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Wednesday, June 7, 2017

बन सुवास जब मन बिखरे

७ जून २०१७ 

बादल बरस रहे हैं जैसे, कृपा बरसती प्रभु की वैसे
भीगा जैसे घर का आँगन, भीगे वैसे अंतर उपवन !

परमात्मा की कृपा का अनुभव साधक को हर घड़ी होता है, पर उस कृपा को सुवास बनाकर बाहर बिखेरना भी तो आना चाहिए. जैसे धरती जल लेकर सुवास देती है, वैसे ही कृपा के जल से भीगा हुआ मन प्रेम के गीत रचे. सुनहले शब्दों की चादर बुने, मोती से वचन कहे, जिसे हंस चुगें. धरा देती है, गगन देता है, प्रकृति देती है और मानव भरे जाते हैं भीतर. पाना ही उनका लक्ष्य है, पाकर वे उसे व्यर्थ कर देते हैं.  

Thursday, April 6, 2017

निज हाथों में मन की डोर

६ अप्रैल २०१७ 
आत्मा सागर है और मन उसमें उठने वाली तरंगें, आत्मा आकाश है, मन उसमें तिरने वाले बादल. आत्मा कच्चा माल है और मन उसका उत्पादन..हम किसी भी तरह से सोचें अस्तित्त्व और हमारे मध्य कोई न कोई संबंध देख ही सकते हैं. ऐसा संबंध जो हमने नहीं बनाया है जो सदा से है. हम इस बात के लिए पूर्ण स्वतंत्र हैं कि मन को कैसा मानें, तरंगों की भांति जिस पर हमारा कोई नियन्त्रण नहीं, बादलों की भांति जो आते हैं और चले जाते हैं, अथवा तो स्वयं के पूर्ण नियन्त्रण में बनने वाले उत्पाद के रूप में. स्वयं को आत्मा जानकर जब  हम अपने विचारों को गढ़ते हैं, उन्हें सजाना-संवारना हमारे हाथ में होता है. हर विचार एक बीज है और हर बीज  कर्म रूप में वृक्ष  बनेगा जिस पर फल भी लगेंगे और नये बीज भी बनेंगे, जो बिलकुल वैसे ही होंगे जैसा बीज था. इसका अर्थ हुआ हमारा भाग्य हमारे विचारों का ही प्रतिफल है. 

Thursday, March 30, 2017

तू छुप न सकेगा परमात्मा !

३० मार्च २०१७ 
आज आकाश ढका है बादलों से, पर बादलों के पार भी जो झांक सकता है, उसके लिए नीला शुभ्र आकाश उतना ही सत्य है जितना यह बदली भरा आकाश, बल्कि इससे भी अधिक सत्य क्योंकि यह बादल तो आज नहीं कल बरस कर रीते हो जायेंगे. इसी तरह जो देह के पीछे छिपे चिन्मय तत्व को देख सकता है उसके लिए देह का रहना  या न रहना अर्थहीन हो जाता है, क्योंकि जो सदा है वह उसकी दृष्टि से कभी ओझल ही नहीं होता,  जगत का कार्य-व्यवहार उसे क्रीड़ा मात्र ही प्रतीत होता है, और उसके पीछे छिपा निरंजन ही सत्य जान पड़ता है. बादल कितने भी घने हों एक न एक दिन समाप्त हो जायेंगे, इसी तरह भीतर का चैतन्य मन की धारणाओं, वासनाओं और कामनाओं से कितना भी क्यों न छिप गया हो, कभी मिटता नहीं. इस सत्य को स्वीकार करके उसे अपना अनुभव बनाना ही साधक का लक्ष्य है.  

Saturday, April 13, 2013

प्रेम मयी आनंद मयी.....


जुलाई २००४ 
कभी-कभी बादल बरसते हैं तो बरसते ही चले जाते हैं, न जाने कितने हजार युगों से बादल बरस रहे हैं, पुनः पुनः जल, धरा से गगन में उठता है, गिरता है. पुनः पुनः वृक्ष पनपते हैं, नष्ट होते हैं. हम भी न जाने इस धरा पर कितनी बार आ चुके हैं. एक बार और आए हैं, और स्वयं का परिचय हमें मिला है, पिछले जन्म में भी हो सकता है किसी ने हमें यह मार्ग बताया हो, पर हमने यह न चुना हो. इस जन्म में हमने परमात्मा को अपने रहबर माना है. वह हमारे हृदय की ग्रंथियों को काट रहे हैं. कोई राग-द्वेष नहीं है, चाह नहीं है, उसके प्रेम ने अंतर को ऐसा भर दिया है कि और कुछ भी भरने की जगह नहीं है. हम आत्मनिष्ठ होकर जीना सीख गए हैं. आत्मा पूर्णकाम है, वह  आनन्दपूर्ण है, शांतिमयी और सुखमयी है, वह है, वह सहज है, झरने की तरह, पंछी की तरह, फूल की तरह और नन्हे बच्चे की तरह, उसे कोई अपेक्षा नहीं, उसके हृदय में उपेक्षा भी नहीं, वह जैसी भी परिस्थिति आये सहज रूप से व्यवहार करती है, वह प्रेमिल है, वह सूर्य की भांति सारे शरीर को प्रकाशित करती है. वह हमें चेतना से भर देती है. अपार ऊर्जा का भंडार है उसके पास. उससे मिलकर ही दर्शन होता है, अनंत का दर्शन.

