सन्त कहते हैं यह जीवन ही धर्मक्षेत्र है. धर्म का अर्थ है जो धारण करता है, क्षेत्र का अर्थ है खेत. जीवन इसी में स्थित है. यह देह ही कुरुक्षेत्र है, जहाँ हमें कर्मों के बीज बोने हैं. हमें अपने मन की गहराई में स्थित उस परम जीवन, उस चैतन्य आत्मा रूपी जीवन में ही कर्म रूपी यज्ञ करना है. वही बीज बाहर हमारे जीवन में सुख-दुःख रूपी फलों को प्रदान करते हैं. साधना के द्वारा जब हम स्वयं को परम से एक कर लेते हैं तब हमारे बीज उस परम अग्नि में जलकर भस्म हो जाते हैं और कोई फल नहीं देते. तभी हम मुक्ति का अनुभव करते हैं.
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Friday, June 26, 2020
Thursday, June 13, 2019
जहाँ दूसरा हो न कोई
ध्यान का लक्ष्य है देहात्मभाव
की निवृत्ति ! देह को स्थिर इसलिए रखते हैं कि मन के प्रति सजग हो जाएँ. देह और
आत्मा को जोड़ने वाला पुल है मन. देह को आसन में बैठकर उसे भूल जाना है. मन से
चिन्तन करना है, हम देह नहीं हैं. स्वयं को देह से अन्य मानने का अर्थ है हम निराकार
हैं. दृष्टि व मन में आकार हैं, इनका आदि-अंत है, चैतन्य का आदि-अंत नहीं. हम एक
हैं. हममें कोई अवयव नहीं. एक में मन खो जाता है. हमारे चारों ओर यदि देखें तो
आकाश निराकार है, हम भी आकाशवत हैं. स्थूल आकाश आधिभौतिक है, चित्ताकाश आधिदैविक
है तथा चिदाकाश आध्यात्मिक है. चिदाकाश न स्थूल है न सूक्ष्म, यह दोनों के पार
है. इसका अनुभव ही ध्यान है.
Thursday, May 30, 2019
मन को जिसने जान लिया है
मन पानी की तरह है, तरल ! और यह सदा प्रवाह में रहता है. चैतन्य
अचल है पर उसकी ही शक्ति मन एक पल भी स्थिर नहीं रहता. चैतन्य स्वयं में संतुष्ट
है पर मन सदा किसी न किसी तलाश में रहता है. जगत में विज्ञान का जो इतना विस्तार
हुआ है वह मन के इसी खोजी स्वभाव का ही परिणाम है. मन यदि अपने इस स्वभाव से
परिचित हो जाये तो अपने बदलाव को सहजता से स्वीकार कर लेगा. एक तरंग की तरह जो
उसमें चढ़ाव व उतराव आते हैं, कभी वह सुख का अनुभव करता है कभी उदासी का, तो इस
बदलाव को वह एक आश्चर्य की तरह देखेगा, इसका उपयोग करेगा और आगे बढ़ जायेगा. मन गतिशील है एक नदी की धारा
की तरह, कभी उथला है जल और कभी गहरी है नदी, कभी फूलों के हार उसमें बहते हैं, कभी
सड़े हुए पत्तों को लिए कोई सूखी डाल. मन को जिस स्थान से देखा जा सकता है वहीं
विश्राम है. जीवन में गति और विश्राम दोनों ही चाहिए.
Monday, October 29, 2018
जगमग दीप जले घर-बाहर
३० अक्तूबर २०१८
दीपावली का उत्सव दस्तक दे रहा है. राम के अयोध्या लौटने की ख़ुशी
में लाखों वर्ष पूर्व जो दीपक जलाये गये थे, मानो आज भी वे अपने प्रकाश को बाँट
रहे हैं. प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है, ख़ुशी और जागरण का भी. राम का अर्थ है रोम-रोम
में रमन करने वाला चैतन्य, जब उसका आगमन भीतर होता है, ज्ञान का प्रकाश छा ही जाता
है. अयोध्या का अर्थ है जहाँ कोई युद्ध न लड़ा जाता हो. जिस मन में कोई द्वंद्व न
बचा हो, जो मन समाहित हो गया हो, जहाँ अपना ही विरोधी स्वर न गूँजता हो, ऐसा मन ही
अयोध्या है, जहाँ राम का आगमन होता है. दशरथ का अर्थ है दस इन्द्रियों वाला अर्थात
देह, जब देहाध्यास छूट गया हो, तभी चैतन्य का अनुभव होता है. दीपावली का उत्सव
यानि मिष्ठानों और पटाखों का उत्सव. चेतना जब शुद्ध होती है तब उससे मधुरता का
सृजन होता है, आनंद का विस्फोट होता है, वही जो बाहर अनार व फुलझड़ी जलाने पर होता
है. भारतीय संस्कृति में हर उत्सव के पीछे एक संदेश छुपा है. हमारे शास्त्रों का
मुख्य स्वर है आत्मअनुभव, इसीलिए हर उत्सव अपने भीतर जाने की प्रेरणा देता प्रतीत
होता है.
