जीवन एक पाठशाला ही तो है, जहां हर कदम पर हमें सीखना होता है। किसी की उम्र चाहे कितनी हो, वह बालक हो या वृद्ध, सीखने की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। कोई भी यहाँ पूर्ण नहीं है, पूर्णता की ओर बढ़ रहा है। अहंकार का स्वभाव है वह स्वयं को पूर्ण मानता है, अत: व्यक्ति सीखना बंद कर देता है; और अपने को मिथ्या ही पूर्ण मानता है। ऐसे में उसके भीतर एक कटुता, कठोरता तथा दुख का जन्म होता है। सीखते रहने की प्रवृत्ति उसे बालसुलभ कोमलता प्रदान करती है। बच्चे जैसा लचीला स्वभाव हो तभी हम आनंद के राज्य में प्रवेश पा सकते हैं। प्रकृति या अस्तित्त्व हमें ऐसी परिस्थितियों में रखते हैं, जहां अहंकार को चोट पहुँचे। यदि दुख का अनुभव अब भी होता है, शिकायत का भाव बना हुआ है अहंकार का साम्राज्य बना हुआ है। स्वाभिमान जगा नहीं है। स्वाभिमान में व्यक्ति अपने प्रेमस्वरूप होने का अनुभव करता है। वहाँ कोई दूसरा है ही नहीं। कृतज्ञता की भावना से वह भरा रहता है। जो उसे कटु वचन कह रहा है मानो वह उसकी परीक्षा ले रहा है, मानो परमात्मा ने उसे वहाँ रखा हुआ है। जब मन कृतज्ञता से भरा हो तो उसमें कैसी पीड़ा ! हर श्वास जब परमात्मा की कृपा से मिली है तब जिस परिस्थिति में रखा जाये वह किसी बड़ी योजना का भाग है ऐसा मानना होगा। यह सृष्टि किसी विशाल आयोजन की तरह किसी शक्ति द्वारा चलायी जा रही है, यहाँ यदि हम स्वयं को जानकर उसमें परमात्मा के सहायक बनना चाहते हैं तो हमें विनम्र होना सीखना होगा, यह पहली सीढ़ी है।
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Wednesday, August 9, 2023
Monday, November 28, 2022
कण -कण में जो देखे उसको
जब तक हम सुख-दुःख के भोक्ता बनते हैं, मान-अपमान हमें प्रभावित करता है, तब तक हम मन के तल पर ही जी रहे हैं। आत्मा साक्षी है, वहाँ न सुख है न दुःख, एकरस आनंद है। न अपमान का भय है न मान की आकांक्षा, वह साक्षी सदा एक सी किंतु सहज अवस्था है। वह दिव्यता का एक अंश है जो हमारा वास्तविक स्वरूप है, पर जो अन्नमय, प्राणमय, मनोमय और विज्ञानमय कोष के आवरण में छिपा हुआ है, जिसे आनंदमय कोष भी कहते हैं। स्वयं के भीतर उसे अनुभव करना और विश्व आत्मा या परमात्मा के साथ एक हो जाना ही हर साधना का लक्ष्य है; अर्थात पहले हमें अपने भीतर उस दिव्य तत्व को अनुभव करना है फिर कण-कण में उस दिव्यता का अनुभव करना है। हर व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति के पीछे वही एक सत्ता है, इसका अनुभव सीधे-सीधे नहीं हो सकता। पहले गुरू में उसके दर्शन होते हैं फिर स्वयं में तथा फिर जगत में, इसके बाद साधक जीते जी मुक्ति का अनुभव करते हैं। सारे बंधन मन के स्तर पर ही अनुभव में आते हैं।
