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Monday, July 25, 2022

जैसे नदी मिले सागर से

मानव परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है क्योंकि उसके पास अनंत सम्भावनाओं के रूप में चेतना का बीज है। जब तक हम सामान्य जीवन से संतुष्ट रहते हैं, यह सुप्तावस्था में पड़ा रहता है, जब भीतर स्वयं को जानने की ललक उठती है तो यह बीज अंकुरित होने लगता है। पहली बार उस आनंद की झलक मिलती है जो इस जगत का नहीं है। अलौकिक प्रेम की धीमी-धीमी आँच भीतर सुलगने लगती है और मन देह की सीमा के पार विचरने लगता है। चेतना का बीज जिसे गहराई में छिपा मानते थे अब सारे ब्रह्मांड में उसके विस्तार  का अनुभव होता है। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म है और असीम से भी असीम ! कर्मों के प्रति विशेष आग्रह टूटने लगते हैं, क्योंकि हर कर्म किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही किया जाता है। जीवन से अनावश्यक झर जाता है और अस्तित्त्व का जो आशय है वह हमारे होने में पूर्ण होने लगता है। जैसे कोई नदी सागर तक का मार्ग सहज ही खोजती है वैसे ही भीतर की चेतना उस परम चेतना की ओर अग्रसर हो जाती है। 


Wednesday, May 31, 2017

सबके हित में अपना हित हो

१ जून २०१७ 
यह ब्रह्मांड आपस में किन्हीं अदृश्य तंतुओं से जुड़ा हुआ है. मानव व अन्य सभी सूक्ष्म व स्थूल जीव अपने भौतिक अस्तित्त्व के लिए परस्पर निर्भर हैं. सभी जैसे एक विशाल देह के अंग हों. जिस प्रकार हमारी देह में हाथ अपने लिए नहीं है, पूरी देह की देखभाल के लिए है, पैर भी उसे गति प्रदान करने के लिए हैं, इसी प्रकार सभी प्राणी स्वयं के लिए नहीं हैं अन्यों के लिए हैं. जब समाज व परिवार में हर कोई अपनी उन्नति के साथ-साथ सभी की उन्नति के उपाय सोचेगा तो समाज  अपने आप समृद्धिशाली होगा. अपने पास जो भी योग्यता हो वह समाज के काम आ सके, ऐसी भावना भीतर जगते ही मन को गहरा विश्राम मिलता है. हाथों के द्वारा सेवा न भी ही सके, तो धन के द्वारा, ज्ञान के द्वारा, अपना समय देकर अथवा जगत के प्रति मंगल कामनाएं भेजकर ही हम उस ऋण को किसी हद तक उतार सकते हैं जो हमें इस सृष्टि के प्रति चुकाना है.

Thursday, April 27, 2017

भरा हुआ है जो खाली

२७ अप्रैल २०१७ 
हम स्वयं को सिद्ध करना चाहते हैं , अपना आप इतना छोटा लगता है कि कुछ करके उसे भरना चाहते हैं. हमारे कृत्य उस खालीपन को भरने के लिए हैं न कि इस जगत को समृद्ध बनाने के लिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि हम स्वयं को जानते नहीं, अपने भीतर के उस खालीपन को भी नहीं जानते, जिसमें अपार सम्भावनाएं छिपी हैं . एक बार जो स्वयं को न कुछ होना स्वीकार लेता है जो वास्तव में सत्य है, तत्क्षण उसके जीवन में पूर्णता का अनुभव होने लगता है, कुछ नहीं को कुछ नहीं से ही भरा जा सकता है. इस ब्रहमांड  में जो दिखाई देता है वह अदृश्य की तुलना में बहुत थोड़ा है. सूक्ष्म स्थूल से ज्यादा बलशाली है. हमारा खालीपन ही वास्तव में हमारी संपदा है और उसी से हम भागते हैं, यही तो माया है. 

