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Wednesday, December 15, 2021

तमसो मा ज्योतिर्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय नामक वैदिक मंत्र में अंधकार से प्रकाश की ओर  ले जाने की प्रार्थना की गयी है। अंधकार में टकराने का भय है, सर्प आदि जंतुओं का डर भी है। अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान ही अंधकार है, जिसके कारण जगत में  सुख-दुःख, हानि-लाभ, मान-अपमान से टकराना पड़ता है। क्रोध, लोभ, मोह आदि के सर्प, बिच्छू आदि के काटने का डर बना रहता है। जैसे ही स्वयं का बोध होता है, अर्थात् ज्ञान का दीपक जलता है, तो ये सभी स्पष्ट दिखाई पड़ने लगते हैं। इनसे बचकर रहा जा सकता है, क्योंकि स्वयं के भीतर समता का वह स्थान प्राप्त हो जाता है जहाँ से आनंद, शांति और प्रेम की अबाध धारा निरंतर बहती रहती है। अज्ञान काल में ही राग-द्वेष सताते हैं, क्रोध आदि शत्रु जलाते हैं, जब आत्मबोध होता है तब इनकी सत्ता उसी तरह विलीन हो जाती है जैसे दिया जलते ही अंधकार दूर हो जाता है। जैसे स्वप्न में होने वाली हानि को हम हानि नहीं मानते वैसे ही ज्ञान होने पर जगत में होने वाले सुख-दुःख,लाभ-हानि आदि स्वप्नवत ही प्रतीत होते हैं। 


Monday, March 8, 2021

शिव की करे जो मन उपासना

 शिवलिंग पत्थर से बनाया जाता है। जबकि शिव पदार्थ नहीं हैं, वे निराकार हैं, अमर हैं, शाश्वत हैं।  पत्थर का प्रयोग शायद इसी अमर्त्य को दिखाने के लिए किया जाता है क्योंकि   देह की अपेक्षा पत्थर अनंत काल तक रह सकता है। शिव का ज्योतिर्लिंग हमारी आत्मा का प्रतीक है। देहें ठोस दिखती हैं उनका रूप और आकार है। जो बना है वह मिटेगा ही। जो जन्मा है वह मरेगा ही। देह जन्मती है फिर मिटती है। इसके भीतर रहने वाली ज्योति ही शिवलिंग का प्रतीक है,  जो वास्तव में ठोस है. खुदाई में न जाने कब से बनाए शिवलिंग मिलते हैं, वे नहीं मरते। जब तक सृष्टि है, शिवलिंग की सत्ता रहेगी। उस आत्मज्योति को  ही जल चढ़ाते हैं। वही चेतना प्रेम और क्रोध दोनों है। शिव में समाई है शक्ति, जो सृजन करती है। पत्थर के एक-एक परमाणु में में अपार शक्ति है। हमारे भीतर भी अपार शक्ति है, विध्वंसात्मक और सृजनात्मक दोनों ही। दोनों को समुचित उपयोग में लाना है। तीनों गुणों से सम्पन्न है वह शक्ति, इसलिए बेल पत्र चढ़ाते हैं। कंटक चढ़ाते हैं ताकि तमस सीमा में  रहे, जल चढ़ाते हैं, ताकि रजस सीमा में रहे। शिव के साथ सभी भूत -प्रेत भी  दिखाते हैं, भूत अतीत  का प्रतीक है, मन में न जाने कितने जन्मों मे संस्कार हैं, अतृप्त कामनायें हैं जो राक्षस की भांति पीछे लगी हैं। शक्ति उन्हीं का संहार करती है। हर आत्मा का जीवन शिव और शक्ति की लीला है।