Sunday, September 22, 2019
भवचक्र से पार हुआ जो
यह दुनिया मानो एक
रंगशाला है, जिसमें अलग-अलग देश अपनी भूमिकाएं निभा रहे हैं, छोटे देश, बड़े देश,
बीच के देश. कुछ युद्ध के लिए लालायित देश, कुछ शांति प्रिय देश....सभी की
अपनी-अपनी भूमिका है जिसे वह निभा रहे हैं. निर्देशक कहीं नजर तो नहीं आता पर वह
है जरूर, सभी सोचते हैं जिसमें उनका लाभ हो ऐसे कदम उठायें, उसके लिए अन्य देशों
की हानि भी उन्हें मंजूर है. इस खेल-तमाशे में इतना जोश जनता के भीतर भर दिया जाता
है कि अक्सर वह अपना होश ही गंवा बैठती है. अनेक कष्टों का सामना भी वह कर लेती है
जब उसे राष्ट्रहित और धर्म के नाम पर भावनात्मक रूप से उकसाया जाता है. आज सारी
दुनिया में यह हो रहा है, न जाने कितनी बार मानव सभ्यता अपने विकास की चरम सीमा पर
पहुँची पर इसी उन्माद के कारण उसका विनाश हुआ. यहाँ भीड़ को प्रेरित करके कुछ भी
कराया जा सकता है, व्यक्ति की बात कौन सुनता है. जब कोई एक देश, दूसरे के तेल
संस्थानों पर बेवजह हमला कर देता है, और कोई इसकी जिम्मेदारी भी नहीं लेता, तो यही
लगता है कि मानव की बुद्धिहीनता की कोई सीमा नहीं है. यहाँ ज्ञान भी अनंत है और
अज्ञान भी, यहाँ एक ही सम्प्रदाय के लोग आपस में तो लड़ते रहते हैं पर दूसरे सम्प्रदाय
के खिलाफ बोलने से भी गुरेज नहीं करते. संत
कहते हैं, सम्प्रदाय छिलका है धर्म भीतर का फल है, पर ये छिलके पर ही अटके हुए हैं,
वास्तविक धर्म से तो इनका अभी वास्ता ही नहीं पड़ा शायद इसी को हमारे शास्त्रों में
लीला कहा गया है.
Sunday, August 11, 2019
स्वयं का ही जो शासन माने
अपने सुख-दुःख के लिए जब हम
स्वयं को जिम्मेदार समझने लगते हैं, तब अध्यात्म में प्रवेश होता है. जब तक हमारा
सुख-दुःख व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति पर निर्भर है, तब तक हम संसार में रचे-बसे
हैं. संसारी होने का अर्थ है पराधीन होना, अपनी ख़ुशी के लिए दूसरों की पराधीनता को
स्वीकार करना ही अधार्मिकता है. 'दूसरे' में व्यक्ति, वस्तु और परिस्थति तीनों ही
आ जाते हैं. तुलसीदास ने कहा है, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं...इसलिए स्वतंत्र
प्रकृति का व्यक्ति जगत में अपनी राह खुद बनाता है, अपने भाग्य का निर्माता स्वयं
बनता है. ऐसा व्यक्ति कर्मयोगी बन सकता है, ज्ञानी बन सकता है, भक्त बन सकता है, तीनों
बन सकता है. निष्काम कर्मयोग के द्वारा परमात्मा को सब प्राणियों में देखा जा सकता
है, ज्ञान के द्वारा परमात्मा को स्वयं में देखा जा सकता है और भक्ति के द्वारा कण-कण
में देखा जा सकता है. सत्संग के द्वारा ही हम सभी अध्यात्म में प्रवेश के अधिकारी
बनते हैं.