Wednesday, June 6, 2018
कबिरा मन निर्मल भया
६ जून २०१८
संत कहते हैं, हमारे मन का आकाश यदि विचार रूपी बादलों से ढका न हो तो अपने निर्मल
स्वभाव को सहज ही प्राप्त हो सकता है. जब भीतर कोई भय न हो, तनाव या संशय न हो और
न ही कोई इच्छा हो, कुछ त्यागने या ग्रहण करने की प्रवृति भी न हो, तभी मानना होगा
कि मन खाली है. इस खालीपन को चैतन्य से भरने की आकांक्षा भी न हो, तब जो अनुभूति
होगी उसे अनुभव करने वाला भी वहाँ कोई नहीं होगा, मात्र अनुभव ही जब शेष रह जाता
है तब जीवन का मर्म समझ में आता है.
Thursday, March 9, 2017
ममेवांशो जीवलोका:
१० मार्च २०१७
कबीर ने कहा है, कोई सागर को स्याही बना ले और सारे वनों की कलम बना ले तब भी उस परमात्मा का बखान नहीं कर सकता. कृष्ण कहते हैं, मैं अपने एक अंश में इस सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करता हूँ. आज के वैज्ञानिक भी कहते हैं जो दिखाई देता है वह उस न दिखाई देने वाले की तुलना में अति सूक्ष्म है. हमारी बुद्धि चकरा जाती है यह सोचकर कि अरबों, खरबों गैलेक्सी भी उस अनंत के सामने कुछ नहीं. इस विशाल सृष्टि में मानव का स्थान कितना छोटा है पर उसके भीतर जो चैतन्य है वह उसी परमात्मा का अंश है, राजा कितना भी बड़ा हो, उसके पुत्र के लिए वह सदा सुलभ है, ऐसे ही परमात्मा कितना भी महान हो मानव के लिए वह हर क्षण उपलब्ध है. मानव जन्म का इसीलिए इतना गौरव गाया गया है. हमारा मूल बना है उसी तत्व से जिससे वह बना है. प्रेम, शांति, पवित्रता, ज्ञान, शक्ति, सुख और आनंद हमारा मूल स्वभाव है, तभी तो इससे विपरीत होते ही हम व्याकुल हो जाते हैं. जितना-जितना हम अपने मूल से दूर चले जाते हैं, दुःख को प्राप्त होते हैं.
Thursday, August 20, 2015
उसकी ओर जरा मुड़ देखें
वह परम चैतन्य जो इस
सम्पूर्ण सृष्टि का नियंता है, जो ऋत है, नियम है, आनन्दमय है, नित है, ज्ञानमय
है. सब प्राणियों को जानने वाला है. वह अगोचर है पर उसी के द्वारा देखा जाता है,
उसी के द्वारा सुना जाता है, वह ईश्वर हर आत्मा को अपनी ओर उन्मुख करना चाहता है,
कभी सुख कभी दुःख के द्वारा वह हमें सजग करता है. उसके प्रति जागरूक होना ही साधना
का फल है.
Monday, April 27, 2015
एक स्रोत शांति का भीतर
जनवरी २०१५
‘ब्रह्म सत्यम
जगत मिथ्या’ शंकराचार्य ने कहा है मिथ्या का अर्थ है जो दीखता तो है पर है नहीं,
माया है, स्वप्न है, लेकिन जिस समय हम स्वप्न देखते हैं सत्य प्रतीत होता है.
