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Tuesday, June 12, 2018

जीवन नैया सदा डोलती


१२ जून २०१८ 
जीवन जितना सरल है उतना ही जटिल भी. यहाँ फूल के साथ कांटे भी हैं और सुख के साथ दुःख भी. यहाँ हर शै जोड़े में आती है. स्वास्थ्य के साथ रोग भी है और बचपन के साथ बुढ़ापा भी. जो इन दो के पार निकल गया वह बच गया जो दो में से एक को चाहता रहा और एक से बचता रहा, वह जीवन भर बंधन में फंसा रहा. पुण्य कर्म उदय होने पर सहज ही आनंद का अनुभव होता है, पाप का उदय होने पर विपत्ति आती है. सब कुछ सदा ही ठीक-ठीक चलता रहे ऐसी कामना जो करता है, उसे दो के पार ही जाना होगा. उस स्थिति में मन साक्षी भाव में टिकना सिख जाता है. साक्षी भाव में रहकर, कर्त्तव्य कर्म को पालन करते हुए अपने जीवन को उन्नत बनाने का प्रयत्न करने वाले साधक के जीवन में भविष्य के लिए पाप कर्म जमा नहीं होते. उसका वर्तमान भी संतुष्टिदायक होता है.

Friday, May 15, 2015

साक्षी का जब फूल खिलेगा

फरवरी २००९ 
हमारी नजर दूसरों के दोषों पर रहती है, जिससे अपने दोष नहीं दीखते. सद्गुरु कहते हैं, हम अपना अवलोकन करें जैसे कोई रास्ते के किनारे खड़ा होकर तटस्थ भाव से भीड़ को देखता है. हम न्यायाधीश न बनें, साक्षी बने रहें और हमारी तटस्थता से देखने से पता चलता है कि हम अपने कृत्यों से अलग हैं, हम कर्ता नहीं हैं, यही मुक्ति का द्वार है. जो अपने शुभ कर्मों से बंधा है, वह अशुभ से भी बंधा रहेगा. जिसने पुण्य का फल चाहा वह पाप के फल से बंधा ही रहेगा. राग-द्वेष से मुक्त मन ही साक्षी बन सकता है. साक्षी की सुवास टिकी रहे तो दिन भर मुदिता बनी रहती है. परमात्मा भीतर ही है, हृदय परमात्मा का है पर बुद्धि समाज द्वारा दी गयी है. प्रार्थना हृदय से उतरती है तो सीधे परमात्मा तक पहुंचती है. वह अनवरत प्रतीक्षारत है, हम ही नजरें बचा लेते हैं.


Monday, April 20, 2015

जीवन पल में ही मिलता है

दिसम्बर २००८ 
यदि ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि किसी क्षण में हम जहाँ होते हैं वहाँ नहीं होते, बल्कि हमारा कोई पता-ठिकाना ही नहीं ! हम जीवन को खोज रहे हैं और जीवन हमें खोज रहा है. जीवन हर तरफ से हमें घेरे हुए है. हम कहते हैं कि भविष्य सुंदर होगा, पर वह भविष्य कभी  आता ही नहीं. जो आता है, वह अभी है, वह आज है ! हम कभी वर्तमान में नहीं होते, इस क्षण में जो जागृत है, वही जागृत है. कृत्य का गुण भीतर से आता है, जो कृत्य मूर्छा में किया गया है वह बांधता है. जागृत कृत्य ही पुण्य है.

Wednesday, March 4, 2015

एक तू न मिला

फरवरी २००८ 
भक्त स्थूल जगत को तो आनंदित करता ही है, सूक्ष्म जगत को भी प्रभावित करता है. उसके आस-पास रहने वाले लोग भी धीरे-धीरे इसी रंग में रंग जाते हैं. आखिर कोई कब तक परमात्मा से दूर रह सकता है. हम अपना जीवन तभी तो प्रेममय तथा शांतिमय बना सकते हैं जब विकारों से दूर हों, और विकारों से दूर होने की शक्ति परमात्मा से मिलती है, जब उसके प्रेम का अहसास होता है. यह जगत अनित्य है इसे हम अपने अनुभव से प्रतिपल जानते हैं. यह स्मरण रहे तो आसक्ति नहीं होती. इस जगत में हमारी कोई शरणस्थली नहीं है. जब तक पुण्य हैं तभी तक शरण है, वरना अशरण ही है. दस की गिनती में हम एक को न लगायें तो शून्य ही शेष रहता है, एक परमात्मा न हो तो संसार शून्य है. उसी एक की शरण में जाना है. 