Tuesday, April 24, 2018
किताबों की दुनिया
२४ अप्रैल २०१८
आज विश्व पुस्तक दिवस है. किताबों के बिना जीवन कैसा होता, इसकी कल्पना भी दुरूह
है. बचपन से ही किताबें मानव की साथी बन जाती हैं. पढ़ना तो दूर शिशु जब बोलना भी
नहीं जानता, किताबों को उलटता-पलटता है और जब कोई उसे पढ़कर सुनाता है तो तिलिस्म
जैसी एक दुनिया उसके सामने खुलती जाती है. बाल कविताओं और कहानियों की किताबें
उसके सामने एक ऐसी दुनिया का चित्रण करती हैं जिसे उसने अभी देखा नहीं है पर जिसके
बारे में जानने की इच्छा सदा से उसके मन में थी. एक व्यक्ति के मानसिक धरातल पर
उसके संगी वे पात्र भी होते हैं जिनसे किसी पुस्तक में उसकी भेंट हुई थी. विश्व के
कितने महान लेखक हैं, जैसे शेक्सपीयर, गोर्की, टालस्टाय, चेखव, विक्टर ह्यूगो,
प्रेमचन्द, अज्ञेय, दिनकर, महादेवी वर्मा और ऐसे ही कई अन्य अनगिनत लेखक व
लेखिकाएं, जिनके नाम दुनिया के हर कोने में जाने जाते हैं, जिन्होंने लाखों
व्यक्तियों के हृदयों को किसी न किसी रूप में छुआ है. हम कौन सी किताबें पढ़ते हैं
इसके द्वारा ही यह पता चल सकता है कि हमारा कितना मानसिक विकास हुआ है. विश्व
पुस्तक दिवस पर उन तमाम लेखकों को सादर नमन जिनकी पुस्तकें पढ़कर मन आह्लादित हुआ
है, किसी न किसी रूप में लाभान्वित हुआ है.
Monday, December 18, 2017
मुक्त हुआ मन जब आशा से
१८ दिसम्बर २०१७
व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति से किसी न किसी प्रकार की अपेक्षा रखना
ही व्यक्ति के दुःख का कारण है, यह बात न जाने कितनी बार हमने सुनी है. मन यदि
असंतुष्ट है तो इसका एकमात्र कारण है अपेक्षाओं का पूरा न होना. एक प्रकार से मन
अपेक्षाओं का ही दूसरा नाम है. जब तक यह बात अनुभव से स्वयं को सही न जान पड़े तब
तक अपेक्षा से मुक्त होना सम्भव नहीं है. इसीलिए जिस क्षण प्रमाद और अनावश्यक
क्रिया से मुक्त होकर साधक निज स्वभाव में लौटना चाहता है कोई न कोई स्मृति
संस्कार रूप में आकर उसे विचलित कर देती है. अशांति का हल्का सा धुआं भी मन को
ध्यानस्थ नहीं होने देता. सजग होकर यदि उस संस्कार के पीछे के कारण को जानने का
प्रयास करें तो कोई न कोई अपेक्षा ही उसके मूल में दिखाई देती है.
Thursday, September 28, 2017
एक चेतना सबको जोड़े
२८ सितम्बर २०१७
जब हम कहते हैं ‘घट घट में
राम’, तब हम सभी के मध्य अनुस्यूत एक समान धारा को देखने का प्रयास कर रहे होते हैं. मानवों के स्वभाव
पृथक-पृथक हैं, ज्ञान का स्तर भी एक नहीं है, रूप-रंग में एक देश के लोग दूसरे देश
के लोगों के समान नहीं होते, किंतु उन्हें एक करती है भीतर की चेतना, वही उन्हें
निकट लाती है और वही उन्हें सशक्त करती है. व्यक्ति चेतना से जितना दूर निकल जाते
हैं, समाज में विघटन उतना ज्यादा होता है. जहाँ वर्गभेद भारी हो, लोगों को आपस में
जुड़ने के लिए कोई तो समानता चाहिए. समान रूचि वाले व्यक्ति जुड़ जाते हैं, क्योंकि
उनकी चेतना किसी एक दिशा में प्रवाहित होती है. जितना-जितना व्यक्ति चेतना को मुखर
होने का अवसर देगा, उसे भेद गिरते नजर आयेंगे. समाज में एकता बढ़ेगी और एकता में ही
शक्ति है. शक्ति की पूजा के पर्व पर इसे याद रखना होगा.
