Showing posts with label तप. Show all posts
Showing posts with label तप. Show all posts

Thursday, June 25, 2020

सद्विचार जब सोचेगा मन

विचारों से कर्म, कर्म से आदत, आदत से चरित्र और चरित्र से भाग्य का निर्माण होता है. इसका अर्थ हुआ हमारे भाग्य के निर्माता हमारे विचार हैं. जैसा विचार मन में होगा वैसा ही भाग्य निर्मित होगा. अब देखने वाली बात यह है कि कोई सकारात्मक विचारों को प्रमुखता देता है और कोई नकारात्मक बातों को, ऐसा क्यों होता है. यह भी तो विचार का ही फल है, जो अच्छी पुस्तके पढ़ेगा, शास्त्रों का अध्ययन करेगा, सन्तों, महापुरुषों की वाणी पढ़े, सुनेगा उसके भीतर वैसे ही विचार आएंगे. जो केवल अपने ही मन की सुनेगा वह नकारात्मकता का शिकार हो सकता है, क्योंकि मन का यह स्वभाव है वह नकार को जल्दी पकड़ लेता है, मन पानी की तरह है नीचे बहना  उसके लिए सरल है, यदि उसे ऊपर ले जाना है तो भाप बनाना पड़ेगा, जो तप से ही होगा. इसीलिए शास्त्रों में तप की महत्ता गायी गयी है. जीवन में अनुशासन हो तो वही तप है. वाणी पर संयम हो तो वह वाणी का तप है. तप से ही मन स्वभाव को बदल कर ऊँचा उठने लगता है, उसे अग्नि का साथ मिल जाता है, अग्नि सदा ऊपर ही उठती है. 

Tuesday, March 11, 2014

रसो वै सः

सितम्बर २००५ 
 आत्मा जो सूक्ष्म तथा तेजस शरीर के साथ अनादि काल से रह रही है, तप रही है. सूक्ष्म विकार और वासनाएं न जाने कितने-कितने जन्मों से उसे जला रही हैं, वह शीतलता चाहती है. शुद्ध रूप में तो वह स्वयं प्रेम स्वरूप है पर अभी उस पर कर्मों के संस्कार चिपके हैं. वह मलिन है, परमात्मा रूपी जल ही उसे तृप्त कर सकता है. यूँ तो परमात्मा तो हर क्षण उसके निकट ही है, उसके हर सुख-दुःख की खबर भी उसे है. वह उसे हर पल निहार रहा है पर आत्मा ही अपने आवरण में ढकी उसे नहीं देख पा रही है. जब ज्ञान मिलता है कर्म संस्कार ढीले पड़ते हैं तो उसे कुछ भास होता है, वह परमात्मा के उन्मुख होना चाहती है पर अहंकार आड़े आ जाता है, कभी बुद्धि भ्रमित करती है. ज्ञान यदि हमें रूखा-सूखा और गर्वीला बना दे तो वह ज्ञान भी व्यर्थ हो जाता है. हमें तो सरस बनना है.  

Tuesday, February 18, 2014

एक वही जानने योग्य

अगस्त २००५ 
परमात्मा एक है, उसको अनेक लोग अनेक भावों से भजते हैं. शास्त्रों में लिखा है, सत्य, यज्ञ, तप और दान ये धर्म के चार स्तम्भ हैं जिनके आश्रय से परम शांति का अनुभव किया जा सकता है. शुद्ध क्रिया ही सत्य का आश्रय लेती है, वही तप स्वरूप है और यज्ञ भी वही है. शुद्ध क्रिया के लिए ज्ञान और शक्ति का साथ होना आवश्यक है. बांटने का अपना महत्व है, ईश्वर  के गुणों को अपनाते हुए जो भी हमारे पास प्रचुर मात्र में है बांटना है. जितना आवश्यक हो उससे अधिक की कामना भी नहीं करनी है, जिस क्षण मन कामना से रहित हुआ, प्रेम उसमें आकर बस जाता है, साधक के हृदय में अहोभाव की स्थिति बनी रहती है. उसके माध्यम से परमात्मा जो कराना चाहे वह सदा तैयार रहता है. 

Wednesday, September 25, 2013

तप कर कुंदन होवे स्वर्ण

मार्च २००५ 
तितिक्षा के बिना प्राप्त किया हुआ ज्ञान सफल नहीं होता, सुविधापूर्ण जीवन जीने की इच्छा हमें तप करने से रोकती है, कष्ट से घबराना सिखाती है, लेकिन इससे हमारे भीतर की शक्तियाँ बाहर नहीं आ पातीं. हमारे शरीर में शक्ति केंद्र हैं, जिनमें अनंत शक्ति है. मूलाधार केंद्र में जड़ता तथा चैतन्य दोनों हैं. जड़ता का अनुभव हर कोई करता है पर चेतना का कोई तप करने वाला ही. स्वाधिष्ठान केंद्र में काम तथा सृजन करने की क्षमता है. मणिपुर में लोभ, इर्ष्या, संतोष तथा उदारता हैं. हृदय में प्रेम, द्वेष तथा भय हैं. विशुद्धि चक्र में कृतज्ञता तथा दुःख की भावना शक्ति है. आज्ञा चक्र में ज्ञान तथा क्रोध व सहस्रहार में आनन्द ही आनन्द है. हम प्रतिपल सजग रहें तो नकारात्मक वृत्तियों के शिकार नहीं होंगे, तब सकारात्मक को पनपने का अवसर मिलेगा ही. सजगता भी तप है और विनम्रता भी तप है. देह को सदा सुख-सुविधाओं में रखकर हम अपने भीतर रहने वाले चैतन्य देव को जागृत होने का अवसर नहीं देते, वह हमारे माध्यम से प्रकट होना चाहता है, अपना अनंत प्रेम हमें देना चाहता है. हम उसकी आवाज को अनसुना कर देते हैं. हम पत्थरों को थामते हैं, हीरों को त्याग देते हैं. निद्रा के तामसी सुख के पीछे ध्यान का सात्विक सुख त्याग देते हैं. स्वार्थी होकर सेवा के महान व्रत से दूर रहते हैं. देह बुद्धि से ऊपर उठते ही हमारा जीवन खिलने लगता है. इसके लिए तप तो करना ही होगा.

Monday, September 19, 2011

अंश और अंशी


फरवरी २००१ 

जो जिसका अंश है वह उससे दूर नहीं रह सकता, जैसे धरती से उत्पन्न वस्तुएं धरती की ओर आकर्षित होती हैं, वैसे ही हम उस चैतन्य के अंश होने के कारण उसी की ओर खिंचते हैं. उस तक पहुंचने के लिए हमें कोई प्रयास भी नहीं करना है, यह उतना ही सहज है जितना ऊपर से गिरायी वस्तु का नीचे आना. बल्कि उससे दूर जाने के लिए हमें अथक प्रयास करना पड़ता है. लेकिन संसार ऐसे ही चलता है विपरीत दिशा में. जो सहज है, सरल है उसे भाता नहीं. वह सदा अपने अहंकार की पुष्टि के लिए कठिन मार्ग को ही अपनाता है. एक दृष्टि से देखा जाये तो संसारी ज्यादा तप करता है भक्त से भी और ज्ञानी से भी.