Thursday, December 17, 2020

भक्ति करे कोई सूरमा

 भक्त कहता है हम मरुथल सा रूखा-सूखा दिल लेकर तेरे द्वार पर आये थे, देखते ही देखते तूने वहाँ हरियाली के अंबार लगा दिए। तेरा नाम भर सुना था, तुझे जानते भी नहीं थे पर जो  खाली दामन साथ लाये थे, उसे भर दिया. जो दिखाई नहीं देते पर जिनकी चमक से मन में ज्योति छा गयी है, वैसे मधुर भावों के अनेक हीरे-मोती तू लुटाता है. दो बूँद ही प्रेम की इस उर ने चाही थी पर कितना कृपालु है तू कि प्रेम के  दरिया बहा दिए. कितने विकारों से भरा था मन, अहंकार के हाथी पर चढ़ कर आया था, पर तू पावन करने वाला है. सारे संबंध  तुझसे ही पनपे हैं, तू पिता बनकर पालता है, माँ बनकर संवारता है, गुरू बनकर राह दिखाता है, मित्र बनकर स्नेह लुटाता है, भाई या बहन बनकर जीवन पथ को सुंदर बनाता है. यह सारी सृष्टि तुझसे ही उपजी है. भक्त को किसी दर्शन, किसी वाद, ता किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं है, उसे समाधि भी नहीं साधनी है, उसे तो भीतर उमड़ते उस प्रेम को एक दिशा देनी है, उस अनंत पर लुटाना है. प्रेम का आदान-प्रदान ही एकमात्र वह कृत्य है जो उसे अस्तित्त्व से जोड़ता है. 


Wednesday, June 17, 2015

मस्त हुआ जो वही पा गया

जनवरी २०१० 
अभ्यास और वैराग्य ये दो पंख हैं, जिनके सहारे साधक अध्यात्म के आकाश में उड़ता है. अभ्यास समय सापेक्ष है पर वैराग्य समय सापेक्ष नहीं है. परम को प्रेम करें तो संसार से वैराग्य हो जाता है. मन ही तो संसार है, जब मन स्थिर हो जाता है तो वह ज्योति स्तम्भ बन जाता है, तब शरीर हल्का हो जाता है. मस्ती में परम वैराग्य है. वैराग्य से समाधि का अनुभव होता है, समाधि से प्रज्ञा पुष्ट होती है. पूर्णता का अनुभव होता है.    

Sunday, November 3, 2013

कौन सदा है संग सभी के

मार्च २००५ 
श्रीमद्भागवत में कृष्ण कहते हैं, ‘जब भक्त मेरा भजन करते-करते थक जाता है, तब मैं उसका भजन करने लगता हूँ’. कृष्ण कितने अनोखे हैं, वे परम अराध्य हैं, समस्त कारणों के कारण हैं, परमब्रह्म परमेश्वर हैं. हमारा श्रद्धाभाव जितना दृढ होगा उतना ही हम प्रभु को करीब से जानने लगते हैं. उसकी कृपा से ही संशय दूर होते हैं, इच्छाएं उठने से पूर्व ही पूर्ण होने लगती हैं. राधा उनकी आह्लादिनी शक्ति है, वही कृष्ण की बंसी की मधुरता है, वही उनके भीतर का शुद्ध हास्य है, वही उनका प्रेम है. वह सदा ही हमारे मन के मन्दिर में विराजते थे पर हमें ही इसका पता नहीं चलता था, हमारे भीतर ईश्वर के प्रति सहज स्वाभाविक प्रेम सुप्तावस्था में रहता है, सद्गुरु की कृपा से वह प्रकट हो जाता है, उसका प्राकट्य एक अद्भुत घटना है जो अंधकार न जाने कब से भीतर बना होता है, वह पल में समाप्त हो जाता है. भीतर ज्योति भर जाती है, जैसे रोम-रोम दिव्यता से भर गया हो. परमात्मा सदा हमारे साथ है.