Tuesday, July 11, 2017
प्रतिपल बदल रहा है जग यह
१२ जुलाई २०१७
हमारे दुखों का कारण हमारे ही भीतर है, इसका ज्ञान होते ही हम सबल हो जाते हैं. जिस
वस्तु का निर्माण हमने किया है उसे नष्ट करने की क्षमता भी तो हमारे ही पास है.
यदि जगत हमारे दुखों का कारण हो तब तो हम असहाय हैं, क्योंकि जगत को बदलने की
क्षमता हमारे पास है ही नहीं, जगत अपनी राह चलेगा ही. यदि बाहरी कारण हमारे अंतर्मन
की दशा को प्रभावित करते हैं तब तो हम कभी भी प्रसन्न नहीं रह सकते क्योंकि बाहर
तो सब कुछ प्रतिपल बदल रहा है. मौसम ही अनुकूल-प्रतिकूल होते रहते हैं. व्यक्ति
बदल जाते हैं. यहाँ तक कि हमारा खुद का मन भी सुबह, दोपहर और शाम को अलग-अलग भावों
में रहता है. बस एक हम ही हैं जो कभी नहीं बदलते, जो अनंत काल से जैसे थे अनंत काल
तक वैसे ही रहेंगे. पर हम तो अपने उस न बदलने वाले स्वयं से कभी मिले ही नहीं, इसलिए
कभी ख़ुशी कभी गम के गीत ही गाते रहे.
Wednesday, June 21, 2017
योगी बनें उपयोगी बनें
२१ जून २०१७
हमारे अस्तित्त्व के कई स्तर हैं, कोई भी व्यक्ति अंतिम स्तर तक भी जा सकता है और
केवल पहले पर ही रह कर पूरा जीवन बिता सकता है. देह के स्तर पर अन्य जीवों और
मानवों में ज्यादा भेद नहीं है, मन के स्तर पर मानव मनन चिंतन कर सकता है जो अन्य
प्राणी नहीं कर सकते. आत्मा के स्तर पर मनुष्य अपने भीतर आनंद और शांति के स्रोत
से जुड़ सकता है. उसे पूर्ण स्वाधीनता और प्रसन्नता का अनुभव इसी स्तर पर होता है.
योग ही इसका एकमात्र उपाय है. योग का अर्थ है जुड़ना, व्यष्टि का समष्टि से जुड़ना अथवा
तो मन का आत्मा से जुड़ना. इसका आरम्भ देह से होता है, फिर श्वास की सहायता से मन की
गहराई में जाकर व्यक्ति को जगत के साथ एकत्व का अनुभव होता है. योग को केवल कुछ आसनों
तक ही सीमित कर देना ऐसा ही है जैसे शिक्षा का उपयोग मात्र जीविकापार्जन के लिए
करना.
Monday, May 29, 2017
जीवन जब उपहार बने
३० मई २०१७
जीवन की संपदा अपने आप में इतनी अनमोल है कि उस पर सब कुछ लुटाया जा सकता है, किन्तु मानव न जाने किस सुख की तलाश में जीवन को ही लुटा देने पर तुला रहता है. हम वस्तुओं को इकठ्ठा करते हैं, फिर वे एक बोझ बनकर अपनी सुरक्षा के लिए हमारे सामने उपस्थित हो जाती हैं. संबंध बनाते हैं पर दोनों तरफ की अपेक्षाएं उसे एक संघर्ष बना देती हैं. हम चाहते हैं सारी परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल बनी रहें पर जीवन का स्वभाव ऐसा नहीं है, यहाँ पल-पल संयोग बनते-बिगड़ते रहते हैं. इस आपाधापी में हम असली बात को भुला ही देते हैं, परमात्मा का साथ जो हमें सहज ही मिल सकता है, आत्मा का स्पर्श जो सदा ही हमारे साथ रहती है, हमारा मन जो स्वयं में डूबना चाहता है, कभी प्रकृति के सौन्दर्य में, कभी संगीत में, कभी बस चुपचाप प्रियजनों के साथ चांदनी रात में बैठकर, लेकिन आज के मानव के पास अपने निकट आने के लिए समय ही नहीं है. जीवन तब एक दुविधा बन जाता है.
