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Tuesday, July 11, 2023

सत्यं शिवं सुंदरं

जीवन का हर पक्ष सुंदर हो, साधक को सदा इस बात का बोध रहना चाहिए। सौंदर्य  की परख भी प्रेम, शांति तथा आनंद की भाँति मन की गहराई में जाकर मिलती है। शुद्ध चैतन्य को 'सत्यं शिवं सुंदरं' कहा गया है, जिससे जुड़कर साधक को सूक्ष्म व अरूप सौंदर्य की झलक मिलती है। जो अपने भीतर गया है वही प्रकृति के भीतर छिपे उस अनाम सौंदर्य से जुड़ सकता है। वायु का स्पर्श, आकाश की अनंतता, अग्नि की लपटों का आकर्षक रूप, बहाते हुए जल का कलकल नाद, उसमें उठती हुई तरंगें, धरती पर पर्वत, घाटियाँ, जंगल, आदि उसे सौंदर्य  की ख़ान के रूप में दिखायी देते हैं। इस असीम सुंदरता को संरक्षित व  सुरक्षित रखने की भावना सहज ही भीतर जगती है। उन्हें प्रदूषित करने का विचार भी उसके मन में  नहीं आ सकता। यदि नई पीढ़ी को बचपन से ही ध्यान सिखाया जाये तो वे इस गुण को सहज ही अपना लेंगे और अपने आस-पास एक सुंदर वातावरण का निर्माण करेंगे। 


Saturday, October 23, 2021

बहे काव्य की धारा अविरल

काव्य कल्पना की वायवीय उड़ान है तो गद्य वस्तविकता की ठोस भूमि पर चलना। दोनों के क्षण मानव के जीवन में आते रहते हैं। किसी अनोखे आनंद को पाकर, कुछ ऐसा जानकर जो पहले कभी  जाना नहीं गया था अथवा कुछ ऐसा जानकर जो इस जगत का भी जान नहीं पड़ता, मन उस अलौकिक लोक में विचरण करता है। उस रस को व्यक्त करना गद्य में सम्भव ही नहीं है। वह इतना सूक्ष्म है कि शब्दों में भी नहीं समाता, तब कुछ परिचित शब्दों में उसे बहाया जाता है जैसे भूमि पर कोई लकीर खींच दे और बहता हुआ जल उधर की तरफ़ बह जाए। कवि केवल उस अनाम अनुभव को एक रास्ता देता है और वह जो उसके मन को घेरे हुए था, वह ऊर्जा शब्दों के रूप में बह जाती है। शब्द ऊर्जा ही तो हैं, जिनमें भावों का परिवर्तन होता है,  फिर वे स्थित हो जाते हैं। गतिमय ऊर्जा स्थाई हो जाती है। दूसरी ओर जब भीतर का अनुभव स्थायी हो गया हो तो मन में वेग नहीं उठता और अब स्थायी ऊर्जा को गतिमान बनाना है तो गद्य का जन्म होता है। भीतर एक स्थिरता है, शांति है और भाव भी शांत हो गये हैं। कौतूहल अब पहले की तरह ज़मीन से उखाड़ नहीं देता आकाश में उड़ने के लिए, इसलिए शब्द थम- थम कर आते हैं। 


Thursday, June 13, 2019

जहाँ दूसरा हो न कोई



ध्यान का लक्ष्य है देहात्मभाव की निवृत्ति ! देह को स्थिर इसलिए रखते हैं कि मन के प्रति सजग हो जाएँ. देह और आत्मा को जोड़ने वाला पुल है मन. देह को आसन में बैठकर उसे भूल जाना है. मन से चिन्तन करना है, हम देह नहीं हैं. स्वयं को देह से अन्य मानने का अर्थ है हम निराकार हैं. दृष्टि व मन में आकार हैं, इनका आदि-अंत है, चैतन्य का आदि-अंत नहीं. हम एक हैं. हममें कोई अवयव नहीं. एक में मन खो जाता है. हमारे चारों ओर यदि देखें तो आकाश निराकार है, हम भी आकाशवत हैं. स्थूल आकाश आधिभौतिक है, चित्ताकाश आधिदैविक है तथा चिदाकाश आध्यात्मिक है. चिदाकाश न स्थूल है न सूक्ष्म, यह दोनों के पार है.  इसका अनुभव ही ध्यान है. 

