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Wednesday, January 25, 2017

सबका मंगल होए रे

२५ जनवरी २०१७ 
हम जीवन में कितने ही व्यक्तियों से मिलते हैं. जिनमें कुछ के साथ थोड़े समय के लिए कुछ के साथ देर तक हम समय बिताते हैं. विचारों का आदान-प्रदान भी होता है और वस्तुओं का भी. इससे भी सूक्ष्म एक शै है जिसका आदान-प्रदान निरंतर चलता रहता है, चाहे वह व्यक्ति सम्मुख हो या हम उसके बारे में किसी से बात कर रहे हों, या उसके बारे में कुछ सोच रहे हों. किसी के प्रति हमारी भावना केवल हम तक सीमित नहीं रह पाती, वह तत्क्षण उस तक पहुँच जाती है. स्थूल से सूक्ष्म अति शक्तिशाली है. हम शब्दों का ध्यान रख लेते हैं और भीतर क्रोध रखते हुए भी बाहर से जाहिर नहीं करते, कभी-कभी इसका विपरीत भी हो सकता है. कोई भीतर प्रेम होते हुए भी बाहर से उदासीनता व्यक्त करे, पर दोनों ही स्थितियों में सूक्ष्म तरंगों के द्वारा हमारी वास्तविक भावनाएं उसके अंतरतम तक पहुँच जाती हैं, और भविष्य में उसका व्यवहार उनसे भी प्रभावित होगा. इसीलिए संत कहते हैं सदा हृदय से सबके लिए मंगल कामना करते रहें. 

Friday, June 12, 2015

उठ जाग मुसाफिर भोर भई

दिसम्बर २००९ 
इस जगत में सभी तो दुखी दिखाई पड़ते हैं, कोई एक दूसरे को नहीं समझता, लेकिन यही तो होना ही चाहिए. जब सभी की बुद्धि पर मोह का पर्दा पड़ा हो तो कोई खुश रह भी कैसे सकता है. मन ही दुःख का जनक है और मन नाम है अहंकार का. अहंकार पुष्ट होता है अपनी छवि को पुष्ट करने से, छवि पुष्ट होती है अपने बारे में सत्य-असत्य धारणाएं पालने से. इच्छाओं की पूर्ति होती रहे तो भी अहंकार पुष्ट होता है. अपने में कोई सद्गुण हो या न हो पर होने का वहम हो तो भी अहंकार पुष्ट होता है और यह अहंकार दुःख का भोजन करता है. जब हम अपने ही बनाये भ्रम को टूटते देखते हैं तो भीतर छटपटाहट होती है, यह सब सूक्ष्म स्तर पर होता है इसलिए कोई इसे समझ नहीं पाता, वही समझता है जो अपने भीतर गया हो जिसने मन का असली चेहरा भली-भांति देखा हो. जो मन को ही स्वयं मानता हो, वह कैसे इसे पहचानेगा. इसीलिए जगत में कोई दोषी नहीं है अथवा तो सभी दोषी हैं. संतजन यही तो कहते आये हैं, जो जगा नहीं है वह दुःख पाने ही वाला है.  

