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Tuesday, April 25, 2017

बहता जाये मन नदिया सा

२६ अप्रैल २०१७ 
प्रकृति में हो रहे परिवर्तनों को हम आसानी से स्वीकार लेते हैं. उसके अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं. सर्दी और गर्मी से बचने के कितने ही साधन मानव ने खोज निकाले हैं. देह भी प्रकृति का ही अंश है और मन भी, देह भी सदा एक सी नहीं रहने वाली और मन तो पल-पल में बदलता है. जैसे स्वयं का मन बदलता है वैसे ही अन्यों का भी. किसी के प्रति कोई धारणा बनाकर उसी के अनुसार उससे व्यवहार करना वैसा ही है जैसे ग्रीष्म ऋतु के चले जाने पर भी सूती वस्त्र ही पहनने का आग्रह रखना. जैसे रुका हुआ पानी पीने लायक नहीं रहता वैसे ही रुका हुआ मन यानि की पूर्वाग्रहों से युक्त मन भी मैत्री,  करुणा व मुदिता के मार्ग पर नहीं चल सकता. जगत के प्राणियों के प्रति मैत्री का भाव हमें जड़ता से मुक्त रखता है. अंतर में जगी करुणा ह्रदय को कोमल बनाये रखती है और मुदिता तो वह आभूषण है जो हर हाल में हमें सौन्दर्य प्रदान करता है. 

Friday, May 15, 2015

साक्षी का जब फूल खिलेगा

फरवरी २००९ 
हमारी नजर दूसरों के दोषों पर रहती है, जिससे अपने दोष नहीं दीखते. सद्गुरु कहते हैं, हम अपना अवलोकन करें जैसे कोई रास्ते के किनारे खड़ा होकर तटस्थ भाव से भीड़ को देखता है. हम न्यायाधीश न बनें, साक्षी बने रहें और हमारी तटस्थता से देखने से पता चलता है कि हम अपने कृत्यों से अलग हैं, हम कर्ता नहीं हैं, यही मुक्ति का द्वार है. जो अपने शुभ कर्मों से बंधा है, वह अशुभ से भी बंधा रहेगा. जिसने पुण्य का फल चाहा वह पाप के फल से बंधा ही रहेगा. राग-द्वेष से मुक्त मन ही साक्षी बन सकता है. साक्षी की सुवास टिकी रहे तो दिन भर मुदिता बनी रहती है. परमात्मा भीतर ही है, हृदय परमात्मा का है पर बुद्धि समाज द्वारा दी गयी है. प्रार्थना हृदय से उतरती है तो सीधे परमात्मा तक पहुंचती है. वह अनवरत प्रतीक्षारत है, हम ही नजरें बचा लेते हैं.