Monday, June 11, 2018

खिले सुमन सा मन जिस क्षण


११ जून २०१८ 
प्रकाश, हवा और जल के बिना एक नन्हा सा फूल भी आँखें नहीं खोल पाता, साथ ही उसे धरती का आधार भी चाहिए और बढ़ने के लिए आकाश भी. मानव मन के संबंध में प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है, वायु सजगता का और जल प्रेम का, धरती है देह और आकाश है आत्मा. मन को यदि उड़ान भरनी है तो देह को स्वस्थ व सबल रखना होगा. शास्त्रों और गुरुजनों द्वारा बताए गये ज्ञान का अनुसरण करना होगा, अंतर में प्रेम को पनपने का अवसर देना होगा, यानि भावपक्ष भी सबल हो और बुद्धि पक्ष भी तभी मन आत्मा के आकाश में ऊपर और ऊपर जा सकता है, जहाँ जाकर सारे भेद समाप्त हो जाते हैं. जैसे एक बीज फूल बनकर तृप्त होता है, मन भी जब पूरा खिल जाता है, तभी तृप्ति का अनुभव करता है.

Wednesday, June 6, 2018

कबिरा मन निर्मल भया


६ जून २०१८ 
संत कहते हैं, हमारे मन का आकाश यदि विचार रूपी बादलों से ढका न हो तो अपने निर्मल स्वभाव को सहज ही प्राप्त हो सकता है. जब भीतर कोई भय न हो, तनाव या संशय न हो और न ही कोई इच्छा हो, कुछ त्यागने या ग्रहण करने की प्रवृति भी न हो, तभी मानना होगा कि मन खाली है. इस खालीपन को चैतन्य से भरने की आकांक्षा भी न हो, तब जो अनुभूति होगी उसे अनुभव करने वाला भी वहाँ कोई नहीं होगा, मात्र अनुभव ही जब शेष रह जाता है तब जीवन का मर्म समझ में आता है.

Wednesday, April 11, 2018

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा


1२ अप्रैल २०१८
जीवन जिन तत्वों से मिलकर बना है, वे हैं पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश. तीन तत्व स्थूल हैं और दो सूक्ष्म. पृथ्वी, वायु व जल से देह बनी है, अग्नि यानि ऊर्जा है मन अथवा विचार शक्ति, और आकाश में ये दोनों स्थित हैं. शास्त्रों में परमात्मा को आकाश स्वरूप कहा गया है, जो सबका आधार है . परमात्मा के निकट रहने का अर्थ हुआ हम आकाश की भांति हो जाएँ. आकाश किसी का विरोध नहीं करता, उसे कुछ स्पर्श नहीं करता, वह अनन्त है. मन यदि इतना विशाल हो जाये कि उसमें कोई दीवार न रहे, जल में कमल की भांति वह संसार की छोटी-छोटी बातों से प्रभावित न हो, सबका सहयोगी बने तो ही परमात्मा की निकटता का अनुभव उसे हो सकता है. मन की सहजावस्था का प्रभाव देह पर भी पड़ेगा. स्व में स्थित होने पर ही वह भी स्वस्थ रह सकेगी. मन में कोई विरोध न होने से सहज ही सन्तुष्टि का अनुभव होगा.

Tuesday, March 13, 2018

इक मुठ्ठी आसमान


१४ मार्च २०१८ 
हर कोई चाहता है इक मुठ्ठी आसमान...यह गीत शायद आपने भी सुना होगा. कभी-कभी इन गीतों में कितनी गहरी बात मिल जाती है. क्या हममें से हर किसी की यही चाहत नहीं है. हर मन के भीतर जो एक तलाश चल रही है, वह इसी अपनेपन से भरे उन्मुक्त आकाश की ही तो है. शास्त्रों में तीन आकाशों की बात कही गयी है, पहला है भूताकाश, जो हम बाहर देखते हैं, जिसमें यह धरती, ग्रह, चाँद, सूरज आदि हैं. इस आकाश में ही बड़े-बड़े पर्वत हैं और इमारतें हैं. आज जहाँ खाली स्थान है, कल वहाँ कोई महल था, आकाश को न उसके होने से कोई अंतर पड़ा न उसके न होने से. दूसरा आकाश है, चित्ताकाश, जिसमें अनवरत हमारे विचार विचरण करते हैं. अच्छे विचार हों या बुरे, सकारात्मक या नकारात्मक, चित्ताकाश को कोई अंतर नहीं पड़ता. ये दो आकाश तो सभी को उपलब्ध हैं. तीसरा है चिदाकाश जिसकी हमें तलाश है, जो ध्यान में उपलब्ध होता है. जहाँ हम अपने आप को  आनंद स्वरूप विराट परमात्मा में विलीन कर देते हैं. यह आकाश भी हमारे भीतर है, पर चित्ताकाश के पार है. यहाँ प्रेम, शांति और सुख का सहज ही अनुभव होता है. मुठ्ठी भर भी इस आकाश की उपलब्धि आत्मा को उड़ने के लिए पंख दे देती है.