मिथ्या का एक अर्थ अनुपयोगी है. अनुपयोगी का अर्थ है विवेक से उपयोग करके उससे
मुक्त हो जाना. यह जगत विवेक से जीने जैसा है, उपयोग करके उससे पृथक हो जाने जैसा
है, इसी अर्थ में यह जगत मिथ्या है, हमारे भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म है, वही
अनंत है, निरंतर उसका विस्तार हो रहा है. जगत में दूर से दूर की वस्तुएं तथा निकट
से निकट का शरीर, मन बुद्धि, चित्त तथा अहंकार भी आ जाते हैं. श्वास यानि प्राण भी
हमारे उपयोग में लाने जैसा है, जिसे देखते–देखते हम मन तक पहुंचते हैं, बुद्धि,
चित्त तथा अहंकार को जानते-जानते स्वयं तक पहुंचते हैं. चैतन्य की अनुभूति होते ही
हमें अपनी शाश्वतता का प्रमाण भी मिल जाता है, मृत्यु का भय नहीं रहता, सारे
द्वन्द्वों से पार उस निर्भय, निर्वैर अवस्था का अनुभव होता है, जहाँ एक अखंड
शांति का सोता बह रहा है, जहाँ कोई चाह नहीं, पूर्णता है, जहाँ कोई अभाव नहीं, उस
अखंड आनंद की अवस्था में भी एक विस्तार है, रहस्य है. विस्मय की वह अनोखी अवस्था
ही समाधि तक पहुंचती है. जिससे प्रज्ञा का जन्म होता है, वही जानने योग्य है !
Monday, January 26, 2015
एक आँख भीतर को खोलें
जो निकट से भी निकट है
उसे जानना कठिन है, पर क्यों कठिन है ? जो हम स्वयं हैं, उससे विस्मृति कैसे हो
गयी? हम स्वप्न में जी रहे हैं. स्वप्न में ही मिथ्या संबंध जोड़ लेते हैं तभी
वास्तविक संबंध को पहचान नहीं पाते, वह संबंध जो हमारा अपने साथ है. इसी को अध्यास
कहते हैं. हम देह को ही मैं मानते हैं क्योंकि हम इसे बाहर से ही देखते हैं, जब हम
इसे भीतर से देखते हैं तत्क्षण आसक्ति छूट जाती है. वह आँख हमें पैदा करनी है
जिससे हम भीतर झाँक सकें, देह का ठीक-ठीक बोध होते ही देह पर पकड़ ढीली होने लगती
है तब दृष्टि चैतन्य की ओर जाती है. सत्य जानने से ही हम मुक्ति का अनुभव करते
हैं. जब देह से दूरी बढ़ने लगती है तो परमात्मा से निकटता होने लगती है.
Wednesday, August 13, 2014
चैतन्य को मीत बनाएं
जनवरी २००७
जब भीतर सत्संग की चाह
जगे, निर्मोहता बढ़े, प्रेम जगे तो मानना चाहिए कि हरिकृपा बरस रही है. किसी ने कहा
है,
इन्सान की बदबख्ती
अंदाज से बाहर है
कमबख्त खुदा होकर
इन्सान नजर आता है
कृष्ण कहते हैं कि जो
चैतन्य के साथ स्वयं को जोड़ता है वह अपना मित्र है जो जड़ के साथ जोड़ता है वह अपना शत्रु
है. नश्वर वस्तुओं को पाने में हम स्वयं को बड़ा मानते हैं तो यह छोटापन है, उनके
खोने से दुखी हो जाते हैं यह भी दुर्बलता है. क्रोध, मान, माया, लोभ, मोह सभी जड़
हैं, किन्तु कोई दोष हममें है यह मानने से दोष दृढ़ हो जाता है. हमें उसे अपने में
न मानकर प्रकृति में मानना है जो परिवर्तन शील है, वह दोष भी बदलने वाला है, जो
उत्पन्न हुआ है वह नष्ट होने ही वाला है. अपने दोषों को देखना भर है साक्षी भाव
में आते ही दोष मिटने लगते हैं.