Tuesday, March 3, 2015

मिट कर ही मंजिल मिलती है

फरवरी २००८ 
अगर बीज अपने को बचाए तो बचता नहीं और मिटाए तो अमर हो जाता है. जो मिटेगा वही बचेगा, जो बचाएगा वह मिट जाता है. जिस दिन यह ‘मैं’ जान लेता है, मेरे होने में ही बंधन है उस दिन यह मन को सूक्ष्म करने की क्रिया आरम्भ करता है. यह ‘मैं’ का पर्दा मखमल से मलमल का करना है, जिस दिन यह मन पूरा मिट जाता है उस दिन परमात्मा ही बचता है. अभी तो मोटा लोहे का पर्दा है मन, जिस दिन ‘मैं’ नहीं रहता उस दिन वह महा अतिथि आता है. अभी मन खाली नहीं है, भीतर कोलाहल है, इसे शांत करके ही मन महीन किया जा सकता है. सूक्ष्म करते करते शून्य की यात्रा शुरू करनी है जो पूर्ण पर समाप्त होती है. हमारे भीतर सूक्ष्म भी है स्थूल भी. देह बर्फ जैसी है, मन पानी जैसा, आत्मा भाप जैसी है. जो स्वयं को देह मानता है वह मृत्यु से डरेगा. जो स्वयं को मन मानता है वह काव्य, संगीत तथा कला में रूचि रखता है और जो स्वयं को आत्मा मानता है वह सर्वव्याप्त है, वह उड़ान भर सकता है. वह मुक्त है. वह नष्ट नहीं हो सकता. वह सूक्ष्म है, जो जितना सूक्ष्म है उतना ही शक्तिशाली होता जायेगा. वह चट्टान सा दृढ़ भी होगा और फूल से भी कोमल. वह होकर भी नहीं होगा और उसके सिवा भी कुछ होगा भी नहीं, सारे द्वंद्व उसमें आकर मिट जायेंगे. वह होने के लिए कुछ करना नहीं है. वह तो है ही, केवल उसे जानना भर है. मन को खाली करना ऐसा तो नहीं है कि कोई बर्तन ख़ाली करना हो. कामना को त्यागते ही या समर्पण करते ही मन ठहर जाता है, ठहरा हुआ मन ही ख़ाली मन है !


Friday, December 5, 2014

मन भीजे जब रस पावन में

जून २००७ 
हमें स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाना है, जहाँ कोई भेद नहीं है, वहाँ अद्वैत है. स्थूल में भेद है, वहाँ सारे विकार हैं. सूक्ष्म निर्विकार है, वह सारे दुखों से परे है. उस सूक्ष्म को पाना हो तो पहले तन रूपी घट को तपना होगा, मन रूपी दूध को जमाना होगा तब आत्मा रूपी नवनीत प्रकट होगा. तन से निष्काम कर्म, मन से समता को जो साध ले वही आत्मा को जान सकता है. अहंकार ही हमें आत्मा से दूर रखता है. अहंकार भीतर के रस को सुखा देता है. मात्र बौद्धिक ज्ञान कब तक हृदय को हर-भरा रखेगा, उसे तो भक्ति का पावन जल चाहिए. आत्मा का आनंद भक्ति के सहारे मिल सकता है. जिसकी प्रज्ञा जगे तो विनम्रता आ ही जाती है.  

Tuesday, December 2, 2014

सच्चा मोती एक वही है

जून २००७ 
राम ब्रह्म हैं, वह मानव रूप लेकर धरती पर आते हैं. हर मानव ब्रह्म की शक्तियों को लेकर ही आता है, पर वे उसके भीतर निष्क्रिय पड़ी रह जाती हैं. हम सूक्ष्म की ओर चलें तो ये शक्तियाँ जागृत होने लगती हैं. जीवन में वरदान घटते हैं, प्रेम पहला वरदान है जो तब घटता है जब हमारा स्वयं से परिचय होता है, जो परिचय सद्गुरु कराते हैं. जब तक हम मन के किनारे पर बैठे रहते हैं तब तक स्वयं से परिचय नहीं होता, एक बार जब गहरी डुबकी लग जाती है तो आत्मा का मोती हाथ लगता है, जिससे ज्ञान, प्रेम औए आनंद का प्रकाश फूटता है. संस्कारों से मुक्ति मिलती है, मन पावन बनता है.


Thursday, March 27, 2014

कर्म का विज्ञान सिखाता

अक्तूबर २००५ 
हम जो भी स्थूल कर्म करते हैं, वास्तव में वे सभी पूर्व कर्मों के परिणाम हैं, हम उनके कर्ता नहीं हैं. जो सूक्ष्म कर्म हैं, दिखाई नहीं देते, वही बंधन का कारण होते हैं, अतः उन्हें रोकना ही कर्म त्याग है, इस बात का ज्ञान ही समस्त दुखों से एक साथ छुटकारा पाने का उपाय है. कर्ता होकर जब तक हम इस जगत में रहते हैं तब तक हम भोक्ता भी बने रहेंगे. तब हम जगत में रहकर जो भी कर्म करते हैं वह अभिनय मात्र है, उस कर्म का फल वहीं का वहीं समाप्त हो जाता है.  