Thursday, March 30, 2017

तू छुप न सकेगा परमात्मा !

३० मार्च २०१७ 
आज आकाश ढका है बादलों से, पर बादलों के पार भी जो झांक सकता है, उसके लिए नीला शुभ्र आकाश उतना ही सत्य है जितना यह बदली भरा आकाश, बल्कि इससे भी अधिक सत्य क्योंकि यह बादल तो आज नहीं कल बरस कर रीते हो जायेंगे. इसी तरह जो देह के पीछे छिपे चिन्मय तत्व को देख सकता है उसके लिए देह का रहना  या न रहना अर्थहीन हो जाता है, क्योंकि जो सदा है वह उसकी दृष्टि से कभी ओझल ही नहीं होता,  जगत का कार्य-व्यवहार उसे क्रीड़ा मात्र ही प्रतीत होता है, और उसके पीछे छिपा निरंजन ही सत्य जान पड़ता है. बादल कितने भी घने हों एक न एक दिन समाप्त हो जायेंगे, इसी तरह भीतर का चैतन्य मन की धारणाओं, वासनाओं और कामनाओं से कितना भी क्यों न छिप गया हो, कभी मिटता नहीं. इस सत्य को स्वीकार करके उसे अपना अनुभव बनाना ही साधक का लक्ष्य है.  

Wednesday, March 1, 2017

खिले सदा मुस्कान लबों पर

१ मार्च २०१७ 
संत कहते हैं सदा प्रसन्न रहना भगवान की सबसे बड़ी पूजा है. प्रसन्न रहने का अर्थ है एक ऐसी मुस्कुराहट का मालिक बनना जिसे संसार की कोई भी परिस्थिति मिटा न सके, ऐसी प्रसन्नता किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति पर निर्भर नहीं रहती, वह स्वाभाविक सहजता से उत्पन्न होती है. प्रतिपल यदि हम सजग रहते हैं और अस्तित्त्व से निरंतर झरती हुई ऊर्जा से एकत्व का अनुभव करते हैं तब ही इसका अनुभव किया जा सकता है. अतीत जो जा चुका, पश्चाताप या क्रोध के रूप में हमारी ऊर्जा को व्यर्थ न जाने दे और भविष्य जो अभी आया नहीं हमें आशंकित न करे तो जीवन को उसके समग्र सौन्दर्य के साथ जीने का अनुभव प्राप्त होता है. हमारे चारोंओर जो सृष्टि का इतना बड़ा आयोजन चल रहा है, उसके पीछे छिपे अज्ञात हाथों का स्पर्श हम भी महसूस करने लगते हैं. आकाश हमारा मित्र बन जाता है और हवाएँ सहयोगी. 

Wednesday, November 30, 2016

मन ही माया


हर सुबह एक नए अंदाज में प्रकटती है, सूर्य भी नए रूप में दिखाई देता है. आकाश वही है पर बादलों के बदलते रूप उसे नित नया कलेवर पहना देते हैं. इसी तरह आत्मा सदा एक सी रहने पर भी मन पल-पल बदलता है, तीन गुणों के मेल से कभी हँसता कभी उदास होता है. शास्त्रों के अनुसार आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी का निर्माण हुआ है. उसी तरह आत्मा से प्राण, प्राण से ऊर्जा, ऊर्जा से मन तथा मन से देह का निर्माण होता है. साधना के द्वारा जितना-जितना सतोगुण बढ़ता जाता है, मन आत्मा के निकट पहुँच जाता है.