Tuesday, June 23, 2015

प्रेम समाया हर जर्रे में

मार्च २०१० 
यह ब्रह्मांड कितना विशाल है, हमारी आकाशगंगा में डेढ़ सौ अरब तारे हैं और न जाने कितने ग्रह, उपग्रह उन तारों के होंगे, ऐसी अनंत आकाशगंगाएं होंगी. बुद्धि चकरा जाती है पर जब ध्यान में खाली होकर बैठो तो वह अनंत जैसे अपना लगने लगता है, उसमें कहीं भी विचरो ! कैसा अद्भुत है यह ज्ञान. आत्मा जब अपने घर में होती है तो पूर्ण आनंद में होती है और परमात्मा जब अपने घर में होता है तो पूर्ण प्रेम में होता है. प्रेम से ही तो ये सारा साम्राज्य बना है, असंख्य निहारिकायें, असंख्य नक्षत्र, असंख्य पृथ्वियां और असंख्य जीव...कितना अनोखा है प्रेम का यह प्रपंच ! आत्मा बलशाली हो जाये तो मन नन्हे शिशु की तरह निरीह तकता है, बुद्द्धि अपनी मनमानी नहीं कर पाती. जीवन वरदान बन जाता है और सांसे जैसे अमृत हों जिन्हें घूँट-घूँट करर पीया जा सकता है.  

Tuesday, June 24, 2014

दिप दिप जलती ज्योति भीतर

जुलाई २००६ 
सबसे कीमती वस्तु इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में एक ही है और वह है परम चेतना और वह चेतना इस सृष्टि के कण-कण में समायी है, जिसने इस सृष्टि का निर्माण किया है, जो इसके नियम चला रही है, जिसने ये नियम बनाये, जो स्वयं भी उन्ही का रूप हो गयी, उसी में समा गयी, वही जानने योग्य है वह चेतना अविनाशी है. जो चेतना हम भीतर अनुभव करते हैं उसी का अंश है. हमारा मन उसी से बना है, पर जानता नहीं और कल्पनाओं में डूबा रहता है. जीवन में उत्सव तभी हो सकता है जब इस सत्य का अनुभव हो जाये.


Tuesday, June 4, 2013

सांचा तेरा नाम

इस ब्रह्मांड में सबसे पवित्र वस्तु है परमात्मा, सभी पदार्थ जूठे हो चुके हैं, पर ब्रह्म अभी तक अछूता है, उसे कोई जान ही नहीं पाया है, वह अगम है, सत्य, शिव और सुंदर है. यदि हमें उसे अपने अंतःकरण में अवतरित करना है तो उसे सुपात्र बनाना होगा. मन जिसका संग करेगा उसी का रंग उस पर चढ़ेगा. जब हम असजग होते हैं तो ही कोई न कोई विकार रूपी पशु आकर हमारे मन की वाटिका को तहस-नहस कर डालता है. निरंतर सजगता ही मन को सुपात्र बनाती है. जिसमें उसकी छवि झलकती है.

Friday, September 21, 2012

जीवन एक साधना है


‘कुछ कुछ’ से ‘कुछ नहीं’ किया फिर ‘सब कुछ’ बना दिया...साधना का यही करिश्मा है. संतों के जीवन को देखकर यही तो लगता है. धूल का एक कण ही एक दिन हिमालय बन सकता है, पानी का एक कतरा सागर बन सकता है. सतत साधना सीमित को असीमित कर सकती है. सत्य भरे हुए बादल की तरह है जो मन रूपी धरती की प्यास बुझाता है. वह शमा है, जो निरंतर जल रही है ताकि अंधकार से साधक निकल आए, अज्ञान का अंधकार जो हमारे दिलों को छोटा कर देता है, हमारे सच्चे स्वरूप को हमसे जुदा कर देता है. संत किसी भी पल आयी हुई मृत्यु का बाहें फैलाकर स्वागत भी कर सकता है, उनके हाथ इतने बड़े हो जाते हैं कि सारा ब्रह्मांड उनमें समा सकता है. 

Friday, June 3, 2011

ईश्वर


  अप्रैल २०००
श्वर हर  क्षण हमारे साथ है, हमारे आस-पास है. हम अपने-आप में इतने खोये रहते हैं कि कुछ देखना नहीं चाहते, कुछ महसूस करना नहीं चाहते. हमारे चारों ओर प्रकृति का अतुलित खजाना बिखरा पड़ा है. यह ब्रह्मांड, अनगिनत सितारे, सभी तो उसकी याद दिलाते हैं.. हमारे इतने कार्य कैसे अपने-आप पूर्ण हो जाते हैं... शरीर के अंदर चलने वाला रक्त प्रवाह व नाडी स्पंदन क्या उसकी झलक नहीं दिखाता... लेकिन हम अपने को सर्वसमर्थ मानकर उस सत्ता को भूल जाते हैं. जिसके कारण से हम हैं, जो हमारे भीतर विवेक है, सद् है, आनंद है. हमारे जीवन में जहाँ कहीं भी विशुद्ध स्नेह, विशुद्ध आनंद है, वहीं ईश्वर है.