Saturday, July 5, 2014
जब मन खाली हो जाता है
सितम्बर २००६
मन ग्रन्थि स्वरूप है, जो
विकार हमारे भीतर पड़े हुए हैं, हम उन्हीं विकारों को बाहर से भी अपनी ओर आकर्षित
करते हैं. जब मन की ग्रन्थि हमारे भीतर की उपजाऊ भूमि पाकर फूटती है तो उसमें से
विचार रूपी कोंपले निकलती हैं. जो विचार हमें ज्यादा आते हैं, समझना चाहिए वही
ग्रन्थि काटनी है. ध्यान में हमें यही तो करना है. आते हुए विचारों की साक्षी भाव
से देखना, बिना राग-द्वेष जगाये देखना उस ग्रन्थि से मुक्त करता है. हम जितना-जितना
भीतर से खाली होते जाते हैं वह चैतन्य उतना-उतना उसमें भरता जायेगा. इच्छा जब
घटते-घटते शून्य हो जाएगी तब रास्ता सरल हो जायेगा. इस जगत में इच्छा करने योग्य
एक वही तो है ! पर वह भी तब मिलता है जब उसकी भी इच्छा न रहे..
Friday, June 27, 2014
बुरा जो देखन मैं चला
दूसरों
के दोष देखने से हमारा स्वयं का दोष दृढ हो जाता है क्योंकि हम अन्यों में दोष तभी
देख सकते हैं जब वे पहले हम में हों. भक्ति करने की पहली शर्त है कि अंतकरण शुद्ध हो, मन निर्मल हो. यह जगत ईश्वर का बनाया
है, इसलिए कि हम अपने शरीर को रख सकें, शरीर के उपयोग के लिए यह बना है न कि उपभोग
के लिए. हम इसमें आनन्द ढूँढ़ रहे हैं, इन भौतिक वस्तुओं में आनंद नहीं है, बल्कि
इसके पीछे छिपे चैतन्य में आनन्द है. जैसे पारस यदि डिबिया में बंद हो तो वह लोहे
को सोने में नहीं बदल सकता. सबके भीतर चैतन्य छिपा है उसे उजागर करना है. यहाँ कोई
भी दोषी नहीं है, सभी एक नाटक का पात्र बने हुए अपना अपने रोल निभा रहे हैं. हम कई
जन्मों में यह ज्ञान सुन चुके हैं पर हृदय में धारण नहीं कर पाए. कभी बौद्धिक
व्यायाम के लिए, कभी यश के लिए, कभी दिखावे के लिए हम आज तक भक्ति करते आये हैं.
Monday, August 19, 2013
घट घट में है राम
कोऽहम् ? कुतोऽह्म् ? किम् इदम् च विश्वम् ? ऐसे प्रश्नों के
उत्तर जानने हों तो हमें गुरु, शास्त्र या परमात्मा की शरण में जाना होगा..तभी
ज्ञान होता है अपने सही स्वरूप का, अपने सहज मुक्त स्वभाव से हमारा परिचय होता है,
अपने मूल को हम जानते हैं. पता चलता है, हम कहीं से आये नहीं है, नित्य हैं, जगत
ही हममें आता जाता है. यह जगत त्रिगुणात्मक है, जिस तरह सूर्य का प्रतिबिम्ब जल से
भरे घट में दिखाई देता है, वैसे ही देह रूपी घट में मन, बुद्धि रूपी जल में उस
चैतन्य का प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, जैसे सूर्य, घट, जल या प्रतिबिम्ब से पृथक
है वैसे ही चैतन्य, देह, मन, बुद्धि से
भिन्न है. हम वही चैतन्य हैं, न जाने कितने जन्मों में कितने देह रूपी घट हमने धारण किये हैं, और
कितना मन रूपी जल उसमें भरा है, कितनी बार घट फूटा, पर सूर्य का प्रतिबिम्ब कभी
नहीं बदला. यह ज्ञान होते ही हम अभय को प्राप्त होते हैं क्योंकि मृत्यु का भय चला
जाता है.