Wednesday, October 19, 2016

पल पल जीवन को जी लें

२० अक्तूबर २०१६ 
जीवन का कैनवास कितना विशाल है, इसका आयाम अनंत तक फैला है. हमारा छोटा सा जीवन असीम सम्भावनाएं छिपाए है. मानव व्यर्थ ही स्वयं को देहों के छोटे-छोटे घरोंदों में कैद मानकर, मान्यताओं व धर्मों की दीवारों में बंट जाता है, और अपनी ऊर्जा व्यर्थ के कर्मों में लगा देता है. जब कि आकाश अपने अनदेखे हाथ हमारे सिरों पर रखे झांक रहा है. इस रंगमंच पर घटते हुए दृश्य की साक्षी धरा भी है. जीवन जो अपने शुद्धतम रूप में हर कहीं है, मानव देह में अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रकट हुआ है.  

Tuesday, August 9, 2016

जीवन इक वरदान बने

९ अगस्त २०१६ 
यदि कोई तारों भरे आकाश को देखकर प्रफ्फुलता से नाच सकता है, और सुबह की किरण का स्पर्श पाकर उसी भांति उठता है जैसे पंछी जगते हैं तो वह अभी भी निसर्ग से जुदा नहीं हुआ है. शहर की प्रदूषित हवा और कंक्रीट के जंगलों में पला व्यक्ति आज कुम्हला गया है क्योंकि न तो वहाँ पूर्णिमा का चाँद दिखाई देता है न भोर का उगता हुआ सूरज..जंगल और गाँव के निकट रहने वाला व्यक्ति अभी भी खिला नजर आता है. प्रकृति कुछ करती नजर नहीं आती पर वहाँ सब कुछ अपने आप होता है. प्रकृति से जुड़ा व्यक्ति भी कुछ करता हुआ नहीं लगता, उससे कर्म होते हैं वैसे ही जैसे पेड़ों पर फूल लगते हैं. तब जीवन अपने आप में पूर्ण नजर आता है.

Thursday, January 29, 2015

मिटकर ही आकाश मिलेगा

जनवरी २००८ 
साधक यदि चाहे तो स्वयं का कल्याण कदम-कदम पर कर सकता है. हर क्षण हमारे सम्मुख है ख़ुशी का आकाश, अंतहीन आकाश ! पर हम हर बार धरा को चुन लेते हैं, डरते हैं कहीं आकाश में गुम न हो जाएँ, पर गुम हुए बिना क्या कोई अपने को पा सका है. एक बार तो मरना ही होता है, खोना ही होता है, सहना ही होता है नितांत अकेलापन ! जिसके बाद मिलता है निरंतर सहचरी का भाव, उस परमात्मा से एकता का अभिन्नता का अपार भाव ! वह अस्त्तित्व जो हर पल हमारा साथी है, पर अभी मौन है, तब मुखर हो उठता है ! हम जो भीतर कटुता छिपाए हैं, छल, वंचना तथा ईर्ष्या छिपाए हैं वह तब प्रकट हो जाती है. हम उसे अपने से भिन्न देखते हैं जैसे कोई अपने को देखे और अपने कपड़ों को, जिन पर मेल लगी है, वैसे ही हम अपने मन को देखें और मन पर लगे धब्बों को. वह परमात्मा हमें उसके साथ ही कबूल करता है. वह हमें चाहता है, उसके साथ हमारे सम्बन्ध में कोई छल न हो बस वह यही चाहता है.    

Saturday, March 1, 2014

नीलगगन सा मन हो जाये

अगस्त २००५ 
हम जितना-जितना सजग होकर व्यवहार करते हैं, हमारा भीतर खाली होता जाता है क्यों कि तब कोई ऐसी चेष्टा नहीं होती जिसके लिए भीतर दुःख, पछतावा या उद्वेग हो, बल्कि शांत भाव जो हमारी सहज अवस्था है, वही बना रहता है, जैसे आकाश अपने सहज रूप में शुभ्र है, नीला है तो खाली है, खाली मन में ही परमात्मा का निवास होता है, संतों का मन ऐसा ही होता है जहाँ से ईश्वरीय गुणों का प्रसार होता है. हमारे भीतर भी सरलता, सहजता, विश्वास, आस्था, आत्मीयता इन सारे गुणों का खजाना है, जिन्हें बाँटना है, हमें सजगता की मशाल लेकर इन तक पहुंचना है, ताकि वह पर्दा न रहे जो हमारी सहजता और हमारे बीच है, दूर हो सके. हम तभी सच्ची मुक्ति का अनुभव कर सकते हैं, मुक्ति की आकांक्षा करने वाला मन यदि स्वयं ही मुक्ति का विरोधी बना रहे तो यह सम्भव नहीं होगा ! 