Friday, February 8, 2013

दो में रुकना ही दुःख है


मार्च २००४
ईश्वर निर्विरोध सत् है, इस जगत में दिखाई पड़ने वाली वस्तुएं किसी न किसी का विरोध करती हैं. जो ‘यह’ है वह ‘वह’ नहीं है, कपड़ा, लकड़ी नहीं है, किताब, कलम नहीं है, पर ईश्वर का किसी से विरोध नहीं, वह ‘यह’ भी है और ‘वह’ भी. प्रेम, घृणा नहीं है, लोभ, उदारता नहीं है, पर ईश्वर एक साथ दयालु और न्यायकारी है. कोमल और कठोर है. वह सारे द्वन्द्वों से अतीत है, पर उसमें कुछ भी होने का अभिमान नहीं है, चैतन्य निरहंकार है, इसीलिए ऐसा भी कह सकते हैं कि वह न ‘यह’ है न ‘वह’ है. वह जहाँ है वहाँ भले-बुरे में भी कोई भेद नहीं रह जाता, वहाँ बस चीजें होती हैं, जो जैसा है बस वैसा ही. साधक का लक्ष्य उसी दृष्टि को पाना है, जहाँ अद्वैत है, केवल उसी पल में मन निर्विचार हो जाता है, निर्द्वन्द्व हो पाता है. एक आह्लादपूर्ण ज्योति से भर जाता है, संशय गिर जाते हैं. तब कल्याण करना नहीं पड़ता, जो होता है, वह कल्याणकारी होता है. जीवन सहज उत्सव बन जाता है.

Friday, July 27, 2012

अनोखे अनुभव


जून २००३ 
सदगुरु बादल प्रेम के हम पर बरसे आज, अंतर भीजी आत्मा हरि भई वह आज !
उसे पुकारो तो वह एक क्षण की भी देर नहीं लगाता, भीतर बाहर हर जगह उसी का दीदार होता है, वह हमारे भीतर विद्यमान है, उसी की ज्योति से सारा विश्व प्रकाशित है, उसकी ही अध्यक्षता में परा व अपरा प्रकृति अपना कार्य कर रही है. वह हमें हर क्षण अपने निकट आने का आमन्त्रण देता है. उसने हमें अपने समकक्ष बनाया है. छोटे-छोटे सुखों के प्रलोभन, पुराने संस्कार हमें अपने पथ से विचलित करते हैं, पर निरंतर साधना से हम उसकी समीपता पा लेते हैं. हमारा व्यक्तिगत अनुभव वास्तव में हमारा नहीं है, महाचित्त का विशाल अनुभव है, हमारी आत्मा विशिष्ट नहीं है सभी के भीतर वही आत्मा है. सभी को अनुभव समान नहीं होते क्योंकि चित्त भिन्न भिन्न हैं.


Wednesday, July 18, 2012

सहज योग ही लक्ष्य है


जून २००३ 
सदगुरु हमारे मन में ज्योति जलाते हैं, वह अपने अंतर का आनंद हमें भी बाँटना चाहते हैं. वह हमारे भीतर सोयी श्रद्धा को जगाते हैं. उनका प्रेम अनंत है, हम अपने मन की डोर यदि उनके हाथों में सौंप दें तो उन्नति स्वाभाविक है, वरना ऊर्जा व्यर्थ ही इधर-उधर के कार्यों में लगती रहेगी. वह हमें मन की कल्पनाओं को महत्व न देकर स्वयं में स्थित रहने का संदेश देते हैं. सुख-दुःख के विष को पचाना सिखाते हैं. दुखाकार वृत्ति के साथ जुड़ना अथवा न जुड़ना हमारे अपने हाथ में है, वह समता में रहना सिखाते हैं. परमात्मा के नाते सब उसका है, जगत के नाते भी सब उसी का है. मुक्तात्मा बन कर जीना ही वास्तव में जीना है. मन के दोष मिटाते मिटाते समाधि  की अवस्था तक पहुंचना है पर वहाँ भी रुकना नहीं है बल्कि सहजता के योग को साधना है. अपनी महिमा को जानकर अपने वास्तविक स्वरूप को  पाने के लिये ही हमारा सभी प्रयास चल रहा है. अपनी अल्प बुद्धि से उसे जान नहीं सकते बुद्धि से पार जाकर ही वहाँ की खबर मिलती है.