जीवन जिन तत्वों से मिलकर बना है, वे हैं पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश. तीन तत्व स्थूल हैं और दो सूक्ष्म. पृथ्वी, वायु व जल से देह बनी है, अग्नि यानि ऊर्जा है मन अथवा विचार शक्ति, और आकाश में ये दोनों स्थित हैं. शास्त्रों में परमात्मा को आकाश स्वरूप कहा गया है, जो सबका आधार है . परमात्मा के निकट रहने का अर्थ हुआ हम आकाश की भांति हो जाएँ. आकाश किसी का विरोध नहीं करता, उसे कुछ स्पर्श नहीं करता, वह अनन्त है. मन यदि इतना विशाल हो जाये कि उसमें कोई दीवार न रहे, जल में कमल की भांति वह संसार की छोटी-छोटी बातों से प्रभावित न हो, सबका सहयोगी बने तो ही परमात्मा की निकटता का अनुभव उसे हो सकता है. मन की सहजावस्था का प्रभाव देह पर भी पड़ेगा. स्व में स्थित होने पर ही वह भी स्वस्थ रह सकेगी. मन में कोई विरोध न होने से सहज ही सन्तुष्टि का अनुभव होगा.
Showing posts with label अग्नि. Show all posts
Showing posts with label अग्नि. Show all posts
Monday, October 5, 2020
Thursday, June 25, 2020
सद्विचार जब सोचेगा मन
विचारों से कर्म, कर्म से आदत, आदत से चरित्र और चरित्र से भाग्य का निर्माण होता है. इसका अर्थ हुआ हमारे भाग्य के निर्माता हमारे विचार हैं. जैसा विचार मन में होगा वैसा ही भाग्य निर्मित होगा. अब देखने वाली बात यह है कि कोई सकारात्मक विचारों को प्रमुखता देता है और कोई नकारात्मक बातों को, ऐसा क्यों होता है. यह भी तो विचार का ही फल है, जो अच्छी पुस्तके पढ़ेगा, शास्त्रों का अध्ययन करेगा, सन्तों, महापुरुषों की वाणी पढ़े, सुनेगा उसके भीतर वैसे ही विचार आएंगे. जो केवल अपने ही मन की सुनेगा वह नकारात्मकता का शिकार हो सकता है, क्योंकि मन का यह स्वभाव है वह नकार को जल्दी पकड़ लेता है, मन पानी की तरह है नीचे बहना उसके लिए सरल है, यदि उसे ऊपर ले जाना है तो भाप बनाना पड़ेगा, जो तप से ही होगा. इसीलिए शास्त्रों में तप की महत्ता गायी गयी है. जीवन में अनुशासन हो तो वही तप है. वाणी पर संयम हो तो वह वाणी का तप है. तप से ही मन स्वभाव को बदल कर ऊँचा उठने लगता है, उसे अग्नि का साथ मिल जाता है, अग्नि सदा ऊपर ही उठती है.
Wednesday, May 20, 2020
सदा जानने को उत्सुक जो
मानव सुख का आकांक्षी है, किंतु ऐसा सुख वह नहीं चाहता जो बिना किसी श्रम के उसे उपलब्ध हो जाये. वह अपने सुख का निर्माण भी स्वयं ही करना चाहता है. छोटा बच्चा पालने में आराम से पड़ा है, पर वह स्थिर नहीं बैठता, जितना हो सके हाथ-पैर हिलाता है, यदि ऊपर कोई खिलौना लटका हुआ है, उसे पकड़ना चाहता है. कुछ पाने की उसकी दौड़ पालने से ही आरंभ हो जाती है. करवट बदलना आते ही वह बैठना शुरू कर देता है और चलना सीखते ही जल्दी भागने भी लगता है. मानव के भीतर जो चेतना है वह अग्नि की भांति ऊपर ही ऊपर जाना चाहती है. कुछ वैज्ञानिक अंतरिक्ष का रहस्य खोजने में लगे हैं और कई सागर की अतल गहराइयों का. हमारे ऋषि भी एक वैज्ञानिक की भांति वर्षों तक प्रयोग करते थे, उन्होंने भी कई खोजें की, साथ ही वे उस चेतना को भी जानना चाहते थे जो सदा ही उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थी. यही खोज भारत को अन्य राष्ट्रों से अलग करती है. जो हमें चैन से बैठने नहीं देता आखिर भीतर वह क्या है? कौन विचारता है ? कौन चाहता है ? कौन कर्म के लिए प्रेरित करता है ? इन प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए ही सम्भवतः अध्यात्म शास्त्र की रचना हुई होगी.