Saturday, December 21, 2013

तेरा नाम सांचा

मई २००५ 
किसी ने कितना सही कहा है, “सुबह का बचपन हँसते देखा, दोपहर की मस्त जवानी, शाम बुढ़ापा ढलते देखा, रात को खत्म कहानी” अज्ञानता में भी वैराग्य छा जाता है, लेकिन यह क्षणिक होता है जैसे श्मशान वैराग्य, जब भीतर सत्य की झलक मिल जाती है तो बाहर से राग अपने आप ही छूट जाता है. वास्तव में तो सत्य सदा ही भीतर है, अज्ञान का आवरण ही उसे ढके रहता है. लेकिन संसार से वैराग्य होने का अर्थ उसका अनादर नहीं है न ही उदासीनता, बल्कि उसका सत्यता को जानकर उसके अनुरूप व्यवहार करना है. प्रेमपूर्ण व्यवहार तो करना है पर फंसना भी नहीं है. यदि हम नित्य को छोड़कर अनित्य पर भरोसा करते हैं तो हमें धोखा खाना ही पड़ेगा. नित्य पर किया विश्वास हमें नित्य सुख की ओर ले जाता है. राग हो ईश्वर से और सेवा हो जगत की तो मन खाली रहता है क्योंकि जग से कुछ लेने की कामना तो है नहीं और ईश्वर को कितना भी भर लो वह तो आकाश की तरह है. 

Wednesday, May 23, 2012

धर्म और विज्ञान


धर्म व्यक्ति का परिमार्जन करता है और विज्ञान वस्तु का परिमार्जन करता है. धर्म अंतर में ले जाता है, विज्ञान बाहर की ओर ले जाता है. अंतःकरण का परिमार्जन करने के बाद उसका उपयोग विज्ञान के लिये भी किया जा सकता है परहित के लिये. ऐसा विज्ञान दोषों के प्रति सजग होगा. और जो भी कार्य उसके द्वारा होगा, उसका कर्ताधर्ता एक ‘वही’ होगा, करने वाला निमित्त मात्र होगा. करने वाले का एक मात्र लक्ष्य तो अंतःकरण का परिमार्जन है सो वह निंदा का पात्र होने पर भी कभी अपमानित नहीं होगा, सुख-दुःख आदि में सम भाव में रहकर वह अपने अंतर आकाश को प्राप्त कर लेता है, जिस पर संसार रूपी बादल आते-जाते रहते हैं. पर वह सदा एक सा ही है.

Tuesday, January 3, 2012

पूरा प्रभु आराधिये



सितम्बर २००२ 
आकाश पर कभी घने बादल छा जाते हैं, रिमझिम फुहार और ठंडी हवा के झोंके तन-मन को सिहरा देते हैं. कभी चमचमाती हुई तेज धूप सारे माहौल को रोशन कर देती है. ऐसे ही जीवन भी हर पल रंग बदलता है. कभी मुश्किलें खड़ी हो जाती हैं फिर साक्षी भाव से देखते रहें तो चुपचाप चली भी जाती हैं. ऐसे ही सुख भी आता है तो टिकता थोड़े न है, चला जाता है. हम वहीं के वहीं रह जाते हैं, अपने आप में पूर्ण, न तकलीफ आने से हमारा कुछ घटता है न सुख आने से कुछ बढ़ता है. मान हो तब भी कुछ नहीं बढ़ता अपमान हो तब भी कुछ नहीं घटता. हम पूरे हैं पूरे ही रहते हैं हर क्षण, उस पूर्ण परमात्मा की तरह. 

Friday, November 11, 2011

शाश्वतता


पांच शरीर हैं हमारे, पांचों के पार वह चिदाकाश है जहाँ हमें पहुंचना है. सत्य को चाहने पर ही सत्य की यात्रा होगी. परमात्मा न जाने किस-किस उपाय से हमें उसी ओर ठेल रहा है, वह हमें सुख-दुःख के द्वंद्वों से अतीत देखना चाहता है. हमारे अहं को क्षत-विक्षत करता है. हम उसे तभी जान सकते हैं जब भीतर अहं न हो. शाश्वत को जानने और मानने की मति भी वही देता है. नश्वरता को अपनाएंगे तो वही मिलेगी, और मन पुराने संस्कार जगाता ही रहेगा. जब हम उसकी निकटता में रहते हैं, उसके सामीप्य का अनुभव करते हैं, तभी आकाश की भांति पूर्ण मुक्त, स्वच्छ और अलिप्त रहेंगे.