जब हम घटनाओं के साक्षी बन जाते हैं, तो मुक्ति का अहसास सहज ही होता है। हम सभी ने यह अनुभव किया है। कई बार हम क्रोध करना नहीं चाहते थे लेकिन किसी बात से क्रोधित हो गए और खुद पर आश्चर्य हुआ।यह क्रोध हमारे भीतर संस्कार रूप से मौजूद था और जब तक वह संस्कार बना रहेगा, हमारे न चाहने पर भी क्रोध आएगा। सुबह से रात्रि तक इस सृष्टि में सब कुछ हो रहा है।कोई उन्हें कर नहीं रहा है। कोई चित्रकार किसी दिन एक चित्र बना लेता है और कवि किसी दिन बहुत अच्छी कविता लिखता है। उनसे कोई पूछे, तो वे आश्चर्य करते हैं कि यह कैसे हुआ! उनके मन की गहराई में वे सब मौजूद है, जो उचित समय आने पर व्यक्त हो जाता है । जीवन ने हमें कदम-कदम पर सिखाया है कि यहाँ सब कुछ हो रहा है। हम कर्ता नहीं हैं। बड़े से बड़ा अपराधी भी कहता है, उसने अपराध नहीं किया, किसी क्षण में यह उससे हो गया। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मनुष्य अब भी इसे कैसे नहीं देख पाता कि वह कई कार्य स्वभाव वश ही करता है ! मनुष्य सोचता भर है कि वह स्वयं निर्णय लेकर रहा है। कोई कह सकता है कि यदि उसने प्रयास न किया होता तो उसके जीवन में वह सब न होता जो आज है। पर जीवन में हमें जहाँ जन्म मिला, जैसे परिस्थितियाँ मिलीं, उनमें हमारा क्या हाथ था, हमारे पास उस स्थिति में वही प्रयास करने के अलावा कोई अन्य विकल्प ही नहीं था। किन्हीं कारणों हमारा जीवन एक विशेष दिशा ले ले लेता है और उस दिशा में बहने लगता है।
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Thursday, March 23, 2023
Thursday, July 9, 2020
सत्व गुण जब बढ़ेगा मन में
पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियाँ और मन ये सब मिलकर ग्यारह इन्द्रियां हैं. श्रवण करते समय कान, शब्द तथा मन ये तीन उपस्थित होते हैं, इसी प्रकार प्रत्येक इन्द्रिय के द्वारा विषय अनुभव करते समय विषय, मन और इन्द्रिय तीन की उपस्थिति रहती है. शब्द का आधार कान है और कान का आधार आकाश है; अतः वह आकाशरूप ही है. इसी प्रकार त्वचा, जिह्वा, नेत्र और नासिका भी क्रमशः स्पर्श, स्वाद, रूप और गंध का आश्रय तथा अपने आधार पवन, अग्नि, पृथ्वी और जल के स्वरूप हैं. इन सबका अधिष्ठान है मन. इसलिए सबके सब मन स्वरूप हैं. इनमें मन कर्ता है, विषय कर्म है और इन्द्रिय करण है. ये कर्ता, कर्म और करण रूपी तीन प्रकार के भाव बारी-बारी से उपस्थित होते हैं. इनमें से एक-एक के सात्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद होते हैं. अनुभव भी तीन प्रकार के ही हैं. हर्ष, प्रीति, आनंद, सुख और चित्त की शांति का होना सात्विक गुण का लक्षण है. असन्तोष, सन्ताप, शोक, लोभ तथा अमर्ष -ये किसी कारण से हों या अकारण, रजोगुण के चिह्न हैं. अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य -ये किसी भी तरह क्यों न हों, तमोगुण के ही नाना रूप हैं. प्रत्येक साधना का लक्ष्य सत्वगुण को बढ़ाते जाना है और रजोगुण व तमोगुण को कम करना है.
Friday, February 23, 2018
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
२४ फरवरी २०१८
भगवद् गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं यदि कोई मात्र स्वयं को किसी कर्म का
कर्ता मानता है तो यह उसका अज्ञान है. किसी भी कार्य को सम्पन्न होने के लिए
अनुकूल संयोग जब तक उपस्थित न हों तब तक वह कार्य नहीं हो सकता. एक बीज को उगने के
लिए मिट्टी, हवा, पानी और हवा चाहिए, पर माली यदि कहे यह पौधा उसने उगाया है तो इस
बात में कितनी सच्चाई होगी. इसीलिए कर्म के बाद फल हमारे हाथ में हो नहीं सकता. फल
प्राप्ति भी किसी न किसी कर्म के रूप में सामने आएगी, जिसके लिए पुनः अनुकूल संयोग
होने चाहिए. कर्तापन का बोझ यदि किसी के सिर पर न रहे तो वह कितना हल्का महसूस
करेगा. कर्ता होते ही हम भोक्ता भी हो जाते हैं. यदि कोई विद्यार्थी वर्ष भर मेहनत
करता है किन्तु किसी कारण वश परीक्षा में फेल हो जाता है, तो उसे स्वयं को दोषी
मानने की जरा भी आवश्यकता नहीं है. ‘नेकी कर कुएं में डाल’ कहावत के पीछे भी यही
भाव है, कि अच्छा कार्य भी उचित संयोग बैठने से ही सम्भव हुआ. किन्तु जानबूझ कर गलत
कार्य करके हम इस उपाय द्वारा स्वयं को कर्ताभाव से मुक्त नहीं कर सकते, उस समय
हमें फल के लिए तैयार रहना होगा.