Friday, October 17, 2014
खिला खिला हो मन का उपवन
हमारे
मन में न जाने कितने-कितने जन्मों की कामनाओं के संस्कार पड़े हुए हैं और उसी तरह न
जाने कितने सद्गुण, खजाने स्नेह भाव भी पड़े हैं. यह बीज समुचित वातावरण पाते ही
अंकुरित हो जाते हैं. हम जो भी पढ़ते-सुनते हैं या जिन व्यक्तियों के संपर्क में
आते हैं, जिस प्रकार का भोजन ग्रहण करते हैं, उस स्थान, व्यक्ति या भोजन की
प्रकृति हमें अवश्य प्रभावित करती है. संग का मानसिक उन्नति पर अत्यधिक प्रभाव
पड़ता है. हमें जो चाहिए उसी के अनुकूल खाद व पानी दें तो मन का उपवन व्यर्थ के
खर-पतवार तथा जंगली काँटों से मुक्त रहेगा. ईश्वर प्रकट हो सकेगा. अच्छाई और बुराई
के बीच का महाभारत हर एक को अपने भीतर लड़ना है. यदि ईश्वर की निकटता का अनुभव करना,
इस सृष्टि के रहस्य पर से पर्दा उठाना यदि जीवन का लक्ष्य नहीं तो मानव जीवन की
सार्थकता ही नहीं रह जाती. इससे छोटे लक्ष्य तो हमें विपरीत दिशा में ले जाते हैं.
Monday, September 22, 2014
पल पल रहे जागता मन जब
मार्च २००७
प्रेम का मार्ग अति कठिन है, प्रेम किसी क्रिया या पदार्थ पर
निर्भर नहीं करता. मन रूपी दर्पण पर जमी धूल सामने हो तो आत्मा रूपी प्रेम नहीं दिखता
जब क्रिया या पदार्थ के प्रति आसक्ति के प्रति सजग होकर कोई उसे त्याग देता है तो
उसमें एक नई जागृति उत्पन्न होती है और वह अपने मन पर लगी धूल साफ करने लगता है.
यह जागृति ही प्रेम को जन्म देती है. जो जागता है उसका ध्यान परमात्मा करता है, जागरण
का अर्थ है आत्मा में स्थित हो जाना और आत्मा परमात्मा का अंश है. जागना यानि
सजगता हमें पल-पल मुक्त रखती है. यही जीवन मुक्ति है. भीतर से ऐसी मुक्तता का
अनुभव करना हमें प्रेम सिखाता है. वही सहजता है, वही योगी का लक्ष्य है, ध्यानी का
और ज्ञानी का लक्ष्य है. हर जाता हुआ क्षण हमें विश्रांति का अनुभव दे और हर आता
हुआ शक्ति का तो हम कार्य करते हुए भी आनन्द का अनुभव करते हैं तथा कुछ न करते हुए
भी तृप्ति का. सजगता आती है सजग रहने से जैसे तैरना आता है तैरने से, इसमें किसी
व्यक्ति, वस्तु, क्रिया पर हमें निर्भर नहीं रहना है. सद्गुरु ने यह मार्ग दिया
है, अब चलना तो स्वयं ही होगा. यह तलवार की धार पर चलने जैसा है पर इस पर चलने का
बल परमात्मा हमें देता है, उसकी कृपा तो बरस रही है अनवरत !