Wednesday, April 11, 2018
क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा
1२ अप्रैल २०१८
जीवन जिन तत्वों से मिलकर बना है, वे हैं पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश. तीन तत्व स्थूल हैं और दो सूक्ष्म. पृथ्वी, वायु व जल से देह बनी है, अग्नि यानि ऊर्जा है मन अथवा विचार शक्ति, और आकाश में ये दोनों स्थित हैं. शास्त्रों में परमात्मा को आकाश स्वरूप कहा गया है, जो सबका आधार है . परमात्मा के निकट रहने का अर्थ हुआ हम आकाश की भांति हो जाएँ. आकाश किसी का विरोध नहीं करता, उसे कुछ स्पर्श नहीं करता, वह अनन्त है. मन यदि इतना विशाल हो जाये कि उसमें कोई दीवार न रहे, जल में कमल की भांति वह संसार की छोटी-छोटी बातों से प्रभावित न हो, सबका सहयोगी बने तो ही परमात्मा की निकटता का अनुभव उसे हो सकता है. मन की सहजावस्था का प्रभाव देह पर भी पड़ेगा. स्व में स्थित होने पर ही वह भी स्वस्थ रह सकेगी. मन में कोई विरोध न होने से सहज ही सन्तुष्टि का अनुभव होगा.
Sunday, June 4, 2017
पर्यावरण बचाएं हम
५ जून २०१७
पृथ्वी को हम माँ कहते हैं. उसी से हम जन्मे हैं और एक दिन उसी में हमारे भौतिक
अवशेष लीन हो जाने वाले हैं. पृथ्वी के उपकारों को याद करना आरम्भ करें तो उनका
अंत ही नहीं आएगा. हमारे वस्त्र, मकान, भोजन सभी कुछ तो उसी से मिला है. जल को भी वही
धारण करती है और अग्नि को भी अपने उदर में वही धारण किये हुए है. हजारों तरह के जीव-जन्तु,
पेड़-पौधे, हीरे-जवाहरात और खनिज लवण क्या नहीं है उसके आश्रय में. मानव ने पृथ्वी
के साथ कैसा अमानवीय व्यवहार किया है, यह किसी से छिपा नहीं है. जंगल नष्ट किये जा
रहे हैं, हवा को प्रदूषित किया जा रहा है, जल को भी पीने योग्य नहीं छोड़ा है. मानव
का अज्ञान उसे किस ओर ले जा रहा है वह अपनी बेहोशी में यह भी नहीं देख पा रहा है. विश्व
पर्यावरण दिवस हमें जागने के लिए मजबूर करता है, यदि हम अब नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ी
को जन्म से ही रोगों का सामना करना पड़ेगा. आज भी प्रदूषण के कारण रोगों की संख्या
बढती जा रही है. योग युक्त जीवन शैली अपना कर हम पुनः इस धरा को हरा-भरा बना सकते
हैं.
Wednesday, August 6, 2014
शुभता ही प्रकटे जीवन से
जनवरी २००७
हमारा
तन वेदिका है. प्राणों को हम भोजन की आहुति देते हैं. प्राणाग्नि बनी रहे, देह
दर्शनीय रहे, पवित्र रहे इसलिए सात्विक और अल्प आहार ही लेना है. इंद्र हाथ का देव
है, सो कर्म भी ऐसे हों जो भाव को शुद्ध करें. मुख के देव अग्नि हैं, अतः वाणी भी
शुभ हो. अतियों का निवारण ही योग है. योग से मन प्रसन्न रहता है और भीतर ऐसा प्रेम
प्रकटता है जो शरण में ले जाता है. सन्त हमें जगाते हैं और हम जग कर पुनः सो जाते
हैं. हमें संकल्प करना है कि अशुभ से बचे, क्यों कि अशुभ विष है और हमें जीना है. व्यवहार
क्षेत्र में पहले भाव फिर क्रिया होती है पर अध्यात्म क्षेत्र में पहले क्रिया
पवित्र हो तो भाव अपने आप पवित्र होने लगते हैं. श्रवण या पठन क्रिया है पर श्रवण
के बाद मनन फिर निदिध्यासन होता है.
Monday, June 9, 2014
मनवा शीतल होए
अप्रैल २००६
किसी ने हम पर क्रोध किया और हम जल गये
तो इसका अर्थ है नियति ने हमारे घड़े को खाली करना चाहा था पर हम खाली न हुए. मन घट
के समान है, ऐसा मन जो परमात्मा द्वारा सहेजा गया है, वह नहीं जलता, न अपने न
दूसरों के क्रोध की अग्नि में. वह खाली है और वही शीतल जल से भरा जाता है, कुम्हार
द्वारा तपाये घड़ों में भी जो जल जाता है वह व्यर्थ हो जाता है, जो नहीं जलता वही
काम में आता है. सन्त यह भी कहते हैं, जो तप गया वह कांच, जो नहीं तपा वह हीरा है.