Wednesday, April 1, 2015
निज स्वभाव में टिकना आये
अक्तूबर २००८
तन स्वस्थ
रहे तो मन स्वस्थ रहता है और मन स्वस्थ रहे तो तन स्वस्थ रहता है पर आत्मा स्वस्थ
रहे तो दोनों स्वस्थ रहते हैं. इसलिए आत्मा को ही स्वस्थ रखना परम लक्ष्य होना
चाहिए. सरवर में जैसे कमल रहता है वैसे ही आत्मा तन में रह सकती है. कर्ता का भाव
छूटना ही वह समझ है जो भीतर क्रांति ला सकती है. वही अहंकार है. हमारी जीवन धारा
इसी के कारण मटमैली हो जाती है. जैसे जगत में सब कुछ हो रहा है, तन व मन अपने
स्वभाव के अनुसार बरत रहे हैं, आत्मा साक्षी मात्र है यह अनुभव ही आत्मा को स्वस्थ
रखता है.
Tuesday, April 8, 2014
स्वप्नों सा ही है संसार
दिसम्बर २००५
जब ध्याता और ध्येय एक हो
जाते हैं तभी ध्यान होता है. सारा दुःख दो के कारण है, द्वंद्व ही दुःख का कारण
है, जहाँ अभेद हो वहाँ कोई विकार नहीं रहता, एक ही सत्ता रहती है. यह तभी घटित
होता है जब कोई कामना शेष नहीं रहती, जगत के सारे कार्य तब स्वतः होते हैं,
कर्तृत्व का अभिमान नहीं होता, कर्ता भाव नष्ट हुआ तो भोक्ता भाव भी अपने आप नष्ट
हो जाता है. कोई भी कर्म हमें तब बंधन में डालता है जब करने के बाद देर तक उसकी
स्मृति बनी रहती है, यदि उससे विच्छेद हो जाये तो हम उसके फल के भागी नहीं होते.
हमारे कारण यदि किसी को दुःख पहुंचता है तो हमारा कर्म उसी क्षण बंधा जाता है,
तुरंत प्रायश्चित करना चाहिए. यदि हम किसी को प्रसन्न करते हैं तो पुण्य कर्म बंधा
जाता है. तटस्थ रहकर किया गया कर्म बंधन में नहीं डालता. यह जगत एक स्वप्न ही तो
है, यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है, हर किसी को एक न एक दिन तो जाना ही है, यह हम यदि
याद रखें तो कभी किसी को पीड़ा नहीं पहुंचा सकते.
Thursday, March 27, 2014
कर्म का विज्ञान सिखाता
अक्तूबर २००५
हम जो भी स्थूल कर्म करते
हैं, वास्तव में वे सभी पूर्व कर्मों के परिणाम हैं, हम उनके कर्ता नहीं हैं. जो सूक्ष्म
कर्म हैं, दिखाई नहीं देते, वही बंधन का कारण होते हैं, अतः उन्हें रोकना ही कर्म
त्याग है, इस बात का ज्ञान ही समस्त दुखों से एक साथ छुटकारा पाने का उपाय है. कर्ता
होकर जब तक हम इस जगत में रहते हैं तब तक हम भोक्ता भी बने रहेंगे. तब हम जगत में
रहकर जो भी कर्म करते हैं वह अभिनय मात्र है, उस कर्म का फल वहीं का वहीं समाप्त
हो जाता है.
Friday, August 3, 2012
जो कर्ता है वही भोक्ता है
जून २००३
हम ईश्वर का आधार ग्रहण करते हैं तो वह हमें अपना निमित्त बनाते हैं, हम जो भी
कार्य करते हैं उसमें कर्ता भाव नहीं होता, कोई अहं नहीं बचता, क्योंकि तब हम जो
भी कर्म करते हैं वह वास्तव में हम नहीं कर रहे, इसका ज्ञान हो जाता है. अज्ञान ही
हममें कर्ता भाव भरता है. सदगुरु हमें उस परमपिता से मिला देते हैं और तब तमस जीवन
से लुप्त हो जाता है, एक अवर्णनीय शांति से अन्तःकरण भर जाता है, वह शांति, आनंद
पहले से ही हमारे भीतर थे, उसे कहीं से लाना नहीं होता ज्ञान भी हम सभी के भीतर है
पर जैसे आँख में पड़ा एक कण पर्वत को लुप्त कर देता है अज्ञान ने इसे ढका हुआ था. कृपा
मिलते ही शीतल, मधुर, रसमय प्रकाश छा जाता है, गुणात्मक रूप से आत्मा व परमात्मा
में कोई भेद नहीं, आत्मा अपने तन-मन का सुख-दुःख अनुभव करती है, पर जब हम सुख-दुःख
की सीमा के पार जाकर उस परमात्मा का आश्रय लेते हैं तो हमें भी असीमता का अनुभव
होता है, अनंत प्रेम, अनंत शक्ति, अनंत ज्ञान, जो वास्तव में हम हैं, का अनुभव
होता है. उसकी उपस्थिति भीतर-बाहर सभी जगह दिखाई देती है, अनहद नाद हमारे रस को
बढ़ाता है, परम का आश्रय हो तो वह हमारा अपनाआप होकर प्रकट हो जाता है.
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