Sunday, February 2, 2014
मुक्त रहें जो कर्तापन से
जुलाई २००५
हमारा
सारा जीवन कर्मों की एक श्रृंखला ही तो है. मन जब निज केंद्र में रहना सीख जाता है,
स्वयं में स्थित रहकर परमात्मा को पूर्ण समर्पित अनुभव करता है, तब कर्त्ता भाव से
मुक्त होता है और तब वह भी उसी तरह सम्पूर्ण कार्यों को होते हुए देखता है जैसे
कोई अन्य व्यक्ति. जब हम कर्तापन के भाव से दब जाते हैं तभी दुःख के भोक्ता बनते
हैं. गुण-गुणों में बरत रहे हैं यह जानकर जब हम अलिप्त रहते हैं हमारे भीतर आनन्द
की अजस्र धारा निरंतर बहती रहती है. एक क्षण का भी व्यवधान उसमें हुआ तो साधक को
सहन नहीं होता.
Wednesday, July 24, 2013
वसुधैव कुटुम्बकम
नवम्बर २०१३
हमारे समाज में बहुत विषमता है, कुछ सोने के चम्मच से खाते
हैं, कुछ के पास भोजन ही नहीं है. इसका एक कारण सामुदायिकता की चेतना का अभाव भी है.
यह चेतना कैसे व्यापक हो इसका हल वेदांत के पास है. वेदांत के अनुसार ब्रह्म एक
है, सभी के भीतर मूल संस्कार एक से हैं पर इसका भान नहीं है. जब हमें अपने भीतर
आत्मा का भास होने लगता है तो दृष्टिकोण विशाल हो जाता है, जीवन शैली बदलने लगती
है, व्यवहार बदलने लगता है, सारा समाज, सारा देश, सारा विश्व हमारा परिवार बनने
लगता है. साधकों के लिए यह अत्यंत जरूरी है कि व्यक्तिवादी मनोवृत्ति को बढ़ावा न
मिले, सभी के भीतर उसी चेतना को देखने का अभ्यास हो.
Thursday, April 4, 2013
सहज हुए से सुख आता है
यदि कोई किसी भौतिक वस्तु,
परिस्थिति या व्यक्ति से ही सुख प्राप्त करने का प्रयास करेगा तो दुःख का भागी भी उसे
होना ही पड़ेगा. सुख के पीछे भागो तो नियम के अनुसार दुःख पीछे-पीछे आता ही है, इसी तरह यदि सुख का केन्द्र
ज्ञान है तो आनंद पीछे-पीछे आयेगा. इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले भोग अक्सर रोग के
कारण बनते हैं और ज्ञान से प्राप्त होने वाला आनंद योग कराता है. ईश्वर ने हमें
बुद्धि प्रदान की है जो ज्ञान की आकांक्षी है, जो भीतर के रस से ही तृप्त हो सकती
है, उस रस से, जिसका स्रोत प्रेम है. जीवन में प्रेम नहीं है तो आनंद निज की वस्तु
बनकर रह जायेगा, उसका व्यवहारिक रूप प्रेम है. भीतर के आनंद का बाहर प्राकट्य हमारे
कर्मों से होगा, अन्यथा बादलों में बिजली की चमक की तरह उसका आना होगा. जो चिर
स्थायी है, ऐसी तेल धारवत् शांति जब हृदय में छायी रहे वही आनंद है.