Friday, October 11, 2013
यह तेरा घर यह मेरा घर
मार्च २००५
पांच
तत्वों से मिलकर हमारा भौतिक घर बना है तथा पांच ही तत्वों से मिलकर शरीर का घर भी बना है पर जैसे भौतिक घर स्थायी नहीं है,
वैसे ही शरीर भी स्थायी नहीं है. हमारी मृत्यु के समय वह छूट जाने वाला है, हमें
अपने लिए एक ऐसा घर बनाना है जो सदा उपलब्ध हो, जहाँ जीवन का कोई तूफान हिला न
सके. वह घर बनाने के लिए चार तत्वों की आवश्यकता होगी, पांचवा आकाश तो अपने आप ही
आ जायेगा. सर्वप्रथम मिटटी अथवा पृथ्वी होनी चाहिए सहिष्णुता की, दूसरा तत्व है जल,
उसकी निर्मलता, एक प्रसन्नता जो निर्मलता से उत्पन्न हुई है. तप से प्राप्त तेज व ओज
की अग्नि भी हमें चाहिए ताकि पुराने अवांछित कर्म संस्कार उसमें जल जाएँ. अनासक्ति
की वायु सदा प्रवाहित हो, अनासक्त होकर हम समता को प्राप्त होते हैं, स्थिरता को
प्राप्त होते हैं. ऐसे घर का निर्माण जब भीतर हम कर लेते हैं तो जीवन के झंझावातों
का सामना खुले दिल से कर सकते हैं. तब भीतर समाधान मिल जाता है, भीतर कोई प्रश्न
नहीं रह जाता, एक विस्मय से मन भर जाता है.
Friday, May 24, 2013
पानी विच मीन प्यासी
सितम्बर २००४
जो स्वयं मुक्त है वही दूसरों को मुक्त कर सकता है. जीवन
मुक्त होने की क्षमता हम सभी के भीतर छिपी है, कोई सद्गुरु मिल जाये जो स्वयं
मुक्त हो तो वह हमें मार्ग दिखा सकता है. कामनाओं का अंत नहीं है, भीतर सात्विक
संकल्प जगा के ही इनसे मुक्त हुआ जा सकता है, ऐसे संकल्प जो हमें तृप्त करें,
क्योंकि यदि हम पूर्णकाम होंगे तो हमारे आस-पास के वातावरण को हमसे कोई भय नहीं
होगा, हमें उससे कुछ भी न चाहिए तो वह हमारी ओर विश्वास से देखेगा. हमारी तृप्ति
अन्यों के संतोष का कारण भी बनती है, वास्तव में हमें कोई अभाव नहीं है, जब हम
स्वयं से दूर हो जाते हैं तो विरह की अग्नि हमें जलाती है, भीतर कोई कसक उठती है,
हम संसार से उसका समाधान चाहते हैं, पर जो स्वयं ही उसी अग्नि में जल रहा है, वह
हमारी प्यास क्या बुझाएगा. जैसे ही हम भीतर उतरते हैं, अमृत का निरंतर बहता स्रोत
नजर आता है. यही देखकर तो कबीर ने गाया है- पानी विच मीन प्यासी..आखिर अस्तित्त्व
क्या यूँ ही अपनी सृष्टि को भटकने के लिए छोड़ देगा, वह जो प्रेम स्वरूप है, नहीं,
वह तो निरंतर हमारे साथ है, भीतर जाकर उससे मिलना हमारा काम है.
Sunday, March 10, 2013
चेतन अमल सहज सुख राशि
मई २००४
नन्हा बच्चा अपने भीतर की मस्ती
से आनन्दित है, वह किसी भौतिक कारण के कारण सुखी नहीं है, पर दुखी वह किसी कारण से
ही होता है. मानव जब बड़ा होता है तो किसी
कारण से ही सुखी होता है और दुखी बिना किसी कारण के ही होता है. कल्पनाओं के महल
बनाकर वह स्वयं ही उन्हें गिराता है फिर आकुल होता है. प्रतिस्पर्धा की अग्नि में
स्वयं को झुलसाता है, दिखावे की पीड़ा से गुजरता है. हम अकारण ही भयभीत होते हैं.
और अपने भीतर के आनंद को ढक देते हैं. सहज उल्लास जो छह महीने के बच्चे में प्रकट
होता है भीतर से, वही उस इंसान में भी प्रकट हो सकता है जिसने सारी तृष्णाओं का
त्याग कर दिया है, जो पूर्णकाम है, उसके जीवन की बागडोर अब अस्तित्त्व के हाथों
में है. वह सहज रूप से जीता है, तभी उस अकारण करुणानिधि उस परमात्मा की अहैतुकी कृपा
का अनुभव उसे होता है.
Subscribe to:
Posts (Atom)