Tuesday, April 8, 2014

स्वप्नों सा ही है संसार

दिसम्बर २००५ 
जब ध्याता और ध्येय एक हो जाते हैं तभी ध्यान होता है. सारा दुःख दो के कारण है, द्वंद्व ही दुःख का कारण है, जहाँ अभेद हो वहाँ कोई विकार नहीं रहता, एक ही सत्ता रहती है. यह तभी घटित होता है जब कोई कामना शेष नहीं रहती, जगत के सारे कार्य तब स्वतः होते हैं, कर्तृत्व का अभिमान नहीं होता, कर्ता भाव नष्ट हुआ तो भोक्ता भाव भी अपने आप नष्ट हो जाता है. कोई भी कर्म हमें तब बंधन में डालता है जब करने के बाद देर तक उसकी स्मृति बनी रहती है, यदि उससे विच्छेद हो जाये तो हम उसके फल के भागी नहीं होते. हमारे कारण यदि किसी को दुःख पहुंचता है तो हमारा कर्म उसी क्षण बंधा जाता है, तुरंत प्रायश्चित करना चाहिए. यदि हम किसी को प्रसन्न करते हैं तो पुण्य कर्म बंधा जाता है. तटस्थ रहकर किया गया कर्म बंधन में नहीं डालता. यह जगत एक स्वप्न ही तो है, यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है, हर किसी को एक न एक दिन तो जाना ही है, यह हम यदि याद रखें तो कभी किसी को पीड़ा नहीं पहुंचा सकते. 

Monday, May 20, 2013

प्रेम ही है ईश्वर


सितम्बर २००४ 
इस सृष्टि का आधार प्रेम ही है, प्रभु की कृपा से जब किसी के पुण्य जग जाते हैं, तो इस प्रेम की  प्राप्ति होती है, यह एक ऐसा धन है जिसे पाकर संसार के सभी धन फीके लगते हैं, जो घटता नहीं सदा बढ़ता रहता है. जन्मों-जन्मों से संसार को चाहता मन उसके चरणों में टिकना चाहता है, अब उसे अपना घर मिल गया है. जगत तो क्रीड़ास्थली है जहाँ कुछ देर अपना कर्तव्य निभाना है, और फिर भीतर लौट आना है. जगत में उसका व्यवहार अब प्रेम से संचालित होता है न कि लोभ अथवा स्वार्थ से. परमात्मा ही इस प्रेम का स्रोत है. हम जो इसकी झलक पाकर ही संतुष्ट हो जाते हैं, उनकी क्या हालत होगी जो इसके स्रोत तक पहुंच चुके हैं.

Sunday, January 27, 2013

जगा रहे जो मन अपना


फरवरी २००४ 
हमारा जो कृत्य हमारे लिए या दूसरों के लिए किसी दुःख का कारण बने वह पाप है और जो सुख दे वह पुण्य है. दुखों से मुक्ति ही अध्यात्म का लक्ष्य है, इसके लिए पाप से बचना होगा अर्थात चित्त का शोधन करना होगा, चित्त कब विक्षुब्ध होता है, क्यों होता है, हमारे कारण अन्यों का चित्त तो विक्षुब्ध नहीं हो रहा इसका ध्यान रखना है. मन ही पुण्य शील है और मन ही पाप करवाता है. जब हम असजग होते हैं तभी दुःख पैदा करते हैं. मन को गहराई से देखें तो यह अमनी भाव में चला जाता है वहाँ न पुण्य है न पाप. तब मन संवेदनशील होता है, जागरूक होता है, इस जगत की सच्चाइयों को भीतर से जान लेता है, अनुभव के द्वारा पाया ज्ञान ही स्थायी होता है. तब सारे संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं. अपने ही मन के द्वारा बनाये गए कल्पना के जाल से मुक्ति का अनुभव होता है.

Friday, June 29, 2012

अनंत की ओर


मई २००३ 
ज्ञान वही है जो वक्त पर काम आये, नहीं तो मस्तिष्क पर बोझ डालने जैसा ही है. जो वस्तु, व्यक्ति व परिस्थिति को को नहीं स्वीकारते, वही दुखी होते हैं, जो मुसीबत आने पर मुस्कान से किनारा कर लेते हैं, वे कहाँ तत्व को जान पाए. जब ज्ञान के अवसर का उपयोग आये तब हम अक्सर चूक जाते हैं. अध्यात्म की दुनिया अनंत है, उसमें कोई सीमा हो ही नहीं सकती. वह मुक्त करती है. आत्मा की शक्ति का परिचय हमें इसी दुनिया में मिलता है. वह दुनिया इसी दुनिया में है, बल्कि यह दुनिया, यह छोटा सा जगत उस अनंत दुनिया में समाया है. हमें तो बंधन पसंद है सो उस अनंत दुनिया से हम वास्ता नहीं रखते. पर जब बंधन बोझ लगने लगे, कोई पूर्व पुण्य उदय हो जाये, कृपा हो जाये तो उस अनंत दुनिया के द्वार हमारे लिये खुलने लगते हैं.