Thursday, October 11, 2012
मन लहर आत्मा सागर
सितम्बर २००३
सागर में निरंतर लहरें उठती-गिरती हैं, तट से टकरा कर लौट जाती हैं, तट पर बैठा
व्यक्ति उन्हें देखता है, उनसे पृथक रहकर वह उन्हें अनुभव करता है वैसे ही हमारे मन-सिंधु
में निरंतर सुख-दुःख की लहरें आती-जाती हैं, हम उन्हें देखते रहें तो वे अपने-आप
ही चली जाती हैं, इस तरह हम पूर्व जन्मों के तथा इस जन्म के पूर्व कर्मों के फलों
को काटते जाते हैं, यदि सुख-दुःख के भोक्ता बने तो नए बीज डाल दिए, जिन्हें भविष्य
में काटना होगा तथा यह चक्र अनवरत चलता ही रहेगा. सत्संग से हमारे पूर्व संस्कार
नष्ट होते हैं तथा नित नए सात्विक संस्कार बनते हैं जो बंधन में डालने के लिए नहीं
वरन् मुक्त करने के लिए हैं. इस ज्ञान में स्थित हैं तो कोई भय प्रतीत नहीं होता,
कोई भी इच्छा बांधती नहीं. मन पंछी मुक्त हो उड़ता है. हमारे भीतर ही पशुता,
मानवीयता और देवत्व छिपा है. साक्षी भाव मानवीयता को विकसित करते हुए देवत्व तक ले
जाता है, हम मांगने की प्रथा छोड़कर देने की स्थिति में आ जाते हैं. आत्मा स्वयं
में पूर्ण है, संसार से हमें ऐसा कुछ भी नहीं मिल सकता जो पहले से ही उसमें नहीं
है, फिर पूर्ण अपूर्ण को क्या दे सकता है. प्रेम, आनंद, शांति, संतुष्टि, ज्ञान यह
सभी भीतर हैं और एक बार मिल जाने के बाद कभी खोते नहीं. साक्षी अलिप्त है, सदा
एकरस और सदा उत्साह से परिपूर्ण. वह नित्य सक्रिय है, वह ऊर्जा है, ऊर्जा का
अपरिमित भंडार, वह द्रष्टा है और स्रष्टा भी वही है.
Friday, June 29, 2012
अनंत की ओर
मई २००३
ज्ञान वही है जो वक्त पर काम आये, नहीं तो मस्तिष्क पर बोझ डालने जैसा ही है. जो
वस्तु, व्यक्ति व परिस्थिति को को नहीं स्वीकारते, वही दुखी होते हैं, जो मुसीबत
आने पर मुस्कान से किनारा कर लेते हैं, वे कहाँ तत्व को जान पाए. जब ज्ञान के अवसर
का उपयोग आये तब हम अक्सर चूक जाते हैं. अध्यात्म की दुनिया अनंत है, उसमें कोई
सीमा हो ही नहीं सकती. वह मुक्त करती है. आत्मा की शक्ति का परिचय हमें इसी दुनिया
में मिलता है. वह दुनिया इसी दुनिया में है, बल्कि यह दुनिया, यह छोटा सा जगत उस
अनंत दुनिया में समाया है. हमें तो बंधन पसंद है सो उस अनंत दुनिया से हम वास्ता
नहीं रखते. पर जब बंधन बोझ लगने लगे, कोई पूर्व पुण्य उदय हो जाये, कृपा हो जाये
तो उस अनंत दुनिया के द्वार हमारे लिये खुलने लगते हैं.
Friday, May 18, 2012
एक यात्रा पर जाना है
मार्च २००३
कोई भी घटना, व्यक्ति,
वस्तु अथवा परिस्थिति हमें आत्मसुख से वंचित करे उसमें इतना बल नहीं है, सुखी अथवा
दुखी होना हमारे ही हाथ में है. हम मौन में रहकर जिस आत्मशक्ति का संचय करते हैं,
उसे मिथ्या अहंकार वश पल भर में गंवा देते हैं. सुबह साधना करते हैं, शाम को निंदा
करते हैं, तो हिसाब-किताब बराबर, और हम वहीं के वहीं रह जाते हैं. कोई छोटी से
छोटी बात हमें हिला जाती है. तूफ़ान में एक पत्ते की तरह हम कांपते हैं. अपने मन को
आत्मनिष्ठ बनाना हमारे अपने हाथ में ही है. स्वयं को दुखी होने से बचाना हमारे खुद
के हाथ में है. अस्वस्थ हुआ तो शरीर हुआ, कोई दुःख हुआ तो मन को हुआ पर हम न तो शरीर
हैं न मन. स्वयं को इन दोनों से पृथक जानना ही होगा. ध्यान यही कला है. जीवन को एक
योद्धा की तरह जीना है, सदा सन्नद्ध व सजग, ताकि कोई भीरुता न भीतर घर कर जाये,
जीवन एक यात्रा ही तो है, जैसे एक यात्रा में कुछ सामान साथ लेकर चलना पड़ता है, सजग रहना होता है और मंजिल की ओर
ही ले जाये ऐसे कदम बढ़ाने होते हैं वैसे ही जीवन रूपी यात्रा में हमें साहस व
श्रद्धा का सामान लेकर आनंद रूपी मंजिल तक जाना है. हम यदि सजग यात्री हैं तो
मंजिल स्वयं आयेगी. हमारे संकल्प शुभ होते हैं तो प्रकृति भी हमारा सहयोग करती है.