Tuesday, March 11, 2014

रसो वै सः

सितम्बर २००५ 
 आत्मा जो सूक्ष्म तथा तेजस शरीर के साथ अनादि काल से रह रही है, तप रही है. सूक्ष्म विकार और वासनाएं न जाने कितने-कितने जन्मों से उसे जला रही हैं, वह शीतलता चाहती है. शुद्ध रूप में तो वह स्वयं प्रेम स्वरूप है पर अभी उस पर कर्मों के संस्कार चिपके हैं. वह मलिन है, परमात्मा रूपी जल ही उसे तृप्त कर सकता है. यूँ तो परमात्मा तो हर क्षण उसके निकट ही है, उसके हर सुख-दुःख की खबर भी उसे है. वह उसे हर पल निहार रहा है पर आत्मा ही अपने आवरण में ढकी उसे नहीं देख पा रही है. जब ज्ञान मिलता है कर्म संस्कार ढीले पड़ते हैं तो उसे कुछ भास होता है, वह परमात्मा के उन्मुख होना चाहती है पर अहंकार आड़े आ जाता है, कभी बुद्धि भ्रमित करती है. ज्ञान यदि हमें रूखा-सूखा और गर्वीला बना दे तो वह ज्ञान भी व्यर्थ हो जाता है. हमें तो सरस बनना है.  

Wednesday, December 11, 2013

सागर छल छल छलके भीतर

अप्रैल २००५ 
हमें सूक्ष्म दृष्टि का विकास करना होगा, तब सत्य हमारे मन, कर्म तथा वाणी में प्रकटेगा. सूक्ष्म को देखने की शक्ति हमारे भीतर है पर उस शक्ति से हम परिचित नहीं है. बाहर की दुनिया में प्रतिस्पर्धा, लोभ, उत्तेजना के अनेक अवसर हैं, अहंकार को पोषित किया जाता है. हम सत् से असत् की ओर बढ़ते हैं. भीतर के संसार में इतनी गहराई है कि उसका कोई अंत नहीं है पर भीतर की दुनिया के साथ हमारा सम्पर्क नहीं होता, बाहर से हमें भीतर की ओर जाना है, तो असत् से सत् की ओर चलना होगा. सत् के प्रति प्रेम ही हमारे आत्मा की प्यास है. इसे दुनियावी वस्तुओं से बहलाया नहीं जा सकता. वह केवल और केवल उसी सागर को चाहती है जो अनंत प्रेम, शांति और आनन्द का स्रोत है. न जाने कितने शरीर हमने धारण किये हैं, सदा आत्मा की उपेक्षा करके मन को प्रमुखता दी है जिस कारण हम ढगे गये हैं. रेगिस्तान के मरुस्थल जैसा जीवन जीया है पर भीतर की यात्रा हमें उस सागर तक ले जाती है.


Monday, July 4, 2011

जड़ व चेतन


अगस्त २००० 
जब हम स्थूल का चिन्तन करते हैं तो बुद्धि भी जड़ हो जाती है, प्रमाद मन की जड़ता है, यह वह स्थिति है जब मन परम चेतन के प्रति उदासीन है. सूक्ष्म का चिन्तन करने से बुद्धि चेतन होती है. जगत का चिंतन स्थूल है और जगदीश का सूक्ष्म. जैसे जब पानी वाष्पीकृत होता है तो उसकी शक्ति बढ़ जाती है, जमने पर घट जाती है. हम सारा जीवन एक आयाम को देखते –देखते ही बिता देते हैं, दूसरे आयाम की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता. परिधि पर ही रह जाते हैं, अपने केन्द्र को छू नहीं पाते. तभी जीवन में एक अधूरेपन का अनुभव होता है, पूर्णता की चाह बनी रहती है. अपनी पूरी ऊर्जा व ऊष्मा को पाने का अर्थ है चेतन बने रहना. एक सरिता की तरह सातत्य रूप से गतिमान रहना. स्फूर्तिवान होकर मन में नैसर्गिक व सद्कार्यों के प्रति सदप्रवृत्ति जगे रहना.