Wednesday, August 1, 2012

बन जाये वह मीत हमारा


जून २००३ 
वर्षा होती है तो सब ओर शीतलता छा जाती है और ग्रीष्म का ताप कहीं दूर चला जाता है.ऐसे ही जब हृदय में प्रभु प्रेम के बादल छा जाते हैं और भक्ति रूपी वर्षा होने लगती है, प्यास से तृषित मानस धरा पर जब बूंदें बरसती हैं, तो तीनों तापों से मुक्ति मिल जाती है. मन सौम्यभाव में स्थित हो जाता है, सुख-दुःख रूपी पक्षी भी शांत हो जाते हैं. यह जगत एक अनवरत चलने वाली चक्की की तरह है, रात और दिन जिसके दो पाट हैं. हम सभी एक न एक दिन इसमें पिस जाने वाले हैं, कुछ रहस्य ऐसे हैं, जिन पर पड़ा पर्दा ईश्वर उठाना नहीं चाहते, लेकिन वह इतनी कृपा अवश्य करते हैं कि उनका सान्निध्य एक ऐसा भाव जगाता है जिसके सम्मुख मृत्यु भी नहीं टिक पाती, तब जीवन और मरण दोनों एक से प्रतीत होते हैं, अभय प्रदान करती है भक्ति, तब इस देह से उतने ही कार्य मन लेता है जो आवश्यक हों, तब हृदय अनंत का घर बन जाता है, जब प्रेम के अतिरिक्त कोई भावना हमारे किसी कार्य, विचार या शब्द के पीछे नहीं होती, तब परमात्मा हमारा मीत बन जाता है.   

Friday, July 27, 2012

अनोखे अनुभव


जून २००३ 
सदगुरु बादल प्रेम के हम पर बरसे आज, अंतर भीजी आत्मा हरि भई वह आज !
उसे पुकारो तो वह एक क्षण की भी देर नहीं लगाता, भीतर बाहर हर जगह उसी का दीदार होता है, वह हमारे भीतर विद्यमान है, उसी की ज्योति से सारा विश्व प्रकाशित है, उसकी ही अध्यक्षता में परा व अपरा प्रकृति अपना कार्य कर रही है. वह हमें हर क्षण अपने निकट आने का आमन्त्रण देता है. उसने हमें अपने समकक्ष बनाया है. छोटे-छोटे सुखों के प्रलोभन, पुराने संस्कार हमें अपने पथ से विचलित करते हैं, पर निरंतर साधना से हम उसकी समीपता पा लेते हैं. हमारा व्यक्तिगत अनुभव वास्तव में हमारा नहीं है, महाचित्त का विशाल अनुभव है, हमारी आत्मा विशिष्ट नहीं है सभी के भीतर वही आत्मा है. सभी को अनुभव समान नहीं होते क्योंकि चित्त भिन्न भिन्न हैं.


Wednesday, May 23, 2012

धर्म और विज्ञान


धर्म व्यक्ति का परिमार्जन करता है और विज्ञान वस्तु का परिमार्जन करता है. धर्म अंतर में ले जाता है, विज्ञान बाहर की ओर ले जाता है. अंतःकरण का परिमार्जन करने के बाद उसका उपयोग विज्ञान के लिये भी किया जा सकता है परहित के लिये. ऐसा विज्ञान दोषों के प्रति सजग होगा. और जो भी कार्य उसके द्वारा होगा, उसका कर्ताधर्ता एक ‘वही’ होगा, करने वाला निमित्त मात्र होगा. करने वाले का एक मात्र लक्ष्य तो अंतःकरण का परिमार्जन है सो वह निंदा का पात्र होने पर भी कभी अपमानित नहीं होगा, सुख-दुःख आदि में सम भाव में रहकर वह अपने अंतर आकाश को प्राप्त कर लेता है, जिस पर संसार रूपी बादल आते-जाते रहते हैं. पर वह सदा एक सा ही है.

Thursday, April 19, 2012

इच्छा तेरे रूप अनेक


 फरवरी २००३ 
अक्सर आवश्यकता एवं इच्छा में हमें भेद नहीं मालूम पड़ता, जो वस्तु हमारी आवश्यकता की पूर्ति करे वह कभी दुःख का कारण नहीं बन सकती. इच्छा हमें मानसिक उद्वेग देती है, एक दौड़ में हम शामिल हो जाते हैं. इच्छा उठते ही मन में संकल्प-विकल्प उठते हैं, उसे पूरी करने की धुन हमें बेचैन कर देती है. निर्दोष लगने वाली इच्छा भी मन को अटकाती है, पथ पर चलना संभव नहीं हो पाता. पानी सा मन बहता रहे यही साधना की पहली शर्त है. जैसे आकाश पर बादल आते हैं और चले जाते हैं. मन, बुद्धि आदि आत्मा के चिदाकाश पर आने-जाने वाले बादलों के समान अनित्य हैं, ज्ञान का सूर्य जब निकलता है तो आकाश की स्वच्छ नीलिमा झलकती है.

Friday, August 26, 2011

अज्ञान


नवम्बर २००१ 
है कुछ भी नहीं पर अनादिकाल से हम बार-बार बंधे जा रहे हैं. अज्ञान का आधार तो हमारा मन ही है, मन की दीवारें गिर जाएँ तो यह अज्ञान उसी तरह लुप्त हो जायेगा जैसे अँधेरे कमरे की दीवारें गिर जाएँ तो वहाँ अँधेरा नहीं टिकता. जैसे बादल की सत्ता सूर्य से है पर वही उसको ढक लेते हैं, वैसे ही आत्मा की सत्ता से ही अज्ञान है. ज्ञान ही हमें इससे मुक्त करता है. यह मुक्ति पल भर को भी मिले तो अमूल्य है.