Monday, July 15, 2013
तुझ बिन सूना सारा जीवन
अक्तूबर २००४
परमात्मा आकाश की नाईं खाली है और सागर की भांति भरा. उसकी ऊर्जा
इस ब्रह्मांड के जर्रे-जर्रे में है, सब कुछ उसी ऊर्जा में ओतप्रोत है. वह आनन्द
मय है, ज्ञान मय और प्रेम मय है. हम भी
उसके गुणों को धारण करते हैं, ध्यान में जब हम देह के पार होकर शुद्ध चैतन्य का
अनुभव करते हैं, तब उसकी उपस्थिति का अनुभव करते हैं. हमें अपनी शाश्वतता का अनुभव
होता है. हम भी उसी की भांति ज्योति स्वरूप हैं. वह नित्य है, सदा एकरस है, बल्कि
उसका रस बढ़ता ही जाता है. उससे मिले बिना हमारा जीवन अपूर्ण है. कभी-कभी कुछ ऐसा
होता है पल भर को हम देहातीत हो जाते हैं और उसकी झलक हमें मिलती है, उसकी याद बनी
रहती है, पर संसार में उलझे रहकर वह स्मृति क्षीण हो जाती है. खुद से दूर हम बेबस
की नाईं भीतर तपते हैं, फिर सत्संग से पुरानी स्मृति लौट आती है और हम परमात्मा की
निकटता से उत्पन्न शीतलता का अनुभव करते हैं.
Wednesday, February 13, 2013
ज्ञाता और द्रष्टा वही है
मार्च २००४
आत्मा चैतन्य है, चैतन्य ही
स्वयं को जान सकता है, शेष सभी को भी वही जानता है. जो जगा हुआ है वह जानता है कि
वह चैतन्य है. जागने के लिए उद्यम करना होगा. लक्ष्य को भूलना नहीं होगा, ज्ञान ही
हमारी सजगता टिकाने में सहायक है. ज्ञान जब टिकेगा तो पुराने संस्कार भी मिटने
लगेंगे, तब प्रारब्ध भी आयेगा तो छूकर निकल जायेगा. सजगता के लिए ही साधना है,
ध्यान है. जागृत, स्वप्न और निद्रावस्था के मध्य भी कुछ ऐसे क्षण मिलते हैं जो चेतना
का अनुभव कराते हैं. है, ऐसे क्षणों में हमें टिकना है, फिर हम उस चैतन्य को पा
लेते हैं, जहां मन शांत हो जाता है.
Friday, February 8, 2013
दो में रुकना ही दुःख है
मार्च २००४
ईश्वर निर्विरोध सत् है, इस जगत
में दिखाई पड़ने वाली वस्तुएं किसी न किसी का विरोध करती हैं. जो ‘यह’ है वह ‘वह’
नहीं है, कपड़ा, लकड़ी नहीं है, किताब, कलम नहीं है, पर ईश्वर का किसी से विरोध नहीं,
वह ‘यह’ भी है और ‘वह’ भी. प्रेम, घृणा नहीं है, लोभ, उदारता नहीं है, पर ईश्वर एक
साथ दयालु और न्यायकारी है. कोमल और कठोर है. वह सारे द्वन्द्वों से अतीत है, पर उसमें
कुछ भी होने का अभिमान नहीं है, चैतन्य निरहंकार है, इसीलिए ऐसा भी कह सकते हैं कि
वह न ‘यह’ है न ‘वह’ है. वह जहाँ है वहाँ भले-बुरे में भी कोई भेद नहीं रह जाता,
वहाँ बस चीजें होती हैं, जो जैसा है बस वैसा ही. साधक का लक्ष्य उसी दृष्टि को
पाना है, जहाँ अद्वैत है, केवल उसी पल में मन निर्विचार हो जाता है, निर्द्वन्द्व
हो पाता है. एक आह्लादपूर्ण ज्योति से भर जाता है, संशय गिर जाते हैं. तब कल्याण
करना नहीं पड़ता, जो होता है, वह कल्याणकारी होता है. जीवन सहज उत्सव बन जाता है.
Tuesday, July 31, 2012
छूटें जब आग्रह तब वह आता है
जून २००३
देह को जन्मने के बाद जो नाम दिया गया है, वह तो बदला जा सकता है लेकिन तन के
भीतर जहाँ से खुद के होने की सत्ता का भान होता है, वह अपरिवर्तनीय है. वही वास्तव
में हम हैं, और वह सभी के भीतर है. सभी के भीतर वही चैतन्य है. उस का अनुभव करने
के लिये ही हम शरण में जाते हैं, उसका अनुभव होने के बाद एक मदहोशी एक सात्विक
मस्ती का अनुभव होता है, शरण में जाने का अर्थ है कोई आग्रह न रखना, अस्तित्त्व ने
जो हमारे लिये तय किया है उसे स्वीकार करना, वैसे भी हम जो चाहते हैं, वह सभी होता
कहाँ है और जो होता है वह भाता नहीं, जो भाता है वह टिकता नहीं फिर जो नहीं भाता
वह भी नहीं टिकेगा तो अप्रिय को देखकर हमें परेशान होने की आवश्यकता नहीं है. सारे
आग्रह जब छूट जाते हैं तो जीवन सहज हो जाता है, भीतर की गाठें खुलने लगती हैं,
प्रकाश हो जाता है.
