकर निकल जाएँ, हिला न सकें. माया के आवरण से ढका जो यह जगत है वह नाम उच्चारण के आगे टिकता नहीं. सहजता, सरलता और संतोष के आधार पर जब जीवन टिका हो तो ज्ञान, प्रेम और शांति की दीवारों को खड़ा किया जा सकता है. नाम के जल से जो भीतरी शुद्धि होती है वह विकारों को टिकने नहीं देती, नाम की आंधी जब भीतर के चिदाकाश में उठती है तो बादल छंट जाते हैं, तब हम जीवन की उस उच्चता को प्राप्त करते हैं जो समता से आती है. कोई भी भौतिक या मानसिक कृपणता तब हमें छू भी नहीं पाती, हम पूर्णकाम हो जाते हैं. सत्य ही नाम का साध्य है और सत्य ही साधन है, हमें पूर्ण सत्यता के साथ ही उसको जपना है. आत्मा का सूरज तब भीतर-बाहर एक सा चमकता है.

Monday, September 3, 2012

भीतर गूंजें गान अनोखे


अगस्त २००३ 
हमारी साधना का एकमात्र उद्देश्य अंतःकरण की शुद्धि है, अंतःकरण चित्त, बुद्धि, मन, अहंकार सभी को धारण करता है. सोचने की शक्ति भी यहीं है, हमारी सोच ही साधना का मार्ग तय करती है. बाह्य साधन तो मात्र तैयारी के लिये हैं. मानसिक स्थिति ही हमारी सही स्थिति को दर्शाती है. जब चित्त शुद्ध होगा तभी उसमें परमात्मा का वास होगा, अंतःकरण की शुद्धि का सबसे बड़ा साधन है अपने दोषों को देखना. सदगुरु रूपी आईने में हमें अपने दुर्गुण स्पष्ट दिखने लगते हैं, परदोष देखने की प्रवृत्ति, अधीरता, तितिक्षा की कमी, वाणी का असंयम और भी कई दोष जिन्हें हमें एक-एक कर के निकालना है, तभी चित्त शुद्ध होगा. सदगुरु इसके लिये एक सरल उपाय बतलाते हैं, जब संसार का चिंतन बंद करके हम परमात्मा का चिंतन करेंगे तो मन में विकार नहीं जगेंगे. दोष तभी आते हैं जब हम सांसारिक सुख चाहते हैं, फिर ध्यान में पूर्व संचित संस्कारों का क्षरण होगा और तब मन ठहर जाता है. भीतर मौन जगता है, उस मौन में संगीत सुनाई देता है. वह संगीत इतना सूक्ष्म होता है कि गहन मौन में ही हम उसे ग्रहण करते हैं. हमारा एक मात्र लक्ष्य यदि सत्य को जानना है तो व्यर्थ के कार्यों में स्वयं को लगाना अनुचित होगा. हमारा प्रत्येक क्षण उसी आत्मभाव को प्राप्त करने में लगे जो अमृतत्व है, जो हममें अनंत ऊर्जा का संचार करता है, जो कल्याण मय है, जो हमें आगे बढ़ते रहने को प्रेरित करता है. वही हमारा साध्य है.

Friday, April 20, 2012

सार सार को गहि रहे


साहित्य में हंस को नीर-क्षीर विवेक ग्राही माना गया है. ऐसा व्यक्ति जो संसार से सत् को तो ग्रहण करे असत् को त्यागता जाये, हंस कहा जाता है, जैसे रामकृष्ण, परमहंस कहलाते हैं. हमने भी अपने जीवन में सार्थक क्षणों को अपनाना है, सार्थक कार्य करने है, सार्थक शब्दों का उच्चारण करना है. इस छोटे से जीवन में इतना समय किसके पास है कि सभी कुछ ग्रहण करता चले, मन को जितना- जितना खाली रखें उतना अच्छा है. अपने लक्ष्य की ओर पहुँचाने वाले साधनों को अपनाना ही अच्छा होगा. यदि किसी का लक्ष्य परम आनंद या शांति को पाना हो तो सेवा, सत्संग व साधना इसके साधन हैं, वाणी का संयम, प्रमाद का त्याग, स्वस्थ तन व मन इसके उपकरण हैं, संत कहते हैं, सेवा से कर्म शुद्धि होती है, ध्यान से मन शुद्धि व योग साधना से तन शुद्धि. मनसा, वाचा, कर्मणा कुछ भी ऐसा न हो जो शास्त्र विरुद्ध हो, जो हिंसा में आता हो, जिससे किसी को पीड़ा हो. ईश्वर के प्रति अटूट निष्ठा रखते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए शेष समय का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये लगाना होगा. जब तक ज्ञान में स्थिति नहीं होगी, द्वंद्वों से मुक्ति नहीं मिलेगी.