ईश्वर तो अकारण हमारा मित्र है, वह हमसे जितना प्रेम करता है हम शतांश भी नहीं कर
सकते.
Tuesday, February 28, 2012
खजाना भीतर है
जनवरी २००३
जब जीवन का उद्देश्य मोक्ष हो तब हर वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति का सद्पुयोग होता है. भीतर का सुख पाने की कला आ जाती है. तब मन बाहर से सुख नहीं खोजता, जो भी उसे मिल जाता है उसमें ही आनंद मनाता है. आनंद ही हमारा मूल स्वभाव है, ज्ञान हमें इससे परिचित कराता है और तब यह संसार हमें खेल लगने लगता है. यह जीवन हमें इसलिए मिला है कि अपने भीतर के खजाने को पाकर बाहर इसे लुटायें न कि बाहर वस्तुओं का संग्रह करते फिरें और बाद में उन्हें छोड़कर निराश होकर मर जाएँ. हमारा जीवन एक उत्सव है कभी न समाप्त होने वाला उत्सव, जिसमें हमें उस सच्चिदानन्द का साथ मिला है. आनंद घन हमें ज्ञान प्रदान करता है, उसकी कृपा का पात्र बनते ही वह हमें बुद्धियोग प्रदान करता है. वही प्रियतम है, इस जीवन का आधार है.
Monday, June 6, 2011
अध्यात्म
अप्रैल २०००
अपने सुख के लिये किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति पर जो आश्रित नहीं है, वह स्वाधीन है. जिसे कर्म का बंधन नहीं है, अपने आप में जो पूर्ण है, वह स्वाधीन है. जिसकी आवश्यकताएं कम हैं, जो दीन नहीं है, ऐसा एक ही तो है, वह है परमेश्वर ! हमें उसी के आदर्शों पर चलना है. जीवन एक यात्रा है और ईश्वर उसकी मंजिल. रास्ता कहीं दिखाई नहीं देता, रास्ता भी हमें खुद ही बनाना है. नैतिक मूल्यों की स्थापना करके अपने जीवन में शुचिता और पवित्रता को अपनाकर, अपने आसपास फैले दुर्गुणों से स्वयं को बचाकर, सिर्फ स्वयं को ही नहीं, परिवार को, समाज को, फिर राष्ट्र को सबल बनाना है. यही हमारी धार्मिकता है, यही आध्यात्मिकता है. अध्यात्म मात्र मुक्ति की कामना नहीं है, स्वयं को सबल, शुद्ध व आदर्श बनाते-बनाते कहीं स्वार्थी न हो जाएँ इसका भी ध्यान रखना होगा. लेकिन पहली सीढ़ी तो यही है, हृदय जब शुद्ध होगा, विचार उच्च होंगे, प्रेम की भावना उदात्त होगी मन संकुचित नहीं होगा, सभी प्राणियों में एक उसी की सत्ता का अनुभव होगा, सबको अपनी नजरों से देखेंगे तो सारा जहाँ अपना हो जायेगा, जो ईश्वर का स्थूल रूप है. मन में उहापोह नहीं रहेगी, भावनाएँ एक ओर केंद्रित होंगी तो ध्यान भी सधेगा और तब ईश्वर के सूक्ष्म रूप यानि आत्मा का साक्षात्कार भी होगा.
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