Thursday, July 12, 2012
सब उस पथ के ही राही हैं
मई २००३
ईश्वर को मानना ही नहीं जानना है क्योंकि मानना भी कल्पना है. हम अपने संस्कारों के
कारण, परिवार व समाज की मान्यता के कारण मन में ईश्वर का एक चित्र बना लेते हैं,
पर जब उसे स्वयं अनुभव करते हैं, तभी उसे वास्तव में जानते हैं. जीवन में श्रद्धा
हो, विश्वास हो, प्रेम हो, आस्था हो, अनुशासन हो, परहित की भावना हो, दोष दृष्टि न
हो, अपने दोषों को उखाड़ फेंकने की ललक हो, स्वयं को कुछ न मानते हुए उस परम सत्ता
को ही जगत का कारण मानते हुए निरहंकारी होते जाने का प्रयास हो, तभी साधना के पथ
का अधिकारी कोई बन सकता है. सभी में उसी चैतन्य का वास है, सभी अपने-अपने पथ से
उसी की ओर जा रहे हैं, सभी को वह उनकी क्षमता के अनुसार निर्देशित कर रहा है, यह
मानव जन्म हमें उस परम को जानकर आनंदित होने के लिये मिला है. जीवन का परम लक्ष्य
वही है, केवल वही, उसे पाकर कुछ भी पाना शेष नहीं रह जाता...
Tuesday, April 17, 2012
प्रेम जगाए भाव अनोखे
मिथ्या अहंकार के कारण हम स्वयं को एक लघु इकाई मान बैठते हैं, पर जब हृदय प्रेम से परिचित होता है तो अहंकार गल जाता है. सभी अपने लगते हैं. सभी के भीतर वही एक चैतन्य दीख पड़ता है. हम स्वयं को विशाल अनुभव करते हैं. यह भाव अनोखा है. कोई सुंदर दृश्य देखकर एक क्षण के लिये श्वास भी थम जाती है, कभी किसी के आँसू देखकर जो सूक्ष्म भाव मन में उठते हैं, उस कान्हा की कोई कथा याद आने पर कभी मुस्कान तो कभी आँखों से जल बहता है, ये सभी प्रेम के ही रूप हैं. यह संसार उसकी लीला है, यह सोचकर जो कौतूहल होता है, इस विशाल ब्रह्मांड को अरबों, नक्षत्रों, और नाना जीवों को धरा पर चलते-फिरते देखकर कितना अचरज होता है, फिर हमारा स्वयं का मन..एक क्षण में कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है. आत्मा की सुंदरता, जो ध्यान में दीख पड़ती है. हमारे भीतर का संगीतमय सुंदर संसार...यह सब कितना विचित्र है. और कितने भाग्यशाली हैं हम कि यह सब देख पा रहे हैं.
Monday, September 19, 2011
अंश और अंशी
फरवरी २००१
जो जिसका अंश है वह उससे दूर नहीं रह सकता, जैसे धरती से उत्पन्न वस्तुएं धरती की ओर आकर्षित होती हैं, वैसे ही हम उस चैतन्य के अंश होने के कारण उसी की ओर खिंचते हैं. उस तक पहुंचने के लिए हमें कोई प्रयास भी नहीं करना है, यह उतना ही सहज है जितना ऊपर से गिरायी वस्तु का नीचे आना. बल्कि उससे दूर जाने के लिए हमें अथक प्रयास करना पड़ता है. लेकिन संसार ऐसे ही चलता है विपरीत दिशा में. जो सहज है, सरल है उसे भाता नहीं. वह सदा अपने अहंकार की पुष्टि के लिए कठिन मार्ग को ही अपनाता है. एक दृष्टि से देखा जाये तो संसारी ज्यादा तप करता है भक्त से भी और ज्ञानी से भी.
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